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Tuesday, October 12, 2010

हजारों साल पुराने 20 मंदिरों के मिले अवशेष

खबरों में इतिहास ( भाग-९ )
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-रायसेन में हजारों साल पुराने मंदिर के मिले अवशेष
२-आदि मानव खाते थे बच्चों का मांस
३-उल्कापिंडों की बारिश से खत्म हुए डायनासोर
४-अर्जेंटीना में 1,300 साल पुराने बर्तन मिले
५-1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के

रायसेन में हजारों साल पुराने 20 मंदिरों के मिले अवशेष

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में हजारों साल पुराने विशाल मंदिर समूह का पता चला है। अब तक इस समूह के 20 मंदिरों के भग्नावशेष मिल चुके हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इन मंदिरों को फिर से उनके मूल स्वरूप में लाने का बीड़ा उठाया है। संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इन मंदिरों के भग्नावशेषों का जायजा लेने के बाद बताया कि ये ध्वस्त मंदिर भोजपुर के प्रसिद्ध शिव मंदिर के पास आशापुरी गांव में मिले हैं। शिव मंदिर गुजरात के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के काल का है। सोमनाथ मंदिर की तरह भोजपुर के ऐतिहासिक शिवमंदिर का भी जीर्णोद्धार किया गया है। इस मंदिर से पांच किलोमीटर दूर मिले 20 प्राचीन मंदिरों के टुकड़ों को बेशकीमती पुरा संपदा बताते शर्मा ने कहा कि इनके मिलने से पुरातत्व के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। इनमें से भूतनाथ मंदिर के भग्न अवशेषों को जोड़कर मंदिर को पुन: मूल स्वरूप में लाने का काम शुरू कर दिया गया है।

   आशापुरी में मिले खंडहरों से साफ हुआ है कि भूतनाथ मंदिर का निर्माण हजारों बरस पहले विशाल जलाशय के तट पर किया गया था। प्रतिहार और परमार राजाओं ने यह जलाशय आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक बनवाया था। जलाशय पर विशाल घाट था जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। भूतनाथ मंदिर परमार कालीन स्थापत्य कला का भूमिज शैली में निर्मित उत्कृष्ट मंदिर था। इस पूर्वाभिमुख मंदिर के अवशेषों से पता चला है कि भूतनाथ मंदिर भी भोजपुर के शिव मंदिर की तरह विशाल था। आशापुरी गांव में भूतनाथ मंदिर के अलावा आशापुरी मंदिर, बिलोटा मंदिर, सतमसिया मंदिर आदि मिले हैं। इन मंदिरों में ब्रह्मा, नृवराह, नृसिंह, विष्णु, सूर्य, गणेश, उमा-महेश्वर, नटराज, सदाशिव, कृष्ण, महिषासुर मर्दिनी, नायिकाओं और अप्सराओं की प्रतिमाएं मिली हैं।

आशापुरी क्षेत्र मध्यभारत के मध्यकालीन वटेसर, खजुराहो, कदवाहा आदि की तरह अहम शिल्पकला केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। पुरातत्वविद् इसकी शैलीगत विशिष्टताओं का अध्ययन कर रहे हैं। ध्वस्त मंदिरों के पुनर्निर्माण के लिए चार हजार चार सौ शिलाखंडों को भूगर्भ से निकालकर सुरक्षित रखा गया है। शिल्पखंडों को सहेजने का काम भी किया जा रहा है। तीन महीने की मेहनत से भूतनाथ मंदिर काफी हद तक अपने प्राचीन भव्य स्वरूप में खड़ा होने लगा है। प्राचीन मंदिरों में कोई उत्तराभिमुख है तो कोई दक्षिणाभिमुख। कोई पूर्वाभिमुख है तो कोई पश्चिमाभिमुख। कई मंदिरों के आठवीं, नवीं और दसवीं शताब्दी में बनने का अनुमान लगाया गया है। कुछ मंदिर पंचांग शैली में निर्मित हैं। कई प्रतिमाएं शिल्प कला के लिहाज से बेजोड़ मानी गई हैं। ( जनसत्ता ब्यूरो )।


आदि मानव खाते थे बच्चों का मांस

यूरोप में करीब आठ लाख वर्ष पूर्व आदि मानव अपने प्रतिदिन के भोजन के रूप में मानव मांस, खासकर बच्चों के मांस का भक्षण करते थे। स्पेन में मिले हडि्डयों के जीवाश्म के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों को ग्रान डोलिना की गुफा से बिजोन, हिरण, जंगली भेड़ और अन्य जीवों की हडि्डयों के साथ ही बच्चों और किशोरों के भी कटे हुए अवशेष मिले हैं। सूत्रों ने खबर दी है कि अनुसंधानकताओं को इन हडि्डयों पर कटने या अन्य चोट के निशान मिले हैं जो प्रस्तर के हथियारों के वार से पड़े होंगे। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि हडि्डयों के बीच की मज्जा को निकालने का प्रसास किया गया है और इस बात के भी प्रमाण है कि उनके मस्तिष्क को भी खाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि आदि मानव ने अपनी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने एवं अपने शत्रु पड़ोसियों से निबटने के लिए दूसरे लोगों की हत्या की।

उल्कापिंडों की वर्षा में खत्म हुए डायनासोर

डायनासोर दुनिया से कैसे गायब हुए, इसको लेकर पिछले तीन दशकों से बहस जारी है। अब एक नए अध्ययन में कहा गया है कि साढे़ छह करोड़ साल पहले उल्कापिंड की बारिश में डायनासोर का अंत हो गया। खगोलीय पिंडों की बारिश हजारों साल चली । वैज्ञानिकों ने इससे पहले मैक्सिको की खाड़ी में एक विशाल गड्ढा पाया था जो प्रागैतिहासिक काल में एक उल्का पिंड के टकराने से बना था। डेली टेलीग्राफ में प्रकाशित खबर के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने अब ऐसा ही एक और विशाल गड्ढा यूक्रेन में पाया है जो मैक्सिको की खाड़ी वाले गड्ढे से हजारों साल पुराना है और इससे इस बात की संभावना को बल मिला है कि उल्का पिंडो की बारिश में डायनासोरों का अंत हो गया। यूक्रेन के बोत्शि गड्डे की खोज 2002 में हुई थी। आबरदीन विश्वविद्यालय के प्रो. डेविड जोली की अगुवाई में वैज्ञानिकों के दल ने यूक्रेन के उस गड्ढे में एक और गड्ढा पाया जिसके बारे में उनका विश्वास है कि यह किसी और उल्का पिंड के टकराने से बने और उन दोनों उल्का पिंडों के बीच कई साल का अंतर था ।

अर्जेंटीना में 1,300 साल पुराने बर्तन मिले

अर्जेंटीना में एक घर से खुदाई के दौरान लगभग 1,300 साल पुराने बर्तन मिले हैं। समाचार एजेंसी ईएफई के मुताबिक माना जा रहा है कि ये बर्तन जूजू प्रांत के मूल निवासियों से संबंधित हैं। बर्तन फ्रांसो और गोंजालो को उस समय मिले जब वह अपने घर के निर्माण के लिए खुदाई का काम करवा रहे थे। उनके चाचा राबटरे काराजाना ने बताया, "40 सेंटीमीटर खुदाई करने के बाद बर्तन का टुकड़ा बरामद किया गया और बाद में धीरे-धीरे आगे की खुदाई की गई जिसके बाद ये बर्तन बरामद किए गए। हमने पुरातत्तवविदें से संपर्क किया।"

तिलकारा पुरातत्व संस्थान के वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि बर्तनों के अलावा कोई अन्य मूल्यवान वस्तु भी है अथवा नहीं। माना जाता है कि सैकड़ों वर्ष पहले ‘ओमागुआसा इंडियन्स’ समुदाय के इस इलाके में रहते थे।



1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के

जर्मनी के अंकलाम शहर में 1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के मिले हैं। इन पर अरबी भाषा में खुदाई है, जिससे साबित होता है कि प्राचीन काल में जर्मनी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में शामिल रहा है। कुछ सिक्कों पर शानदार नक्काशी है। गैर पेशेवर पुरातत्वशास्त्री पीटर डाखनर ने इन सिक्कों को बेहतरीन डिजाइन वाला बताया। उन्होंने कुछ स्वयंसेवियों और ग्रीफ्सवाल्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिल कर खुदाई का काम किया। जर्मनी के अंकलाम शहर के पास मेटल डिटेक्टर की मदद से खुदाई में 82 चाँदी के सिक्के मिले हैं। यहाँ चाँदी का बाजूबंद और चाँदी की कुछ सिल्लियाँ भी मिली हैं। ये सभी चीजें 20 से 25 मीटर के दायरे में पाई गईं।

पुरातत्वशास्त्री मिषाएल शाइरेन का कहना है, 'इस जमाने के सिक्के बहुत दुर्लभ हैं। इतनी बड़ी संख्या में उनका यहाँ पाया जाना बड़ी बात है।' सबसे पुराना सिक्का सन 610 का बताया जा रहा है, जबकि यहाँ पाया गया सबसे नया सिक्का 820 एडी का हो सकता है। ग्रीफ्सवाल्ड यूनिवर्सिटी के इतिहासकार फ्रेड रुखोएफ्ट ने कहा, 'बाल्टिक सागर के किनारे अरबी भाषा के अक्षर खुदे हुए सिक्के मिलने से साबित होता है कि यह इलाका 1200 साल से अंतरराष्ट्रीय कारोबार के रूट में रहा है।' ये सिक्के मौजूदा वक्त के ईरान, इराक, अफगानिस्तान या उत्तरी अफ्रीका में ढाले गए हो सकते हैं। समझा जाता है कि काले सागर के कारोबारी रास्ते से होते हुए वे वोल्गा नदी से गुजरकर बाल्टिक सागर के तट तक पहुँचे। सिक्के स्लाविच बस्तियों के पास से मिले हैं। यूरोपीय और एशियाई नस्ल के मिले जुले लोगों की बस्ती स्लाविच बस्ती कही जाती थी। इतिहासकारों का मत है कि स्लाविच और वीकिंग लोगों के बीच कारोबार हुआ होगा। यूरोप के स्कैनडिनेवयाई इलाकों में वाइकिंग लोग रहते थे। यहाँ सिक्के और चाँदी के दूसरे सामान मिले हैं जिनका वजन करीब 200 ग्राम है। उनका मूल्य तो खत्म हो गया होगा, लेकिन चाँदी होने की वजह से उनका महत्व बना रहा होगा। इतिहासकारों का मानना है कि इतनी चाँदी से चार बैल या एक गुलाम खरीदा जा सकता था।

Tuesday, September 28, 2010

अयोध्याः इंतजार एक सार्थक फैसले का





इतिहास गवाह है कि लगभग ढाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रांता भारत को लूटते और तोड़ते-फोड़ते रहे उनमें से बाबर भी एक था। जिसने भारत वर्ष में आतंक पैदा किया एवं उसे लूटा तथा तोडा। उक्त विवाद के समाधान हेतु देश के अनेक प्रधानमंत्रियों ने प्रयत्न भी किये लेकिन उनमें सत्य स्वीकार करने की क्षमता न होने के कारण समाधान पर न पहुँच सके। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने तो व्यवस्थित वार्ताओं के द्वारा वास्तव में समाधान का प्रयास करना चाहा परन्तु कुछ मजहबी हठधर्मियों के असहयोग के चलते नतीजे पर न पहुँच सके। 1936 के बाद से उक्त स्थल पर नमाज अता नही की गयी जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। शरियत के अनुसार भी उक्त स्थल मस्जिद नहीं है लेकिन तथाकथित सेकुलरवादियों ने हमेशा उक्त स्थल पर मंदिर होने के साक्ष्य हिन्दुओं से ही मांगे। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है आने वाली पीढ़ी को हमारा धर्मनिरपेक्ष वर्ग क्या देना चाहता है। झूठा इतिहास या भ्रम की स्थिति झूठ में प्रत्यारोपित राष्ट्र या बिखरी संस्कृति। समाधान को लटकाता एवं विकल्प की तलाश में भटकता उक्त वर्ग ही मुख्य जिम्मेदार है उस 6 दिसम्बर, 1992 की दुर्भाग्यशाली घटना का जिसने कभी भी जिम्मेदारी से निर्णायक बात कहने का साहस नही किया  या उन्हें इन्तजार है दूसरे भूचाल का जब लाशों के ढेर पर बैठ वे सत्ता का बंदरबाँट कर सकें।

बहरहाल अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सारी सुनवाई पूरी करके साठ साल पुराने अयोध्या मामले पर फैसला देने की स्थिति में आ गई है। ३० अक्तूबर को आने वाला है फैसला। इस बार ज्यादातर पक्ष कोर्ट का फैसला मानने को तैयार हैं। हालांकि इसमें एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि नाखुश होने या राजनैतिक कारणों से यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में जाकर लटक सकता है ?

इस राजनैतिक खींचतान में ही आया था 6 दिसम्बर, 1992 एक ऐसा दुर्भाग्यशाली दिन। इस दिन धार्मिक विद्वेष का ऐसा गुबार उठा संख्या बल के समक्ष अयोध्या के विवादित धार्मिक स्थल को समाप्त होना पड़ा। विवादित ढॉचा ध्वस्त हो गया परन्तु अभी भी यक्ष प्रश्न है ऐसी स्थिति आयी कैसे । सर्वे भवन्तु सुखिनः को आधार मानने वाला, सर्व धर्म समभाव की सुखद कल्पना लिए वसुधैव कुटुम्बकम् से गौरव की अनुभूति करने वाला, अंहिंसा परमो धर्मा का मूल वैचारिक सहिष्णु कहलाने वाला हिन्दू समाज अचानक आक्रामक कैसे हो गया। गंगा-जमुनी संस्कृति का निर्मल जल रक्त रंजित किन परिस्थितियों में हुआ। आपसी एकता के माध्यम से गुलामी की जंजीर तोड़ने वाले एक दूसरे से क्यों भय खाने लगे, विचारणीय है।

विवाद सुलझाने की बहुत हुई हैं कोशिशें

  यदि हम अपने इतिहास पर गौर करे तो पायेगें कि 1847 से 1857 के बीच नवाब वाजिद अली शाह ने अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के झगड़े को समाप्त करने के लिए प्रयास किए। उन्होंने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जिसमें एक हिन्दू एक मुसलमान तथा एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सदस्य निष्पक्ष की भूमिका में था। जिस समिति ने उक्त स्थल के बारें में बताया ‘‘मीर बाकी ने किसी भवन की तोड़कर इसे बनवाया था क्योंकि इस पर साफ तौर पर लिखा है यह फरिश्तों के अवतरण का स्थल है। इसमें भवन का मलबा भी लगा है।’’ 1857 के समय अमीर अली तथा बहादुर शाह जफ़र ने फरमान जारी किया जिसके अनुसार ‘‘हिन्दुओं के खुदा रामचन्द्रजी की पैदाइश की जगह जो बाबारी मस्जिद बनी है वह हिन्दुओं को बाखुशी सौप दी जाये क्योंकि हिन्दु मुसलमान ना इन्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है’’ सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ 36 पर कर्नल मार्टिन ने लिखा है, अयोध्या की बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं को (मुसलमानों द्वारा) वापस देने की खबर से हममें (अंग्रेजो में) घबराहट फैल गयी और यह लगने लगा कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज खत्म हो जायेंगे। 1857 की क्रान्ति असफल होने के बाद अंग्रेजो ने 18 मार्च, 1858 में कुबेर टीला में इमली के पेड़ पर अमीर अली तथा बाबा राम चरण दास को हजारो हिन्दुओं तथा मुसलमानो के समाने फाँसी दे दी। इस सन्दर्भ में मार्टिन लिखते हैं, जिसके बाद फैजाबाद में बलवाइयों की कमर टूट गयी और तमाम फैजाबाद जिले में हमारा रौब गालिब हो गया। इस प्रकार राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद समाप्त होते होते रह गया। कुछ राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों ने भी सितम्बर 1992 में विवादित स्थल को 10 किमी दूर ले जाने का प्रस्ताव रखा परन्तु धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी सरकार तक इनकी आवाज नहीं पहुँची। मुस्लिम समाज के साहित्यकारों ने भी उक्त विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान माना। अबुल फलज 1598 ईं में अकबारनामा अइना-ए-अकबरी में उस स्थान को राम का निवास स्थान बताया। 1856 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक हदीका-ए-शहदा के पृष्ठ 4-7 के अनुसार मथुरा-बनारस-अवध की मस्जिदें, मंदिरों को तोड़कर बनायी गयी थी। 1878 ई.में हाजी मो. हसन ने अपनी पुस्तक जिया-ए-अख्तर के पृष्ठ 38-39 में राजा रामचन्द्र के महल सराय और सीता की रसोई को तुड़वाना वर्णित है। 1885 ई. में मौलवी अब्दुल करीम की पुस्तक गुलगस्ते हालात-ए-अयोध्या अवध के अनुसार भी जन्म स्थान और सीता रसोई भवनों को तोड़कर उस स्थान पर बाबर बादशाह ने एक मस्जिद बनवायी। 1909 के अल्लामा मो. जनमुलगानीखॉ रामपुरी की पुस्तक तारीखे-ए-अवध के अनुसार भी बाबर ने जन्म स्थान को मिस्मार करके मस्जिद बनवायी।

1785 ई. में आस्ट्रेलिया के जेसुइट पादरी जोसेफ टीफेनथेलर जो 1766 से 1771 तक अवध में रहे जिनकी पुस्तक के पृष्ठ 252-254 जिसका अनुवाद श्री शेर सिंह आईएएस ने किया जिसमें भी एक किले जिसे राम कोट कहते थे गिरा तीन गुम्मदों वाली मस्जिद बनवाने का जिक्र है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया-सर्जन जनरल एडवर्ड वेलफेयर (1858) के अनुसार भी हिन्दुओं के कम से कम तीन पवित्र स्थलों पर मस्जिद बनवाने को जिक्र है जिसमें राम जन्म भूमि शामिल है। 1880 ई. की फैजाबाद समझौता रिपोर्ट में भी बाबर द्वारा 1528 में राम जन्म भूमि पर जिसे तोड़ मस्जिद का निर्माण बताया गया। 1881 की फैजाबाद के इम्पीरियल गजट में भी मुसलमानों द्वारा तीन मस्जिदें बनवाये जाने का जिक्र है। जो जन्म स्थान, त्रेता ठाकुर तथा स्वर्ग द्वार है। इसी प्रकार फाइजाबाद (फैजाबाद) गजेटियर ग्रन्थ एचआर नेविल के अनुसार (1928 ई.) भी 1525 में बाबर का 7 दिन अयोध्या में रूक कर प्रचीन मंदिरों को ध्वस्त करने एवं मस्जिद के निर्माण का जिक्र है। जो पृष्ठ 155 पर अंकित है। 1902 के बाराबंकी जिला गजेटियर में एक रिपोर्ट एच आर नेविल ने भी जन्म स्थान का जिक्र एवं विवाद की बात स्वीकार की।

इसी प्रकार मुस्लिम शायरों तथा विद्वानों ने विवादित स्थल पर राम मंदिर की बात स्वीकारी है। अबुल फजल मुगल काल के एक लेखक थे। जिन्होने आइना-ए-अकबरी में अवध (अयोध्या) को महापुरूष राम की निवास स्थान बताया। ‘‘औरंगजेब आलमगीर’’ में स्पष्ट (पृष्ठ संख्या 623-630) रूप से विस्तार को दिया गया काफिरों (हिन्दुओं) ने इस स्थान (राम जन्म भूमि) की मुक्ति के लिए 30 बार आक्रमण किये 1664 ई0 में ऐसे ही किये गये आक्रमण में दस हजार हिन्दू हताहत हुए। सहीफा-ए-नसैर बहादुर शाही (1700-1800) यह पुस्तक औरंगजेब की पौत्री तथा बहादुर शाह जफ़र की पुत्री बंगारू अमातुज्ज-जोहर ने लिखी है। जिसके अनुसार (पृष्ठ 4-7) मथुरा बनारस और अवध (अयोध्या) में काफिरों (हिन्दुओ) के इबादतगाह है जिन्हें वे गुनहगार व काफिर कन्हैया की पैदाइशखाना, सीता की रसोई व हनुमान की यादगार मानते हैं जिसके बारे में हिन्दू मानते है कि यह रामचन्द्र ने लंका पर फतह हासिल करने के बाद बनवाया था। इस्लाम की ताकत के आगे यह सब नस्तनाबूद कर दिया गया और इन सब मुकामों पर मस्जिद तामीर कर दी गयी। बादशाहों को चाहिए कि वे मजिस्दों को जुमे की नवाज से महरूम न रखे, बल्कि यह लाजमी कर दिया जाय कि वहॉ बुता की इबातद न हो शंख की आवाज मुसलमानों के कानों में न पहुँचे।

बाबरी मस्जिद का विवरण पुस्तक के नवे अध्याय में जिसका शीर्षक ‘‘वाजिद अली और उनका अहद’’ में लिखा है। पहले वक्तो के सुल्तानों ने इस्लाम की बेहतरी के लिए और कुफ्र को दबाने के लिए काम किये। इस तरह फैजाबाद और अवध (अयोध्या) को भी कुफ्र से छुटकारा दिलाया गया। अवध में एक बहुत बड़ी इबादतगाह थी और राम के वालिद की राजधानी थी जहॉ एक बड़ा सा मन्दिर बना हुआ था। वहॉ एक मजिस्द तामीर करा दी गयी। जन्म स्थान का मंदिर राम की पैदाइशगाह थी जिसके बराबर में सीता की रसोई थी। सीता राम की बीबी का नाम था। उसी जगह पर बाबर बादशाह ने मूसा आसिकान की निगहबानी में एक सर बुलन्द मस्जिद तामीर करायी। वह मस्जिद आज भी सीता पाक (सीता की रसोई) के नाम से जानी जाती है।

न्यायिक व्यवस्था के अनुसार भी सन् 1885 में फैजाबाद जिले के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने एक नागरिक अपील संख्या 27 में कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद का निर्माण हिन्दुओं के एक पवित्र स्थल पर भवन तोड़कर किया गया है चूँकि यह घटना 356 वर्ष पूर्व की है इसलिए अब इसमें कुछ करना कठिन है। अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी। जिसका कि फैसला मध्य सितम्बर में आने की पूरी सम्भावना है। इस सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की विशेष पीठ ने 27 जुलाई, 2010 को दोनो पक्षों के अधिवक्ताओं को सिविल संहिता प्रक्रिया की धारा-89 के तहत बुलाकर समाधान के विषय पर बातचीत की परन्तु दुर्भाग्यवश सार्थक हल नहीं निकला था।

Thursday, September 9, 2010

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का इतिहास

 
अयोध्या में सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद का वर्तमान अध्याय 22-23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखने से शुरू हुआ था।   शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में क़ायम कथित राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे। मगर 60 साल के लंबे सफ़र में अदालत को अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिंदू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी और क्या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है? वैसे तो हाईकोर्ट को दर्जनों वाद बिंदुओं पर फ़ैसला देना है, लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाक़ी ने बनवाया? इसी के साथ कुछ तकनीकी या क़ानूनी सवाल भी हैं। मसलन क्या जिन लोगों ने दावे दायर किए हैं , उन्हें इसका हक़ है? क्या उन्होंने उसके लिए ज़रुरी नोटिस वग़ैरह देने की औपचारिकताएँ पूरी की हैं और क्या ये दावे क़ानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर दाख़िल किए गए?

अदालत को ये भी तय करना है कि क्या इसी मसले पर क़रीब सवा सौ साल पहले 1885 – 86 में अदालत के ज़रिए दिए गए फ़ैसले अभी लागू हैं। उस समय हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने मस्जिद से सटे राम चबूतरे पर मंदिर बनाने का दावा किया था, जिसे अदालत ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ऐसा होने से वहाँ रोज़- रोज़ सांप्रदायिक झगड़े और ख़ून- ख़राबे का कारण बन जाएगा। अदालत ने ये भी कहा था कि हिंदुओं के ज़रिए पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन अब इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता।

मामले को हल करने के लिए सरकारों ने अनेकों बार संबंधित पक्षों की बातचीत कराई, लेकिन कोई निष्कर्ष नही निकला। लेकिन बातचीत में मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई अथवा नही।

सुप्रीम कोर्ट ने भी 1994 में इस मामले में अपनी राय देने से इनकार कर दिया कि क्या वहाँ कोई मंदिर तोड़कर कोई मस्जिद बनाई गई थी। गेंद अब हाईकोर्ट के पाले में है। मसला तय करने के लिए अदालत ने ज़ुबानी और दस्तावेज़ी सबूतों के अलावा पुरातात्विक खुदाई करवाकर एक रिपोर्ट भी हासिल कर ली है, जिसमें मुख्य रूप से ये कहा गया है कि विवादित मस्जिद के नीचे खुदाई में मंदिर जैसी एक विशाल इमारत , खम्भे , एक शिव मंदिर और कुछ मूर्तियों के अवशेष मिले हैं।

लेकिन मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति करते हुए उसे सबूतों में शामिल न करने की बात कही है, जबकि हिंदू पक्ष इस रिपोर्ट के अपने दावे की पुष्टि में प्रमाण मानते हैंÜ

अदालत में मुख्य रूप से चार मुक़दमे विचाराधीन हैं, तीन हिंदू पक्ष के और एक मुस्लिम पक्ष का. लेकिन वादी प्रतिवादी कुल मिलाकर मुक़दमे में लगभग तीस पक्षकार हैं।

सरकार मुकदमे में पक्षकार है, लेकिन उसकी तरफ़ से कोई अलग से पैरवी नही हो रही है. सरकार की तरफ़ से शुरुआत में सिर्फ़ ये कहा गया था कि वह स्थान 22/ 23 दिसंबर 1949 तक मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है।

इसी दिन मस्जिद में मूर्तियाँ रखने का मुक़दमा भी पुलिस ने अपनी तरफ़ से क़ायम करवाया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क करके ताला लगा दिया गया था।

इमारत तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम की सुपुर्दगी में दे दी गई और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की ज़िम्मेदारी भी दे दी गई। आरोप हैं कि तत्कालीन ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर भीतर- भीतर उन लोगों का साथ दे रहे थे, जिन्होंने मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखीं. इसीलिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने के बावजूद मूर्तियां नहीं हटवाईं। जनवरी 16, 1950 को हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता गोपाल सिंह विशारद ने सिविल कोर्ट में ये अर्ज़ी दायर की कि मूर्तियों को वहाँ से न हटाया जाए और एक राम भक्त के रूप में उन्हें वहाँ पूजा अर्चना की अनुमति दी जाए।

सिविल कोर्ट ने ऐसा ही आदेश पारित कर दिया. अदालत ने पूजा आदि के लिए रिसीवर की व्यवस्था भी बहाल रखी. इस मुक़दमे में सरकार को नोटिस देने की औपचारिकता पूरी नही की गई थी.। संभवतः इसीलिए कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और दावा दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र दास परमहंस ने दायर किया, जो उन्होंने बाद में 1989 में वापस ले लिया। फिर 1959 में हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने अदालत में तीसरा मुक़दमा दर्ज करके कहा कि उस स्थान पर सदा से राम जन्म स्थान मंदिर था और वह निर्मोही अखाड़ा की संपत्ति है, इसलिए रिसीवर हटाकर इमारत उसे सौंप दी जाए।

निर्मोही अखाड़ा का तर्क है कि मंदिर को तोड़ने के प्रयास किए गए पर वह सफल नही हुए और हिंदू वहाँ हमेशा पूजा करते रहे. उनका यह भी कहना है कि 1934 के दंगों के बाद मुसलमानों ने डर के मारे वहाँ जाना छोड़ दिया था, और तब से वहाँ नमाज़ नही पढ़ी गई। इसलिए हिंदुओं का दावा पुख़ता हो गया।

दो साल बाद सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और कुछ स्थानीय मुसलमानों ने चौथा मुक़दमा दायर करके कहा कि बादशाह बाबर ने 1528 में यह मस्जिद बनवाई थी और 22/ 23 दिसंबर, 1949 तक यह मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है। इतने लंबे समय तक उनका कब्ज़ा रहा। इसे मस्जिद घोषित कर उन्हें क़ब्जा दिलाया जाए।

मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि निर्मोही अखाड़ा ने 1885 के अपने मुक़दमे में केवल राम चबूतरे पर दावा किया था, न कि मस्जिद पर और वह अब उससे पलट नही सकता. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि अदालत का तत्कालीन फ़ैसला अब भी बाध्यकारी है।

मुस्लिम पक्ष राम चबूतरे पर हिंदुओं के क़ब्ज़े और दावे को स्वीकार करता है।

मुस्लिम पक्ष तर्क में यह तो मानता है कि वर्तमान अयोध्या वही अयोध्या है जहां राम चन्द्र जी पैदा हुए, लेकिन बाबर ने जहाँ मस्जिद बनवाई, वह ख़ाली जगह थी।

क़रीब चार दशक तक यह विवाद अयोध्या से लखनऊ तक सीमित रहा. लेकिन 1984 में राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से जन्म भूमि का ताला खोलने का ज़बरदस्त अभियान चलाकर इसे राष्ट्रीय मंच पर ला दिया. इस समिति के अध्यक्ष गोरक्ष पीठाधीश्वर हिंदू महासभा नेता महंथ अवैद्य नाथ ने और महामंत्री कांग्रेस नेता तथा उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना इसमें शामिल थे।
एक स्थानीय वकील उमेश चंद्र पाण्डे की दरख़ास्त पर तत्कालीन ज़िला जज फ़ैज़ाबाद के एम पाण्डे ने एक फऱवरी 1986 को विवादित परिसर का ताला खोलने का एकतरफ़ा आदेश पारित कर दिया, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया मुस्लिम समुदाय में हुई।

इसी की प्रतिक्रिया में फ़रवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता अख़्तियार किया।

ताला खोलने के आदेश के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय की अपील अभी भी कोर्ट में लंबित है।

मामले में एक और मोड 1989 के आम चुनाव से पहले आया जब विश्व हिंदू परिषद के एक नेता और रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने एक जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में पांचवां दावा फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया।

इस दावे में स्वीकार किया गया कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखी गईं. दावा किया गया कि जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं और वही इस संपत्ति के मालिक।

इस मुक़दमे में मुख्य रूप से ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि बादशाह बाबर ने एक पुराना राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई। दावे के समर्थन में अनेक इतिहासकारों, सरकारी गज़ेटियर्स और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला दिया गया है। यह भी कहा गया कि राम जन्म भूमि न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है। इस दावे में राम जन्म भूमि न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया। श्री अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी हैं।



इस तरह पहली बार विश्व हिंदू परिषद भी परोक्ष रूप से पक्षकार बना।

याद रहे कि राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश फ़ैज़ाबाद में जन सभा कर राम राज्य की स्थापना के नारे के साथ किया था। चुनाव से पहले ही विवादित मस्जिद के सामने क़रीब दो सौ फुट की दूरी पर वीएचपी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, जो कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी का कारण बना।



विश्व हिंदू परिषद ने 1989 में शिलान्यास से पूर्व इस मामले में कोर्ट आदेश के पालन की बात कही थी, पर अब वह संसद में कानून बनाकर मामले को हल करने की बात करती है, क्योंकि उसके मुताबिक़ अदालत आस्था के सवाल पर फ़ैसला नही कर सकती। निर्मोही अखाड़ा और विश्व हिंदू परिषद अदालत की लड़ाई में एक दूसरे के विरोधी हैं।



जगदगुरु स्वामी स्वरूपानंद की राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति भी 1989 में इस मामले में प्रतिवादी बनी। उनका दावा है कि पूरे देश के सनातन हिंदुओं का प्रतिनिधित्व यही संस्था करती है। उसके तर्क निर्मोही अखाड़ा से मिलते जुलते हैं। हिंदुओं की दो और संस्थाएं हिंदू महासभा और आर्य प्रादेशिक सभा भी प्रतिवादी के रूप में इस स्थान पर सदियों से राम मंदिर होने का दावा करती हैं।

इनके अलावा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कई अन्य हिंदुओं को उनकी निजी हैसियत से भी प्रतिवादी बनाया हैं। इनमे हनुमान गढ़ी के धर्मदास प्रमुख हैं। धर्मदास और निर्मोही अखाड़ा की पुरानी लड़ाई है और वह विश्व हिंदू परिषद के क़रीब हैं।

निर्मोही अखाड़ा ने कई स्थानीय मुसलमानों को प्रतिवादी बनाया है। मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड मुख्य दावेदार है। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने हाशिम अंसारी समेत कई स्थानीय मुसलमानों को अपने साथ पक्षकार बनाया है।

उसके अलावा जमीयत-ए-उलेमा हिंद, शिया वक़्फ़ बोर्ड, आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस संस्थागत रूप से प्रतिवादी हैं। मुस्लिम पक्षों का सबका दावा लगभग एक जैसा है सिवा आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस के जिसने पहले यह कहा था कि अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात साबित हो जाए तो मुलिम अपना दावा छोड़ देंगे।

शुरू में इस मुक़दमे में कुल 23 प्लाट शामिल थे, जिनका रक़बा बहुत ज़्यादा था. लेकिन छह दिसंबर को विवादित मस्जिद ध्वस्त होने के बाद 1993 में केंद्र सरकार ने मामला हल करने और मंदिर मस्जिद दोनों बनवाने के लिए मस्जिद समेत 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली।

ज़मीन अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराते हुए 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अब केवल उस स्थान का मालिकाना हक़ तय करना है जहाँ पर विवादित मस्जिद थी।

इस तरह अब मात्र क़रीब आधा बिस्वा ज़मीन का मुकदमा बचा है। जीतने वाले पक्ष को अगल-बग़ल की अधिग्रहीत भूमि ज़रुरत के मुताबिक मिलेगी। कहने को यह आधा बिस्वा ज़मीन का मामला है लेकिन करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों की भावनाएं अब इससे जुड़ गई हैं। अदालत और समूची न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इससे जुडी है. अदालत के फ़ैसले को लागू कराना सरकार का दायित्व होगा। इसलिए सब मिलाकर यह मामला पूरे भारतीय समाज और संवैधानिक-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है। (साभार बीबीसी )

Sunday, August 22, 2010

नालंदा विश्वविद्यालय - बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया, अब बख्तियारपुर का नीतिश इसे जिंदा करेगा !

नालंदा में सारिपुत्त स्तूप का अवशेष। नालंदा में प्राचीन विश्वविद्यालय के स्थल पर कुछ बौद्ध भिक्षु ( सभी फोटो विकीपीडिया से साभार ।

  भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्माण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।


तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतमबुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतमबुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ा केंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतमबुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।

बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५० ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवाया था। नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया।

  अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी और पराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। ( प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक विवरण देखने के लिए यहां क्लिक करें।)
   दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध शिक्षाकेंद्र के तौर पर पहचान बन चुके इस विश्वविद्यालय को अंततः    मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने ११९९ ईसवी में जलाकर नष्ट कर दिया। अब बख्तियारपुर के नीतिश कुमार, जो अभी बिहार के मुख्यमंत्री हैं, के प्रयासों से फिर नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया है। १६ देशों की मदद से इसके निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। भारत के नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की देखरेख में इसकी रूपरेखा तय की जा रही है। यह तो तय है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की तरह यह सिर्फ बौद्ध शिक्षा का केंद्र नहीं रहेगा लेकिन इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवित करने के विधेयक को मंजूरी दे चुके राज्यसभा सदस्यों को उम्मीद है कि प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर दुनिया में भारत का नाम उसी तरह रोशन करेगा जैसा कि प्राचीन काल में था। इसी उम्मीद के साथ नालंदा विश्वविद्यालय विधेयक 2010 को राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है।

    लंबे अंतराल के बाद शनिवार को राज्यसभा में एक सार्थक और सारगर्भित चर्चा देखने को मिली। सभी दलों के सदस्यों ने इस विश्वविद्यालय के तमाम पहलुओं पर अपनी राय जाहिर की। सांसदों के सुझावों में विश्वविद्यालय की इमारत के वास्तुशिल्प से लेकर इसमें पढ़ाए जाने वाले विषय भी शामिल थे। यह विधेयक गत 12 अगस्त को राज्यसभा में पेश किया गया था।

बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर स्थित बड़ा गांव में आज भी नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष मौजूद हैं। राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में बड़ा गांव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं।अपनी ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक पांचवीं सदी में दुनिया के तमाम देशों के करीब 10 हजार विद्यार्थी वहां शिक्षा ग्रहण करते थे। कहा जाता है कि तत्कालीन नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय काफी समृद्ध था। उसकी इमारत नौ मंजिल की थी।

    विधेयक के मुताबिक नया नालंदा विश्वविद्यालय परिसर 441 एकड़ में बनेगा। विदेश राज्यमंत्री परनीति कौर के मुताबिक इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में इतिहास, व्यापार प्रबंधन, भाषा, पर्यावरण एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया जाएगा। इसकी इमारत के वास्तुशिल्प का चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के जरिए किया जाएगा।

   वरिष्ठ सदस्य डा. कर्ण सिंह ने चर्चा के दौरान कहा कि इतिहास बताता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में चीन, जापान, मंगोलिया, अफगानिस्तान, तिब्बत एवं अन्य देशों से शोधार्थी आते थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि नया नालंदा विश्वविद्यालय ऑक्सफर्ड एवं अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों से ज्यादा बेहतर होगा। सीताराम येचुरी ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दिलचस्प है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने नष्ट करवाया था। आज उसको पुन: जीवित कराने में बख्तियारपुर के ही एक व्यक्ति (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) की महत्वपूर्ण भूमिका है।

बीजेपी के बाल आप्टे का सुझाव था कि इस विश्वविद्यालय को विदेश मंत्रालय के बजाय शिक्षा मंत्रलाय के अधीन होना चाहिए था। बीएसपी के युवा सदस्य प्रमोद कुरील का सुझाव था कि नए विश्वविद्यालय का वास्तुशिल्प पुराने विश्वविद्यालय जैसा ही होना चाहिए। ताकि यह अहसास हो कि ज्ञान का प्राचीन केंद्र पुनर्जीवित हो रहा है।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास


नालंदा विश्वविद्यालय

Tuesday, August 17, 2010

एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर

खबरों में इतिहास ( भाग-८)
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर
२-हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव
३-दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल
४-डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास
५-3500 साल पुराना कंगन मिला


तमिलनाडु के ऐतिहासिक तंजौर कस्बे में स्थित चोल राजवंश के समय के एक विशाल मंदिर को एक हजार साल पूरे हो गये हैं और यहां महोत्सव की तैयारी चल रही है। राज्य सरकार विशालकाय बृहदीश्वर मंदिर के एक हजार साल पूरे होने पर अनेक सांस्कृतिक आयोजन करने जा रही है। यह मंदिर अब यूनेस्को के ‘ग्रेट लिविंग चोला मंदिरों’ में शामिल है। 26 सितंबर से शुरू हो रहे दो दिन के उत्सव के दौरान तंजौर सांस्कृतिक केंद्र की तरह बन जाएगा, जहां पूरे शहर भर में कलाकार प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा 100 ओडुवर :मंदिर में गायन प्रस्तुति देने वाले: पवित्र पुस्तक तिरुमुरई का पाठ पढ़ेंगे, जिसमें भगवान शिव के लिए तमिल में गीत और मंत्र लिखे हैं। इस मौके पर जानीमानी नृत्यांगना पद्मा सुब्रमण्यम के निर्देशन में एक हजार कलाकार नृत्य प्रस्तुति देंगे। ( भाषा )।

  देश के सबसे विशालकाय मंदिरों में से एक बृहदेश्वर अथवा बृहदीश्वर मन्दिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। इसे तमिल भाषा में बृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है । इसका निर्माण 1003-1010 ई. के बीच चोल शासक राजाराज चोल एक ने करवाया था । उनके नाम पर इसे राजराजेश्वर मन्दिर का नाम भी दिया जाता है । चोल शासकों ने मंदिर को राजराजेश्वरम नाम दिया था, लेकिन बाद में तंजौर पर चढ़ाई करने वाले मराठा और नायक शासकों ने इसे बृहदीश्वर मंदिर नाम दिया।


 यह मंदिर काफी बड़े परिसर में फैला है तथा तंजौर के किसी भी हिस्से से इसे देखा जा सकता है। इसके अलावा भगवान शिव की सवारी के रूप में मान्य ‘नंदी’ की भी यहां बहुत बड़ी मूर्ति है।मंदिर के गर्भगृह में दुर्लभ पेंटिंग्स हैं, जिनके बारे में कुछ दशक पहले तक जानकारी न के बराबर थी। दरअसल पेंटिंग्स की हालत बहुत खराब होने के कारण इन तक पहुंच पाना मुश्किल था। राज्य सरकार मंदिर के ढांचे में सुधार के लिए 25.19 करोड़ रुपये खर्च करने वाली है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी ली है।

     यह अपने समय के विश्व के विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था । इसके तेरह (13) मंजिले भवन (सभी हिंदू अधिस्थापनाओं में मंजिलो की संख्या विषम होती है ।) की ऊंचाई लगभग 66 मीटर है । मंदिर भगवान शिव की आराधना को समर्पित है । यह कला की प्रत्येक शाखा - वास्तुकला, पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रांकन, नृत्य, संगीत, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का भंडार है। यह मंदिर उत्कीर्ण संस्कृत व तमिल पुरालेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पाषाण पर यह कलश स्थित है, अनुमानत: उसका भार 2200 मन ( 80 टन) है और यह एक ही पाषाण से बना है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य शिवलिंग को देखने पर उनका वृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है। मंदिर में प्रवेश करने पर गोपुरम्‌ के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर नंदी जी विराजमान हैं। नंदी जी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी तथा 3.7 मीटर ऊंची है। भारतवर्ष में एक ही पत्थर से निर्मित नंदी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है।
डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास

पश्चिम अफ्रीका से वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जीवाश्म खोजा है जिसने इस बात की संभावना जगाई है कि धरती पर बहुकोशिकीय जीवन का इतिहास कम से कम डेढ़ अरब साल से भी अधिक पुराना है। नए पाए गए जीव की संरचनात्मक जटिलता एक नई बहस छेड़ सकती है। गैबन की पहाड़ियों से पाया गया यह जीव साधारण आँखों से देखा जा सकता है और इसने विकास की कहानी को थोड़ा पीछे धकेल दिया है। अध्ययन को अंजाम देने वाले पोइटियर्स विश्वविद्यालय के अब्दुल रज्जाक अल अल्बानी ने बताया कि काफी समय से माना जाता रहा है कि जटिल बहुकोशिकीय जीवन की उत्पत्ति 60 करोड़ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है, लेकिन यह 2.1 अरब साल पुरानी है। इस खोज को प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित किया गया है।

अब तक वैज्ञानिकों की यह समझ रही है कि 60 करोड़ साल से पहले दुनिया पर एककोशिकीय जीवाणु का वर्चस्व था, लेकिन बस्तियों में रहने वाले इस नए जीव की खोज से मालूम होता है कि जटिलता की ओर विकास जल्द ही शुरू हो गया था। (भाषा)

दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल

दस करोड़ साल पहले धरती पर डायनोसोरों के साथ बिल्ली जैसे दिखने वाले घड़ियाल रहा करते थे। इस नई खोज ने जीवन के विकास के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्ली के आकार के पकासुचुस कपिलीमई के पैर अपेक्षाकृत लंबे होते थे और उनकी नाक कुत्तों जैसी होती थी। इन प्राणियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके दाँत स्तनधारी जीवों की भाँति होते थे, जिससे उन्हें चबाने की शक्ति मिलती थी। तंजानिया के तट से मिले साढ़े करोड़ साल पुराने घड़ियाल के जीवाष्म को उतने ही पुराने साढ़े करोड़ साल पुराने पत्थरों से वैज्ञानिकों ने प्राप्त किया। ओहाइयो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया कि अफ्रीका के मैदान में यह पानी से दूर रहते थे और कीट-पतंगे खाते थे। प्रो. पैट्रिक ओकोन्नोर ने इस खोज की अगुवाई की। उन्होंने बताया क पहली नजर में यह घड़ियाल स्तनधारी जैसा लगता है। उसका सर आपकी हथेली में समा जाएगा। अगर आप उसके दाँत देखेंगे तो आपको लगेगा नहीं कि वह घड़ियाल था। वह विचित्र तरह का सरीसृप था। (भाषा)

हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिम युग के समय अगर मानव ने अफ्रीका के दक्षिणी तट ‘गार्डन ऑफ ईडन’ में शरण ली होती तो वे शायद जीवित बच सकते थे। वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन से लगभग 240 मील पूर्व में अलग-अलग गुफाओं से मानव-निर्मित कलाकृतियाँ मिली हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जगह धरती पर एकमात्र स्थान था जहाँ हिमयुग के दौरान भी जीवन के लिए अनुकूल स्थिति मौजूद थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि लगभग 195,000 वर्ष पहले दुनिया का तापमान जब अचानक बदला और हिम युग आया तब इस क्षेत्र में रहने वाले लोग खुद को बचाने में सफल हुए होंगे। ‘डेली मेल’ की खबर के मुताबिक, कुछ वैज्ञानिकों का तो यहाँ तक मानना है कि हिमयुग के दौरान मानव आबादी घटकर बहुत कम बची होगी और ये वे लोग रहे होंगे, जो इस क्षेत्र में थे। (भाषा)

3500 साल पुराना कंगन मिला

उत्तरी इजरायल में एक पुरातात्विक खुदाई के दौरान कांस्य बार हुआ है कि उत्तरी इजरायल में 3,500 साल पुराने गांव का पता चला है। अभी तक उस क्षेत्र में तेल मेगिड्डो या तेल हजोर जैसे बड़े शहरों के बारे में ही पता चल पाया था। खुदाई कार्य का नेतृत्व करने वाली प्रमुख पुरातत्वविद कारेन कोवेलो परान ने बताया, "खुदाई में मिला कांस्य युगीन कंगन असाधरण तरीके से सुरक्षित है और इस पर नक्काशी है। उसके ऊपरी हिस्से पर एक सींग जैसी संरचना भी है।" उन्होने बताया "उस युग में सींग पवन देवता का प्रतीक था और वह शक्ति, उत्पादकता और कानून के प्रतीक थे।" कॉवेलो परान ने बताया है, "देश के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के दौरान हमें प्राचीन ग्रामीण इलाकों के जीवन की एक पहली झलक मिली है।" उन्होंने बताया, "ऐसा कंगन जो पहनता रहा होगा, वह निश्चित रूप से संपन्न रहा होगा और ग्रामीण परिवेश से संबंध रखता रहा होगा।

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