इतिहास ब्लाग में आप जैसे जागरूक पाठकों का स्वागत है।​

Website templates

Sunday, August 7, 2011

दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’

खबरों में इतिहास ( भाग-१४ )
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१- दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’
२--बोथनिया की समुद्रतल पर मिली उड़नतश्तरी ?
३- 4 लाख साल पुराना मानव दांत मिला


दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’


 दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’ पहले दो नगरों ‘किला राय पिथौरा’ और ‘सीरी’ को जोड़ने वाला दीवारनुमा अहाता था। इसका निर्माण मंगोल आक्रमण से बचने के लिए कराया गया था। इसका निर्माण तुगलक वंश के शासक जौना शाह यानी मुहम्मद बिन तुगलक ने कराया था। दिल्ली से लगभग साढ़े 14 किलोमीटर दूर पर ये दीवारें दिल्ली-महरौली सड़क को काटती हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-दिल्ली) के उत्तर में, बेगमपुरी मस्जिद के उत्तर में, खिड़की मस्जिद के दक्षिण में, चिराग दिल्ली के उत्तर में और सतपुल के निकट इस नगर के अवशेषों को देखा जा सकता है।
इतिहासकार वाईडी शर्मा के मुताबिक, 1964-65 में थोड़े पैमाने पर की गई खुदाई के बाद ‘किला राय पिथौरा’ की पूर्वी दीवार के साथ उसके संधि स्थल पर ‘जहांपनाह’ का एक हिस्सा मिला है। खुदाई से निर्माण और विस्तार के तीन स्थानों का पता चलता है। इसकी बुनियाद खुरदरे छोटे पत्थर हैं और जमीन से ऊपरी दीवार तक का हिस्सा चिनाई का है। बीसवीं सदी में दिल्ली में बढ़ते हुए उपनगरों की जरूरतों के कारण इस शहर की पत्थर से निर्मित दीवारों को अब हटाकर दूर फैला दिया गया है। स्थापत्य के लिहाज से खिलजी शासकों ने बादामी पत्थरों के स्थान पर लाल पत्थरों को तरजीह दी थी। तुगलकों ने इसे पूरी तरह बदल दिया। उनकी इमारतों में भूरे पत्थर के सीधे-सादे और कठोरतल, बड़े बड़े कमरों के ऊपर मेहराबी छत, भीतर की ओर ढालू दीवारें, किनारों की तरफ बुर्ज, चार केंद्रीय मेहराबें और खुले भागों पर सरदल होते थे।
शर्मा के मुताबिक, मिट्टी और र्इंटों से बनी मोटी दीवारों के लिए बाहर की तरफ ढालू बनाना जरूरी था। लेकिन वह पत्थर की दीवार के लिए जरूरी नहीं था। इस पद्धति को तुगलकों ने संभवत: सिंध, पंजाब या अफगानिस्तान से लिया था जहां गारे या र्इंटों का इस्तेमाल होता था। बर्नी के मुताबिक, मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में दिल्ली के कोषागार में सबसे अधिक कर संग्रह किया। सुल्तान ने दिल्ली में रहने के दौरान कृषि उत्पादन को बढ़ाने का प्रयास किया और अकाल के दौरान कुंओं का निर्माण करवाया। कृषि के लिए अलग विभाग ‘दीवान-ए-अमीरकोट’ की स्थापना की।
तुगलक को भारतीय उपमहाद्वीप का एक विशाल क्षेत्र शासन करने को प्राप्त हुआ था। उसे राजधानी दक्षिण के दौलताबाद ले जाने और मुद्रा नीति के लिए जाना जाता है। महत्वाकांक्षी सुल्तान ने तुगलकाबाद के दक्षिण पूर्व में 1327 में एक छोटी पहाड़ी पर आदिलाबाद के किले का निर्माण कराया था। इस किले का नाम मुहम्मदाबाद था। लेकिन बाद में इसे आदिलाबाद नाम से जाना जाने लगा। पुरातत्वविदों के मुताबिक, इसकी प्राचीर की सुरक्षा तीन स्तरों बाह्य दुर्ग प्राचीर, गलियारा और अंतर्कोट में थी। इसका निर्माण विशुद्ध रूप से स्थानीय शैली में किया गया है। केंद्र में निर्मित तल का विन्यास आयताकार है। चारों ओर से अनगढ़ पत्थरों की प्राचीर से घिरा हुआ है। ( नई दिल्ली, 7 अगस्त -भाषा)। 

बोथनिया की समुद्रतल पर मिली उड़नतश्तरी?


 लंदन। बोथनिया की खाड़ी में स्वीडन के एक व्यापारी जहाज के मलबे की खोज के दौरान अभियानकर्ताओं ने सोनार किरणों के माध्यम से एक ऐसी रहस्यमय चीज का मलबा खोजने का दावा किया है, जो अज्ञात उड़न तश्तरी (यूएफओ) हो सकती है।
इस रहस्यमय आकार के यूएफओ की खोज स्वीडन और फिनलैंड के बीच स्थित समुद्री हिस्से में करीब 100 मीटर गहराई पर की गई। इस खोज के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दूसरे ग्रह के लोग धरती पर आते रहे हैं।
समाचार पत्र 'डेली मेल' के अनुसार यूएफओ की खोज करने वाले खोजी दल की राय है कि कीचड़ से सने इस वस्तु ने समुद्रतल से हटने का प्रयास किया होगा क्योंकि उसके आसपास हिलने-डुलने के निशान पाए गए हैं।
शराब और शैम्पेन से लदे स्वीडन के डूबे जहाजों की खोज में लगे स्वीडिश विशेषज्ञ पीटर लिंडबर्ग ने इस यूएफओ के मलबे की खोज की। कुछ लोगों का मत है कि इस यूएफओ का आकार स्टार वार्स श्रृंखला की फिल्मों में दिखाए जाने वाली मिलेनियम फाल्कन उड़न तश्तरी से मिलता है, जिसका आकार गोलाकार था।
लिंडबर्ग ने कहा कि यह 60 फुट बड़ा है और इसे आसानी से देखा जा सकता है। बकौल लिंडबर्ग, " इस पेशे में हम अक्सर अजीबोगरीब चीजें देखते हैं लेकिन अपने 18 वर्ष के पेशेवर करियर के दौरान मैंने इस तरह की चीज पहले कभी नहीं देखी।"

4 लाख साल पुराना मानव दांत मिला


तेल अवीव। तेल अवीव विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर मंगलवार को लिखा कि इजराइली शहर रोश हाइन में एक गुफा में चार लाख साल पुराना मानव दांत मिला है। यह प्राचीन आधुनिक मानव का सबसे पुराना प्रमाण है।समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक वेबसाइट पर इसके साथ ही लिखा गया कि अब तक मानव के जिस समय काल से अस्तित्व में होने की बात मानी जा रही थी, यह मानव उससे दोगुना अधिक समय पहले जीवित था। यह दांत 2000 में गुफा में मिला था।
इससे पहले आधुनिक मानव का सबसे प्राचीन अवशेष अफ्रीका में मिला था, जो दो लाख साल पुराना था। इसके कारण शोधार्थी यह मान रहे थे कि मानव कि उत्पत्ति अफ्रीका से हुई थी।सीटी स्कैन और एक्स रे से पता चलता है कि ये दांत बिल्कुल आधुनिक मानवों जैसे हैं और इजरायल के ही दो अलग जगहों पर पाए गए दांत से मेल खाते हैं। इजरायल के दो अलग जगहों पर पाए गए दांत एक लाख साल पुराने हैं।
गुफा में काम कर रहे शोधार्थियों के मुताबिक इस खोज से वह धारणा बदल जाएगी कि मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी।गुफा की खोज करने वाले तेल अवीव विश्वविद्यालय के अवि गाफेर और रैन बरकाई ने कहा कि चीन और स्पेन में मिले मानव अवशेष और कंकाल से हालांकि मानव की अफ्रीका में उत्पत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ी थी, लेकिन यह खोज उससे भी महत्वपूर्ण है।

Thursday, July 7, 2011

पद्मनाभ मंदिर में 5 लाख करोड़ का खजाना

केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर से अब तक मिला खजाना कितने मूल्‍य का है, यह अभी तक सस्‍पेंस ही बना है। मीडिया में तहखाने से मिली चीजों की कीमत 1 लाख करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा बताई जा रही है। लेकिन केरल के पूर्व मुख्‍य सचिव सीपी नायर ने दावा किया है कि खजाना करीब पांच लाख करोड़ रुपये का हो सकता है। ऊपर से नीचे के क्रम में चित्रों के परिचय दिए गए हैं। सभी चित्र सहारा समय से साभार लिए गए हैं।                                   चित्र संख्या 1- केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर से सोने का अब तक का सबसे बड़ा भंडार मिला है. मंदिर से अब तक 1 लाख करोड़ का खजाना मिलने की बात कही जा रही है. फिलहाल खजाने की लिस्ट बनाने का काम जारी है.


चित्र संख्या 2- हिंदुओं के पद्मनाभस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की उपासना होती है. इसके तहखाने में छुपाए गए सोने के खजाने के मिलने के बाद श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया का सबसे अमीर धार्मिक स्थल बन गया है.

चित्र संख्या 3- यह मंदिर त्रावणकोर राजाओं के शासनकाल में 1772 में राजा मार्तण्‍ड वर्मा ने बनवाया था। इस शासन के नियमों के अनुसार मंदिर की संपत्ति पर केंद्र या राज्‍य सरकार का हक नहीं बनता है.

चित्र संख्या 4- खजाने का पता चलने के बाद से मंदिर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई है. पद्मनाभस्‍वामी मंदिर के कुल 6 तहखानों में से 5 तहखाने खोले जा चुके हैं. इनमें से सोना, हीरे, जेवरात, मर्तियां और सिक्‍के मिले हैं. इनकी कीमत लगभग 1 लाख करोड़ आंकी गई है.

चित्र संख्या 5- अब इस बात पर बहस हो रही है कि मंदिर से मिले खजाने को कहां रखा जाए. सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से खजाने का स्रोत और प्राचीनता का पता लगाने का आदेश दिया है.

चित्र संख्या 6- सरकारी अफसर मंदिर के खजाने की गिनती करने के लिए जा रहे हैं. मंदिर में मिली संपत्ति में भगवान विष्‍णु की हीरे, पन्‍ने और रूबी जड़ी 3.5 फुट ऊंची मूर्ति है. इसके अलावा 35 किलों की 18 फुट लंबी एक चेन भी बरामद हुई है. तहखाने में से 1 फुट लंबी एक और मूर्ति भी मिली है.

चित्र संख्या 7- सरकारी अफसर मंदिर के खजाने की गिनती करने के लिए जा रहे हैं. मंदिर में मिली संपत्ति में भगवान विष्‍णु की हीरे, पन्‍ने और रूबी जड़ी 3.5 फुट ऊंची मूर्ति है. इसके अलावा 35 किलों की 18 फुट लंबी एक चेन भी बरामद हुई है. तहखाने में से 1 फुट लंबी एक और मूर्ति भी मिली है. राज परिवार के सूत्रों का कहना है कि चेंबर बी के मुख्य द्वार पर सांप का बना होना यह दर्शाता है कि इसे खोलना अशुभ होगा. सूत्रों ने कहा जांच कमेटी भी इसे नहीं खोलेगी क्योंकि इसके साथ मंदिर की काफी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. एक मान्यता के अनुसार चेंबर बी के नीचे एक सुरंग है जो समुद्र तक जाती है. इस बीच मंदिर और इसके आसपास 24 घंटे का पहरा जारी है.

Monday, June 20, 2011

सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड

खबरों में इतिहास ( भाग-14 )
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।

1-सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड
2-बूढ़ा हो गया है चुनारगढ़ में चन्द्रकांता का किला!
3- 500 साल बाद मिली मोनालीसा की मॉडल की खोपड़ी
4-लक्ष्मी विलास पैलेस है बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़!


सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड

सैटेलाइट के ज़रिए किए गए एक नए सर्वेक्षण से लुप्त हो चुके 17 पिरामिडों और एक हज़ार से अधिक ऐसे मक़बरों का पता चला है जिसकी अब तक खुदाई नहीं की गई है.ये सर्वेक्षण नासा के सहयोग से एक अमरीकी प्रयोगशाला की ओर से किया गया है.इसमें उच्च स्तरीय इंफ़्रा-रेड तकनीक का उपयोग किया गया जिससे भूमिगत वस्तुओं की तस्वीरें हासिल की जा सकती हैं.मिस्र के अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक के उपयोग से प्राचीन स्मारकों को बचाने में सहायता मिलेगी क्योंकि इसके ज़रिए ये पता लगाया जा सकता है कि उनकी खुदाई करके वहाँ लूट तो नहीं हो गई है.
अलाबामा यूनिवर्सिटी की एक टीम ने सैटेलाइट से लिए गए उन तस्वीरों का अध्ययन किया जो इंफ़्रा-रेड कैमरों की मदद से खींची गई थीं.इससे ज़मीन के भीतर मौजूद चीज़ों का पता लगाया जा सकता है.शोध कर रही टीम ने जिस सैटेलाइट का उपयोग किया वह पृथ्वी की सतह से 700 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा कर रहा है लेकिन इसके कैमरे इतने शक्तिशाली हैं कि वे पृथ्वी की सतह पर एक मीटर के व्यास में मौजूद चीज़ों की तस्वीरें ले सकते हैं.सैटेलाइट पुरातत्वविदों ने मिट्टी से बने कई इमारतों का पता लगाया है जिनमें पिरामिड के अलावा कुछ मिस्र के पुराने मकान हैं, धर्म स्थल हैं और मक़बरें हैं.उनका कहना है कि आसपास की मिट्टी से ज़्यादा घनत्व वाले ढाँचों के आधार पर इनकी पहचान की गई है.अब तक एक हज़ार से ज़्यादा मक़बरे और तीन हज़ार पुरानी इमारतों का अब तक पता लगाया जा चुका है.
आरंभिक खुदाई से इस शोध में मिली कुछ जानकारियों की पुष्टि भी हो गई है.जिसमें सक़्क़ारा में ज़मीन में दबे गए दो पिरामिड शामिल हैं.जब शोध कर रहा दल वहाँ पहुँचा था तो कम ही लोगों को भरोसा था कि वहाँ कुछ मिलेगा लेकिन खुदाई शुरु हुई तो इन पिरामिडों का पता चला. अब संभावना व्यक्त की जा रही है कि ये मिस्र के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्मारकों में से एक साबित हो सकते हैं. डॉ सारा पारकैक बरमिंघम और अलाबामा स्थित प्रयोगशालाओं में नासा के सहयोग से इस परियोजना पर काम कर रही हैं.
उन्होंने सैटेलाइट से मिली तस्वीरों की मदद से पुरातात्विक सर्वेक्षण के काम की शुरुआत की है. वे कहती हैं, "हम एक साल से भी अधिक समय से शोधकार्य में लगे हुए थे. मैं सैटेलाइट से मिल रही जानकारियों को देख रही थी लेकिन 'वाह' कहने वाला क्षण उस समय आया जब हमने एक क़दम पीछे हटकर सारी सामग्री को देखा. हमे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हमने मिस्र में इतनी चीज़ों का पता लगा लिया है."
वे मानती हैं कि ये तो शुरुआत भर है. वे कहती हैं, "जिसका हमने पता लगाया है वो तो सतह के क़रीब हैं. इसके अलावा हज़ारों ऐसे स्थान हो सकते हैं जो नील नदी की गाद में दब गए होंगे." डॉ सारा पारकैक कहती हैं कि सबसे अद्भुत क्षण तानिस में आया. वे बताती हैं कि खुदाई में एक तीन हज़ार साल पुराना मकान निकला जिसका पता सैटेलाइट की तस्वीरों से मिला था और सब चकित रह गए जब मकान और तस्वीर में समानता मिली.

बूढ़ा हो गया है चुनारगढ़ में चन्द्रकांता का किला!
http://khabar.ibnlive.in.com/news/54017/9
मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर के चुनार में रहस्य, रोमांच, विस्मय और जादू की रोमांचक दास्तानों से भरपूर किवदंतियों एवं लोककथाओं के लिए विख्यात देश का अनोखा चन्द्रकांता का चुनारगढ़ का किला बूढ़ा हो गया है। गढ़ की दीवारें, प्राचीरें और चट्टानी जीवट वाले बुर्ज शताब्दियों से समय के निर्मम थपेड़ों की चोट झेलते-झेलते अब जर्जर हो चुकी है। समय के साथ अब इसकी चोट सहने की शक्ति लगभग खत्म हो रही है।
राजा भर्तहरी की तपोस्थली व हिन्दी के पहले उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री की तिलिस्म स्थली चुनारगढ़ अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है और इस ओर किसी का ध्यान नही है। उत्तर भारत के शासकों के जय-पराजय का हमराज किसी समय ध्वस्त हो सकता है। हिन्दुओं की पवित्र धार्मिक नगरी वाराणसी जाने के लिए गंगा के लिए मार्ग प्रशस्थ करने वाले विंध्य पर्वत पर चरण आकार वाले इस किले का प्राचीन नाम चरणाद्रिगढ़ रहा है।
यदि विंध्याचल पर्वत नहीं होता तो गंगा वाराणसी की ओर न जाकर दक्षिण दिशा की ओर जाती। गंगा पर पुस्तक लिखने वाले विद्वानों ने अपनी पुस्तकों में इसका उल्लेख किया है। इतिहासकारों के अनुसार उत्तर भारत के प्रत्येक शासकों की दिलचस्पी चुनार के किले पर कब्जा जमाने की रही है। जिस विजेता का शासन दिल्ली से बंगाल तक हो जाता था उसके लिए चुनार का किला एक महत्वपूर्ण पड़ाव हो जाता था। इसके अतिरिक्त जलमार्ग से इस किले तक पहुंचना भी काफी आसान होता था।
मिर्जापुर के तत्कालीन कलक्टर द्वारा 18 अप्रैल सन 1924 को दुर्ग पर लगाये एक शिलापत्र पर उत्कीर्ण विवरण के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद इस किले पर 1141 से 1191 ई. तक पृथ्वीराज चौहान, 1198 में शहाबुद्दीन गौरी, 1333 से स्वामीराज, 1445 से जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की, 1512 से सिकन्दर शाह लोदी, 1529 से बाबर, 1530 से शेरशाहसूरी और 1536 से हुमायूं आदि शासकों का अधिपत्य रहा है। शेरशाह सूरी से हुए युद्ध में हुमायूं ने इसी किले में शरण ली थी।
जहां तक इस किले के निर्माण का सम्बंध है कुछ इतिहासकार 56 ईपू में राजा विक्रमादित्य द्वारा इसे बनाया गया मानते हैं। कुछ इतिहासकार इसके निर्माण वर्ष पर अपनी मान्यता प्रदान नहीं करते। शेरशाह सूरी ने चुनार के दुर्ग का महत्व बेहतर समझा। चुनार से बंगाल तक सूरी के शासनकाल में कोई अन्य किला नहीं था। हालांकि बाद में शेरशाह ने बिहार के सासाराम में एक किले का निर्माण खुद कराया।
शेरशाह सूरी के पश्चात 1545 से 1552 तक इस्लामशाह, 1575 से अकबर के सिपहसालार मिर्जामुकी और 1750 से मुगलों के पंचहजारी मंसूर अली खां का शासन इस किले पर था। तत्पश्चात 1765 ई. में किला कुछ समय के लिए अवध के नवाब शुजाउदौला के कब्जे में आने के बाद शीघ्र ही ब्रिटिश आधिपत्य में चला गया। शिलापट्ट पर 1781 ई में वाटेन हेस्टिंग्स के नाम का उल्लेख अंकित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस किले पर उत्तर प्रदेश सरकार का कब्जा है।
किले की ऐतिहासिकता का विवरण अबुलफजल के चर्चित आईने अकबरी में भी मिलता है। फजल ने इसका नाम चन्नार दिया है। लोकगाथाओं में पत्थरगढ़, नैनागढ़, चरणाद्रिगढ़ आदि नामों से जाने जानेवाला यह किला किवंदतियों के अनुसार विक्रमादित्य ने अपने भाई भतृहरि के लिए बनवाया था। विलासिता व भोग के जीवन से विरक्त भतृहरि ने यही तप साधना की थी। दुर्ग में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है। हालांकि तमाम इतिहासकार इसे मान्यता नहीं देते हैं पर मिर्जापुर गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है।
गजेटियर में संदेश नामक राज का सम्बन्ध का भी उल्लेख है। माना जाता है कि महोबा के वीर बांकुरे आल्हा का विवाह इसी किले में सोनवा के साथ हुआ था। सोनवा मण्डप आज भी किले में मौजूद है। ऐतिहासिक एवं रहस्य रोमांच का इतिहास अपने हृदय में समेटे इस किले का इस्तेमाल फिलहाल पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र के रुप में किया जा रहा है। लिहाजा पर्यटक इस किले के दीदार से वंचित रह जाते हैं।
पर्यटन को बढ़ावा देने का ढिढोरा पीटने वाली सरकारों का इस ओर ध्यान नही है दुर्ग जगह-जगह से दरक रहा है। यह ऐतिहासिक धरोहर किसी भी समय ध्वस्त हो सकता है। भले ही चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के लोकप्रिय धारावाहिक चन्द्रकांता के बाद इसी नाम से एक और टेलीविजन धारावाहिक का प्रदर्शन शुरू होने वाला हो पर सरकार का ध्यान इस किले को बचाने की ओर नहीं है।

500 साल बाद मिली मोनालीसा की मॉडल की खोपड़ी
फ्लोरेंस। पुरातत्वविदों को इटली के फ्लोरेंस शहर में एक खोपड़ी का कंकाल मिला है। ऐसा माना जा रहा है कि यह खोपड़ी उसी महिला की है जो चित्रकार लियोनार्दो दा विंची की मोनालीसा कृति के लिए उनकी मॉडल बनी थी। यह कंकाल 500 साल पुराना है।
समाचार एजेंसी एकेआई के मुताबिक रेशम व्यापारी फ्रासेंस्को डेल गियोकोंडो की पत्नी लीसा ज्योर्जियो का शव सेंट ऑरसोला में दफनाया गया था। उनकी जुलाई 1542 में 63 वर्ष की आयु में मौत हो गई थी। पुरातत्वविदों ने पिछले महीने ही सेंट ऑरसोला में खुदाई शुरू की थी। बोलोग्ना विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद ज्योर्जियो ग्रुपियोनी का कहना है कि एक कब्र की खुदाई की गई थी, जिसमें एक महिला की खोपड़ी व श्रोणी के हिस्से मिले।
जब इस खोपड़ी के टूटे हुए हिस्सों को जोड़ा गया तो जो आकृति बनी वह मोनालीसा की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग से मिलती-जुलती है। अब इतिहासकार इस महिला के डीएनए की तुलना फ्लोरेंस के सैंटिसिमा एनुन्जिएंटा गिरजाघर में दफनाए गए उसके दोनों बच्चों के डीएनए से करेंगे।
ज्यादातर आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि लियोनार्दो की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग मोनालीसा के लिए ज्योर्जिया ही मॉडल बनी थी, जो बाद में अपने पति की मौत के बाद नन बन गई थीं। वैसे कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लियोनार्दो की यह कृति कई चेहरों का सम्मिलित रूप थी।


लक्ष्मी विलास पैलेस है बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़!
वडोदरा। वडोदरा के गायकवाड़ राजपरिवार को पूरे गुजरात में काफी सम्मान से देखा जाता है। अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद इस राजपरिवार ने वडोदरा के विकास से लेकर सामाजिक और आर्थिक सुधारों से जुड़े कई कार्यक्रम चलाए।
वडोदरा के लक्ष्मी विलास पैलेस का निर्माण 1890 में महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के वक्त हुआ था। तब से लेकर अभी तक राजपरिवार का मुख्य ठिकाना यही है। एक जमाने में वडोदरा स्टेट पर गायकवाड़ राजपरिवार की हुकूमत चलती थी। लक्ष्मी विलास पैलेस और उसके आसपास के 700 एकड़ का इलाका राजपरिवार के नाम है। बताया जाता है कि लक्ष्मी विलास पैलेस ब्रिटिश राजघराने के महल बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़ है। इस महल के दायरे में एक म्यूजियम, एक क्रिकेट ग्राउंड, इनडोर टेनिस कोर्ट और बैडमिंटन कोर्ट मौजूद है।
महल के पास की जमीन पर एक गोल्फ कोर्स और चिड़ियाघर भी बनाया गया है। राजपरिवार के बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल से लेकर लक्ष्मी विलास पैलेस तक एक रेल लाइन बिछाई गई थी। फिलहाल इस राजपरिवार के सबसे बड़े भाई रंजीत सिंह यहां अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनको इस राजघराने में महाराजा का दर्जा हासिल है। लक्ष्मी विलास पैलेस के अलावा वडोदरा में दो और महल- मकरपुर पैलेस और प्रताप विलास पैलेस इस मराठा राजपरिवार के नाम है।
भारत की आजादी से पहले इस राजपरिवार ने वडोदरा स्टेट में शिक्षा और टेक्सटाइल इंडस्ट्री के विकास में अहम भूमिका निभाई थी। बाल विवाह पर रोक, छूआछूत मिटाने और संस्कृत के विकास में भी वडोदरा राजपरिवार का खास योगदान माना जाता है। 1908 में बैंक ऑफ बड़ौदा की नींव भी इसी राजपरिवार के सहयोग से डाली गई थी जो आज भी देश के बड़े बैंकों की सूची में शामिल है।

Sunday, April 17, 2011

कोलकाता की खोज करने वाले जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील

खबरों में इतिहास ( भाग-13 )
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील
२-नेपाल ने भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की
3-10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र
जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील
मान्यता थी कि कोलकाता के संस्थापक जाब चार्नक थे। कोलकाता हाईकोर्ट में इतिहासकारों की दायर एक याचिका में अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर संस्थापक की मान्यता पर रोक लगा दी। ( पूरा विवरण इस पीडीएफ से पढ़ें -बेदखल हुए जाब चार्नाक  )

अब भी लोग कोलकाता की खोज का श्रेय उन्हें ही देते हैं। कोलकाता की खोज करने वाले जॉब चार्नक तीन सौ साल पहले हावड़ा जिले के उलबेड़िया पहुंचे थे। तब यहां मुगल साम्राज्य कायम था। इतिहास का ज्यादातर हिस्सा भले ही नष्ट हो गया हो, लेकिन लोग आज भी कोलकाता के साथ चार्नक को जरूर याद करते हैं। हालांकि हावड़ा वालों को और खास करके उलबेड़िया के लोगों को यह याद नहीं है कि कभी इतिहास पुरुष चार्नक उनके इलाके में भी रहते थे। महीनों तक हावड़ा जिले में रहने वाले चार्नक के मकान की दशा देख कर खंडहर भी सोचेगा कि उसकी हालत कुछ बेहतर है।

मकान के तौर पर महज ढाई टूटे हुए खंभे और कुछ ईट-पत्थर ही शेष बचे हैं। पास में रहने वाले गोपाल दास के मुताबिक किसी जमाने में साहेब बाड़ी के तौर पर प्रसिद्ध मकान को लोग नीली कोठी के नाम से जानते थे। बचपन में सुना था कि वे यहां रहते थे। इससे ज्यादा कुछ पता नहीं है। मकान के आसपास जरूर दूसरे भवन बन चुके हैं।
उलबेड़िया के इतिहासकार असित हाजरा के मुताबिक हेमेंद्र बनर्जी के हावड़ा इतिहास और सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि 1687 में चार्नक उलबेड़िया आए थे। वे यहां औद्योगिक केंद्र की स्थापना करना चाहते थे। इस बारे में ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल काउंसिल को सिफारिश भी की थी।
उनका कहना है कि इतिहास के पन्नों से यह जानकारी भी मिलती है कि व्यापारिक कारणों से नवाब के लठैतों ने चार्नक को जमकर पीटा भी था। इसके बाद 24 अगस्त 1690 की दोपहर उन्होंने इलाके को सदा के लिए अलविदा कह दिया और यहां से कूच कर गए। तीन साल तक अंग्रेज बहादुर इलाके में रहे और इसके लिए उन्होंने एक मकान बनवाया था,जिसे लोग साहेब बाड़ी भी कहते थे। लगभग 20 साल पहले यहां एक विशाल दीवार और दरवाजे के हिस्से दिखाई देते थे, लेकिन अब सब कुछ गायब हो गया है। उनका कहना है कि यहां से वे सूतानूटी गए। अगर यहीं बस जाते तो आज कोलकाता नहीं होता और उसकी जगह उलबेड़िया ही विश्व व्यापार का केंद्र बन चुका होता।

स्थानीय लोगों की बात तो छोड़िए उलबेड़िया नगरपालिका के चेयरमैन देवदास घोष यह सुनकर हैरत में पड़ जाते हैं कि सचमुच चार्नक उनके इलाके में आकर ठहरे थे। इसी तरह हाटकालीगंज इलाके में चार्नक के मकान से महज 50 मीटर की दूरी पर रहने वाले एक दुकानदार सवाल पूछते हैं कि सचमुच चार्नक कभी यहां रहते थे, ऐसा तो उन्होंने कभी किसी से नहीं सुना जबकि वे सालों से यहां रह रहे हैं। (साभार-जनसत्ता)।
यह भी पढ़िए- कोलकाता को किसने बसाया
भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की

नेपाल ने पड़ोसी भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी की अनुकृति बनाए जाने की खबरों को खारिज किया है और कहा कि जापान और युनेस्को द्वारा शुरू की गई संरक्षण परियोजनाओं के कारण नेपाल में बुद्ध के पवित्र जन्म स्थान की मान्यता बरकरार रहेगी।नेपाल के संस्कृति मंत्रालय के सचिव मोद राज दोत्तेल ने कहा कि युनेस्को ने 1997 में लुम्बिनी को बुद्ध की जन्मस्थली बताते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि भारत युनेस्को के घोषणा पत्र को मानने वाले 200 देशों में से एक है। बुद्ध भला दो स्थानों पर जन्म कैसे ले सकते हैं। नेपाल का लुम्बिनी ही वह स्थान है, जहां उनका जन्म हुआ था। पुरातत्वविदों का कहना है कि बुद्ध के दक्षिणी नेपाल के राजवंश में पैदा लेने का सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय सम्राट अशोक द्वारा 249 ईसा पूर्व में लुम्बिनी की यात्रा के दौरान यहां स्थापित किए गया शिलालेख है, जिसपर लिखा है, "ईश्वर के प्रिय राजा पियादशी (अशोक) ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में खुद बुद्ध साक्यमुणि के जन्मस्थान की राजकीय यात्रा की, उन्होंने यहां शिला लगवाई.. और लुम्बिनी गांव पर लगने वाला कर घटा दिया।"

लुम्बिनी के बुद्ध का जन्म स्थान होने का एक अन्य ऐतिहासिक प्रमाण वह पाषाण चित्र है, जो नेपाली राजा रिपु मल्ला के आदेश पर बनाया गया था। रिपु मल्ला ने 1312 ईस्वी में लुम्बिनी की तीर्थयात्रा के समय इस चित्र बनाने का आदेश दिया था। इसमें बुद्ध की माता और महारानी एक हाथ से एक पेड़ को पकड़ी हुई है, जबकि उसके बगल में एक नवजात शिशु एक कमल की पंखुड़ी पर खड़ा है। यह पाषाण शिल्प अपने निर्माण के समय से ही इस स्थान पर लगा हुआ है। यहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालु सम्राट अशोक द्वारा लगवाए गए शिलाओं और पाषाण चित्र को दूध और जल से नहलाते हैं। जापान सरकार के खर्च पर इन शिलाओं और पाषाण शिल्प के संरक्षण की एक परियोजना चलाई जा रही है। माना जाता है कि बुद्ध का जन्म 623 ईसा पूर्व में हुआ था, लेकिन 624 ईसा पूर्व से 560 ईसा पूर्व के बीच कुछ और तिथियों का भी उल्लेख मिलता है।

लुम्बिनी में अभी अनेक बौद्ध मठ चल रहे हैं और यह वर्तमान दक्षिणी नेपाली जिला रुपनदेही में स्थित है। यहां से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिलौराकोट को बुद्ध के समय के कपिल वस्तु की राजधानी माना जाता है। इधर कुछ रिपोर्टों में हालांकि उत्तर प्रदेश के पिपराहवा को तत्कालीन कपिलवस्तु की राजधानी बताया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के एक जिले का नाम सिद्धार्थ नगर होने और यहां लुम्बिनी तथा तिलौराकोट की अनुकृति बनाने की खबरों से नेपाल के नागरिकों को चिंता हो रही है कि इससे तीर्थयात्रियों में यह भ्रम फैल सकता है कि बुद्ध का जन्म भारत में हुआ था। ( काठमांडो-एजंसियां )

10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र

मुगल शासक जहाँगीर का आदमकद चित्र 10 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ। यह अब तक के ज्ञात बड़े मुगल चित्रों में एक है। सत्तरहवीं सदी का यह चित्र बोन्हमास इंडियन एवं इस्लामिक नीलामी घर में मंगलवार को नीलाम हुआ। स्वर्ण एवं वाटरकलर से बने इस चित्र में जहांगीर ने स्वर्णजड़ित सिंहासन पर आसीन हैं।

नीलामीघर क प्रमुख एलीस बेली ने कहा कि यह 17 वीं सदी का दुलर्भतम एवं वांछित चित्र है और इस काल का ऐसा कोई चित्र नहीं है जो नीलाम हुआ हो। इस प्रकार की कोई दूसरी कलाकृति ज्ञात नहीं है और इसके महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। यह कलाकृति मध्य पूर्व के संग्रहालय द्वारा खरीदी गई।

बेली ने कहा कि इस चित्र से के असाधारण विवरण और जटिलता दर्शकों को मोह लेती है। हम इसे बेचकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि यह 1617 के आसपास की तस्वीर है और जब जहाँगीर मांडू में थे तब इसे चित्रकार अबुल हसन ने बनाया था। ( नई दिल्ली, बुधवार, 6 अप्रैल 2011 -भाषा )

Friday, March 18, 2011

देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा

खबरों में इतिहास(भाग-12)
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा का अनावरण
२-खुदाई में मिले अवशेषों से स्पाइस रूट की पुष्टि
3-सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर
खुदाई में मिले अवशेषों से स्पाइस रूट की पुष्टि
 केरल के प्राचीन बंदरगाह शहर विझिनजम में एक खुदाई स्थल पर मिले अवशेषों से सदियों पहले बाहरी दुनिया से व्यापार के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले स्पाइट रूट की पुष्टि हुई है। इसके लिहाज से इसे यूनेस्को से धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रदेश के प्रयास को बल मिलेगा।

हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार में दो हजार सालों से केरल प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। इसके कारोबारी साझेदारों में रोमन साम्राज्य, अरब खाड़ी और सुदूर पूर्व शामिल हैं। केरल के मसालों के लिए प्राचीन दुनिया के लगाव के कारण ये व्यापारी प्रदेश में आते थे। विझिनजम का जिक्र मध्यकालीन दस्तावेजों में मिलता है। यह एक समय दक्षिण केरल में आठवीं से दसवीं सदी में एवाय राजवंश की राजधानी रहा था। केरल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के अजीत कुमार ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के राबर्ट हार्डिंग के साथ विझिनजम में खुदाई का काम शुरू किया ताकि शहर के सांस्कृतिक महत्त्व को समझा जा सके।(भाषा)।

देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा का अनावरण

सारनाथ स्थित थाई मंदिर में गांधार शैली में बनी देश की सबसे ऊंची (80 फुट) प्रतिमा का बुधवार को थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री जनरल सूरावेद चुल्लानाट ने अनावरण किया। इसके साथ ही भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि से गुंजित वातावरण में थाईलैंड के प्रमुख भिक्षु सुथी सहित एक दर्जन अनुयायियों ने दीप जलाकर पंचशील पाड्ग किया।

थाई बौद्ध विहार परिसर में बौद्ध परंपरा के मुताबिक विधिपूर्वक पूजा अर्चना की गई। उसके बाद विशाल बुद्ध प्रतिमा के सामने रखी प्रतीक छोटी प्रतिमा का पर्दा खींचकर अनावरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। जनरल चुल्लानाट ने इस मौके पर कहा कि भगवान बुद्ध की प्रतिमा भारत और थाईलैंड के बीच मैत्री का प्रतीक है। भारत गुरुभूमि है। यहीं से भिक्षु थाइलैंड गएऔर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। कई एकड़ क्षेत्र में फैले मंदिर परिसर के संस्थापक व बौद्धधर्म के प्रमुख प्रचारक भदंत शासन रश्मि का यह ड्रीम प्रोजेक्ट लगभग 14 साल में पूरा हुआ। बामियान (अफगानिस्तान) में गौतम बुद्ध की प्राचीन व विशाल प्रतिमाओं को तालिबानियों के खंडित करने से आहत होकर भदंत शासन ने इस प्रतिमा के निर्माण की परिकल्पना की थी। लगभग दो करोड़ रुाए में बनकर तैयार हुई प्रतिमा में 20 फीट ऊंची आधार स्तंभ व 60 फुट प्रतिमा की ऊंचाई है। इसके निर्माण में चार लाख 89 हजार किलोग्राम वजन के कुल 815 पत्थर लगे हैं।

बैजनाथ धाम (बिहार) निवासी शिल्पकार मोहन राउत के तैयार माडल को चुनार निवासी मूर्तिकार जीउत कुशवाहा नेकुशल कारीगरों की सहायता से विशाल बुद्ध प्रतिमा का रूप दिया। प्रसिद्ध वास्तुकार अनुराग कुशवाहा के निर्देशन में प्रतिमा की आधारशिला व तकनीकी ढ़ांचों का निर्माण हुआ, जबकि मुंबई के वरिष्ठ इंजीनियर पीपी कल्पवृक्ष के मार्गदर्शन में प्रतिमा स्थापित की गई। इस बीच पूर्व घोषणा के विपरीत प्रतिमा अनावरण के बाद मंदिर परिसर में ही भदंत शासन रश्मि का दाह संस्कार क्षेत्रीय नागरिकों के विरोध के चलते नहीं किया जा सका। 22 दिसंबर 2010 को देहांत के बाद उनके पाथर्व शरीर को उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार प्रतिमा के अनावरण तक मंदिर में रखा गया था। थाई बौद्ध विहार समिति के सचिव डा. धर्मरश्मि गौतम ने बताया कि दंत भदंत शासन रश्मि का अंतिम संस्कार कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है। उनका शव तब तक मंदिर परिसर में ही रखा जाएगा। (भाषा)।
सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर

वैज्ञानिकों को खुदाई में धरती पर मौजूद सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर का जीवाश्म मिला है। समझा जाता है कि यह धरमी पर करीब नौ करोड़ वर्ष पहले विचरण करता था। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल को इस डायनासोर का जीवाश्म अंगोला में में मिला। उनका मानना है कि इसका आकार धरती पर मौजूद आज तक के सबसे बड़े माँसाहारी डायनासोर ‘टी-रेक्स’ से भी बड़ा था। यह लंबी गर्दन वाला जीव पौधे और अन्य वनस्पति खाता था । डेली मेल के रिपोर्ट अनुसार इसे अंगोलाटाइटन एडामास्टोर नाम दिया गया है। जहाँ इसके जीवाश्म मिले हैं वह नौ करोड़ वर्ष पहले पानी के अंदर रहा होगा। समझा जाता है कि मछली और शार्क के दाँत के साथ मिले उसके अवशेष बहकर समुद्र में चले और शार्कों ने उसके टुकडे-टुकड़े कर दिए। (भाषा

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...