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Friday, January 20, 2012

सेटेलाइट की मदद से पेरु के प्राचीन स्थलों की खोज

पेरु में स्थित प्राचीन स्थलों की खोज और उन पर शोध
पिछले चार साल से इटली के पुरातत्वविद सेटेलाइट तकनीक के जरिए पेरु में स्थित प्राचीन स्थलों की खोज और उन पर शोध करने का काम कर रहे हैं। इटली के पुरातत्वविदों की ये टीम सेटेलाइट के जरिए प्राप्त की गई तस्वीरों की मदद से ये काम कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर ये टीम देश के दक्षिणी भाग में हज़ारों साल पहले नाज्का सभ्यता द्वारा सूखे पठार पर उकेरे गए पशुओं के चित्रों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
मिस्र में सालों से सेटेलाइट तस्वीरों की मदद से वहाँ के ऐसे प्राचीन स्थलों के बारे जाना जा सका है जिसें आमतौर पर नहीं देखा जा सकता था। लेकिन ये तकनीक दक्षिणी अमरीका में कुछ मायनों में नई है। पेरु कई प्राचीन सभ्यताओं का जन्म स्थल रहा है जिसमें से एक 'इंका सभ्यता' भी थी। पेरू में अनुमानित एक लाख ऐसे पुरातन स्थल है जिनमें से केवल कुछ को ही खोजा जा सका है।
सेटेलाइट से खोज : इटली के पुरातत्वविदों की टीम की अगुवाई कर रहे निकोल मेसिनी का कहना है कि इस तकनीक की मदद से उन स्थलों को खोजने में मदद मिलेगी जो आसमान सी ली गई तस्वीरों में नहीं दिखाई देती है।
उनका कहना है कि सेटेलाइट द्वारा ली गई तस्वीरों से वैज्ञानिकों को मिट्टी और पत्थरों की परतों को हटाकर उनके भीतर, या फिर घने जंगलों में भी देख पाएंगे। मसिनी का कहना है, 'पेरु में ज़्यादातर पुरातात्विक स्थान ऐसे है जहां पहुंचना कठिन है। जैसे वहां सीयरा नाम का एक मरुस्थल है जिसपर सीधे तौर पर और ना ही आसमान से निगरानी रखा जा सकती है। ऐसी स्थिति में निगरानी या स्थिति पर नजर रखना केवल सैटेलाइट डेटा की मदद से ही संभव है।'
साल 2008 में मेसिनी की टीम ने इन्फ्रा रेड और बहुआयामी तस्वीरों की मदद से पेरु के गहरे मरुस्थल में जाकर प्राचीन अडोब पिरामिड को खोज निकाला था। लेकिन सैटेलाइट की इस तकनीक का और एक महत्वपूर्ण उपयोग है।
उदाहरण के लिए इराक़ में इसका इस्तेमाल खाड़ी युद्ध से पहले और बाद में प्राचीन स्थलों में हुई लूटपाट के बाद हुए प्रभावों को जानने के लिए किया गया।
मेसिनी का मानना है कि पेरु में एक बड़े क्षेत्रफल में सभ्यता फैला हुई है लेकिन शोध करने के संसाधन कम है। सैटेलाइट तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन से वैज्ञानिक ये भी पता लगा सकते है कि मानव गतिविधियों से इन पुरातात्विक स्थलों पर कोई नकारात्मक प्रभाव हुआ है।
इटली के पुरातत्वविदों का मानना है कि सैटेलाइट के ज़रिए अध्ययन मंहगा है, लेकिन पेरु में पर्यटन राजस्व का तीसरा बड़ा स्रोत है ऐसे में वे इस खर्च की भरपाई कर लेगा।

हजारों साल पहले भी खाए जाते थे पॉपकॉर्न!
एक नए शोध में पाया गया है कि उत्तरी पेरू के लोग साधारण अनुमान से 1,000 साल पहले भी पॉपकॉर्न खाया करते थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें पेरू में मकई के फूले हुए दाने मिले हैं, जो कि इस बात का संकेत है कि वहां रहने वाले लोग इसका इस्तेमाल मकई का आटा और पॉपकॉर्न बनाने में करते थे।
वॉशिंगटन के प्राकृतिक इतिहास संग्राहलय के मुताबिक पाए गए मकई के फूले हुए दानों में से सबसे पुराने करीब 6,700 साल पुराने थे। 'स्मिथसोनियन म्यूजम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री' के न्यू वर्ल्ड आर्केलॉजी विभाग की निरीक्षक डोलोर्स पिपर्नो ने कहा कि मैक्सिको में 9,000 साल पहले मकई को जंगली घास के जरिए उगाया जाता था।
उनका कहना था कि उनकी शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि साउथ अमेरिका में मकई के आने के एक हजार साल बाद ये महाद्वीप के दूसरे क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाया गया।
शोधकर्ताओं की टीम को मकई के बालों के अवशेष पारेदोन्स और हुआका प्रीटा नाम के प्राचीन स्थलों पर मिला। हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि उस समय मकई लोगों के आहार का अहम हिस्सा नहीं था।


Wednesday, January 18, 2012

चीन के ४४००० प्राचीन खंडहर, मंदिर व अन्य सांस्कृतिक स्थल गायब !

  चीन का कहना है कि उसके 44,000 प्राचीन खंडहर, मंदिर और अन्य सांस्कृतिक स्थल गायब हो चुके हैं.देश में धरोहरों की पहली गणना में यह तथ्य सामने आए है, गणना में 20 साल लगे।
पाया गया है कि जिन प्राचीनतम धरोहरो की छाप अभी तक चीन में बची हुई है वो भी विलुप्ति की ओर बढ़ रहे है. क़रीब एक चौथाई तो काफ़ी खराब स्थिति में हैं।
चीन के सरकारी मीडिया ने एक अधिकारी के हवाले से बताया कि इस तरह के बहुत सारे स्थान असुरक्षित थे और उन्हें निर्माण की योजनाओं के तहत गिराया गया था।
चीन के सांस्कृतिक धरोहरों की देखरेख करने वाले विभाग की ओर से कराई गई गणना में सात लाख धरोहरों को पंजीकृत किया गया।

सर्वेक्षण के उप-निदेशक लिउ शियाओ ने सरकारी मीडिया को बताया कि व्यवसायिक प्रयोग के लिए इमारतों के निर्माण से इन अवशेषों को नुकसान पहुँचा है। आंकड़ों के अनुसार टेराकोटा के लड़ाकुओं का क्षेत्र शांक्सी प्रांत सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा जहाँ 3,500 सांस्कृतिक स्थल गायब हुए हैं।
  "ग्रेट वॉल ऑफ़ चाईना" भी खतरे में
हालांकि धरोहरों की इस गिनती में किसी इमारत या स्मारक का नाम नहीं लिया गया है।
पत्रकारों के मुताबिक़ 'ग्रेट वॉल ऑफ चाईना' भी घिसाव और अनाधिकृत विकास का सामना कर रही है क्योंकि वहां घूमने गए पर्यटक संरक्षण के नियमों की पाबंदी नही करते है जिसका स्थानीय ग्रामीण व्यवसायिक फ़ायदा उठाते हैं। कहा जाता है कि चीन के किन राजवंश के हिस्से की दीवार पर दो साल पहले कुछ लोगों ने सोने की खोज में छेद कर दिए थे। (
साभार-बीबीसी )

Tuesday, January 3, 2012

काशीराज के सरस्वती भंडार कक्ष के लॉकर में रखी है रामचरित मानस की असली पांडुलिपि

वाराणसी में पिछले दिनों तुलसीघाट से चोरी गई तुलसीदास रचित रामचरित मानस की पांडुलिपि असली नहीं है। इसका रहस्यमय खुलासा करते हुए गोस्वामी तुलसीदास के मित्र राय टोडर की 14वीं पीढ़ी के सदस्य वयोवृद्ध आनंद बहादुर सिंह द्वारा किए जाने से पूरे मानस परिवार से जुड़े लोग व पुलिस प्रशासन अवाक है। आनंद बहादुर ने अपने भदैनी स्थित आवास पर जनसत्ता के वाराणसी संवाददाता अरविंद कुमार से बातचीत में बताया कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस की 1704 की असली पांडुलिपि काशीराज के सरस्वती भंडार कक्ष के लॉकर में रखी है। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास रामलीला समिति बतौर मंत्री सिंह ने कहा कि तुलसीघाट स्थित हनुमान मंदिर से चोरी गई रामचरित मानस, तुलसीदास रचित पांडुलिपि नहीं है।
   पिछले दो सौ वर्ष से घाट पर रामलीला के समय का संचालन जिस मानस पांडुलिपि से किया जाता है उसके तुलसीदास के तिरोधान के 200 वर्ष बाद लिखे जाने के संकेत मिलते हैं। असली पांडुलिपि के अंत में गोस्वामी जी ने पुष्पिका को रेखांकित किए थे। जबकि चोरी गई पांडुलिपि के अंत में पुष्पिका न होने से रचनाकार वर्ष अज्ञात सर्वविदित है। असली रामचरित मानस के चोरी का प्रश्न ही नहीं है। वह काशीराज के सरस्वती भंडार में संग्रहीत है। हालांकि तुलसीघाट स्थित हनुमान मंदिर से दो सौ साल पुरानी मानस पांडुलिपि की तलाश में पुलिस प्रशासन बरामदगी के लिए गंभीर है। जनता को इसमें सहयोग करना चाहिए ताकि सच सामने आ सके। काशीराज संस्करण का मूल पाठ तैयार करने के दौरान आचार्य पं. विश्वनाथ मिश्र के साथ तुलसीघाट पर रखी दोनों पांडुलिपि का अध्ययन किया गया था। प्रकाशित संस्करण का भूमिका में उल्लेख है कि 1704 की प्रति अखाड़े के पूर्ववर्ती महंत लक्ष्मण दास ने काशीराज को हनुमत जयंती के अवसर पर भेंट कर दी थी जो आज भी काशीराज के महल में खास पोथी के नाम से राजमहल के लॉकर में सुरक्षित है, जबकि घाट से चोरी गई पांडुलिपि हनुमान जी प्रतिमा के पास ही गद्दी पर विराजमान रही, जो कि तुलसीदास जी द्वारा रचित नहीं है।
 
अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के सचिव आनंद बहादुर ने बताया कि उनकी पीढ़ी गोस्वामी जी के समय से ही संकटमोचन मंदिर व हनुमान मंदिर की परंपराओं से जुड़ी हैं। वे खुद भी पूर्व महंत बाकेराम मिश्र के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में कार्य कर चुके हैं। 1947 से ही गोस्वामी तुलसीदास रामलीला की देखरेख कर रहे हैं। उधर संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र ने कहा कि चोरी गई पांडुलिपि तुलसीदास रचित न होने की बाबत प्रशासन को पहले भी अवगत करा चुके हैं। रामचरित मानस की पांडुलिपि के चोरी होने से संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो वीरभद्र मिश्र भी काफी दु:खी हैं। पांडुलिपि की चोरी हो जाने से काशी के डीएम रवींद्र व डीआईजी रामकुमार मौके पर पहुंचकर रामचरित मानस की हनुमान मंदिर से चोरी हो गई मानस की पड़ताल कराने लगे। पुलिस व गुप्तचरों की टीम, दक्षिण भारत के कई जिलों में खोज के लिए भेज दी गई है। इस विषय पर तुलसीघाट व मंदिर से जुड़े डा. विशंभर नाथ मिश्र भी मानस की चोरी हो जाने पर काफी मर्माहित हैं। (खबर जनसत्ता से साभार )।

Friday, December 23, 2011

प्राचीन हस्तलिखित ‘रामचरित मानस’ की चोरी

   गंगा किनारे तुलसीघाट के तुलसी मंदिर से गुरुवार को प्राचीन रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रति चोरी हो गई। मंदिर के एक तरफ के द्वार की कुंडी तोड़कर चोर ‘रामचरित मानस’ के दो भागों के अलावा एक वाल्मीकि रामायण और चांदी का एक मुकुट भी साथ ले गए। अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) मानसिंह चौहान ने बताया कि मंदिर के पुजारी दुर्गा शंकर मिश्र की तहरीर पर भेलूपूर थाने में मामला दर्ज किया गया है। पुजारी के मुताबिक, दिन में दस बजे मंदिर खोलते वक्त एक द्वार की कुंडी टूटी हुई मिली। पुजारी की सूचना पर जिलाधिकारी रवींद्र और पुलिस उप महानिरीक्षक राम कुमार भी देर रात मौके पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। डाग स्क्वाड के साथ पुलिस टीम ने चोरों का सुराग पाने की नाकाम कोशिश की।वाराणसी, 23 दिसंबर (भाषा)।

Tuesday, December 13, 2011

मिला सबसे पुराना बिस्तर

  पुरातत्ववेताओं ने दावा किया है कि उन्होंने बिस्तर के सबसे पुराने साक्ष्य खोज निकाले हैं। जिसमें गुफा मानव मच्छरों को भगाने वाले पौधों का उपयोग करते थे। उनका अनुमान है कि इस बिस्तर पर गुफा मानव करीब 77,000 वर्ष पहले सोया करते थे. डेली मेल की खबर के मुताबिक, जोहान्सबर्ग में यूनिवर्सिटी ऑफ द विटवाटरसैंड के लीन वाडले के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में एक गुफा में पत्तों और तनों से बना एक बिस्तर खोजा है।
सिबुदु खनन क्षेत्र में कम से कम तीन भिन्न सतहों में बिस्तर के साक्ष्य मिले हैं। इस बिस्तरों पर 38 हजार से 77 हजार वर्ष पहले लोग सोया करते थे।
सोने की जगह के अलावा इस बिस्तरों में मच्छर भगाने वाले रसायनों का भी प्रयोग किया गया है ताकि मच्छर दूर रहें।

 (साभार-समय लाइव।

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