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Saturday, February 8, 2014

प्राचीनतम शहर काशी का रहस्य जानने के लिए शुरू हुई पुरातात्विक खुदाई

     दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी के रहस्यों और कालखंड को तलाशने के लिए दिल्ली ASI और पटना की टीम काशी के राजघाट पहुंची है। खुदाई के लिए ट्रैंच बनाकर मापन कर लिया गया है।
 पहले ट्रैंच A-1 में 92 सेमी की खुदाई भी हो चुकी है। अभी तक की खुदाई में कुछ बर्तनों के टुकड़े मिले हैं। जानकारों के मुताबिक खुदाई की गहराई का मापन मिलती जा रही मिटटी की सतहों पर ही डिसाइड होगा।
 1969 के बाद फिर से काशी की प्राचीनता को वैज्ञानिक आधार देने के लिए खुदाई की जा रही है। वैज्ञानिकों की टीम कार्बन डेटिंग के जरिए ये पता लगाएगी कि इस शहर की नगरीय सभ्यता कैसी और कितनी पुरानी है।
राजघाट में बीएचयू ने वर्ष 1960 से 1969 तक खुदाई कराई थी। खुदाई से इस तथ्य का खुलासा हुआ था कि ईसा पूर्व 8वीं शताब्दी से लेकर आज तक काशी में मानव जीवन रहा है। कई कालखंडों में यहां पर मानव जीवन होने के साक्ष्य भी मिले हैं।
 दिल्ली से आई ASI टीम के सहायक पुरातत्व विद राजेश यादव ने बताया कि ट्रैंच बनाकर खुदाई का काम शुरू हो गया है। उन्होंने बताया, माउंट (टीला ) कल्चर सीक्वल जानने के लिए वर्टिकल और डिटेल्ड खुदाई की जा रही है।
     इतिहासकार ओपी केजरीवाल ने बताया कि काशी में हो रही खुदाई विज्ञान और इतिहास को एक नया आधार देगी। ग्रंथों में बनारस का इतिहास महाभारत काल का मिलता है। इतिहास की कई किताबों में काशी कि सभ्यता का प्राचीन वर्णन मिलता है। खुदाई से जो चीजें मिलेंगी वो प्राचीनता की दिशा में एक नया इतिहास दुनिया को देंगी।
राजघाट के पास अवशेष स्थल पर खुदाई 1969 के बाद एक बार फिर ASI और ज्ञान प्रवाह की संयुक्त देख-रेख में खुदाई शुरू हो गई है। पुरातत्वविद और बीएचयू की पूर्व प्रो. विदुला जायसवाल ने बताया कि राजघाट के पुरातात्विक खंडहर से काशी की प्राचीनता का जो इतिहास ईसापूर्व 8 वीं शताब्दी यानि 2800 वर्ष का मिलता है।
इस बार खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों की कार्बन डेटिंग कराई जाएगी तभी पता चल पाएगा कि इस शहर का इतिहास कितना पुराना है।
सहायक पुरातत्वविद राजेश यादव ने बताया कि कार्बन डेटिंग आधुनिक विज्ञान में काफी विकसित प्रणाली है। खुदाई के दौरान प्राप्त जीव-जंतुओं के अवशेषों, बर्तन, नगर सभ्यता की ईटों और भी तमाम ऐसी चीजें होती हैं जिनका कार्बन कण और एक्टिव पदार्थों से काल खंड का पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिक आधार पर कार्बन डेटिंग ही प्राचीनता का सबसे पुख्ता प्रमाण दे सकता है। वहीं, इससे पहले भी अक्टूबर माह में पुरात्व विभाग ने एक और स्थान की खुदाई की थी। लखनऊ से 50 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में साधु शोभन सरकार के सपने से प्रेरित होकर सोने के लिए खुदाई भी की गई। वहां कुछ न मिलने पर आखिर कर खुदाई करने पहुंची टीम को अपना बोरिया बिस्तर बांध कर निकल जाना ही सही लगा।
 (स‌ाभार दैनिक जागरण-वाराणसी.)

डौंडिया खेड़ा: सोना तो नहीं, सोने से बड़ा खजाना मिला
 उन्नाव (उत्तर प्रदेश) के डौंडिया खेड़ा के महल में हुई खोदाई में सोना तो नहीं मिला, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को उससे भी बड़ा खजाना मिला है। खोदाई में निकले अवशेषों से ऐसे प्रमाण मिले हैं कि वहां का इतिहास तीन हजार साल पुराना है। यह तथ्य एएसआइ के लिए काफी अहम है। इससे पहले डौंडिया खेड़ा का इतिहास 7वीं सदी तक का ही माना जा रहा था।
एएसआइ के पहले महानिदेशक ने 1860 में प्रमाण जुटाए थे कि चीनी यात्री ह्वेन सांग ने सातवीं सदी में डौंडिया खेड़ा का भ्रमण किया था। उसने लिखा था कि डौंडिया खेड़ा में बौद्ध धर्म मानने वाले लोग उसे मिले थे। एएसआइ ने जब डौंडिया खेड़ा में राजा राव रामबख्श के महल की खोदाई की तो वहां मिले अवशेषों से प्राथमिक स्तर पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि वहां का इतिहास 2 हजार साल पुराना है। खोदाई में चमकीले मृदभांड, लाल बर्तन, हड्डी की नुकीली वस्तुएं, जानवरों की हड्डियां, सुपारी के आकार के पत्थर व लोहे की कीलें मिली थीं। एएसआइ की उत्खनन एवं अन्वेक्षण शाखा के निदेशक डॉ. जमाल हसन कहते हैं कि अवशेषों के अध्ययन से इस बात का पता चला है कि डौंडिया खेड़ा का इतिहास 3 हजार साल पुराना है। एएसआइ के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. बी आर मणि कहते हैं कि एएसआइ ने परीक्षण के लिए डौंडिया खेड़ा में खोदाई की अनुमति दी थी। विभाग ऐसी खोदाई कराता रहता है।
अंग्रेजों ने कर लिया था राजा रामबख्श के महल पर कब्जा
शोभन सरकार ने डौंडिया खेड़ा में एक हजार टन सोना दबा होने का दावा किया था। इसके बाद राजा राव रामबख्श के खंडहर हो चुके महल में एएसआइ ने 18 अक्टूबर को खोदाई शुरू कराई थी। जियोलॉजिकल ऑफ इंडिया ने एएसआइ को 29 अक्टूबर को रिपोर्ट दी थी, जिसमें उसने कहा था कि महल के नीचे सोना, चांदी या अन्य धातु दबी हो सकती है। राजा के महल में एक माह तक खोदाई चली और काम 19 नवंबर 2013 को पूरा हुआ। इस काम में 278751 रुपये खर्च हुए थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने महल पर कब्जा कर राजा राव रामबख्श को फांसी दे दी थी।
करीब 100 लोगों ने लगाई आरटीआइसोना मामले को लेकर एएसआइ के दिल्ली स्थित मुख्यालय में करीब 100 आरटीआइ लगाई गई हैं। इसमें लोगों ने पूछा है कि क्या सपनों के आधार पर भी एएसआइ खोदाई कराता है? क्या बाबाओं की बात पर भी एएसआइ भरोसा करता है? कई लोगों ने सोना निकालने के मामले पर होने वाले खर्च की जानकारी मांगी है।
(स‌ाभार दैनिक जागरण-[वी.के.शुक्ला], नई दिल्ली।)

Friday, January 31, 2014

भीम पुत्र घटोत्कच का कंकाल मिला!


 भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल ज्योग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 22 फुट का विशाल नरकंकाल मिला है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियंत्रण में है। यह वही इलाका है, जहां से कभी प्राचीनकाल में सरस्वती नदी बहती थी।

इस कंकाल को वर्ष 2007 में नेशनल जिओग्राफी की टीम ने भारतीय सेना की सहायता से उत्तर भारत के इस इलाके में खोजा। 8 सितंबर 2007 को इस आशय की खबर कुछ समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई थी। हालांकि इस तरह की खबरों की सत्यता की कोई पुष्टि नहीं हुई है। इस मामले में जब तक कोई अधिकृत बयान नहीं जारी होता, यह असत्य ही मानी जा रही है।

बताया जाता है कि कद-काठी के हिसाब से यह कंकाल महाभारत के भीम पुत्र घटोत्कच के विवरण से मिलता-जुलता है। हालांकि इसकी तुलना अमेरिका में पाए जाने वाले बिगफुट से भी की जा रही है जिनकी औसत हाइट अनुमानत: 8 फुट की है। इसकी तुलना हिमालय में पाए जाने वाले यति से भी की जा रही है, जो बिगफुट के समान ही है।

माना जा रहा है कि इस तरह के विशालकाय मानव 5 लाख वर्ष पूर्व से 1 करोड़ 20 लाख वर्ष पूर्व के बीच में धरती पर रहा करते थे जिनका वजन लगभग 550 किलो हुआ करता था।

यह कंकाल देखकर पता चलता है कि किसी जमाने में भारत में ऐसे विशालकाय मानव भी रहा करते थे। माना जा रहा है कि भारत सरकार द्वारा अभी इस खोजबीन को गुप्त रखा जा रहा है।

खास बात यह है कि इतने बड़े मनुष्य के होने का कहीं कोई प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हो सका था। क्या सचमुच इतने बड़े आकार के मानव होते थे? यह पहला प्रमाण है जिससे कि यह सिद्ध होता है कि उस काल में कितने ऊंचे मानव होते थे।
हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी।

हालांकि इस क्षेत्र में अभी किसी को जाने नहीं दिया जा रहा और आर्कलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का कहना है कि सरकार से अनुमति प्राप्त होने के बाद ही इस पर कुछ कहा जाएगा। हालांकि भारत सरकार भारत से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्यों को अब तक छुपाकर ही रख रही है। क्यों? यह सरकार से ही पूछा जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि राम जन्मभूमि, रामसेतु आदि प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्यों को सरकार ने छुपाकर रखा है। फिलहाल यहां भारत सरकार ने किसी के भी जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

महाभारत में भीम पुत्र घटोत्कच और राक्षस बकासुर के इस तरह के विशालकाय होने का वर्णन मिलता है। भीम ने असुर पुत्री हिडिम्बा से विवाह किया था जिससे घटोत्कच और घटोत्कच से बर्बरीक का जन्म हुआ। महाभारतकाल में भी इतने विशालकाय मानव हुआ करते थे।

    इस तरह के कंकाल विश्वभर में कई जगहों पर पाए गए हैं, लेकिन यह सबसे विशालकाय है। अब तक के सबसे प्राचीनतम ज्ञात जीवाश्म एशिया, चीन, जावा और भारत (शिवालिक हिल्स) से प्राप्त किया गया है।
नेशनल ज्योग्राफी की टीम ने यहां खुदाई करने से पहले भूमि के कुछ विशेष चिह्नित इलाकों का स्पेशल एक्स-रे किया था जिसमें उनको यह पता चला कि जमीन के भीतर कुछ विशेष है। बाद में यहां खुदाई करने के बाद एक विशालकाय नरकंकाल मिला। जिसकी खोपड़ी का आकार 10 फुट से अधिक था। यह पूरा कंकाल तकरीबन 30 फुट के करीब है।

     इसके अलावा यहां खुदाई करने पर टीम को कुछ शिलालेख भी मिले जिसमें ब्राह्मी लिपी में कुछ अंकित है। इस भाषा का विशेषज्ञों ने अनुवाद किया। इसमें लिखा है कि- ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।(नई दिल्ली)
http://hindi.webdunia.com/religion-sanatandharma-history

Tuesday, January 28, 2014

`हिंसा, बीमारी से खत्म हुई सिंधु घाटी सभ्‍यता`


वाशिंगटन : लोगों के बीच हिंसा, संक्रामक रोगों और जलवायु परिवर्तन ने करीब 4,000 साल पहले सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्‍यता का खात्मा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। यह दावा एक नए अध्ययन में किया गया है।

नॉर्थ कैरोलिना स्थित एप्पलचियान स्टेट यूनिवर्सिटी में नृविज्ञान (एन्थ्रोपोलॉजी) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ग्वेन रॉबिन्स शुग ने एक बयान में कहा कि जलवायु, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों, सभी ने शहरीकरण और खात्मे की प्रक्रिया में भूमिका निभाई, लेकिन इस बारे में बहुत कम ही जानकारी है कि इन बदलावों ने मानव आबादी को किस तरह प्रभावित किया।

शोध पत्र के प्रमुख लेखक शुग ने कहा कि सिंधु घाटी सभ्‍यता का अंत और मानव आबादी का पुन:संगठित होना लंबे समय से विवादित रहा है। यह शोध पत्र प्लॉस वन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यूनिवर्सिटी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि शुग और अनुसंधानकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने हड़प्पा के तीन दफन स्थलों से मानव कंकाल अवशेषों में अभिघात (ट्रॉमा) और संक्रामक बीमारी के सबूत की जांच की। हड़प्पा सिंधु घाटी स5यता के सबसे बड़े शहरों में से एक था।

विज्ञप्ति में कहा गया कि उनका विश्लेषण लंबे समय से चले आ रहे इन दावों के विपरीत है कि सिंधु सभ्‍यता का विकास शांतिपूर्ण, सहयोगात्मक और समतामूलक समाज के रूप में हुआ जहां कोई सामाजिक भेदभाव, वर्गीकरण नहीं था और आधारभूत संसाधनों तक पहुंच में कोई पक्षपात नहीं था। विश्लेषण के अनुसार हड़प्पा में कुछ समुदायों को अन्य के मुकाबले जलवायु परिवर्तन और सामाजिक आर्थिक क्षति का अधिक असर झेलना पड़ा, खासकर सामाजिक रूप से सुविधाहीन या हाशिए पर रहे लोगों को, जो कि हिंसा और बीमारियों के अधिक शिकार बनते हैं।

शुग ने कहा कि पूर्व के अध्ययनों में कहा गया था कि पारिस्थितिजन्य कारक पतन का कारण बने, लेकिन उन सिद्धांतों को साबित करने के लिए कोई संबंधित साक्ष्य नहीं था। पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में मौजूदा तकनीकों में सुधार आया है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के घटनाक्रमों का मानव समुदायों पर व्यापक असर पड़ता है। वैज्ञानिक ये अनुमान नहीं लगा सकते कि जलवायु परिवर्तन का असर हमेशा हिंसा और बीमारी जैसा होगा। शुग ने कहा कि हालांकि, इस मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधु शहरों में तेजी से हुई नगरीकरण की प्रक्रिया, और व्यापक सांस्कृतिे संपर्क ने मानव आबादी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दीं। कुष्ठ और तपेदिक जैसे संक्रामक रोग संभवत: एक संपर्क क्षेत्र में संचरित हो गए जो मध्य एवं दक्षिण एशिया तक फैल गए। (एजेंसी)
http://zeenews.india.com/hindi/news/sci-tech/violence-disease-caused-end-of-indus-valley-civilization/200709

Thursday, January 16, 2014

कृष्ण और बौद्ध काल के खोए पन्ने

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     इतिहास बुलेटिन में निम्न खबरों का अवलोकन करें। ये खबरें स‌ाभार ली गईं हैं। इन्हें स‌ंकलित करके यहां दे रहा हूं। राजनीति व अपराध प्रमुख खबरों की बहुतायत में इतिहास ये खबरें छपतीं तो हैं मगर यत्र-तत्र बिखरी होने के कारण उचित जगह नहीं ले पातीं। मुझे जब भी ऎसा खबरें उपलब्ध होतीं हैं, मैं उन्हें स‌जोकर रखता हूं और स‌ंकलित करके आप तक पहुंचाने का प्रयास करता हूं। उम्मीद है ये खबरें इतिहास प्रेमियों को रुचिकर लगेंगीं।-- डा. मान्धाता स‌िंह ।


1-  कृष्ण व बौद्धकाल के खोए पन्ने ।
2- 3600 साल पुराने राजा का कंकाल मिला ।
3- पश्चिम बंगाल में मिला प्राचीन बौद्ध मठ ।

कृष्ण और बौद्ध काल के  खोए पन्ने

   मध्‍यकाल में भारतीय इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया। तक्षशिला और पाटलीपुत्र के ध्वंस के बाद महाभारत युद्ध और बौद्ध काल के बीच के हिंदू इतिहास के अब बस खंडहर ही बचे हैं। विदेशी इतिहासकारों ने जानबूझकर इस काल के इतिहास को विरोधाभासी बनाया। क्योंकि उन्हें भारत में नए धर्म को स्थापित करना था। दरअसल बुद्ध के पूर्व के संपूर्ण इतिहास को नष्ट किए जाने का संपूर्ण प्रयास किया गया। इस धूमिल से इतिहास को इतिहासकारों ने खुदाईयों और ग्रंथों की खाक छानते हुए क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है।

हड़प्पा, सिंधु और मोहनजोदड़ों सभ्यता का प्रथम चरण 3300 से 2800 ईसा पूर्व, दूसरा चरण 2600 से 1900 ईसा पूर्व और तीसरा चरण 1900 से 1300 ईसा पूर्व तक रहा। इतिहासकार मानते हैं कि यह सभ्यता काल 800 ईस्वी पूर्व तक चलता रहा।

प्रथम चरण के काल में महाभारत हुई, दूसरे चरण के काल में मिस्र के फराओं और भारत के कुरु और पौरवो के राजवंश थे। तीसरे चरण में यहूदी धर्म के संस्थापक इब्राहिम, मूसा, सुलेमान ने यहूदी वंशों का निर्माण किया तो भारत में सभी वंशों के 16 महाजनपदों का उदय हुआ। हड़प्पा से पहले सिंधु नदी के आसपास मेहरगढ़ की सभ्यता का अस्तित्व था। उससे पूर्व मध्यप्रदेश में भीमबेटका में भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता को खोजा गया जिसका काल 9000-7000 ईसा पूर्व था। यहां गुफाओं में कुछ शैलचित्र ऐसे भी मिले हैं जिनकी उम्र कार्बनडेटिंग अनुसार 35 हजार ईसा पूर्व की मानी गई है।

सिंधु या मोहनजोदड़ो के काल में इराक में सुमेरी और मिस्र में सबाइन सभ्यता सबसे विकसित सभ्यता थी। मोहदजोदड़ों हड़प्पा से मिलने वली मुहरें, बर्तन, भित्तिचित्र आदि ईरान, मिस्र और इराकी सभ्यताओं में पाई गई मुहरों आदि से मिलती जुलती है। सिंधु घाटी की कई मोहरें सुमेरिया से मिली है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि इस देश के उस काल में भारत से संबंध थे।

2800 से 1900 ईसापूर्व के बीच भारत में किन राजवंशों का राज था इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। इस काल में धर्म का केंद्र हस्तीनापुर, मधुरा आदि से हटकर तक्षशिला हो गया था। अर्थात पेशावर से लेकर हिंदुकुश के इलाके में बहुत तेजी से परिवर्तन हो रहे थे।

1300 ईसा पूर्व भारत 16 महाजनपदों में बंटा गया- 1. कुरु, 2. पंचाल, 3. शूरसेन, 4. वत्स, 5. कोशल, 6. मल्ल, 7. काशी, 8. अंग, 9. मगध, 10. वृज्जि, 11. चे‍दि, 12. मत्स्य, 13. अश्मक, 14. अवंति, 15. गांधार और 16. कंबोज। अधिकांशतः महाजनपदों पर राजा का ही शासन रहता था, परंतु गण और संघ नाम से प्रसिद्ध राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था। इस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।

महाभारत के बाद धीरे-धीरे धर्म का केंद्र तक्षशिला (पेशावर) से हटकर मगध के पाटलीपुत्र में आ गया। गर्ग संहिता में महाभारत के बाद के इतिहास का उल्लेख मिलता है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तक्षशिला और पाटलीपुत्र के संहार किए जाने के कारण महाभारत से बुद्धकाल तक के इतिहास का अस्पष्ट उल्लेख मिलता है।

यह काल बुद्ध के पूर्व का काल है, जब भारत 16 जनपदों में बंटा हुआ था। हर काल में उक्त जनपदों की राजधानी भी अलग-अलग रही, जैसे कोशल राज्य की राजधानी अयोध्या थी तो बाद में साकेत और उसके बाद बौद्ध काल में श्रावस्ती बन गई।

महाभारत युद्ध के पश्चात पंचाल पर पाण्डवों के वंशज तथा बाद में नाग राजाओं का अधिकार रहा। पुराणों में महाभारत युद्ध से लेकर नंदवंश के राजाओं तक 27 राजाओं का उल्लेख मिलता है।

महाभारत काल के बाद अर्थात कृष्ण के बाद हजरत इब्राहीम का काल ईस्वी पूर्व 1800 है अर्थात आज से 3813 वर्ष पूर्व का अर्थात कृष्ण के 1400 वर्ष बाद ह. इब्राहीम का जन्म हुआ था। यह उपनिषदों का काल था। ईसा से 1000 वर्ष पूर्व लिपिबद्ध किए गए छांदोग्य उपनिषद में महाभारत युद्ध के होने का जिक्र है।

हजरत इब्राहीम के काल में वेद व्यास के कुल के महान संत 'सुतजी' थे। इस काल में वेद, उपनिषद, महाभारत और पुराणों को फिर से लिखा जा रहा था। सुतजी और इब्राहीम का काल थोड़ा-बहुत ही आगे-पीछे रहा।

इस काल में उत्तर वैदिक काल की सभ्यता का पतन होना शुरू हो गया था। इस काल में एक और जहां जैन धर्म के अनुयायियों और शासकों की संख्‍या बढ़ गई थी वहीं धरती पर यहूदियों के वंश विस्तार की कहानी लिखी जा रही थी। हजरत इब्राहीम इस इराक का क्षेत्र छोड़कर सीरिया के रास्ते इसराइल चले गए थे और फिर वहीं पर उन्होंने अपने वंश और यहूदी धर्म का विस्तार किया।
इस काल में भरत, कुरु, द्रुहु, त्रित्सु और तुर्वस जैसे राजवंश राजनीति के पटल से गायब हो रहे थे और काशी, कोशल, वज्जि, विदेह, मगध और अंग जैसे राज्यों का उदय हो रहा था। इस काल में आर्यों का मुख्य केंद्र 'मध्यप्रदेश' था जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा दोआब तक था। यही पर कुरु एवं पांचाल जैसे विशाल राज्य भी थे। पुरु और भरत कबीला मिलकर 'कुरु' तथा 'तुर्वश' और 'क्रिवि' कबीला मिलकर 'पंचाल' (पांचाल) कहलाए।

अंतिम राजा निचक्षु : महाभारत के बाद कुरु वंश का अंतिम राजा निचक्षु था। पुराणों के अनुसार हस्तिनापुर नरेश निचक्षु ने, जो परीक्षित का वंशज (युधिष्ठिर से 7वीं पीढ़ी में) था, हस्तिनापुर के गंगा द्वारा बहा दिए जाने पर अपनी राजधानी वत्स देश की कौशांबी नगरी को बनाया। इसी वंश की 26वीं पीढ़ी में बुद्ध के समय में कौशांबी का राजा उदयन था। निचक्षु और कुरुओं के कुरुक्षेत्र से निकलने का उल्लेख शांख्यान श्रौतसूत्र में भी है।

जन्मेजय के बाद क्रमश: शतानीक, अश्वमेधदत्त, धिसीमकृष्ण, निचक्षु, उष्ण, चित्ररथ, शुचिद्रथ, वृष्णिमत सुषेण, नुनीथ, रुच, नृचक्षुस्, सुखीबल, परिप्लव, सुनय, मेधाविन, नृपंजय, ध्रुव, मधु, तिग्म्ज्योती, बृहद्रथ और वसुदान राजा हुए जिनकी राजधानी पहले हस्तिनापुर थी तथा बाद में समय अनुसार बदलती रही। बुद्धकाल में शत्निक और उदयन हुए। उदयन के बाद अहेनर, निरमित्र (खान्दपनी) और क्षेमक हुए।

मगध वंश में क्रमश: क्षेमधर्म (639-603 ईपू), क्षेमजित (603-579 ईपू), बि‍म्बिसार (579-551), अजातशत्रु (551-524), दर्शक (524-500), उदायि (500-467), शिशुनाग (467-444) और काकवर्ण (444-424 ईपू) ये राजा हुए।

नंद वंश में नंद वंश उग्रसेन (424-404), पण्डुक (404-294), पण्डुगति (394-384), भूतपाल (384-372), राष्ट्रपाल (372-360), देवानंद (360-348), यज्ञभंग (348-342), मौर्यानंद (342-336), महानंद (336-324)। इससे पूर्व ब्रहाद्रथ का वंश मगध पर स्थापित था।

अयोध्या कुल के मनु की 94 पीढ़ी में बृहद्रथ राजा हुए। उनके वंश के राजा क्रमश: सोमाधि, श्रुतश्रव, अयुतायु, निरमित्र, सुकृत्त, बृहत्कर्मन्, सेनाजित, विभु, शुचि, क्षेम, सुव्रत, निवृति, त्रिनेत्र, महासेन, सुमति, अचल, सुनेत्र, सत्यजित, वीरजित और अरिञ्जय हुए। इन्होंने मगध पर क्षेमधर्म (639-603 ईपू) से पूर्व राज किया था।( स‌ाभार- http://www.webdunia.com/)

3600 साल पुराने राजा का कंकाल मिला

 मिस्र में एक ऐसे राजा के अवशेष मिला है जिसके बारे में इतिहास में कोई जिक्र नहीं था। वह सम्भवत: तीन हजार 600 साल पहले शासन करता था। मिस्र के एंटिकि्वटी मंत्रालय ने बताया कि राजधानी काहिरा से 500 किलोमीटर दूर सोहाग प्रांत में साउथ अबिदोस नामक स्थान पर यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया की टीम को खुदाई के दौरान सेनब्के नाम के राजा का कंकाल मिला है।
प्राचीन मिस्र के राजाओं को फराओं के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि सेनेब्के का नाम इससे पहले मिस्र के इतिहास में कभी नहीं सुना गया था।
मंत्रालय ने एक बयान में बताया कि सेनेब्के का नाम खुदाई स्थल पर एक राजकीय कारतूस पर खुदा मिला।
बयान के साथ जारी तस्वीरों में ताबूत काफी खराब हालत में है। जिस चैम्बर में राजा को दफनाया गया था उसकी छत को पेटिंग से सजाया गया था।
राजा के कंकाल की तस्वीरों के साथ जारी कैप्शन में लिखा है कि उसके शव को ममी के रूप में संरक्षित किया गया था, लेकिन पुराकालीन कब्र लूटने वालो ने उसके शरीर को ममी से बाहर निकाल दिया था।
मंत्रालय ने बताया कि कब्र के पास किसी तरह का फर्नीचर न होना इस बात का प्रमाण है कि फराओ काल में कब्र को लूटा गया था। बयान में सेनेब्के का शासनकाल 1650 ईसा पूर्व बताया गया है। (भाषा)

पश्चिम बंगाल में मिला सबसे प्राचीन बौद्ध मठ

 पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर के दातन स‌े दो किलोमीटर दूर मोघलामारी में  पिछले शनिवार को खुदाई के दौरान छठीं शताब्दी ईसापूर्व के बौद्धमठ का पता चला है। यहां स‌े पकाई गईं मिट्टी की छह पट्टलिकाएं ( टेराकोटा टेबलेट्स ) मिले हैं। यहां राज्य के पुरातात्विक विभाग की तरफ स‌े एक टीले की इतिहासकार खुदाई कर रहे हैं। हालांकि इस मठ का क्या नाम था अभी इतिहासकार नहीं तय कर पाएं हैं क्यों कि जो मुहर यहां स‌े मिली है उसे अभी पढ़ा जाना है। इसपर ब्राह्मी लिपि में शब्द उकेरे गए हैं।
  खुदाई में पकाई गई मिट्टी की जो छह पट्टलिकाएं मिली हैं वह एक स‌ीढ़ी के नीचे डिब्बे में रखीं मिली हैं। इनपर ब्राह्मी लिपि में - ये दामा हेतु प्रभाबो....महा शमन....। लिखा हुआ है। इससे इतिहासकारों का मानना है कि यह कोई महत्वपूर्ण बौद्धविहार रहा होगा।
  इस स‌्थल स‌े इसके पहले एक स‌ोने का स‌िक्का और एक लाकेट भी मिला है। इनपर भी ब्राह्मी लिपि में-- महाराजाधिराज स‌माचारदेवो....। लिखा है। इस प्रमाण के आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि यह बौद्धविहार बंगाल के स‌्वतंत्र शासक के आधीन था। स‌ंभवतः यह राजा गुप्तशासक कुमारगुप्त के स‌मय यहां का शासक था।
  मालूम हो कि मोघलमारी के इस टीले की स‌बसे पहले खुदाई प्रसिद्ध इतिहासकार बीएन मुखर्जी ने 2003 में की थी। स‌्थानीय लोग िस टीले को स‌खी स‌ेना या स‌शि स‌ेना कहते हैं। प्राप्त प्रमाणों के आधार पर  बीएऩ मुखर्जी ने चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में उल्लिखित उस बौद्ध मठ को बताया जो बंगाल में था और मुर्शिदाबाद के रक्तामृत्तिका विहार स‌े भी प्राचीन है।
 कलकत्ता विश्वविद्यालय की ओर स‌े 2004 में मोगालमारी टीले की खुदाई शुरू की गई थी जो कई चरणों में 2012 तक चली। इस खुदाई में शामिल पुरातत्वविदों ने इस विशाल टीले की खुदाई के बाद निष्कर्ष निकाला है कि इस बौद्ध विहार का दो चरणों में विकास हुआ। पहला चरण छठवीम स‌े स‌ातवीं तक था इसके बाद का चरण नौवीं स‌े दसवीं शताब्दी रहा होगा। अर्थाभाव में यह खुदाई बंद कर दी गई थी जो राज्य पुरातात्विक विभाग ने 20 नवंबर स‌े फिर शुरू की । कलकत्ता विश्वविद्यालय के पुरात्तवविद रजत स‌ान्याल का कहना है कि खुदाई में मिली काफी स‌ंख्या में देवियों की मूर्तियों स‌े स‌ाबित होता है कि यह मठ बुद्धकाल के वज्रयानियों के स‌मय निर्मित किया गया होगा।
     खबर स‌्रोत स‌ाभार----http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata/

नालंदा में एक और विवि के अवशेष मिले


 बिहार पुरातत्व विभाग को पुराने नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर से 40 किलोमीटर की दूरी पर तेल्हाडा में एक अन्य विश्वविद्यालय के अवशेष मिले हैं जिसकी चर्चा चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के विवरणी में किया गया है। बिहार पुरातत्व विभाग के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने बताया कि खुदाई के दौरान तेल्हाडा में विश्वविद्यालय के अवशेष मिले हैं।
उन्होंने बताया कि तेल्हाडा विश्वविद्यालय का जिक्र इत्सिंग जिन्होंने ईसा पूर्व सातवीं सदी में नालंदा का भ्रमण किया था, उसके विवरणी में किया गया है। तिल्हाडा विश्वविद्यालय को उच्च शोध वाले के रूप में या फिर नालंदा विश्वविद्यालय जो कि प्राचीन काल में पूरे विश्व के बौद्ध विद्वानों के लिए ज्ञान हासिल करने का केंद्र था इसकी प्रतिस्पर्द्धा में खोला गया होगा।
वर्मा ने बताया कि तेल्हाडा में तीन बौद्ध मंदिरों के अवशेष मिले हैं और इनका भी जिक्र इत्सिंग के विवरणी में किया गया है। उन्होंने बताया कि उक्त विवरणी में करीब एक हजार बौद्ध भिक्षुओं के एक बड़े चबूतरे पर साथ बैठकर प्रार्थना करने का भी जिक्र है जिसे भी खुदाई के दौरान चिन्हित कर लिया गया है।
बिहार पुरातत्व विभाग के निदेश अतुल कुमार वर्मा ने बताया कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी के दौरान बिहार की यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग की विवरणी में बताई गई बातों के मुताबिक तेल्हाडा से गुप्त और पाल काल की संरचनाएं खुदाई में मिली हैं।
उन्होंने बताया कि सीलें जिनपर तिल्हाधक महाविहारा लिखा है जिसी पुष्टि पुरातत्विद एलक्जेंडर कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में की थी, वह भी पाए गए हैं। यह महाविहारा के करीब एक किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। नालंदा जिला के एकंगसराय प्रखंड के तेल्हाडा में 2009 में शुरू  किया गया खुदाई का काम आज भी जारी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वहां जारी खुदाई कार्याें की प्रगति के बारे में जानने के लिए कई बार उस स्थल का भ्रमण कर चुके हैं।
मुख्यमंत्री ने हाल ही में यह घोषणा की थी कि खुदाई के क्रम में तेल्हाडा में मिली सामग्रियों को पटना में बन रहे अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय में रखा जाएगा। नीतीश के आग्रह पर नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने तेल्हाडा के प्राचीन बौद्ध मठ के शुरुआती खुदाई स्थल का पिछले सप्ताह भ्रमण किया था। सेन नालंदा में स्थापित होने वाले नालंदा इंटरनेश्नल यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं। (पटना, 15 जनवरी (भाषा)।)

  जगन्नाथ मंदिर का संरक्षण कार्य इस साल के अंत तक पूरा होगा

   पुरी के जगन्नाथ मंदिर में चल रहे संरक्षण व मरम्मत कार्य को पूरा करने के लिए दिसंबर 2014 की समय सीमा निर्धारित करते हुए केंद्र ने बुधवार को कहा कि वह ओड़िशा में सभी प्राचीन स्मारकों का संरक्षण सुनिश्चित करेगा।
केंद्रीय संस्कृति सचिव रवींद्र सिंह ने मुख्य सचिव के नेतृत्व में राज्य सरकार के अधिकारियों से बातचीत के बाद संवाददाताओं से कहा,‘हमने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) से दिसंबर 2014 तक श्री जगन्नाथ मंदिर के संरक्षण व मरम्मत कार्य को पूरा करने को कहा है, जो 2015 में होने वाले भगवान के नवकलेवर उत्सव से काफी पहले हो जाएगा।’
केंद्रीय सचिव ने बैठक में मौजूद एएसआइ अधिकारियों को निर्देश दिया कि जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार की मरम्मत व बहाली के काम को मार्च 2014 तक पूरा कर लें।
पुरी में एएसआइ की एक इकाई स्थापित करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केंद्रीय सचिव ने कहा कि एक पखवाड़े के भीतर औपचारिक आदेश दे दिए जाएंगे। बैठक में कोणार्क मंदिर के संरक्षण व उसके अंदर भरी रेत की बोरियों को हटाने के बारे में भी विस्ताार से चर्चा की गई। ( भुवनेश्वर, 15 जनवरी (भाषा)। )



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