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Tuesday, September 28, 2010
अयोध्याः इंतजार एक सार्थक फैसले का
इतिहास गवाह है कि लगभग ढाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रांता भारत को लूटते और तोड़ते-फोड़ते रहे उनमें से बाबर भी एक था। जिसने भारत वर्ष में आतंक पैदा किया एवं उसे लूटा तथा तोडा। उक्त विवाद के समाधान हेतु देश के अनेक प्रधानमंत्रियों ने प्रयत्न भी किये लेकिन उनमें सत्य स्वीकार करने की क्षमता न होने के कारण समाधान पर न पहुँच सके। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने तो व्यवस्थित वार्ताओं के द्वारा वास्तव में समाधान का प्रयास करना चाहा परन्तु कुछ मजहबी हठधर्मियों के असहयोग के चलते नतीजे पर न पहुँच सके। 1936 के बाद से उक्त स्थल पर नमाज अता नही की गयी जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। शरियत के अनुसार भी उक्त स्थल मस्जिद नहीं है लेकिन तथाकथित सेकुलरवादियों ने हमेशा उक्त स्थल पर मंदिर होने के साक्ष्य हिन्दुओं से ही मांगे। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है आने वाली पीढ़ी को हमारा धर्मनिरपेक्ष वर्ग क्या देना चाहता है। झूठा इतिहास या भ्रम की स्थिति झूठ में प्रत्यारोपित राष्ट्र या बिखरी संस्कृति। समाधान को लटकाता एवं विकल्प की तलाश में भटकता उक्त वर्ग ही मुख्य जिम्मेदार है उस 6 दिसम्बर, 1992 की दुर्भाग्यशाली घटना का जिसने कभी भी जिम्मेदारी से निर्णायक बात कहने का साहस नही किया या उन्हें इन्तजार है दूसरे भूचाल का जब लाशों के ढेर पर बैठ वे सत्ता का बंदरबाँट कर सकें।
बहरहाल अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सारी सुनवाई पूरी करके साठ साल पुराने अयोध्या मामले पर फैसला देने की स्थिति में आ गई है। ३० अक्तूबर को आने वाला है फैसला। इस बार ज्यादातर पक्ष कोर्ट का फैसला मानने को तैयार हैं। हालांकि इसमें एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि नाखुश होने या राजनैतिक कारणों से यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में जाकर लटक सकता है ?
इस राजनैतिक खींचतान में ही आया था 6 दिसम्बर, 1992 एक ऐसा दुर्भाग्यशाली दिन। इस दिन धार्मिक विद्वेष का ऐसा गुबार उठा संख्या बल के समक्ष अयोध्या के विवादित धार्मिक स्थल को समाप्त होना पड़ा। विवादित ढॉचा ध्वस्त हो गया परन्तु अभी भी यक्ष प्रश्न है ऐसी स्थिति आयी कैसे । सर्वे भवन्तु सुखिनः को आधार मानने वाला, सर्व धर्म समभाव की सुखद कल्पना लिए वसुधैव कुटुम्बकम् से गौरव की अनुभूति करने वाला, अंहिंसा परमो धर्मा का मूल वैचारिक सहिष्णु कहलाने वाला हिन्दू समाज अचानक आक्रामक कैसे हो गया। गंगा-जमुनी संस्कृति का निर्मल जल रक्त रंजित किन परिस्थितियों में हुआ। आपसी एकता के माध्यम से गुलामी की जंजीर तोड़ने वाले एक दूसरे से क्यों भय खाने लगे, विचारणीय है।
विवाद सुलझाने की बहुत हुई हैं कोशिशें
यदि हम अपने इतिहास पर गौर करे तो पायेगें कि 1847 से 1857 के बीच नवाब वाजिद अली शाह ने अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के झगड़े को समाप्त करने के लिए प्रयास किए। उन्होंने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जिसमें एक हिन्दू एक मुसलमान तथा एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सदस्य निष्पक्ष की भूमिका में था। जिस समिति ने उक्त स्थल के बारें में बताया ‘‘मीर बाकी ने किसी भवन की तोड़कर इसे बनवाया था क्योंकि इस पर साफ तौर पर लिखा है यह फरिश्तों के अवतरण का स्थल है। इसमें भवन का मलबा भी लगा है।’’ 1857 के समय अमीर अली तथा बहादुर शाह जफ़र ने फरमान जारी किया जिसके अनुसार ‘‘हिन्दुओं के खुदा रामचन्द्रजी की पैदाइश की जगह जो बाबारी मस्जिद बनी है वह हिन्दुओं को बाखुशी सौप दी जाये क्योंकि हिन्दु मुसलमान ना इन्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है’’ सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ 36 पर कर्नल मार्टिन ने लिखा है, अयोध्या की बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं को (मुसलमानों द्वारा) वापस देने की खबर से हममें (अंग्रेजो में) घबराहट फैल गयी और यह लगने लगा कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज खत्म हो जायेंगे। 1857 की क्रान्ति असफल होने के बाद अंग्रेजो ने 18 मार्च, 1858 में कुबेर टीला में इमली के पेड़ पर अमीर अली तथा बाबा राम चरण दास को हजारो हिन्दुओं तथा मुसलमानो के समाने फाँसी दे दी। इस सन्दर्भ में मार्टिन लिखते हैं, जिसके बाद फैजाबाद में बलवाइयों की कमर टूट गयी और तमाम फैजाबाद जिले में हमारा रौब गालिब हो गया। इस प्रकार राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद समाप्त होते होते रह गया। कुछ राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों ने भी सितम्बर 1992 में विवादित स्थल को 10 किमी दूर ले जाने का प्रस्ताव रखा परन्तु धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी सरकार तक इनकी आवाज नहीं पहुँची। मुस्लिम समाज के साहित्यकारों ने भी उक्त विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान माना। अबुल फलज 1598 ईं में अकबारनामा अइना-ए-अकबरी में उस स्थान को राम का निवास स्थान बताया। 1856 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक हदीका-ए-शहदा के पृष्ठ 4-7 के अनुसार मथुरा-बनारस-अवध की मस्जिदें, मंदिरों को तोड़कर बनायी गयी थी। 1878 ई.में हाजी मो. हसन ने अपनी पुस्तक जिया-ए-अख्तर के पृष्ठ 38-39 में राजा रामचन्द्र के महल सराय और सीता की रसोई को तुड़वाना वर्णित है। 1885 ई. में मौलवी अब्दुल करीम की पुस्तक गुलगस्ते हालात-ए-अयोध्या अवध के अनुसार भी जन्म स्थान और सीता रसोई भवनों को तोड़कर उस स्थान पर बाबर बादशाह ने एक मस्जिद बनवायी। 1909 के अल्लामा मो. जनमुलगानीखॉ रामपुरी की पुस्तक तारीखे-ए-अवध के अनुसार भी बाबर ने जन्म स्थान को मिस्मार करके मस्जिद बनवायी।
1785 ई. में आस्ट्रेलिया के जेसुइट पादरी जोसेफ टीफेनथेलर जो 1766 से 1771 तक अवध में रहे जिनकी पुस्तक के पृष्ठ 252-254 जिसका अनुवाद श्री शेर सिंह आईएएस ने किया जिसमें भी एक किले जिसे राम कोट कहते थे गिरा तीन गुम्मदों वाली मस्जिद बनवाने का जिक्र है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया-सर्जन जनरल एडवर्ड वेलफेयर (1858) के अनुसार भी हिन्दुओं के कम से कम तीन पवित्र स्थलों पर मस्जिद बनवाने को जिक्र है जिसमें राम जन्म भूमि शामिल है। 1880 ई. की फैजाबाद समझौता रिपोर्ट में भी बाबर द्वारा 1528 में राम जन्म भूमि पर जिसे तोड़ मस्जिद का निर्माण बताया गया। 1881 की फैजाबाद के इम्पीरियल गजट में भी मुसलमानों द्वारा तीन मस्जिदें बनवाये जाने का जिक्र है। जो जन्म स्थान, त्रेता ठाकुर तथा स्वर्ग द्वार है। इसी प्रकार फाइजाबाद (फैजाबाद) गजेटियर ग्रन्थ एचआर नेविल के अनुसार (1928 ई.) भी 1525 में बाबर का 7 दिन अयोध्या में रूक कर प्रचीन मंदिरों को ध्वस्त करने एवं मस्जिद के निर्माण का जिक्र है। जो पृष्ठ 155 पर अंकित है। 1902 के बाराबंकी जिला गजेटियर में एक रिपोर्ट एच आर नेविल ने भी जन्म स्थान का जिक्र एवं विवाद की बात स्वीकार की।
इसी प्रकार मुस्लिम शायरों तथा विद्वानों ने विवादित स्थल पर राम मंदिर की बात स्वीकारी है। अबुल फजल मुगल काल के एक लेखक थे। जिन्होने आइना-ए-अकबरी में अवध (अयोध्या) को महापुरूष राम की निवास स्थान बताया। ‘‘औरंगजेब आलमगीर’’ में स्पष्ट (पृष्ठ संख्या 623-630) रूप से विस्तार को दिया गया काफिरों (हिन्दुओं) ने इस स्थान (राम जन्म भूमि) की मुक्ति के लिए 30 बार आक्रमण किये 1664 ई0 में ऐसे ही किये गये आक्रमण में दस हजार हिन्दू हताहत हुए। सहीफा-ए-नसैर बहादुर शाही (1700-1800) यह पुस्तक औरंगजेब की पौत्री तथा बहादुर शाह जफ़र की पुत्री बंगारू अमातुज्ज-जोहर ने लिखी है। जिसके अनुसार (पृष्ठ 4-7) मथुरा बनारस और अवध (अयोध्या) में काफिरों (हिन्दुओ) के इबादतगाह है जिन्हें वे गुनहगार व काफिर कन्हैया की पैदाइशखाना, सीता की रसोई व हनुमान की यादगार मानते हैं जिसके बारे में हिन्दू मानते है कि यह रामचन्द्र ने लंका पर फतह हासिल करने के बाद बनवाया था। इस्लाम की ताकत के आगे यह सब नस्तनाबूद कर दिया गया और इन सब मुकामों पर मस्जिद तामीर कर दी गयी। बादशाहों को चाहिए कि वे मजिस्दों को जुमे की नवाज से महरूम न रखे, बल्कि यह लाजमी कर दिया जाय कि वहॉ बुता की इबातद न हो शंख की आवाज मुसलमानों के कानों में न पहुँचे।
बाबरी मस्जिद का विवरण पुस्तक के नवे अध्याय में जिसका शीर्षक ‘‘वाजिद अली और उनका अहद’’ में लिखा है। पहले वक्तो के सुल्तानों ने इस्लाम की बेहतरी के लिए और कुफ्र को दबाने के लिए काम किये। इस तरह फैजाबाद और अवध (अयोध्या) को भी कुफ्र से छुटकारा दिलाया गया। अवध में एक बहुत बड़ी इबादतगाह थी और राम के वालिद की राजधानी थी जहॉ एक बड़ा सा मन्दिर बना हुआ था। वहॉ एक मजिस्द तामीर करा दी गयी। जन्म स्थान का मंदिर राम की पैदाइशगाह थी जिसके बराबर में सीता की रसोई थी। सीता राम की बीबी का नाम था। उसी जगह पर बाबर बादशाह ने मूसा आसिकान की निगहबानी में एक सर बुलन्द मस्जिद तामीर करायी। वह मस्जिद आज भी सीता पाक (सीता की रसोई) के नाम से जानी जाती है।
न्यायिक व्यवस्था के अनुसार भी सन् 1885 में फैजाबाद जिले के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने एक नागरिक अपील संख्या 27 में कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद का निर्माण हिन्दुओं के एक पवित्र स्थल पर भवन तोड़कर किया गया है चूँकि यह घटना 356 वर्ष पूर्व की है इसलिए अब इसमें कुछ करना कठिन है। अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी। जिसका कि फैसला मध्य सितम्बर में आने की पूरी सम्भावना है। इस सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की विशेष पीठ ने 27 जुलाई, 2010 को दोनो पक्षों के अधिवक्ताओं को सिविल संहिता प्रक्रिया की धारा-89 के तहत बुलाकर समाधान के विषय पर बातचीत की परन्तु दुर्भाग्यवश सार्थक हल नहीं निकला था।
Tuesday, October 27, 2009
सात पुरियों में से एक है अयोध्या
भारतवर्ष की प्राचीन सात पुरियों में से एक अयोध्या है। सात पुरियों की गणना इस प्रकार की जाती है।1. अयोध्या पुरी 2. मथुरा पुरी 3. माया पुरी 4. काशी पुरी 5. कांची पुरी 6.अवंतिकापुरी 7. द्वारिका पुरी । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि सभी का हमारे सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इनमें से अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि के संदर्भ में जानी जाती है हालाकि इस विषय को लेकर राजनैतिक विवाद जारी है। मैं यहां किसी संप्रदायिक या राजनैतिक विवाद की चर्चा नहीं कर रहा हूं बल्कि अयोध्या के बारे में ही कुछ कहना चाहता हूं। कुछ प्चलित कथाएं हैं अयोध्या के बारे में। हालाकि इनके भी साक्ष्य हमारे पौराणिक साहित्य में उपलब्ध हैं। आइए इन कथाओं के माध्य से अयोध्या को जानने की कोशिश करते हैं।
कब और किसने बसाया अयोध्या को ?
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, अयोध्यापुरी को मनु ने बसाया था, जबकि स्कंदपुराण कहता है कि यह नगरी विष्णु के सुदर्शन चक्र पर बसी है। कुछ मतों के अनुसार, अयोध्या श्रीरामचंद्र के धनुष के अग्रभाग पर स्थित है। कथा है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम पृथ्वी पर लीला समाप्ति के बाद समस्त अयोध्यावासियों को निज धाम ले गए। अयोध्या वीरान हो गई। बाद में श्रीराम के पुत्र कुश ने इसे फिर से बसाया। कहते हैं कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पटरानी रुक्मिणी के साथ अयोध्या आए थे। उनके नाम पर बना कुंड आज भी 'रुक्मिणी कुंड' के नाम से जाना जाता है।
विक्रमादित्य ने किया पुनरोद्धार
कलियुग में अयोध्या के पुनरोद्धार का श्रेय उज्जायिनी के राजा विक्रमादित्य को जाता है। मान्यता है कि एक बार उनके मन में भावना उठी कि हम सूर्यवंशी है, श्रीरामचंद्रजी की जन्मभूमि का पता लगाना चाहिए। एक दिन प्रात:काल सरयू नदी के किनारे उन्होंने देखा कि श्यामवर्ण का एक पुरुष काले रंग के घोड़े पर सवार होकर आया और उसने सरयू में डुबकी लगा दी। जब वह घुड़सवार सरयू से बाहर आया, तो वह गौरवर्ण तथा उसका घोड़ा सफेद रंग का दिखा। मान्यता है कि उन्होंने घुड़सवार से उसका परिचय पूछा, तो वह अश्वारोही बोला, 'मैं तीर्थराज प्रयाग हूं। पापियों के पाप धोते-धोते कलुषित हो जाता हूं। सरयू और अयोध्यापुरी के प्रताप से मैं पापों से मुक्त होकर वास्तविक स्वरूप में आ जाता हूं।' प्रयागराज ने उन्हे रामजन्मभूमि की खोज के लिए काशी जाने का परामर्श दिया। काशी पहुंचकर विक्रमादित्य अन्न-जल त्यागकर विश्वनाथ मंदिर के द्वार पर बैठ गए। विक्रमादित्य का संकल्प देखकर विश्वनाथ बूढ़े ब्राह्मण के वेश में आकर बोले- 'राजा! तुम यह गऊ और पोथी लेकर अयोध्या जाओ, जहां गऊ के थन से स्वत: दूध गिरेगा, उसे ही श्रीरामचंद्र की जन्मभूमि समझना। इसके बाद इस पोथी के आधार पर अयोध्या के प्राचीन स्थलों का पुनरोद्धार करना।'
मंदिर का निर्माण
अयोध्या में जिस स्थान पर गाय का दूध स्वत: थनों से बहने लगा, वहां विक्रमादित्य ने सुंदर मंदिर बनवाया, जिसमें एक भव्य शालिग्राम शिला पर श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सहित हनुमानजी की स्थापना की। 84 कसौटी के स्तंभों पर निर्मित 7 कलशों वाले श्रीरामजन्मभूमि मंदिर को 1528 में यवनों की सेना ने ध्वस्त कर दिया। उस समय श्रीराम-पंचायतन के विग्रह वाली शिला को सरयू में प्रवाहित कर दिया गया। कहा जाता है कि 1748 में महाराष्ट्रियन ब्राह्मण श्रीनरसिंहराव मोघे को लक्ष्मण घाट पर श्रीराम-पंचायतन शिला प्राप्त हुई। इसे उन्होंने अयोध्या के स्वर्गद्वार पर मंदिर बनवाकर बैठाया। एक ही शालिग्राम शिला पर सम्पूर्ण राम-पंचायतन बने होने के कारण यह देवालय 'श्रीकालेराम मंदिर' के नाम से विख्यात हो गया।
रामदूत बने क्षेत्राधिकारी
किंवदंतियों के अनुसार, जब श्रीरामचंद्र अयोध्यावासियों के साथ निजधाम जाने लगे, तो उन्होंने हनुमानजी को अयोध्या की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंप दी। हनुमानगढ़ी में उनका दर्शन करके भक्त कृतार्थ हो जाते है।
प्रमुख तीर्थस्थल
सोने से बना कनक भवन सीताजी को कैकेयी माता ने मुंह-दिखाई में दिया था। वर्तमान भवन ओरछा स्टेट द्वारा बनवाया गया है। यहां युगल सरकार का दर्शन करके तीर्थयात्री कृतार्थ हो जाते हैं। इसके पास ही मत्तागजेन्द्रजी का स्थान है, जो विभीषणजी के पुत्र है। यहां से उत्तार में सप्तसागरतीर्थ है। पूर्वी भाग में अयोध्या की अधिष्ठात्री 'छोटी देवकाली' प्रतिष्ठित है। जन्मभूमि के निकट सीता रसोई एवं अग्निकोण में सीता कूप है। आगे रत्न सिंहासन मंदिर है। अयोध्या में गरुड़ द्वारा लाया गया मणि पर्वत है। अयोध्या के स्वर्गद्वार पर किया गया जप-तप, स्नान-दान, हवन, पूजा-पाठ अक्षय फलदायक होता है। सरयू में सहस्त्रधारा तीर्थ और लक्ष्मण टीले पर लक्ष्मण किला है। कार्तिक-शुक्ल-नवमी (अक्षय नवमी), देवोत्थान एकादशी और रामनवमी के दिन श्रद्धालु अयोध्या की परिक्रमा करते है। उत्तार प्रदेश के फैजाबाद जिले में स्थित अयोध्या की यात्रा रेल और सड़क मार्ग से आसानी से की जा सकती है। [साभार-अतुल टण्डन-याहू जागरण]
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