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Friday, April 23, 2010

1857 की लोककथाएं

  १८५७ की आजादी की जंग की खासियत यह रही कि इसके शहीद देशभक्तों को लोगों के दिलों में देवतुल्य जगह मिली। उनके बारे में तमाम लोककथाएं भी प्रचलित हो गईं। दुर्भाग्य से ऐसी लोककथाओं में से कुछ का ही संकलन हो पाया है। ऐसी ही कुछ लोककथाएं का अवलोकन करिए ।

शहाबपुर के बाबा

इलाहाबाद से २५ किमी. दूर लखनऊ मार्ग पर हथिगहां के पास एक गांव है - शहाबपुर, जहां हिन्दू मुसलमान, नीची जाति, मध्य जाति के लोग बहुतायत में रहते हैं। यहीं आम के एक बाग में एक मिट्टी का ऊंचा स्थान ( देवस्थान) बना है जिसे गांव के लोग संग्राम बाबा का स्थान कहते हैं। वहां कुछ अगरबत्तियां, कुछ धूपदीप - कुछ जलते हुए - कुछ बुझे मिल जाएंगे। गांव के लोग जब भी कोई शुभ कार्य करते हैं तो संग्राम बाबा के स्थान पर पूजा करते हैं। वे खेती के दिनों में, खेतों में बेहन डालने के पहले संग्राम बाबा की पूजा करते हैं। तालाब में मछली डालने के पहले संग्राम बाबा के स्थान पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। जब भी कोई आम का बाग खरीदता है तो संग्राम बाबा को खस्सी काट कर चढ़ाता है। शहाबपुर एवं आसपास के लोगों का विश्वास है कि ऐसा करने से खेतों में फसल अच्छी होगी, तालाब में खूब मछलियां जन्म लेंगी, पेड़ों पर खूब आम आयेंगे। कई बार यहां गांव की औरतें एवं पुरुष गवनई करते मिल जाएंगे। यह संग्राम बाबा कौन हैं? गांव के लोग इनकी कहानी यूं बयान करते हैं...।

सन्‌ अट्ठारह सौ सत्तावन की एक काली रात थी। अंग्रेजों की सेना का इलाहाबाद और उसके आसपास के क्षेत्रां पर कब्जा हो चुका था। उनकी तोपों , बंदूकों एवं संगीनों के डर से आदमी तो आदमी, पशु पक्षी भी डरने लगे थे। रातों में झींगुर तक बोलने से डरते थे। चिड़ियां अपने घोसलों में दुबक कर रहती थीं।

ऐसी ही एक रात को इलाहाबाद के पास के बेली गांव के कुछ लोगों ने जिनमें हिन्दू भी थे और मुसलमान भी , अंग्रेजों का खजाना लूट लिया। खजाना ही जब उनके पास नहीं रहेगा तो कहां से आयेगी और रसद, रसद नहीं रहेगी तो अंग्रेजों के पांव उखड़ जाएंगे। खजाना अगर नहीं रहेगा तो सैनिकों को वेतन कहां से मिलेगा और वेतन नहीं मिलेगा तो सैनिक अपने आप ही विद्रोह कर देंगे। ऐसा सोचने वाले ये लोग, लखनऊ की तरफ, लखनऊ जाने वाले रास्ते से भाग निकले। अंग्रेजी सेना उनका चारों तरफ से पीछा करने लगी। वे भागते हुए शहाबपुर पहंचे, जहां वे एक बड़े किसान संग्राम सिंह जिन्हें लोग राजा कहते थे, के यहां पहुंचे। संग्राम सिंह ने उन विद्रोहियों को अपने यहां शरण दी तथा इन सबको अपने खजाने की रसीद काट कर दी कि यह पैसा अंग्रेजों का न होकर मेरे खजाने का है। शरण में पहुंचे विद्रोहियों को इन्होंने अपने गांव में बसा भी लिया। अंग्रेज अधिकारी कर्नल चैपमैन, जिसको इस क्षेत्रा के विद्रोहियों के दमन की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी, अपनी सेना लेकर शहाबपुर पहुंचा और संग्राम सिंह के किले को चारों तरफ से घेर लिया। किले के चारों तरफ उन पासियों की बस्ती थी जो संग्राम सिंह की सेना में शामिल थे। उस पासी बस्ती के लोगों ने चैपमैन की सेना पर चाकू, लाठी, भाला, बल्लम और छोटे हथियारों से आक्रमण किया। दो दिन तक अंग्रेजों की सेना उनसे जूझती रही। उसके बाद उन्हें परास्त कर किले के करीब पहुंच गयी। किले के भीतर संग्राम सिंह के सैनिकों ने लालमिर्च का धुंआ चारों तरफ फैला दिया - जिसके कारण अंग्रेजी सेना भाग गयी। संग्राम सिंह अपनी टुकड़ी के साथ, किले से जैसे ही बाहर निकले, वैसे ही गांव जवार के ढेर सारे लोग उनके साथ उनकी सेना में आ मिले। इन लोगों ने पचदेवरा के जंगल में जाकर मोर्चा लिया, जहां एक काली मां का प्रसिद्ध मंदिर भी है, जिसे संग्राम सिंह ने बनवाया था। गांव के लोग बताते हैं कि महाभारत की लड़ाई की तरह अट्ठारह दिन यहां लड़ाई चली, उसके बाद संग्राम सिंह इस युद्ध में शहीद हुए। अंग्रजों ने उनका सर धड़ से अलग कर दिया।

गांव के लोगों के अनुसार संग्राम सिंह १०-१२ फुट के अत्यंत बलिष्ठ जवान थे जिनकी गर्दन मोटी थी और सर बहुत बड़ा था। जब कर्नल चैपमैन उनका कटा सर लेकर इलाहाबाद पहुंचा तो , जज ने जो इलाहाबाद में विद्रोहियों को सजा देने के लिए नियुक्त किया गया था, कहा कि ये इतने बलिष्ठ जवान थे, इनको मार कर नहीं लाना चाहिए था, इन्हें बंदी बना कर लाना चाहिए था। बाद में गांव वालों के अनुसार उनका वही सर लाकर, शहाबपुर के बाग में अंतिम संस्कार किया गया जहां पर आज संग्राम बाबा का स्थान है। गांव वाले बताते हैं तभी से संग्राम बाबा गांव के देवता हो गये। एक दिन गांव वालों को सपना आया कि मरने के बाद भी वे दुखों एवं कष्टों से बचायेंगे तथा सुख समृद्धि देंगे।

बाद में अंग्रेजों ने पुरस्कार स्वरूप चैपमैन को शहाबपुर की जमींदारी दे दी। उसने संग्राम सिंह के किले को ध्वस्त कर दिया एवं उसके ऊपर अपना शानदार किला बनवाया जो आज भी गांव में मौजूद है। चैपमैन ने उस टीले के आसपास रहने वाली पासी जाति को हटा कर वहां से १०-१२ किमी. दूर, उनकी एक अलग बस्ती बसायी जिसे पसियाना कहा जाता है। गांव के लोग बताते हैं कि चैपमैन इन पासियों से बहुत डरता था। क्योंकि उसे लगता था कि वे संग्राम सिंह की सेना में थे, अतः कभी भी वे उस पर रात बिरात आक्रमण कर सकते हैं।

कहते हैं कि बाद में चैपमैन अपनी यह जमींदारी मध्य उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ के राजा को बेच कर इंग्लैण्ड चला गया। यह घटना सर्वप्रथम शालिगराम श्रीवास्तव की पुस्तक ÷ प्रयाग प्रदीप' ( हिन्दुस्तानी एकेडमी, १९३७) में अत्यंत संक्षिप्त रूप में वर्णित है।

माधो भइया

आजमगढ़ जिले के कई गांवों में आपको एक लोकगीत सुनने को मिल सकता है , माधो भइया, कुंवर के साथ निकलते भइया, अंग्रेजन के करेजवा हिलवते ये भइया। ये माधो भइया कौन हैं। इस लोकगीत में कहा जाता है कि आजमगढ़ में माधो भइया ने कुंवर सिंह के साथ मिल कर अंग्रेजों को परास्त किया। अगर इस गीत में कुंवर सिंह का जिक्र है तो जरूर यह १८५७ से जुड़ा लोकगीत होगा। बहुत सम्भव है कि ये माधव भइया, माधव सिंह हों।

कहते हैं कि आजमगढ़ की १७वीं सेना के सिपाही माधो सिंह जिले के पहले साहसी आदमी थे जिन्होंने सन्‌ १८५७ की क्रांति की प्रथम गोली चला कर हचिन्सन को मौत के घाट उतार दिया। बताया जाता है कि इन्होंने इस जिले में क्रांति की शुरुआत की। अंग्रेजों ने इन्हें पकड़ने के लिए दो हजार रुपये का इनाम घोषित किया था। यहां के क्रांतिकारियों ने माधो सिंह के नेतृत्व में एक घोषणापत्रा जारी किया था , जिसे ÷ आजमगढ़ घोषणापत्रा' के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें कहा गया था -

विदेशियों के विरुद्ध संघर्ष करने में अपने मतभेदों को खत्म कर दें। सभी लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ही की पुरानी किताबों और ज्योतिषियों, पंडितों की गिनती से भी स्पष्ट हो गया है कि अंग्रेजों का भारत से अधिकार खत्म हो गया है। इसलिए सभी के लिए यह जरूरी है कि वे ब्रिटिश दासता में रहना अस्वीकार कर दें।''

जिस समय लखनऊ में युद्ध चल रहा था , उस समय आजमगढ़ क्षेत्रा में विद्रोहियों ने ब्रिटिश सेना के विरुद्ध मार्च १८५८ में पुनः अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया। इससे कुंवर सिंह को आजमगढ़ होते हुए शाहाबाद स्थिति अपने गृहस्थान जगदीशपुर जाने तथा एक बार फिर अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा को कायम करने का अवसर मिला। इस समय आजमगढ़ की रक्षा में ३७वीं रेजिमेण्ट के २८६ सिपाही, मद्रास घुड़सवार सेना के ६० सिपाही तथा ३७वीं सेना के ही कर्नल मिलमैन के नेतृत्व में दो तोपें मौजूद थीं। इस बीच अंग्रेजों को इस बात की गुप्त सूचना मिली थी कि आजमगढ़ में बलवाई एकत्रित हो रहे हैं। बताया जाता है कि कुंवर सिंह के सिपाही १७ मार्च को आजमगढ़ जिले के अतरौलिया पहुंच गये। २० मार्च को कर्नल मिलमैन दो सौ से लेकर तीन सौ सिपाहियों के साथ आजमगढ़ के कोयसला स्थान पर आ गया। दूसरे दिन मिलमैन भारतीय स्वाधीनता सेनानियों पर आक्रमण करने के लिये बढ़ा। पहली मुठभेड़ में भारतीय सिपाही पीछे हट गये। लेकिन जब अंग्रेज एक स्थान पर बैठ कर नाश्ता कर रह थे, तभी अचानक क्रांतिकारियों के आक्रमण करने की सूचना उन्हें मिली। अंग्रेज पीछे हट गये और विद्रोही उन्हें आजमगढ़ तक पीछे धकेल ले गये। इस युद्ध में मिलमैन को अपनी तोपें तथा युद्ध के अन्य सामान वहीं छोड़ कर भागना पड़ा।

इस बीच कुंवर सिंह माधो भइया के साथ मिल कर अपनी एक हजार फौजों और ढाई हजार समर्थकों के साथ २४ मार्च १८५८ को आजमगढ़ से १० मील दूर मंदौरी पहुंचे। इस समय वे अपनी पूरी ताकत में थे और उनका इस पूरे इलाके पर सम्पूर्ण अधिकार था। इसी समय कुंवर सिंह एवं माधो सिंह की फौजों को एक और जीत हासिल हुई , जब उनके सैनिकों ने २७ मार्च १८५८ को गाजीपुर से आने वाली कर्नल डैम की फौज को हरा दिया। इसमें दो सौ सिपाही थे। यह युद्ध २४ मार्च १८५८ को हुआ था। कुंवर सिंह एवं माधो सिंह ने अपनी अग्रिम, मुख्य फौज को, जिसमें कई तोपें थीं, अतरौलिया गांव भेज दिया, जो आजमगढ़ से २० मील की दूरी पर है। अब आजमगढ़ पर कुंवर सिंह के सैनिकों का कब्जा हो गया था, इसकी पुष्टि बनारस के कमिश्नर की ओर से इलाहाबाद के सरकारी सचिव के नाम २७ मार्च को भेजे गये तार संदेश से होती है। इसमें कहा गया था - करीब चार हजार बलवाइयों ने बिना किसी रोक टोक के आजमगढ़ में कल प्रवेश किया। वहां पर एक हजार सिपाही बंदूकों के साथ हैं, जिनमें दो गोरखा सैनिक हैं। बनारस के अफसर कमांडिंग ने भी भारत सरकार के सैनिक सचिव को २७ मार्च को ही जो तार भेजा था उसमें भी कहा गया था - कल दोपहर को बलवाइयों ने बिना किसी विरोध के आजमगढ़ पर अधिकार कर लिया। शत्रओं की संख्या चार हजार बतायी जाती है तथा तीन हजार और पीछे से आ रहे हैं। मैं समझता हूं कि गाजीपुर को तत्काल खतरा पैदा हो सकता है और इसके साथ ही जौनपुर और अंत में बनारस को भी। जौनपुर की फौज बनारस भेजी जानी चाहिए, क्योंकि बनारस पर आक्रमण की स्थिति में इस समय वहां कोई फौज नहीं है। तोपों के मामले में भी हम विशेष रूप से कमजोर हैं। केवल दो तोपें ही हैं।

कार्ल मार्ककेर ने अपनी रेजिमेण्ट के ३७३ सिपाहियों और १९ अफसरों के साथ मार्च के अंतिम दिनों में आजमगढ़ के लिये प्रस्थान किया। आजमगढ़ में मार्ककेर और कुंवर सिंह एवं माधो सिंह की संयुक्त सेना के बीच हुआ युद्ध लड़ाइयों के इतिहास में अपना मुख्य स्थान रखता है। कर्नल मार्ककेर के नेतृत्व में उसकी सेनाएं ६ अप्रैल को प्रातः विद्रोहियों के मोर्चे की ओर आगे बढ़ीं। मार्ककेर ने देखा कि काफी संख्या में लोग एक इमारत और आम के बगीचे में एकत्रा हैं जो सड़क के बायीं ओर था। सड़क के दायीं और भी खाइयों में अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिये लोग छिपे हैं , उसने मैदान में अपनी पैदल सेना को भेजा। विद्रोहियों ने खाइयों के दूसरी ओर भी मोर्चाबंदी कर ली। इसी बीच उनके अन्य साथियों ने सड़क के दूसरे किनारे से गोलाबारी शुरू कर दी। इस पर मार्ककेर ने भी अपने तोपचियों को गोलाबारी करने का आदेश दिया। वे सब इमारत पर गोला बरसाने लगे जहां पर काफी संख्या में विद्रोही छिप कर युद्ध कर रहे थे। इतना होने पर भी विद्रोही आत्मसर्मपण करने अथवा पीछे हटने के लिए तैयार नहीं थे। उनमें से अनेक आम के पेड़ पर चढ़ गये और उनकी शाखाओं से उन्होंने बंदूकों से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। उनकी सेना मार्ककेर के रसद पहुंचाने के रास्ते को काट देना चाहती थी। अंत में मुख्य द्वार पर एक छोटी सी दरार नजर आयी, लेकिन इसके बाद भी एक दीवार थी, जहां पर विद्रोही मोर्चा लिये हुए थे। अंग्रेजों ने तोपों से फिर गोलाबारी की, इससे दीवार गिर गयी। मार्ककेर इस पर पुनः आक्रमण करना चाहता था, लेकिन उसने देखा कि इमारत को क्रांतिकारियों ने खाली कर दिया है।

अंगे्रजों ने देखा कि दोनों दीवारों के बीच तीन फुट ऊंची जवानों की लाशें पड़ी हैं। इस तरह से आजमगढ़ के स्वतंत्राता प्रेमियों ने अपने बलिदान से इस संघर्ष को अंत तक चलाया और उन्होंने पीछे हटने का नाम न लिया। इतना घोर युद्ध करने के बाद ही अंगे्रज सेना आजमगढ़ के अंदर जाने में सफल हो सकी।

यह कहानी १३.०७.२००५ को आजमगढ़ जनपद के मझौवा गांव में इंद्रावती , रामाशीष तथा आजमगढ़ शहर के हीरा लाल की स्मृतियों तथा उदयनारायण सिंह की पुस्तिका वीर कुंवर सिंह, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९९ पर आधारित है।



सात समंदर पार सन्‌ सत्तावन की कथा

दक्षिण अमेरिका में एक देश है जिसका नाम है सूरीनाम। सूरीनाम की राजधानी है परामारिबों। सूरीनाम समुद्र के किनारें हरियाली और जंगलों से भरा एक देश है , जहां जाने के लिये लगभग सत्तर घंटे का दिल्ली से हवाई सफर करना पड़ता है। सन्‌ १८२० में दास प्रथा की समाप्ति के बाद औपनिवेशिक देशों को अपने खेतों एवं बागानों का काम करने के लिये श्रमिकों की जरूरत पड़ी थी। ऐसे में १८३६ के बाद भारत के भोजपुरी अंचलों से बड़े पैमाने पर लोग शर्तबंदी गिरमिटिया मजदूर बना कर ले जाये गये। ये लोग यहां से कलकत्ता ले जाये जाते थे, वहां से दक्षिण अफ्रीका, फिर उन्हें विभिन्न उपनिवेशों में भेजा जाता था। सूरीनाम, डच समाज का एक उपनिवेश था, वहां पर गन्ना, कोका, चावल इत्यादि की खेती होती थी। डच उपनिवेशों का अंग्रेज उपनिवेशों से समझौता था। इसी काम के तहत २८००० भारतीय लोगों को ले जाया गया जिनमें १४००० लोग लौटे और १४००० सूरानाम में ही बस गये। ऐसे ही प्रवासी भोजपुरी लोगों का एक परिवार जो पारामारिबों में रहता है उसके एक अस्सी वर्षीय बुजुर्ग रामदेव राम किशुन अपने दादा के भारत से यहां आने का कारण बताते हैं -

भारत में बड़ी गरीबी थी , बार बार अकाल पड़ता था, सन्‌ १८५७ के विद्रोह के बाद अंगे्रज, गांव के गांव तबाह करने लगे थे, वे अपनी तोपों से गांवों के लोगों को उड़ाने लगे थे। इमारतें नष्ट करने लगे थे, हिन्दू मंदिरों को भी नहीं छोड़ा। ऐसे में लोग भाग कर कहीं भी चले जाना चाहते थे, जहां शांति हो। रामकिशुन बताते हैं कि हमारे गांव का नाम नगवां था। वह तब गाजीपुर जिले में पड़ता था, सुनते हैं अब बलिया जिला हो गया है। नगवां के ही मंगल पांडे थे, जिन्होंने १८५७ में अंग्रेजों पर गोली चलायी थी। हमारे बाबा बताते थे कि अंग्रेजों ने गांव पर सात सौ रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसे बड़ी ही सख्ती से वसूला। सामूहिक जुर्माना की वसूली के लिये अंग्रेजों ने सात बार इस गांव को लूटा, इसीलिए भाग कर यहां आ गये कि चाहे जितना दुःख होगा, ऐसा दुःख कहीं नहीं होगा। बाबा बताते थे मंगल पांडे को अंग्रेजों ने फांसी दी, मंगल पांडे शिव के भक्त थे।

बाबा गांव को बहुत याद करते थे , बताते थे कि जब हम लोग गांव छोड़ कर आये थे, तब लगभग ३००० आबादी थी। अधिकतर पांडे बिरादरी के थे जिनके पास जमीन थी। यहां चीनी तैयार करने की मिल और करघे चला करते थे। १८५७ के बाद मंगल पांडे का परिवार भी कहीं राजस्थान भाग गया था। राम किशुन बताते हैं कि उस समय ऐसे अनेक परिवार अंग्रेजों के दमन से घबड़ा कर मारीशस, सूरीनाम जैसे देशों में आ गये थे।

गोविन्द वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान द्वारा संचालित - विदेशिया परियोजना के अंतर्गत सूरीनाम के लोगों से किये गये साक्षात्कारों पर आधारित।

बूढ़े बरगद की आत्मकथा

मैं बूढ़ा बरगद हूं। १८५७ के आंदोलन का जीवंत इतिहास मैं अब अत्यंत बूढ़ा हो चुका हूं। अत्यंत जर्जर। मेरी शाखाएं टूट चुकी हैं। सच मानो ये मेरी मात्रा शाखाएं नहीं वरन्‌ अस्थियां हैं , जो जमीन पर गिर कर ढेर बन चुकी हैं।

रोज मेरे सामने से हजारों लोग गुजरते हैं लेकिन कोई मेरी तरफ देखता भी नहीं। चिड़ियां चुरगुन भी अब मेरे पास नहीं आतीं। गिलहरी डालों पर छलांगें नहीं लगाती। मैं अतीत के दंश से ग्रसित एक पेड़ हूं जिस पर सन्‌ सत्तावन के विद्रोह में एक सौ तैंतीस लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था। अंग्रेजों के हुकुम पर उनके सिपाही घोड़ों से बांध कर स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों को घसीटते हुए लाते, रस्सी का फंदा बनाते, उनकी गर्दन बांधते और उनके प्राण निकल जाने की प्रतीक्षा करते। उसके बाद घसीटते हुए उन्हें गंगा नदी तक ले जाते और जानवरों की तरह कही फेंक देते। उसमें ज्यादातर दलित व पिछड़ी जाति के लोग होते जो दिहाड़ी के मजदूर वे लोग थे, जो स्वतंत्राता प्राप्ति की आग में जल जाना चाहते थे। लेकिन आपको पता है कि मेरी डालों पर जिन एक सौ तैंतीस लोगों को लटकाया गया था, उनका नाम आज इतिहास में कहीं नहीं हैं।

मैं यह बात इसलिए कहा रहा हूं , क्योंकि मैं केवल जड़, तना व पत्तियों से युक्त वटवृक्ष नहीं हूं। बल्कि भारत के इतिहास का साक्षी हूं। मैंने अनगिनत वसंत व पतझड़ देखे। ४ जून १८५७ का वह दिन जब मेरठ से उठी आजादी की चिंगारी कानपुर में शोला बन पहुंची तो मैंने नाना साहब की अगुवाई में तात्या टोपे की वीरता देखी, रानी लक्ष्मी बाई का बलिदान देखा और अजीमुल्ला खां की शहादत देखी। मुझे वह दिन भी याद है जब बैरकपुर छावनी में मेरे ही सहोदर एक वटवृक्ष पर लटका कर क्रांति के अग्रदूत मंगल पांडे को फांसी दी गयी। आपको पता है देश की आजादी के दीवानों पर क्रूर एवं दमनपूर्ण कहर ढाये जाने से मेरी जड़ें तक हल गयीं।

लेकिन उस दिन मैं भीतर से बिलकुल ही टूट गया जब एक सौ तैंतीस गरीब , दलित, पिछड़ी जाति के देशभक्तों को अंग्रेजों ने मेरी शाखाओं पर ही सामूहिक फांसी दी। उनकी गर्दन को मेरी शाखाओं पर ही बांध कर लटका दिया गया। उस दिन मैं थर्राया, बहुत चिल्लाया, चीखते चीखते मेरा गला रुंध गया, आंखों के आंसू रो रो कर सूख गये। वह रोमांचकारी दर्द भरी दास्तान याद आते ही मैं कराह उठता हूं।

आज मेरे चारों तरफ झाड़ उग आये हैं , खरपतवार उग आये हैं। न यहां कोई नमन करता है, न श्रद्धा के आंसू ही बहाता है। न मंदिरों जैसी घंटियों की घनघनाहट है, न जलती हुई अगरबत्तियों के धुंए से निकलती सुगंधित मलय गंध, न पुष्प बहार - बस एक एकांत है एक उदासी है और शहीदों के सीने पर कूदते अंग्रेजों के घोड़ों के टापों की आवाज। मैं बूढ़ा बरगद हूं। इतिहास के सीमांत पर पड़ा।

यह कहानी दलित लेखक श्री के. नाथ ने आर्य नगर , कानपुर में दिनांक २४ जनवरी, २००७ को बतायी, यही कहानी प्रसिद्ध बरगद वृक्ष के नीचे, नाना पेशवा पार्क, कानपुर की शिलापट्टि पर भी अंकित है।

गंगू बाबा

बिठूर के आसपास के गांव में बूढ़ी औरतें अपने नाती पोतों को एक कहानी सुनाती हैं - गंगू बाबा की कथा' ।गंगू बाबा यहीं आसपास के किसी गांव के रहने वाले एक युवक थे। वे इतने बलशाली थे कि बहती नदियों की धारा मोड़ देते थे। पहाड़ों का सर तोड़ देते थे। दो दो शेरों से एक साथ लड़ लेते थे। वे जितने वीर थे उतने दी दयालु। किसी को भूखा देख अपनी रोटी तक उसे खिला देते थे। कोई अगर जाड़े में कांप रहा हो तो उसे अपना कम्बल तक दे देते थे। कहते हैं कि अगर रात में हिरणें रोतीं तो वे उनके दुख से विह्नल हो जाते और शेरों का सीना तोड़ देते थे। निचली जाति में जन्मे एवं गरीब परिवार से सम्बध रहने पर भी गांव जेवार में उनका बहुत सम्मान था। बड़े बड़े जमींदार भी अपने आसनों से उठ कर उन्हें गले लगाते थे।

एक बार वे जंगल से शेर मार कर अपनी पीठ पर लाद कर आ रहे थे। तभी बिठूर के राजा नानाराव पेशवा ( नाना साहब) अपनी सेना लेकर उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने ऐसा वीर एवं साहसी युवक शायद ही कहीं देखा हो जो शेर को मार कर उसे पीठ पर लाद कर निर्भय हो चलता हो। उन्होंने गंगू बाबा को रोका एवं कहा - क्या तुम मेरी सेना में शामिल हो सकते हो?'' गंगू बाबा यह सुन कर बहुत खुश हुए और नाना साहब की सेना में शामिल हो गये। यह वही वक्त था जब नाना साहब ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया था। उनकी सेना में रहते हुए गंगू बाबा ने एक बार अकेले ही अपनी तलवार से डेढ़ सौ अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया था। इस नाते वे अंग्रेजों को खटकने लगे। काफी प्रयास के बाद अंग्रेज अत्यंत जबरदस्त घेराबंदी कर गंगू बाबा को पकड़ पाये थे। फिर उन निर्दयियों ने उन्हें रस्सी से घोड़े के पीछे बांध दिया था और घसीट कर बिठूर से कानपुर तक लाये थे। कानपुर लाकर चुन्नीगंज में नीम की डाल पर लटका कर फांसी दे दी गयी थी।

बिठूर के आसपास गंगू बाबा की कथा कहने वाली इन औरतों को शायद यह पता न हो कि कानपुर के चुन्नीगंज में गंगू बाबा की एक मूर्ति लगी है , जिसे गरीब दलितों ने आपस में एक एक पैसा इकट्ठा कर बनाया है।

यह कहानी १० जनवरी , २००७ की सुबह १२ बजे एक बूढ़ी औरत भगवंती देवी तथा दलित लेखक के. नाथ द्वारा मुझे सुनायी गयी थी, जो उत्तर भारत के जिला कानपुर देहात के दुआरी गांव के रहने वाले हैं। (शोध , संकलन एवं अध्ययन : बद्री नारायण )

बांग्ला बुद्धिजीवियों की दृष्टि में १८५७ की जनक्रांति

१८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

१८५७ का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। इस विद्रोह का आरंभ छावनीं क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुई परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिय़ा। इस विद्रोह के अन्त में ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारत में शासन समाप्त हो गया और ब्रितानी सरकार का प्रत्यक्ष शासन आरम्भ हो गया जो अगले ९० वर्षों तक चला।
विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिंक करिए..........।
 

१८५७ की स्मृति में तीन संग्रहालय
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत तीन ऐसे संग्रहालय हैं जहां प्रथम स्वाधीनता संग्राम-1857 से संबंधित दस्तावेज और स्मृति चिह्न संरक्षित हैं । ये हैं - 1857, मेमोरियल संग्रहालय, लखनऊ, मुमताज महल संग्रहालय, लाल किला, नई दिल्ली और स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय, दिल्ली ।


1857 मेमोरियल संग्रहालय

यह संग्रहालय लखनऊ में रेजीडेंसी भवन के एनेक्सी में स्थापित किया गया है । इस भवन के भग्नावशेष हमें लखनऊ में 1857 की महान क्रांति की याद दिलाते हैं और ये इसी स्थिति में हैं, जिसमें वे वर्ष 1920 में केन्द्रीय सुरक्षा में आये थे । इस संग्रहालय की डिजाइन, 1857 के स्वाधीनता संघर्ष का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करने लायक बनाया गया है और इसमें रेजीडेंसी माडल, पुरानी तस्वीरें, चित्र, दस्तावेज, बंदूक, कवच, रैंक बेज आदि 511 वस्तुएं हैं । यह संग्रहालय तस्वीरों, अश्मलेखों और चित्रों के माध्यम से 1857 की क्रांति को एक सिलसिलेवार ढंग से प्रदर्शित करता है । लखनऊ के रणनीतिक स्थलों, 1857 की क्रांति के केन्द्र, आदि के मानचित्र भी हैं । एक नई वीथिका भी तैयार की गयी है, जिसमें रेजीडेंसी परिसर के दक्षिणी हिस्से से खुदाई में मिले अवशेष प्रदर्शित किए गए हैं ।

मुमताज महल संग्रहालय, दिल्ली

इस संग्रहालय में प्रथम स्वाधीनता संग्राम, 1857 से संबंधित 42 सामान है, जिसमें मानचित्र, अश्मलेख, चिट्ठियां, चित्र, अभिलेख, पटौदी के नवाब और बहादुरशाह जफर द्वारा इस्तेमाल हथियार तथा दिल्ली पर कब्जे के दौरान जनरल जे निकोलसन द्वारा इस्तेमाल फील्ड ग्लास आदि शामिल हैं ।

स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय, दिल्ली

इसकी स्थापना लाल किला के अंदर एक दो मंजिला बैरक में 1995 में की गयी । प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लाल किला का खास महत्व था । यह संग्रहालय 1857 की क्रांति के पूर्व की स्थिति से लेकर प्रथम स्वाधीनता संग्राम तथा 15 अगस्त, 1947 तक के स्वाधीनता आंदोलन की व्यापक तस्वीर पेश करता है । इसमें 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से जुडे अश्मलेख, हथियार , पत्र आदि 14 चीजें हैं ।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण प्राचीन स्मारक पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के तहत इन संग्रहालयों का प्रबंधन एवं विकास संभालता है ।

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