इतिहास ब्लाग में आप जैसे जागरूक पाठकों का स्वागत है।​

Website templates

Sunday, August 22, 2010

नालंदा विश्वविद्यालय - बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया, अब बख्तियारपुर का नीतिश इसे जिंदा करेगा !

नालंदा में सारिपुत्त स्तूप का अवशेष। नालंदा में प्राचीन विश्वविद्यालय के स्थल पर कुछ बौद्ध भिक्षु ( सभी फोटो विकीपीडिया से साभार ।

  भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्माण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।


तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतमबुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतमबुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ा केंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतमबुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।

बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५० ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवाया था। नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया।

  अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी और पराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। ( प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक विवरण देखने के लिए यहां क्लिक करें।)
   दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध शिक्षाकेंद्र के तौर पर पहचान बन चुके इस विश्वविद्यालय को अंततः    मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने ११९९ ईसवी में जलाकर नष्ट कर दिया। अब बख्तियारपुर के नीतिश कुमार, जो अभी बिहार के मुख्यमंत्री हैं, के प्रयासों से फिर नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया है। १६ देशों की मदद से इसके निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। भारत के नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की देखरेख में इसकी रूपरेखा तय की जा रही है। यह तो तय है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की तरह यह सिर्फ बौद्ध शिक्षा का केंद्र नहीं रहेगा लेकिन इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवित करने के विधेयक को मंजूरी दे चुके राज्यसभा सदस्यों को उम्मीद है कि प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर दुनिया में भारत का नाम उसी तरह रोशन करेगा जैसा कि प्राचीन काल में था। इसी उम्मीद के साथ नालंदा विश्वविद्यालय विधेयक 2010 को राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है।

    लंबे अंतराल के बाद शनिवार को राज्यसभा में एक सार्थक और सारगर्भित चर्चा देखने को मिली। सभी दलों के सदस्यों ने इस विश्वविद्यालय के तमाम पहलुओं पर अपनी राय जाहिर की। सांसदों के सुझावों में विश्वविद्यालय की इमारत के वास्तुशिल्प से लेकर इसमें पढ़ाए जाने वाले विषय भी शामिल थे। यह विधेयक गत 12 अगस्त को राज्यसभा में पेश किया गया था।

बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर स्थित बड़ा गांव में आज भी नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष मौजूद हैं। राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में बड़ा गांव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं।अपनी ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक पांचवीं सदी में दुनिया के तमाम देशों के करीब 10 हजार विद्यार्थी वहां शिक्षा ग्रहण करते थे। कहा जाता है कि तत्कालीन नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय काफी समृद्ध था। उसकी इमारत नौ मंजिल की थी।

    विधेयक के मुताबिक नया नालंदा विश्वविद्यालय परिसर 441 एकड़ में बनेगा। विदेश राज्यमंत्री परनीति कौर के मुताबिक इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में इतिहास, व्यापार प्रबंधन, भाषा, पर्यावरण एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया जाएगा। इसकी इमारत के वास्तुशिल्प का चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के जरिए किया जाएगा।

   वरिष्ठ सदस्य डा. कर्ण सिंह ने चर्चा के दौरान कहा कि इतिहास बताता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में चीन, जापान, मंगोलिया, अफगानिस्तान, तिब्बत एवं अन्य देशों से शोधार्थी आते थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि नया नालंदा विश्वविद्यालय ऑक्सफर्ड एवं अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों से ज्यादा बेहतर होगा। सीताराम येचुरी ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दिलचस्प है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने नष्ट करवाया था। आज उसको पुन: जीवित कराने में बख्तियारपुर के ही एक व्यक्ति (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) की महत्वपूर्ण भूमिका है।

बीजेपी के बाल आप्टे का सुझाव था कि इस विश्वविद्यालय को विदेश मंत्रालय के बजाय शिक्षा मंत्रलाय के अधीन होना चाहिए था। बीएसपी के युवा सदस्य प्रमोद कुरील का सुझाव था कि नए विश्वविद्यालय का वास्तुशिल्प पुराने विश्वविद्यालय जैसा ही होना चाहिए। ताकि यह अहसास हो कि ज्ञान का प्राचीन केंद्र पुनर्जीवित हो रहा है।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास


नालंदा विश्वविद्यालय

Tuesday, August 17, 2010

एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर

खबरों में इतिहास ( भाग-८)
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर
२-हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव
३-दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल
४-डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास
५-3500 साल पुराना कंगन मिला


तमिलनाडु के ऐतिहासिक तंजौर कस्बे में स्थित चोल राजवंश के समय के एक विशाल मंदिर को एक हजार साल पूरे हो गये हैं और यहां महोत्सव की तैयारी चल रही है। राज्य सरकार विशालकाय बृहदीश्वर मंदिर के एक हजार साल पूरे होने पर अनेक सांस्कृतिक आयोजन करने जा रही है। यह मंदिर अब यूनेस्को के ‘ग्रेट लिविंग चोला मंदिरों’ में शामिल है। 26 सितंबर से शुरू हो रहे दो दिन के उत्सव के दौरान तंजौर सांस्कृतिक केंद्र की तरह बन जाएगा, जहां पूरे शहर भर में कलाकार प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा 100 ओडुवर :मंदिर में गायन प्रस्तुति देने वाले: पवित्र पुस्तक तिरुमुरई का पाठ पढ़ेंगे, जिसमें भगवान शिव के लिए तमिल में गीत और मंत्र लिखे हैं। इस मौके पर जानीमानी नृत्यांगना पद्मा सुब्रमण्यम के निर्देशन में एक हजार कलाकार नृत्य प्रस्तुति देंगे। ( भाषा )।

  देश के सबसे विशालकाय मंदिरों में से एक बृहदेश्वर अथवा बृहदीश्वर मन्दिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। इसे तमिल भाषा में बृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है । इसका निर्माण 1003-1010 ई. के बीच चोल शासक राजाराज चोल एक ने करवाया था । उनके नाम पर इसे राजराजेश्वर मन्दिर का नाम भी दिया जाता है । चोल शासकों ने मंदिर को राजराजेश्वरम नाम दिया था, लेकिन बाद में तंजौर पर चढ़ाई करने वाले मराठा और नायक शासकों ने इसे बृहदीश्वर मंदिर नाम दिया।


 यह मंदिर काफी बड़े परिसर में फैला है तथा तंजौर के किसी भी हिस्से से इसे देखा जा सकता है। इसके अलावा भगवान शिव की सवारी के रूप में मान्य ‘नंदी’ की भी यहां बहुत बड़ी मूर्ति है।मंदिर के गर्भगृह में दुर्लभ पेंटिंग्स हैं, जिनके बारे में कुछ दशक पहले तक जानकारी न के बराबर थी। दरअसल पेंटिंग्स की हालत बहुत खराब होने के कारण इन तक पहुंच पाना मुश्किल था। राज्य सरकार मंदिर के ढांचे में सुधार के लिए 25.19 करोड़ रुपये खर्च करने वाली है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी ली है।

     यह अपने समय के विश्व के विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था । इसके तेरह (13) मंजिले भवन (सभी हिंदू अधिस्थापनाओं में मंजिलो की संख्या विषम होती है ।) की ऊंचाई लगभग 66 मीटर है । मंदिर भगवान शिव की आराधना को समर्पित है । यह कला की प्रत्येक शाखा - वास्तुकला, पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रांकन, नृत्य, संगीत, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का भंडार है। यह मंदिर उत्कीर्ण संस्कृत व तमिल पुरालेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पाषाण पर यह कलश स्थित है, अनुमानत: उसका भार 2200 मन ( 80 टन) है और यह एक ही पाषाण से बना है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य शिवलिंग को देखने पर उनका वृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है। मंदिर में प्रवेश करने पर गोपुरम्‌ के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर नंदी जी विराजमान हैं। नंदी जी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी तथा 3.7 मीटर ऊंची है। भारतवर्ष में एक ही पत्थर से निर्मित नंदी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है।
डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास

पश्चिम अफ्रीका से वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जीवाश्म खोजा है जिसने इस बात की संभावना जगाई है कि धरती पर बहुकोशिकीय जीवन का इतिहास कम से कम डेढ़ अरब साल से भी अधिक पुराना है। नए पाए गए जीव की संरचनात्मक जटिलता एक नई बहस छेड़ सकती है। गैबन की पहाड़ियों से पाया गया यह जीव साधारण आँखों से देखा जा सकता है और इसने विकास की कहानी को थोड़ा पीछे धकेल दिया है। अध्ययन को अंजाम देने वाले पोइटियर्स विश्वविद्यालय के अब्दुल रज्जाक अल अल्बानी ने बताया कि काफी समय से माना जाता रहा है कि जटिल बहुकोशिकीय जीवन की उत्पत्ति 60 करोड़ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है, लेकिन यह 2.1 अरब साल पुरानी है। इस खोज को प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित किया गया है।

अब तक वैज्ञानिकों की यह समझ रही है कि 60 करोड़ साल से पहले दुनिया पर एककोशिकीय जीवाणु का वर्चस्व था, लेकिन बस्तियों में रहने वाले इस नए जीव की खोज से मालूम होता है कि जटिलता की ओर विकास जल्द ही शुरू हो गया था। (भाषा)

दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल

दस करोड़ साल पहले धरती पर डायनोसोरों के साथ बिल्ली जैसे दिखने वाले घड़ियाल रहा करते थे। इस नई खोज ने जीवन के विकास के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्ली के आकार के पकासुचुस कपिलीमई के पैर अपेक्षाकृत लंबे होते थे और उनकी नाक कुत्तों जैसी होती थी। इन प्राणियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके दाँत स्तनधारी जीवों की भाँति होते थे, जिससे उन्हें चबाने की शक्ति मिलती थी। तंजानिया के तट से मिले साढ़े करोड़ साल पुराने घड़ियाल के जीवाष्म को उतने ही पुराने साढ़े करोड़ साल पुराने पत्थरों से वैज्ञानिकों ने प्राप्त किया। ओहाइयो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया कि अफ्रीका के मैदान में यह पानी से दूर रहते थे और कीट-पतंगे खाते थे। प्रो. पैट्रिक ओकोन्नोर ने इस खोज की अगुवाई की। उन्होंने बताया क पहली नजर में यह घड़ियाल स्तनधारी जैसा लगता है। उसका सर आपकी हथेली में समा जाएगा। अगर आप उसके दाँत देखेंगे तो आपको लगेगा नहीं कि वह घड़ियाल था। वह विचित्र तरह का सरीसृप था। (भाषा)

हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिम युग के समय अगर मानव ने अफ्रीका के दक्षिणी तट ‘गार्डन ऑफ ईडन’ में शरण ली होती तो वे शायद जीवित बच सकते थे। वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन से लगभग 240 मील पूर्व में अलग-अलग गुफाओं से मानव-निर्मित कलाकृतियाँ मिली हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जगह धरती पर एकमात्र स्थान था जहाँ हिमयुग के दौरान भी जीवन के लिए अनुकूल स्थिति मौजूद थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि लगभग 195,000 वर्ष पहले दुनिया का तापमान जब अचानक बदला और हिम युग आया तब इस क्षेत्र में रहने वाले लोग खुद को बचाने में सफल हुए होंगे। ‘डेली मेल’ की खबर के मुताबिक, कुछ वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक मानना है कि हिमयुग के दौरान मानव आबादी घटकर बहुत कम बची होगी और ये वे लोग रहे होंगे, जो इस क्षेत्र में थे। (भाषा)

3500 साल पुराना कंगन मिला

उत्तरी इजरायल में एक पुरातात्विक खुदाई के दौरान कांस्य बार हुआ है कि उत्तरी इजरायल में 3,500 साल पुराने गांव का पता चला है। अभी तक उस क्षेत्र में तेल मेगिड्डो या तेल हजोर जैसे बड़े शहरों के बारे में ही पता चल पाया था। खुदाई कार्य का नेतृत्व करने वाली प्रमुख पुरातत्वविद कारेन कोवेलो परान ने बताया, "खुदाई में मिला कांस्य युगीन कंगन असाधरण तरीके से सुरक्षित है और इस पर नक्काशी है। उसके ऊपरी हिस्से पर एक सींग जैसी संरचना भी है।" उन्होने बताया "उस युग में सींग पवन देवता का प्रतीक था और वह शक्ति, उत्पादकता और कानून के प्रतीक थे।" कॉवेलो परान ने बताया है, "देश के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के दौरान हमें प्राचीन ग्रामीण इलाकों के जीवन की एक पहली झलक मिली है।" उन्होंने बताया, "ऐसा कंगन जो पहनता रहा होगा, वह निश्चित रूप से संपन्न रहा होगा और ग्रामीण परिवेश से संबंध रखता रहा होगा।

Thursday, July 29, 2010

दिल्ली के थानों में कैद हैं जैन, हिंदू और बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं की बेशकीमती मूर्तियां


दिल्ली पुलिस के मालखानों में विभिन्न धर्म के देवी.देवताओं की अनेक बेशकीमत मूर्तियां जमा हो गयी हैं और पुलिस इनमें से अधिकतर के मूल स्थान के बारे में जानकारी हासिल नहीं कर पायी है। दूसरी तरफ अदालत के आदेश के बाद कुछ मूर्तियों को इनके मूल स्थान पर पहुंचाया गया है।

सूचना के अधिकार कानून के तहत दाखिल एक अर्जी के जवाब में यह बात सामने आयी है कि दिल्ली पुलिस के विभिन्न थानों के मालखानों में जैन, हिंदू और बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं की कई मूर्तियां रखी हुई हैं। इनमें भगवान राम, शिव, गणेश के साथ भगवान महावीर और गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं शामिल हैं।

दिल्ली निवासी सलेक चंद जैन द्वारा गत छह अप्रैल को दाखिल आरटीआई अर्जी के जवाब में यह बात सामने आयी कि कुछ मूर्तियों को अदालत के आदेश पर इनके मूल स्थान या मंदिरों में पहुंचा दिया गया है, जबकि कुछ के बारे में दिल्ली पुलिस जानकारी हासिल नहीं कर सकी है। ऐसी मूर्तियों को संबंधित थानों के मालखानों में ही रखा गया है।

मसलन, आईजीआई हवाईअड्डे के उपायुक्त कार्यालय के 14 मई को भेजे जवाब के अनुसार भगवान शंकर और गणेश की एक.एक मूर्ति अदालत में रखे जाने के बाद मालखाने भेज दी गयीं।
हालांकि पूर्वी दिल्ली जिले के जन सूचना अधिकारी द्वारा 15 मई को भेजे गये जवाब के अनुसार अदालत में पेश की गयीं 44 मूर्तियों में से 34 को मूल स्थानों पर पहुंचा दिया गया है। इनमें से शेष 10 मूर्तियां संबंधित थानों के मालखानों में ही रखी गयी हैं।

इसी तरह कमला मार्केट थाने में दो, दक्षिण पूर्वी जिले के ग्रेटर कैलाश थाने में एक, मध्य दिल्ली के थानों के मालखानों में दो, दक्षिण दिल्ली के थानों में छह, सराय रोहिल्ला थाने के अनुसार पांच मूर्तियां हैं, जो अदालत में पेश किये जाने के बाद संबंधित थानों के मालखानों में रखी गयीं। उत्तरी दिल्ली जिले के जन सूचना अधिकारी कार्यालय ने बताया कि पांच मूर्तियों में से अदालत के आदेश के बाद तीन को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दिया गया और दो को संबंधित थानों के मालखानों में रखा गया। जवाब में यह भी बताया गया कि इन्हें रखने के बारे में अदालत फैसला करती है।

इससे पहले जैन ने गत वर्ष 14 सितंबर को पुलिस के सीपीआईओ के समक्ष आरटीआई अर्जी दाखिल की थी, जिसके जवाब में दिल्ली के विभिन्न थानों के मालखानों में सौ से अधिक बहुमूल्य मूर्तियां होने का पता चला था। इनमें सर्वाधिक मूर्तियां दक्षिण पूर्वी दिल्ली जिले के थानों में रखी बतायी गयीं। इनमें हजरत निजामुद्दीन थाने में 52 और गौतम बुद्ध की एक प्रतिमा कालकाजी थाने में रखी बतायी गयीं।
वहीं 14 मई के जवाब में दक्षिण पूर्वी दिल्ली के ही उपायुक्त कार्यालय ने बताया था कि केवल एक प्रतिमा अदालत के सामने रखी गयी और इसे ग्रेटर कैलाश थाने के मालखाने में रखा गया है। जैन का कहना है 14 अक्तूबर को दिये गये जवाब में जहां उन्हें 53 मूर्तियों के बारे में बताया गया, वहीं दक्षिण पूर्वी दिल्ली पुलिस के ही गत 29 मई के जवाब में बताया गया कि थानों में केवल 46 ही मूर्तियां हैं। अन्य सात के बारे में जानकारी नहीं दी गयी।

जवाब के अनुसार उत्तर पश्चिम दिल्ली में अलग अलग धर्म की 30 मूर्तियां, उत्तरी जिले के थानों में सात मूर्तियां होने की जानकारी दी गयी। पुलिस के संबंधित पीआईओ द्वारा पिछले साल सितंबर.अक्तूबर में भेजे गये जवाबों के अनुसार इन मूर्तियों में अष्टधातु समेत बेशकीमती मूर्तियां भी शामिल हैं और जैन धर्म, हिंदू धर्म की प्रतिमाएं हैं।

बहरहाल पूर्वी दिल्ली जिला पुलिस के 22 अक्तूबर के जवाब के अनुसार 33 मूर्तियां संबंधित मंदिरों में पहुंचा दी गयी थीं। जैन ने पिछले साल और इस साल अप्रैल में दायर अपनी आरटीआई अर्जियों के जवाब मिलने के बाद गत 25 मई को कंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिखकर मांग की है कि पकड़े गये चोरों या तस्करों से जानकारी मिलने के बाद तत्काल जांच के आधार पर इन प्रतिमाओं को मालखानों में जमा कराने के बजाय इनके मूल स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था की जानी चाहिए या इन धर्मों की संस्थाओं को सौंप देना चाहिए। उन्होंने यह अनुरोध भी किया है कि संबंधित धर्म की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मालखानों में मूर्तियों को सम्मान के साथ रखा जाना चाहिए। इसके लिए जैन ने एक समिति बनाने का सुझाव दिया है। (वैभव माहेश्वरी )

कारोबार बन गया है मूर्ति और प्राचीन धरोहरों की चोरी

खबरों में इतिहास ( भाग-८)
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।

१-मूर्ति और प्राचीन धरोहरों की चोरी
२-2700 साल पुराने कंकाल बरामद

कारोबार बन गया है मूर्ति और प्राचीन धरोहरों की चोरी

अपराध की दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा कारोबार संगठित रूप ले चुका है। ये कारोबार है मूर्ति और प्राचीन धरोहरों की चोरी। इसका सालाना टर्न ओवर दस हजार करोड़ रुपये है और इस कारोबार ने अपना नेटवर्क देश भर में फैला लिया है।
भगवान शिव की एक मूर्ति को हाल ही में दिल्ली पुलिस ने बरामद किया। 6 करोड़ रुपये की कीमत वाली ये मूर्ति दक्षिण भारत से चोरी की गई थी। दिल्ली में इसे बेचने के लिए लाया गया मगर तस्करों के हाथ पड़ने से पहले ये मूर्ति दिल्ली पुलिस के हाथ लग गई। ये और ऐसी 1200 प्राचीन धरोहरें देश के विभिन्न हिस्सों से एक साल में चोरी कर ली गईं। 2008 का ये आंकड़ा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का है। दुनिया के बाजार में इनकी कीमत कम से कम 500 करोड़ है।
वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल से पिछले एक साल में सौ करोड़ की मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं। अकेले यूपी में पिछले दो सालों के दौरान नौ शहरों से 75 करोड़ की मूर्तियां बरामद की गईं और 50 लोग गिरफ्तार किए गए। मगर मूर्ति चोरी का ये रैकेट बदस्तूर जारी है। सिर्फ यूपी में ही नहीं हर उस राज्य से जहां प्राचीन धरोहर हैं सैकड़ों की संख्या में मूर्ति या धरोहरों की चोरी हो रही है। मूर्तियों के लिए मशहूर मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा चोरी हो रही है। दूसरे नंबर पर राजस्थान है।
मूर्ति चोरी के तेजी से बढ़ रहे आंकड़ों की दूसरी सबसे बड़ी वजह है सुरक्षा के नाकाफी इंतजाम। बिहार के 72 हैरिटेज स्थलों में से सिर्फ 3 नालंदा, बोधगया और सासाराम ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तरफ से संरक्षित किए गए हैं। पूरे राजगीर इलाके में सिर्फ 12 सुरक्षाकर्मी हैं। पुरातत्व विभाग ने केंद्र सरकार से 500 अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों की मांग की है जो अभी लंबित है। हमारे देश में राष्ट्रीय महत्व की 3675 इमारतें दर्ज हैं। रामनिवास मिर्धा कमेटी ने 9000 प्राचीन इमारतों की देखभाल के लिए चौकीदार आदि की व्यवस्था का निर्देश दिया था जिसमें से बमुश्किल 4000 इमारतों पर ही यह व्यवस्था हो पाई है।
समस्या ये है कि सिर्फ चौकीदारों की तैनाती से मूर्तियों की सुरक्षा संभव नहीं क्योंकि निहत्थे चौकीदारों की हत्या कर मूर्ति चोरी के कई मामले हुए हैं। जिस तरीके से मूर्ति तस्करों का नेटवर्क मजबूत दर मजबूत होता जा रहा है उसके मुकाबले चौकीदार नाकाफी ही रहेंगे। (आईबीएन-7 )


मेक्सिको में 2700 साल पुराने कंकाल बरामद

मेक्सिको में पुरातत्वविदों ने लगभग 2,700 वर्ष पुराने मानव कंकाल बरामद करने का दावा किया है।
एक समाचार एजेंसी के अनुसार मेक्सिको के चियापास प्रांत के जोक्यी इलाके में पुरातत्वविदों ने एक गुंबद का पता लगाया, जिससे 2,700 वर्ष पुराने चार कंकाल बरामद किए गए। पुरात्व मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार जिस गुंबद का पता लगाया गया है वह मिजोअमेरिका युग का सबसे प्रचीन हो सकता है। इससे ओलमेक और माया संस्कृतियों के घटनाक्रम का पता लगाया जा सकता है। इस प्राचीन गुंबद का पता चियापा डी कोजरे पुरातत्व परियोजना से जुड़े सदस्यों ने नेशनल ऑटोनोमस यूनीवर्सिटी ऑफ मेक्सिको (यूएनएएम) और ब्रिगेम यंग यूनीवर्सिटी की सहायता से लगाया।

विशेषज्ञों के अनुसार गुंबद से बरामद चार कंकाल 700-500 ईसापूर्व के हैं हालांकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसके लिए कार्बन 14 डेटिंग और हड्डियों की डीएनए जांच होगी, इसके बाद ही इन कंकालों की अवधि का पता चल पाएगा। एजेंसी के अनुसार गुंबद में अंतिम संस्कार करने के लिए एक कक्ष बना है जिसके साथ एक कमरा भी है। इसमें छह-सात मीटर लंबा पिरामिड और ऊपरी हिस्से में एक मंदिर भी है। एजेंसी के मुताबिक गुंबद के भीतर जो चार कंकाल बरामद किए गए, उसमें एक 50 वर्षीय व्यक्ति, एक वर्षीय लड़का, एक लड़की और एक महिला का कंकाल प्रतीत होता है। पुरातत्वविदों का कहना है कि जिस गुंबद का पता लगाया गया है वह 20वीं शताब्दी के मध्य में ला वंटा टाबेस्को से बरामद गुंबद की तरह प्रतीत होता है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र ओलमेत संस्कृति का गढ़ माना जाता था।

Wednesday, May 12, 2010

अविवाहित थे तुलसी दास ?

खबरों में इतिहास: भाग-७
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-क्या अविवाहित थे तुलसी दास ?
२-बत्तीस सौ साल पुराना किला

अविवाहित थे तुलसी दास ?

 पिछले कई दशकों से तुलसी के जन्म स्थान के विवाद को हल करने में जुटे सनातन धर्म परिषद के अध्यक्ष स्वामी भगवदाचार्य ने कहा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ तथ्यों पर भ्रम बना हुआ है। उन्होंने कहा कि मध्य युग में तुलसी नाम के चार साहित्यकार पैदा हुए। पहले तुलसी गोण्डा जनपद के सूकरखेत राजापुर ग्राम में पैदा हुए, जिन्होने रामचरित मानस समेत 12 ग्रंथों की रचना की। दूसरे तुलसी एटा जिले के सोरों में हुए, तीसरे तुलसी हाथरस जिले में पैदा हुए और चौथे तुलसी बलरामपुर जिले के वर्तमान तुलसीपुर तहसील के देवीपाटन गांव में पैदा हुए थे, जिन्होंने जानकी विजय, गंगा कथा, लवकुश कांड और हनुमान चालीसा की रचना की। उन्होंने कहा कि इतिहासकार इन चारों रचनाकारों की जीवन गाथा को भिन्न-भिन्न समझने की बजाए इन्हें एक ही तुलसीदास समझने की भूल कर बैठे, जिससे मानस के रचियता तुलसीदास के बारे में अनेक भ्रांतियां पैदा हो गर्इं। उन्होंने कहा कि हमें इन चारो तुलसीदास को अलग-अलग रूप में जानने कोशिश करने का प्रयास करना होगा।

स्वामी भगवदाचार्य के अनुसार मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास(1556-1605) सम्राट अकबर महान के समकालीन थे। उन्होंने कहा कि एक अकबर द्वितीय भी हुआ, जो शाह आलम द्वितीय का पुत्र था। उसका समय 1806 से 1837 था। अकबर द्वितीय के समय में लिखे गए गजेटियर में जिस तुलसी का उल्लेख है, वह राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास नहीं थे। उन्होंने कहा कि बांदा के जिला गजेटियर में उल्लेख है कि तुलसी यमुना पार करके आए और यहां उन्होंने साधना की। इससे यह सहज साबित हो जाता है कि कोई तुलसी नाम का विद्वान वहां गया होगा, लेकिन वहां वह पैदा कोई नहीं हुआ। इंपीरियल गजेटियर आफ इंडिया, कलकत्ता के अनुसार तुलसी ने बांदा जिले में राजापुर ग्राम बसाया था। इससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस नाम के गांव को किसी ने बसाया हो, वह उसी नाम के गांव में पैदा कैसे हो सकता है?

मानस लिखने वाले तुलसीदास का जन्म स्थान गोण्डा जनपद का राजापुर गांव ही असली जन्म स्थान होने बारे में कुछ अकाट्य तथ्य प्रस्तुत करते हुए स्वामी भगवदाचार्य ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में यहां पर आत्मा राम के नाम एक टेपरा गोचर भूमि आज भी दर्ज है। आत्मा राम दुबे, गोस्वामी जी के पिता का नाम बताया जाता है। ये सरयूपारी ब्राह्मण थे। इस गोत्र के ब्राह्मण सरयू नदी के आसपास इसी इलाके में ही पाए जाते हैं। यहीं पर पसका के निकट सरयू और घाघरा नदियों के संगम पर सूकरखेत भी है। गोस्वामी जी के गुरु नरहरि दास का आश्रम भी पास में ही है। गोस्वामी जी ने अपनी रचनाओं में अवधी भाषा का प्रयोग किया है। उनकी एक रचना है राम लला नहछू। नहछू नामक संस्कार केवल अवध क्षेत्र में ही प्रचलित है। यह प्रदेश के किसी अन्य हिस्से में नहीं होता है। इस रचना के गीत गोण्डा तथा आसपास के जनपदों में आज भी विवाह के अवसरों पर उसी भाषा में गाए जाते हैं।

डॉ भगवदाचार्य के मुताबिक श्रीराम चरित मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- मैं पुनि निज गुरु सन सुनी, कथा सो सूकर खेत। नहिं समझेउ कछु बाल मन तब मैं रहेंउ अचेत। अर्थात बाल्यकाल में उन्होंने सूकरखेत स्थित गुरु नरहरिदास के आश्रम में आकर शिक्षा प्राप्त की और बहुत दिन तक यहां रहे भी। उन्होंने इन संदर्भों का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया कि बाल्य काल में कोई बालक अकेले बांदा जिले से गोण्डा तक कै से आ सकता है। निश्चित रूप से वह स्थान गोण्डा जिले का राजापुर गांव ही है, जहां से सूकरखेत स्थित गुरु नरहरि दास की कुटी चंद कदमों की दूरी पर है। सभी विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि उनकी माता का निधन बचपन में ही हो गया था। उनका लालन-पालन चुनिया नाम की एक महिला ने किया था। कुछ दिनों बाद उनके पिता की मृत्यु भी हो गई और इस तरह वे एक अनाथ बालक की तरह भटकते हुए नरहरिदास के आश्रम पर आ गए थे। उन्होंने कहा कि अपनी रचनाओं में गोस्वामी जी ने पौराणिक स्थलों का छोड़कर मौजूदा नाम वाले किसी भी शहर के नाम का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन उन्होंने बहराइच का उल्लेख जरूर किया है, जो गोण्डा के बगल में ही है।

स्वामी भगवदाचार्य ने कहा कि पिछले साल लखनऊ विश्वद्यिालय के हिंदी विभाग की ओर से आयोजित राष्टÑीय संगोष्ठी में भी बहुमत से यह सिद्ध हुआ कि बांदा और एटा का दावा निराधार है। उन्होंने कहा कि इससे पहले दिसंबर 2005 में काशी विद्यापीठ वाराणसी में आयोजित चौथे विश्व तुलसी सम्मेलन में भी सर्वसम्मति से यही प्रस्ताव पारित किया गया कि गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर (सूकरखेत) गोण्डा ही है। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास को अविवाहित साबित करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उन्होंने कहा कि तुलसी नाम के जो चार साहित्यकार हुए, उनमें से सोरों और बलरामपुर में जन्मे तुलसी दास की पत्नियों का नाम रत्नावली था। स्वामी भगवदाचार्य के मुताबिक मानसकार तुलसी आजीवन अविवाहित और एकांत साधक रहे। स्वामी भगवदाचार्य ने सूकरखेत (राजापुर)को पर्यटन स्थल घोषित करने, तुलसीदास के नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने और एक पुलिस चौकी कायम करने की मांग की है।

सर्वमान्य कथा तुलसीदास के बारें में जो हम जानते हैं, उसका अवलोकन इस लिंक से करें। हिंदी विकीपीडिया ने इसे विस्तार से छापा है।

गोस्वामी तुलसीदास [१४९७ (१५३२?) - १६२३] एक महान कवि थे। उनका जन्म राजापुर, (वर्तमान बाँदा जिला) उत्तर प्रदेश में हुआ था। अपने जीवनकाल में तुलसीदासजी ने १२ ग्रन्थ लिखे और उन्हें ...


32 सौ साल पुराना निकला जाजमऊ टीला


    कानपुर को लखनऊ से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 25 पर स्थित जाजमऊ के विशाल प्राचीन टीले की खुदाई में सैकड़ों वर्ष पुराने पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। अवशेष ने जाजमऊ की पूर्व अनुमानित प्राचीनता [लगभग 600-700 ईसा पूर्व] को लगभग 600 वर्ष और पीछे [लगभग 1200-1300 ईसा पूर्व] खिसका दी है। इस तरह 3200 साल पुराना टीला माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय के निदेशक राकेश तिवारी के अनुसार यहा चार साल से उत्खनन कार्य चल रहा था। खुदाई में लगभग दो हजार उत्तरी चमकदार पालिश वाले पात्र [बर्तन], पुराने सैकड़ों सिक्कों का जखीरा, बर्तन बनाने में प्रयोग किया जाने वाला पकी मिट्टी से बना ब्राह्माी लेखयुक्त [पुरानी लिपि] उपकरण तथा कच्ची और पकी ईटों से निर्मित मौर्य और पूर्व मौर्य कालीन इमारतों के अवशेष मुख्य रूप से पाए गए हैं।

गंगा के किनारे वाले हिस्से में डा. राजीव कुमार त्रिवेदी द्वारा कराये गये उत्खनन में एक अत्यन्त चमकदार पात्र में रखे चांदी के सिक्कों का जखीरा मिला है। इन सिक्कों पर सूर्य, चक्र, वेदिका में वृक्ष, अर्ध चन्द्र, मेरु [पर्वत] आदि चिन्ह अंकित हैं। यह जखीरा दुर्लभ उपलब्धि है। पुरातात्विक खुदाई में ऐसा जखीरा पहली बार मिला है। तिवारी के अनुसार जाजमऊ के उत्खनन से अस्थि-निर्मित तीखे बाणाग्र [तीर के आगे हिस्सा], पकी मिट्टी और उप रत्‍‌नों से बनी गुड़िया [मनके], मिट्टी और शीशे के कई कंगन, मिट्टी के खिलौने और मूर्तिया, मुद्रा-छाप [सीलिंग], धातु-उपकरण, मिट्टी के बने विभिन्न तरह के बर्तनों के टुकड़े, सोप स्टोन से बने पात्र [बर्तन] व और उनके ढक्कन, पकी मिट्टी की सुसज्जित चकरियों [डिस्क] के तमाम उदाहरण समकालीन इतिहास के महत्वपूर्ण स्त्रोत होंगे।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...