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Friday, December 23, 2011

प्राचीन हस्तलिखित ‘रामचरित मानस’ की चोरी

   गंगा किनारे तुलसीघाट के तुलसी मंदिर से गुरुवार को प्राचीन रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रति चोरी हो गई। मंदिर के एक तरफ के द्वार की कुंडी तोड़कर चोर ‘रामचरित मानस’ के दो भागों के अलावा एक वाल्मीकि रामायण और चांदी का एक मुकुट भी साथ ले गए। अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) मानसिंह चौहान ने बताया कि मंदिर के पुजारी दुर्गा शंकर मिश्र की तहरीर पर भेलूपूर थाने में मामला दर्ज किया गया है। पुजारी के मुताबिक, दिन में दस बजे मंदिर खोलते वक्त एक द्वार की कुंडी टूटी हुई मिली। पुजारी की सूचना पर जिलाधिकारी रवींद्र और पुलिस उप महानिरीक्षक राम कुमार भी देर रात मौके पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। डाग स्क्वाड के साथ पुलिस टीम ने चोरों का सुराग पाने की नाकाम कोशिश की।वाराणसी, 23 दिसंबर (भाषा)।

Tuesday, December 13, 2011

मिला सबसे पुराना बिस्तर

  पुरातत्ववेताओं ने दावा किया है कि उन्होंने बिस्तर के सबसे पुराने साक्ष्य खोज निकाले हैं। जिसमें गुफा मानव मच्छरों को भगाने वाले पौधों का उपयोग करते थे। उनका अनुमान है कि इस बिस्तर पर गुफा मानव करीब 77,000 वर्ष पहले सोया करते थे. डेली मेल की खबर के मुताबिक, जोहान्सबर्ग में यूनिवर्सिटी ऑफ द विटवाटरसैंड के लीन वाडले के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में एक गुफा में पत्तों और तनों से बना एक बिस्तर खोजा है।
सिबुदु खनन क्षेत्र में कम से कम तीन भिन्न सतहों में बिस्तर के साक्ष्य मिले हैं। इस बिस्तरों पर 38 हजार से 77 हजार वर्ष पहले लोग सोया करते थे।
सोने की जगह के अलावा इस बिस्तरों में मच्छर भगाने वाले रसायनों का भी प्रयोग किया गया है ताकि मच्छर दूर रहें।

 (साभार-समय लाइव।

Wednesday, November 9, 2011

ढह रही हैं अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतें

  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अवध के पहले बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने जो छतरमंजिल बनवाई थी उसका पोर्च मंगलवार को अचानक ढह गया। आसिफुद्दौला के बनवाए रूमी दरवाजा में दरार आ गई है तो वाजिद अली शाह के पिता अमजद अली शाह का मकबरा अतिक्रमण का शिकार है। शाहनजफ इमामबाड़ा के परिसर को शादी ब्याह के लिए भाड़े पर दिया जाता है। शादी ब्याह और पाटिर्यों के चलते यहां शोर शराबा और खाना पीना भी चलता है। खाना बनाने के लिए भठ्ठियां सुलगती रहती हैं और धुआं ऐतिहासिक ईमारत को नुकसान पहुंचता है। इसका निर्माण भी बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने 1816-17 में करवाया था। बड़ा इमामबाड़ा परिसर से लेकर छोटा इमामबाड़ा परिसर में लोगों ने मकान से लेकर दुकान तक खोल ली है। यह बानगी है लखनऊ की ऐतिहासिक ईमारतों की बदहाली की।
मंगलवार को छतरमंजिल का 15 फुट ऊंचा और तीस फुट लंबा पोर्च अचानक गिर जाने के बाद सब की नींद खुली है। यह ऐतिहासिक इमारत है और कई दशक से इसमे सेंट्रल ड्रग रिसर्च सेंटर की प्रयोगशाला चल रही है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के निदेशक राकेश तिवारी के मुताबिक यह इमारत जर्जर हो चुकी है। सीडीआरआई को करीब एक दशक पहले ही इसकी जानकारी दे दी गई थी पर इसे खाली नहीं किया गया। यह बताता है कि किस तरह ऐतिहासिक धरोहरों की अनदेखी की जा रही है। नवाबों के वंशज और अभिनेता जाफर मीर अब्दुल्ला ने जनसत्ता से कहा-सरकार तो चाहती है यह सब ऐतिहासिक इमारते गिर जाएं क्योकि वह तो नया इतिहास बना रहे हैं। उनके स्मारक यहां बन रहे हैं जिनका इस अवध की जमीन से कोई रिश्ता नहीं रहा । जिन लोगों ने अवध का निर्माण किया उनके स्मारक ढह रहे हैं। भारी ट्रैफिक के कारण रूमी दरवाजे में दरार आ चुकी है तो इमामबाड़ा में अतिक्रमण बढ़ रहा है। सिबटेनाबाद इमामबाड़ा के गेट पर तो सरकार ने ही अतिक्रमण कर लिया है।
जाफर मीर अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट की सांस्कृतिक समिति के सेक्रेट्री जनरल(रिटायर) और स्वीडन में बसे मशहूर वास्तुकला विशेषज्ञ प्रोफेसर सतीश चंद्रा का हवाला देते हुए कहा कि इन ईमारतों का रख रखाव भी ठीक से नहीं हो रहा है। सतीश चंद्रा का भी यही मानना है कि ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण में जो सामग्री इस्तेमाल की जा रही है उससे काफी नुकसान पहुंच सकता है। इन इमारतों को दुरुस्त करने का काम पोटर्लैंड सीमेंट, सुर्खी, चूना और मौरंग आदि की मदद से किया जा रहा है। इनसे इमारतों की पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे संकट और बढ़ रहा है। अब्दुल्ला ने आगे कहा-अवध की इन इमारतों की खास बात यही है कि इन इमारतों में जो पोरेसिटी होती है उसी के चलते दीवारों के कान होते है वाला मुहावरा भी मशहूर हुआ और भूल भुलैया में दीवार के एक छोर पर कोई कागज फाड़े तो दूसरे छोर पर आवाज सुनी जा सकती थी। पर इमारतों की मरम्मत के चलते यह पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे इन इमारतों को नुकसान पहुंच रहा है।
एमिटी विश्विद्यालय के आकिर्टेक्ट विभाग के कुछ छात्रों ने इन इमारतों के हालात का अध्ययन कर कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटाई हैं। अध्ययन के मुताबिक लखनऊ की पहचान रूमी दरवाजा में जो दरार आई है यदि उसे जल्द दुरुस्त नहीं किया गया तो आसिफुद्दौला की यह धरोहर इतिहास के पन्नो से गायब हो जाएगी। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के पिता अमजद अली शाह का मकबरा सिबटेनाबाद हजरत गंज में है। यह शिया लोगों का महत्त्वपूर्ण स्थल है। यह भवन भी भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के संरक्षित भवनों में से एक है। इस इमामबाड़े पर लोगों ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे आप किसी मुहल्ले में खड़े हैं। इमामबाड़े में अंदर जाने पर आपको गैस एजंसी से लेकर चाट की दुकान तक मिल जाएगी। और लोग अतिक्रमण करे तो समझ में आता है सरकारी महकमा भी इस काम में पीछे नहीं है। हजरत गंज को खुबसूरत बनाने के नाम पर पर इस इमामबाड़े के मुख्य गेट पर बड़ा सा फव्वारा बना दिया गया जिससे अब कोई धार्मिक जलूस आदि भी बाहर नहीं आ सकता।
ऐसी ही स्थिति बड़ा इमामबाड़ा की है । इसको अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने 1784 में बनवाया था। यहां पर भी लोगों ने कब्ज़ा जमा रखा है। इमामबाड़े के बाहर के हिस्से में एक होटल वाले ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर वह ठेला लगाता है व इमामबाड़े के अंदर की तरफ उसकी रसोई है। इमामबाड़े के अंदर की तरफ, मस्जिद के पीछे की तरफ व नीचे लोगों ने अवैध कब्ज़ा जमा रखा है। छोटा इमामबाड़ा में बाहर- अंदर दोनों जगह लोगों ने कब्ज़ा कर रखा है। यहां बाकायदा इन परिवारों का चौका चूल्हा जलता है। कहने को तो यह भी पुरातत्त्व विभाग का संरक्षित भवन है पर इसकी देख रेख करने वाला कोई है ऐसा देख कर नहीं लगता। करीब दर्जन भर इमारतें जर्जर हो चुकी हैं। ( साभार-जनसत्ता, अंबरीश कुमार )

Friday, October 21, 2011

पुरातात्विक स्थल ताराडीह

   बिहार के गया शहर स्थित महाबोधि मंदिर के पश्चिम स्थित पुरातात्विक स्थल ताराडीह का सौंदर्यीकरण होगा. इसके लिए योजना बना कर पर्यटन विभाग को भेजने का निर्देश दिया गया है।
मगध प्रमंडल के आयुक्त विवेक कुमार सिंह ने भी पिछले दिनों इस पर चर्चा की थी और उसके अनुपालन के लिए पर्यटन और कला-संस्कृति विभाग को निर्देश दिया है। ताराडीह भारत का एक मात्र ऐसा उत्खनन स्थल है जहां नव प्रस्तर काल से वर्तमान काल तक के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं।

वर्षे बाद शुरू हुआ प्रयास
चार दिसंबर, 2000 को बिहार सरकार के कला,संस्कृति व युवा विभाग ने इसके सौंदर्यीकरण का प्रयास किया था. विभागीय मंत्री अशोक कुमार सिंह बोधगया ताराडीह गौतम वन पुरातत्व परिसर के सौंदर्यीकरण और संरक्षण के कार्ये का शिलान्यास भी किया था, लेकिन 11 वर्ष बीत गये पर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखायी। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रेम दासा ने इस पुरातात्विक स्थल के विकास में रुचि दिखायी थी पर 1993 में उनकी हत्या हो जाने के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

यहां मिले हैं ऐतिहासिक अवशेष
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, बिहार अंचल द्वारा1981-82 में इस पुरातात्विक स्थल का उत्खनन डॉ अजीत कुमार सिन्हा के निर्देशन में शुरू हुआ था. यहां से मिले सामान को बोधगया के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है. यहां सात कालों के अवशेष मिले हैं।

इतने महत्वपूर्ण धरोहर को संरक्षित करने के बजाय उन्हें मिट्टी से भर दिया गया है. आज यह स्थल देखरेख के अभाव में मल, मूत्र त्याग और कूड़ा फेंकने का स्थल बन कर रह गया है। यहां हुई खुदाई में तमाम पुरातात्विक चीजें मिली हैं।
* नव पाषाण युग - पत्थर के मनके, सूई, पत्थर के खिलौने।
* ताम्र युग - धातु की सूई, मनके, बरतन, हांडी।
* कृष्ण-लोहित व कृष्ण मृदभाड - मिट्टी के बरतन, मिट्टी के बने मनुष्य के सिर, मिट्टी की सूई।
* उत्तरी कृष्ण मांजित मृदभांड - हैडल लगे बरतन व चूल्हा।
* कुषाण कालीन - बुद्ध की मूर्ति, पत्थर मनका, धातु की सूई, चूल्हे के अवशेष।
* गुप्त काल - अभिलेखयुक्त बुद्ध की मूर्ति, सिर विहीन मूर्ति, बौद्ध मठ।
* पाल युग - बुद्ध की मूति, बौद्ध मठ ।
(साभार-प्रभात खबर)

Monday, October 10, 2011

ऐतिहासिक कालीन कुत्तों के अवशेष

 ऐतिहासिक समय मे जैविक व्‍यवस्‍थाओ की जानकारी हमको अवशेषो का अध्‍ययन करने से मिलती है। जीवाश्‍म वैज्ञानिको को तीन पूर्व ऐतिहासिक कालीन कुत्‍तो के अवशेष प्राप्‍त हुए है। वैज्ञानिको का ऐसा अनुमान है कि इस अवशेष से पूर्व ऐतिहासिक कालीन कई महत्‍वपूर्ण जानकारी हमारे सामने निकल कर आएगी।
जीवाश्म वैज्ञानिकों ने पूर्व ऐतिहासिक कालीन तीन कुत्तों के अवशेषों की खोज की है और उनका दावा है कि यह खोज मानव और कुत्ते के बीच की शुरूआती संबंधों को दर्शाने वाला हो सकता है। रायल बेलजियन इंस्टि्टयूट आफ नेचुरल साइंसेज के नेतृत्व वाले दल का दावा है कि मरने के बाद पुरापाषाणकालिक कुत्तों के दिमागों को भी हटाया गया है जो जानवरों की आत्मा को मुक्त करने की मानवीय कोशिश की ओर संकेत करता है।
दिमाग को हटाने के लिए कुत्तों की खोपडि़यों में छेद किया गया है। इस दल के प्रमुख मितजे गेरमोनपरे ने कहा कि उत्तरी क्षेत्र के बहुत सारे लोगों का मानना है मस्तिष्क में आत्मा का निवास होता है। ऐसे ही लोगों में से कुछ व्यक्तियों ने मरे हुए जानवरो की खोपड़ी में छिद्र किया ताकि उसकी आत्मा मुक्त हो सके। डेली मेल के मुताबिक तीसरे कुत्ते के मुंह में बड़ा हड्डी फंसा हुआ है और उसके बारे में जीवाश्म वैज्ञानिकों का मानना है कि मरने के बाद उसके मुंह में किसी व्यक्ति ने रीति रिवाज के तहत ऐसा किया है।

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