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Wednesday, November 9, 2011

ढह रही हैं अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतें

  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अवध के पहले बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने जो छतरमंजिल बनवाई थी उसका पोर्च मंगलवार को अचानक ढह गया। आसिफुद्दौला के बनवाए रूमी दरवाजा में दरार आ गई है तो वाजिद अली शाह के पिता अमजद अली शाह का मकबरा अतिक्रमण का शिकार है। शाहनजफ इमामबाड़ा के परिसर को शादी ब्याह के लिए भाड़े पर दिया जाता है। शादी ब्याह और पाटिर्यों के चलते यहां शोर शराबा और खाना पीना भी चलता है। खाना बनाने के लिए भठ्ठियां सुलगती रहती हैं और धुआं ऐतिहासिक ईमारत को नुकसान पहुंचता है। इसका निर्माण भी बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने 1816-17 में करवाया था। बड़ा इमामबाड़ा परिसर से लेकर छोटा इमामबाड़ा परिसर में लोगों ने मकान से लेकर दुकान तक खोल ली है। यह बानगी है लखनऊ की ऐतिहासिक ईमारतों की बदहाली की।
मंगलवार को छतरमंजिल का 15 फुट ऊंचा और तीस फुट लंबा पोर्च अचानक गिर जाने के बाद सब की नींद खुली है। यह ऐतिहासिक इमारत है और कई दशक से इसमे सेंट्रल ड्रग रिसर्च सेंटर की प्रयोगशाला चल रही है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के निदेशक राकेश तिवारी के मुताबिक यह इमारत जर्जर हो चुकी है। सीडीआरआई को करीब एक दशक पहले ही इसकी जानकारी दे दी गई थी पर इसे खाली नहीं किया गया। यह बताता है कि किस तरह ऐतिहासिक धरोहरों की अनदेखी की जा रही है। नवाबों के वंशज और अभिनेता जाफर मीर अब्दुल्ला ने जनसत्ता से कहा-सरकार तो चाहती है यह सब ऐतिहासिक इमारते गिर जाएं क्योकि वह तो नया इतिहास बना रहे हैं। उनके स्मारक यहां बन रहे हैं जिनका इस अवध की जमीन से कोई रिश्ता नहीं रहा । जिन लोगों ने अवध का निर्माण किया उनके स्मारक ढह रहे हैं। भारी ट्रैफिक के कारण रूमी दरवाजे में दरार आ चुकी है तो इमामबाड़ा में अतिक्रमण बढ़ रहा है। सिबटेनाबाद इमामबाड़ा के गेट पर तो सरकार ने ही अतिक्रमण कर लिया है।
जाफर मीर अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट की सांस्कृतिक समिति के सेक्रेट्री जनरल(रिटायर) और स्वीडन में बसे मशहूर वास्तुकला विशेषज्ञ प्रोफेसर सतीश चंद्रा का हवाला देते हुए कहा कि इन ईमारतों का रख रखाव भी ठीक से नहीं हो रहा है। सतीश चंद्रा का भी यही मानना है कि ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण में जो सामग्री इस्तेमाल की जा रही है उससे काफी नुकसान पहुंच सकता है। इन इमारतों को दुरुस्त करने का काम पोटर्लैंड सीमेंट, सुर्खी, चूना और मौरंग आदि की मदद से किया जा रहा है। इनसे इमारतों की पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे संकट और बढ़ रहा है। अब्दुल्ला ने आगे कहा-अवध की इन इमारतों की खास बात यही है कि इन इमारतों में जो पोरेसिटी होती है उसी के चलते दीवारों के कान होते है वाला मुहावरा भी मशहूर हुआ और भूल भुलैया में दीवार के एक छोर पर कोई कागज फाड़े तो दूसरे छोर पर आवाज सुनी जा सकती थी। पर इमारतों की मरम्मत के चलते यह पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे इन इमारतों को नुकसान पहुंच रहा है।
एमिटी विश्विद्यालय के आकिर्टेक्ट विभाग के कुछ छात्रों ने इन इमारतों के हालात का अध्ययन कर कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटाई हैं। अध्ययन के मुताबिक लखनऊ की पहचान रूमी दरवाजा में जो दरार आई है यदि उसे जल्द दुरुस्त नहीं किया गया तो आसिफुद्दौला की यह धरोहर इतिहास के पन्नो से गायब हो जाएगी। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के पिता अमजद अली शाह का मकबरा सिबटेनाबाद हजरत गंज में है। यह शिया लोगों का महत्त्वपूर्ण स्थल है। यह भवन भी भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के संरक्षित भवनों में से एक है। इस इमामबाड़े पर लोगों ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे आप किसी मुहल्ले में खड़े हैं। इमामबाड़े में अंदर जाने पर आपको गैस एजंसी से लेकर चाट की दुकान तक मिल जाएगी। और लोग अतिक्रमण करे तो समझ में आता है सरकारी महकमा भी इस काम में पीछे नहीं है। हजरत गंज को खुबसूरत बनाने के नाम पर पर इस इमामबाड़े के मुख्य गेट पर बड़ा सा फव्वारा बना दिया गया जिससे अब कोई धार्मिक जलूस आदि भी बाहर नहीं आ सकता।
ऐसी ही स्थिति बड़ा इमामबाड़ा की है । इसको अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने 1784 में बनवाया था। यहां पर भी लोगों ने कब्ज़ा जमा रखा है। इमामबाड़े के बाहर के हिस्से में एक होटल वाले ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर वह ठेला लगाता है व इमामबाड़े के अंदर की तरफ उसकी रसोई है। इमामबाड़े के अंदर की तरफ, मस्जिद के पीछे की तरफ व नीचे लोगों ने अवैध कब्ज़ा जमा रखा है। छोटा इमामबाड़ा में बाहर- अंदर दोनों जगह लोगों ने कब्ज़ा कर रखा है। यहां बाकायदा इन परिवारों का चौका चूल्हा जलता है। कहने को तो यह भी पुरातत्त्व विभाग का संरक्षित भवन है पर इसकी देख रेख करने वाला कोई है ऐसा देख कर नहीं लगता। करीब दर्जन भर इमारतें जर्जर हो चुकी हैं। ( साभार-जनसत्ता, अंबरीश कुमार )

Friday, October 21, 2011

पुरातात्विक स्थल ताराडीह

   बिहार के गया शहर स्थित महाबोधि मंदिर के पश्चिम स्थित पुरातात्विक स्थल ताराडीह का सौंदर्यीकरण होगा. इसके लिए योजना बना कर पर्यटन विभाग को भेजने का निर्देश दिया गया है।
मगध प्रमंडल के आयुक्त विवेक कुमार सिंह ने भी पिछले दिनों इस पर चर्चा की थी और उसके अनुपालन के लिए पर्यटन और कला-संस्कृति विभाग को निर्देश दिया है। ताराडीह भारत का एक मात्र ऐसा उत्खनन स्थल है जहां नव प्रस्तर काल से वर्तमान काल तक के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं।

वर्षे बाद शुरू हुआ प्रयास
चार दिसंबर, 2000 को बिहार सरकार के कला,संस्कृति व युवा विभाग ने इसके सौंदर्यीकरण का प्रयास किया था. विभागीय मंत्री अशोक कुमार सिंह बोधगया ताराडीह गौतम वन पुरातत्व परिसर के सौंदर्यीकरण और संरक्षण के कार्ये का शिलान्यास भी किया था, लेकिन 11 वर्ष बीत गये पर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखायी। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रेम दासा ने इस पुरातात्विक स्थल के विकास में रुचि दिखायी थी पर 1993 में उनकी हत्या हो जाने के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

यहां मिले हैं ऐतिहासिक अवशेष
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, बिहार अंचल द्वारा1981-82 में इस पुरातात्विक स्थल का उत्खनन डॉ अजीत कुमार सिन्हा के निर्देशन में शुरू हुआ था. यहां से मिले सामान को बोधगया के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है. यहां सात कालों के अवशेष मिले हैं।

इतने महत्वपूर्ण धरोहर को संरक्षित करने के बजाय उन्हें मिट्टी से भर दिया गया है. आज यह स्थल देखरेख के अभाव में मल, मूत्र त्याग और कूड़ा फेंकने का स्थल बन कर रह गया है। यहां हुई खुदाई में तमाम पुरातात्विक चीजें मिली हैं।
* नव पाषाण युग - पत्थर के मनके, सूई, पत्थर के खिलौने।
* ताम्र युग - धातु की सूई, मनके, बरतन, हांडी।
* कृष्ण-लोहित व कृष्ण मृदभाड - मिट्टी के बरतन, मिट्टी के बने मनुष्य के सिर, मिट्टी की सूई।
* उत्तरी कृष्ण मांजित मृदभांड - हैडल लगे बरतन व चूल्हा।
* कुषाण कालीन - बुद्ध की मूर्ति, पत्थर मनका, धातु की सूई, चूल्हे के अवशेष।
* गुप्त काल - अभिलेखयुक्त बुद्ध की मूर्ति, सिर विहीन मूर्ति, बौद्ध मठ।
* पाल युग - बुद्ध की मूति, बौद्ध मठ ।
(साभार-प्रभात खबर)

Monday, October 10, 2011

ऐतिहासिक कालीन कुत्तों के अवशेष

 ऐतिहासिक समय मे जैविक व्‍यवस्‍थाओ की जानकारी हमको अवशेषो का अध्‍ययन करने से मिलती है। जीवाश्‍म वैज्ञानिको को तीन पूर्व ऐतिहासिक कालीन कुत्‍तो के अवशेष प्राप्‍त हुए है। वैज्ञानिको का ऐसा अनुमान है कि इस अवशेष से पूर्व ऐतिहासिक कालीन कई महत्‍वपूर्ण जानकारी हमारे सामने निकल कर आएगी।
जीवाश्म वैज्ञानिकों ने पूर्व ऐतिहासिक कालीन तीन कुत्तों के अवशेषों की खोज की है और उनका दावा है कि यह खोज मानव और कुत्ते के बीच की शुरूआती संबंधों को दर्शाने वाला हो सकता है। रायल बेलजियन इंस्टि्टयूट आफ नेचुरल साइंसेज के नेतृत्व वाले दल का दावा है कि मरने के बाद पुरापाषाणकालिक कुत्तों के दिमागों को भी हटाया गया है जो जानवरों की आत्मा को मुक्त करने की मानवीय कोशिश की ओर संकेत करता है।
दिमाग को हटाने के लिए कुत्तों की खोपडि़यों में छेद किया गया है। इस दल के प्रमुख मितजे गेरमोनपरे ने कहा कि उत्तरी क्षेत्र के बहुत सारे लोगों का मानना है मस्तिष्क में आत्मा का निवास होता है। ऐसे ही लोगों में से कुछ व्यक्तियों ने मरे हुए जानवरो की खोपड़ी में छिद्र किया ताकि उसकी आत्मा मुक्त हो सके। डेली मेल के मुताबिक तीसरे कुत्ते के मुंह में बड़ा हड्डी फंसा हुआ है और उसके बारे में जीवाश्म वैज्ञानिकों का मानना है कि मरने के बाद उसके मुंह में किसी व्यक्ति ने रीति रिवाज के तहत ऐसा किया है।

Tuesday, September 20, 2011

कैमूर की पहाड़ियों में मिले मध्य पाषाण काल के कई दुर्लभ अवशेष आज भी उपेक्षित


  मानव विकास के इतिहास के साक्षी हैं ये शैल चित्र

 मध्य प्रदेश के भीमबेटका के मध्य पाषाण काल के आसपास के शैल चित्रों (रॉक पेंटिंग) पर दुनिया की नजर पड़ने के बाद यूनेस्को ने इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दे दिया, लेकिन बिहार के रोहतास जिले की कैमूर पर्वतीय शृंखला में हाल ही में मिले मध्य पाषाण काल के शैल चित्रों सहित न जाने ऐसे कितने दुर्लभ अवशेष है, जो आज भी उपेक्षित हैं।
कैमूर की पहाड़ियों और तलहटियों में कुछ पुरातत्व विज्ञानियों, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जानकारों ने जिन शैल चित्रों की खोज की है अभी उससे कहीं अधिक धरोहर अनछुई हैं। एक उत्साही इतिहासकार ने हाल में खोज कर उसे दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है।
इतिहासकार डा श्याम सुंदर तिवारी ने रोहतास में नौहट्टा, तिलौथू और आसपास के क्षेत्र में कैमूर पर्वतीय इलाके में दर्जनों शैल आश्रय (रॉक शेल्टर) में शैल चित्रों की खोज की है। बीएचयू के पुरातत्त्ववेत्ता प्रो बीपी सिंह के साथ सेन्हुआर, पैसरा, खैरडही, नरहन और अगियाबीर जैसे स्थानों पर शैल चित्र के शोध कार्य में सहयोग कर चुके तिवारी मानते हैं कि उन्होंने जिन शैल चित्रों को खोजा है, वे मध्य पाषाण से लेकर नव पाषाण काल के हो सकते हैं। 
तिवारी के अनुसार ये शैल चित्र धाऊ पत्थर को पीस कर पतले ब्रश से उकेरे गए हैं। इससे उस समय के लोगों के चित्रकला कौशल की भी जानकारी मिलती है। यह बात सही भी है कि मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत शृंखला में भीमबेटका में खोजे गए शैल चित्र जिस प्रकार चर्चित हुए, देश में इस प्रकार के कई धरोहरों को वैसा सम्मान नहीं मिल पाया। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र में खोजे गए शैल चित्र भी उन्हीं श्रेणी के हैं, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
पुरातत्व विज्ञानियों ने पुरापाषाण, मध्य पाषाण और नव पाषाण काल के अवशेषों के लिए विंध्य कैमूर शृंखला और गंगा के मैदानी इलाकों की मानव सभ्यता के इतिहास के प्रमुख स्थलों के रूप में पहचान की है। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र उनमें काफी महत्व रखता है।  तिवारी ने जिले के दक्षिणी भाग में कैमूर पहाड़ी पर 21 नए रॉक शेल्टर की खोज की है जो शैल चित्रों के विशाल खजाने साबित हो सकते हैं। कार्बन डेंटिंग पद्धति से कालावधि के बारे में निर्धारण कर इन्हें इनकी सही पहचान देना बहुत जरूरी है। इनके संरक्षण की जरूरत है, क्योंकि इनका लगातार क्षरण हो रहा है।
कैमूर की पहाड़ियों में खोजे गए शैल चित्र मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाए पाषाण चित्रों की तरह अमूल्य है और लगातार इनका क्षरण हो रहा है। ये बिखरे पड़े हैं। इस उत्साही पुरातत्व प्रेमी ने दुर्लभ शैल चित्र वाले रॉक शेल्टर को रोहतास के नौहट्टा के बजरमरवा के धानी बांध जंगल के पास खोज निकाला है।
उन्होंने तिलौथू में फुलवरिया में गड़के और कछुआर की पहाड़ियों में तीन शैल आश्रय में बने शैल चित्रों की खोज की है। इसके अलावा अघौरा प्रखंड के बेचिरागी महाकोल में पांच, बनरमोरा पहाड़ी में दो शैल आश्रयों, दारीहारा में दो, सड़की में तीन, सारोदाग के करमू चौतरा पहाड़ी में दो और तुरवाडीह जंगल में तीन शैल आश्रय मिले हैं।
तिवारी बताते हैं कि शैल आश्रयों में शैल चित्रों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि कैमूर की इन पहाड़ियों में प्राचीन काल में बस्तियां बसी थी, जो अब धरोहर और साक्ष्य के रूप में विशाल चट्टानों पर दर्ज हो चुके हैं। इन्हें गुफाओं में रहने के दौरान मानवों ने अंकित किया है। कैमूर के पर्वतीय क्षेत्रों में मिले इन शैल चित्रों में बाघ जैसे पशु को मानव द्वारा पालतू कुत्तों के जरिए घेरते हुए दिखाया गया है। शैल चित्रों में सूअर, बाघ, बैल आदि पालतू जानवरों को दिखाया गया है। सारोदाग में एक गैंडे का चित्र बना है।
धर्मशालामान में हाथी और उसके बच्चों के भागने और हिरण के शिकार को दर्शाया गया है। वहीं दारीहारा में चनैनमान में एक अज्ञात लिपि भी दिखी है। बंधा गांव के दक्षिण में चनैन मान से मिले शैलचित्र में नाच करते महिला पुरुष और पालतू पशुओं को दर्शाया गया है। इससे पहले रोहतास में सेनुवार, सकास, मलांव और कैमूर के अकोढी आदि गांवों में नवपाषाण काल के अवशेषों की खोज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास और पुरातत्व विभाग ने की थी।
प्रो बीपी सिंह के निर्देशन में हुई खुदाई के बाद रेडियो कार्बन डेटिंग पद्धति से जांच के बाद इन अवशेषों के 2200 से 1950 ईस्वी पूर्व के होने के प्रमाण मिले हैं। सारण के चिरांद में पाए गए नव पाषाण युग के अवशेषों से भी पहले के हैं।
डा तिवारी कहते हैं कि कैमूर की पहाड़ियों में फैले इन शैल चित्रों की खोज का काम 1867 में ब्रिटिश काल में हुआ था। उसके बाद बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के सदस्यों ने कुछ शैल आश्रय की खोज की। 1999-2000 में कर्नल उमेश प्रसाद की अगुआई में भी कुछ शैल आश्रयों पर नजर पड़ी थी।
नई खोजी गई रॉक पेंटिंग्स के बारे में ध्यान दिलाने पर जिलाधिकारी अनुपम कुमार ने कहा कि हजारों साल पुराने शैल चित्र और शैल आश्रय मानव विकास इतिहास के साक्षी हैं। ये धरोहर हैं। कला संस्कृति विभाग को इनके संरक्षण के बारे ध्यान दिलाया जाएगा।  (सासाराम, 19 सितंबर (भाषा)।
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Mesolithic period rock paintings kaimur hills - India

Thursday, August 11, 2011

ताजमहल के पहले बना था हुमायूं का मकबरा


  मुगल शासक हुमायूं का मकबरे को देखकर लगता है कि इस पर गुजरते वक्त की परछाई नहीं पड़ी है। आज भी इस मकबरे का अनछुआ सौंदर्य बेहद प्रभावशाली है। यह मकबरा ताजमहल की पूर्ववर्ती इमारत है। इसी के आधार पर बाद में ताजमहल का निर्माण हुआ। हुमायूं की मौत 19 जनवरी 1556 को शेरशाह सूरी की बनवाई गई दो मंजिला इमारत शेरमंडल की सीढ़ियों से गिर कर हुई थी। इस इमारत को हुमायूं ने ग्रंथालय में तब्दील कर दिया था। मौत के बाद हुमायूं को यहीं दफना दिया गया।
पुरातत्वविद वाईडी शर्मा के मुताबिक, हुमायूं का मकबरा 1565 में उसकी विधवा हमीदा बानू बेगम ने बनवाया था। मकबरे का निर्माण पूरा होने के बाद हुमायूं के पार्थिव अवशेष यहां लाकर दफनाए गए। पूरे परिसर में सौ से अधिक कब्र हैं जिनमें हुमायूं, उसकी दो रानियों और दारा शिकोह की कब्र भी है। दारा शिकोह की उसके भाई औरंगजेब ने हत्या करवा दी थी। विश्व विरासत स्थल में शामिल इसी स्थान से 1857 की क्रांति के बाद ब्रितानिया फौजों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार किया था। फिर निर्वासित कर बर्मा (वर्तमान म्यामां) भेज दिया था।
इतिहासकारों के मुताबिक, हुमायूं के मकबरे के स्थापत्य के आधार पर ही शाहजहां ने दुनिया का आठवां अजूबा ताजमहल बनाया। इसके बाद इसी आधार पर औरंगजेब ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ‘बीबी का मकबरा’ बनवाया, जिसे दक्षिण का ताजमहल कहा जाता है। यह इमारत मुगलकालीन अष्टकोणीय वास्तुशिल्प का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसका इस्लामिक स्थापत्य स्वर्ग के नक्शे को प्रदर्शित करता हैं।
मकबरा परिसर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर ईसा खान की कब्र है। यह कब्र इतनी खूबसूरत है कि अनजान पर्यटक इसे ही हुमायूं का मकबरा समझ लेते हैं। ईसा खान हुमायूं के प्रतिद्वंद्वी शेर शाह सूरी के दरबार में था। इसके अष्टकोणीय मकबरे के आसपास खूबसूरत मेहराबें और छत पर छतरियां बनी हैं। कुल 30 एकड़ क्षेत्र में फैले बगीचों के बीच हुमायूं का मकबरा एक ऊंचे प्लेटफार्म पर बना है, जो मुगल वास्तुकला का शानदार नमूना है। भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर संगमरमर और बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल हुआ। मकबरे में बलुआ पत्थरों की खूबसूरत जाली से छन कर आती रोशनी मानो आंखमिचौली करती है।
हुमायूं का मकबरा एक विशाल कक्ष में है। इसके ठीक पीछे अफसरवाला मकबरा है। कोई नहीं जानता कि यह मकबरा किसने बनवाया, यहां किसे दफनाया गया। इस मकबरे का हुमायूं के मकबरे से क्या संबंध है। हुमायूं के मकबरे के पास ही अरब सराय है। दीवारों से घिरी इस इमारत में हुमायूं के मकबरे के निर्माण के लिए फारस से आए शिल्पकार रहते थे। सिरेमिक की टाइलों से सजी अरब सराय में कई झरोखे और रोशनदान हैं। ( साभार-नई दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा)।

  प्राचीन गोवा के 16वीं सदी के एक प्राचीन किले का निर्माण किस राजवंश ने किया ?

 गोवा में विरासतों के संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर मतभेद हैं कि प्राचीन गोवा के 16वीं सदी के एक प्राचीन किले का निर्माण किस राजवंश ने किया। विरासत कार्यकर्ताओं का मानना है कि आदिलशाह महल के प्रसिद्ध द्वार का निर्माण कदंब वंश के हिंदू राजाओं ने करवाया था। लेकिन, एएसआई के अधिकारियों का कहना है कि इसका निर्माण मुसलिम शासक आदिल शाह ने कराया था।
विरासत संरक्षणकर्ता संजीव सरदेसाई का कहना है कि एएसआई ने आदिलशाह महल के द्वार पर इस आशय की एक पट्टिका लगाई है। लेकिन द्वार के दोनों तरफ ग्रेनाइट की जाली में शेर, मोर, फूल और हिंदू देवताओं की आकृति से साफ होता है कि यह हिंदू कदंब राजाओं ने बनवाया है।
पुराने गोवा के सेंट कजेटान चर्च के सामने यह ऐतिहासिक इमारत यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों की सूची में भी शामिल की गई है। एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद डाक्टर शिवानंदा राव का कहना है कि इस इमारत को पुर्तगाली दौर के समय से अधिसूचित किया गया है। कुछ लोग इसके विपरीत दावा कर रहे हैं। जब तक एएसआई इस जगह की खुदाई नहीं करेगा तब तक कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।
 सरदेसाई ने कहा कि यह अजीब लगता है कि एक मुसलिम शासक अपने किले के प्रवेश द्वार पर हिंदू देवताओं की आकृति बनवाएगा। गोवा हेरिटेज एक्शन ग्रुप के अधिशासी सदस्य और सक्रिय विरासत संरक्षणकर्ता प्रजल शखरदांडे का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में अनेक बार एएसआई के अधिकारियों को पत्र लिखा है। लेकिन अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है। गोवा पर एक समय कदंब वंश का राज था जिसके बाद 1469 से बीजापुर के आदिलशाह ने यहां शासन किया था। ( साभार-पणजी, 11 अगस्त (भाषा)।

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