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Tuesday, November 3, 2009

नष्ट होने को है महान सम्राट अशोक का एक शिलालेख

     सर्वविदित है कि अशोक ने धर्म प्रचार और प्रशासन के निमित्त देश-विदेश में तमाम अभिलेख व शिलालेख खुदवाकर महत्वपूर्ण स्थलों पर रखवाए थे। तब ये शिलालेख-अभिलेख उसके सुशासन में मदद किए और कालान्तर में प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में भी इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी तरह का एक लघुलेख बिहार के कैमूर जिले में एक पहाड़ी पर अवस्खित मगर कुछ विवाद के कारण इसके नष्ट होने की आशंका पैदा हो गई है। सवाल हैदा हो गया है कि इतिहास की कड़ियों को जोड़ने वाले इस ऐतिहासिक साक्ष्य को कैसे बचाया जाए।

      बिहार में कैमूर पहाड़ी पर मौजूद है मौर्य सम्राट अशोक महान का लघु शिलालेख । ब्राह्मी लिपि में इस पर उत्कीर्ण लेख है--एलेन च अंतलेन जंबुदीपसि। इस पंक्ति का अर्थ है- जम्बू द्वीप [भारत] में सभी धर्मो के लोग सहिष्णुता से रहें। आज यह शिलालेख पहाड़ी पर वर्षो से ताले में कैद है।

      इतिहासकार, पुरातत्वविद् व पर्यटक शिलालेख को पढ़ने की चाहत में पहाड़ी पर पहुंचने के बाद वहा से निराश होकर लौटते हैं। खासकर बौद्ध पर्यटक ज्यादा निराश होते हैं। सासाराम से सटी चंदतन पीर नाम की पहाड़ी पर अशोक महान के इस शिलालेख को लोहे के दरवाजे में कैद कर दिया गया है। इस पर इतनी बार चूना पोता गया है कि इसका अस्तित्व ही मिटने को है। यह स्थल पुरातत्व विभाग के अधीन है, पर इस पर दावा स्थानीय मरकजी दरगाह कमेटी का है, कमेटी ने ही यह ताला जड़ा है।

     जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक से गुहार लगाकर थक चुके पुरातत्व विभाग ने अब इस विरासत से अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। इतिहास गवाह है कि सम्राट अशोक महान ने तीसरी शताब्दी ई. पूर्व देशभर में आठ स्थानों पर लघु शिलालेख लगाए थे। इनमें से बिहार में एकमात्र शिलालेख सासाराम में है। शिलालेख उन्हीं स्थानों पर लगाए गए थे, जहा से होकर व्यापारी या आमजन गुजरते थे। सम्राट अशोक ने यहा रात भी गुजारी थी।

   व्यूठेना सावने कटे 200506 सत विवासता। इस पंक्ति में कहा गया है कि अशोक ने जनता के दुखदर्द को जानने के लिए कुल 256 रातें महल से बाहर गुजारी थीं। पुरातत्व विभाग के अधिकारी नीरज कुमार बताते हैं कि चार वर्ष पूर्व आए कुछ बौद्ध पर्यटकों ने तत्कालीन डीएम विवेक कुमार सिंह से मिलकर बंद ताले पर विरोध जताया था। डीएम ने इस पर पुरातत्व विभाग से ब्योरा देने के लिए कहा था। रिपोर्ट मागने पर विभाग ने पूरी स्थिति स्पष्ट की थी। मई 2009 में पुरातत्व विभाग, पटना ने सासाराम के डीएम, एसपी, एसडीओ को पत्र लिखकर शिलालेख के संरक्षण की माग की थी। अफसरों ने वस्तुस्थिति का जायजा लेकर हर पक्षों को सुना था, परंतु मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। फिलहाल वहा पुरातत्व का एक बोर्ड तक नहीं है। तालाबंदी के पीछे मरकजी दरगाह कमेटी के अपने तर्क हैं। ( साभार -याहू जागरण )



इतिहास के आईने में महान सम्राट अशोक

अपने भाइयों के रक्त से रंजित मगध के सिंहासन पर आरूढ़ होकर अशोक ने अपना साम्राज्य शुरू किया था, किंतु कलिंग विजय के पश्चात इसके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया। जिसमें उसके संपूर्ण जीवन-दर्शन को बदल दिया। उसे अपनाकर वह बना ‘प्रियदर्शी’ और हृदय सम्राट-महान अशोक !
अशोक की महत्वाकांक्षा कलिंग विजय के बाद क्षत-विक्षत हो गई। इस विजय से अशोक का हृदय हिल उठा। रही-सही कसर महारानी विदिशा के उस पुत्र ने पूरी कर दी, जिसमें उसने लिखा था-‘हिंसा का मार्ग अपनाकर क्योंकि आप अपने वचन से हट गये हैं, इसलिए मैं आपका और आपकी संतान का त्याग करती हूं।’ अभी अशोक इन अघातों से उभर ही नहीं पाए थे कि उस बालभिक्षु की बातों ने, जो उसका भतीजा था- जिसके पिता की हत्या अशोक ने की थी, सम्राट के दिलो-दिमाग को बुरी तरह मथ दिया और वे भी बुद्ध की शरण में चले गए। देश-विदेश में बौद्धधर्म का प्रचार अशोक ने जिस तरह से किया, उसकी बराबरी इतिहास में नहीं मिलती। पहले संक्षेप में देखें अशोक के जीवन के घटनाक्रम जिसने खुद उनका जीनदर्शन और भारत के इतिहास को नया आयाम दिया।

अशोक (२७३ ई. पू. से २३६ ई. पू.)

     राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष लगे । इस कारण राज्यारोहण चार साल बाद २६९ ई. पू. में हुआ था । वह २७३ ई. पू. में सिंहासन पर बैठा । अभिलेखों में उसे देवाना प्रिय एवं राजा आदि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है । मास्की तथा गर्जरा के लेखों में उसका नाम अशोक तथा पुराणों में उसे अशोक वर्धन कहा गया है । सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने ९९ भाइयों की हत्या करके राजसिंहासन प्राप्त किया था, लेकिन इस उत्तराधिकार के लिए कोई स्वतंत्र प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है ।
     दिव्यादान में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी है, जो चम्पा के एक ब्राह्मण की पुत्री थी । सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार उज्जयिनी जाते समय अशोक विदिशा में रुका जहाँ उसने श्रेष्ठी की पुत्री देवी से विवाह किया जिससे महेन्द्र और संघमित्रा का जन्म हुआ । दिव्यादान में उसकी एक पत्नीस का नाम तिष्यरक्षिता मिलता है । उसके लेख में केवल उसकी पत्नी् का नाम करूणावकि है जो तीवर की माता थी । बौद्ध परम्परा एवं कथाओं के अनुसार बिन्दुसार अशोक को राजा नहीं बनाकर सुसीम को सिंहासन पर बैठाना चाहता था, लेकिन अशोक एवं बड़े भाई सुसीम के बीच युद्ध की चर्चा है ।

अशोक का कलिंग युद्ध

अशोक ने अपने राज्याभिषेक के ८वें वर्ष २६१ ई. पू. में कलिंग पर आक्रमण किया था । आन्तरिक अशान्ति से निपटने के बाद २६९ ई. पू. में उसका विधिवत्‌ अभिषेक हुआ । तेरहवें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में एक लाख ५० हजार व्यक्तिु बन्दी बनाकर निर्वासित कर दिए गये, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी । सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा । इससे द्रवित होकर अशोक ने शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार किया ।
कलिंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान परिवर्तन कर दिया । उसका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्वेलित हो गया । उसने युद्ध क्रियाओं को सदा के लिए बन्द कर देने की प्रतिज्ञा की । यहाँ से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ । उसने बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया ।
   सिंहली अनुश्रुतियों दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को अपने शासन के चौदहवें वर्ष में निगोथ नामक भिक्षु द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई थी । तत्पश्चाषत्‌ मोगाली पुत्र निस्स के प्रभाव से वह पूर्णतः बौद्ध हो गया था । दिव्यादान के अनुसार अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षुक को जाता है । अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की थी । तदुपरान्त अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की थी तथा लुम्बिनी ग्राम को करमुक्तस घोषित कर दिया था ।

अशोक एवं बौद्ध धर्म

कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्ति गत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया । अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगाली पुत्र तिष्या ने की । इसी में अभिधम्मपिटक की रचना हुई और बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया ।
दिव्यादान में उसकी एक पत्नीज का नाम तिष्यरक्षिता मिलता है । उसके लेख में केवल उसकी पत्नीी करूणावकि है । दिव्यादान में अशोक के दो भाइयों सुसीम तथा विगताशोक का नाम का उल्लेख है ।  विद्वानों अशोक की तुलना विश्वि इतिहास की विभूतियाँ कांस्टेटाइन, ऐटोनियस, अकबर, सेन्टपॉल, नेपोलियन सीजर के साथ की है ।
     अशोक ने अहिंसा, शान्ति तथा लोक कल्याणकारी नीतियों के विश्वनविख्यात तथा अतुलनीय सम्राट हैं । एच. जी. वेल्स के अनुसार अशोक का चरित्र “इतिहास के स्तम्भों को भरने वाले राजाओं, सम्राटों, धर्माधिकारियों, सन्त-महात्माओं आदि के बीच प्रकाशमान है और आकाश में प्रायः एकाकी तारा की तरह चमकता है ।" अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और साम्राज्य के सभी साधनों को जनता के कल्याण हेतु लगा दिया ।

अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित साधन अपनाये-

(अ) धर्मयात्राओं का प्रारम्भ, (ब) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्तिे, (स) धर्म महापात्रों की नियुक्तिन, (द) दिव्य रूपों का प्रदर्शन, (य) धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था, (र) लोकाचारिता के कार्य, (ल) धर्मलिपियों का खुदवाना, (ह) विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजना आदि ।
    अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार का प्रारम्भ धर्मयात्राओं से किया । वह अभिषेक के १०वें वर्ष बोधगया की यात्रा पर गया । कलिंग युद्ध के बाद आमोद-प्रमोद की यात्राओं पर पाबन्दी लगा दी । अपने अभिषेक २०वें वर्ष में लुम्बिनी ग्राम की यात्रा की । नेपाल तराई में स्थित निगलीवा में उसने कनकमुनि के स्तूप की मरम्मत करवाई । बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने साम्राज्य के उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त किया । स्तम्भ लेख तीन और सात के अनुसार उसने व्युष्ट, रज्जुक, प्रादेशिक तथा युक्त नामक पदाधिकारियों को जनता के बीच जाकर धर्म प्रचार करने और उपदेश देने का आदेश दिया । अभिषेक के १३वें वर्ष के बाद उसने बौद्ध धर्म प्रचार हेतु पदाधिकारियों का एक नया वर्ग बनाया जिसे धर्म महापात्र कहा गया था । इसका कर्य विभिन्न् धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करना था ।

अशोक के शिलालेख

अशोक के १४ शिलालेख विभिन्न लेखों का समूह है जो आठ भिन्नध-भिन्नक स्थानों से प्राप्त किए गये हैं-

(१) धौली- यह उड़ीसा के पुरी जिला में है ।

(२) शाहबाज गढ़ी- यह पाकिस्तान (पेशावर) में है ।

(३) मान सेहरा- यह हजारा जिले में स्थित है ।

(४) कालपी- यह वर्तमान उत्तरांचल (देहरादून) में है ।

(५) जौगढ़- यह उड़ीसा के जौगढ़ में स्थित है ।
(६) सोपरा- यह महराष्ट्र के थाणे जिले में है ।

(७) एरागुडि- यह आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में स्थित है ।

(८) गिरनार- यह काठियाबाड़ में जूनागढ़ के पास है ।

अशोक के लघु शिलालेख

अशोक के लघु शिलालेख चौदह शिलालेखों के मुख्य वर्ग में सम्मिलित नहीं है जिसे लघु शिलालेख कहा जाता है । ये निम्नांकित स्थानों से प्राप्त हुए हैं-

(१) रूपनाथ- यह मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में है ।

(२) गुजरी- यह मध्य प्रदेश के दतुया जिले में है ।

(३) भबू- यह राजस्थान के जयपुर जिले में है ।

(४) मास्की- यह रायचूर जिले में स्थित है ।

(५) सहसराम- यह बिहार के शाहाबाद जिले में है ।
     धम्म को लोकप्रिय बनाने के लिए अशोक ने मानव व पशु जाति के कल्याण हेतु पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । राज्य तथा विदेशी राज्यों में भी मानव तथा पशु के लिए अलग चिकित्सा की व्य्वस्था की । अशोक के महान पुण्य का कार्य एवं स्वर्ग प्राप्ति का उपदेश बौद्ध ग्रन्थ संयुक्त निकाय में दिया गया है ।
अशोक ने दूर-दूर तक बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु दूतों, प्रचारकों को विदेशों में भेजा अपने दूसरे तथा १३वें शिलालेख में उसने उन देशों का नाम लिखवाया जहाँ दूत भेजे गये थे । दक्षिण सीमा पर स्थित राज्य चोल, पाण्ड्या, सतिययुक्तर केरल पुत्र एवं ताम्रपार्णि बताये गये हैं ।

अशोक के अभिलेख

अशोक के अभिलेखों में शाहनाज गढ़ी एवं मान सेहरा (पाकिस्तान) के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं । तक्षशिला एवं लघमान (काबुल) के समीप अफगानिस्तान अभिलेख आरमाइक एवं ग्रीक में उत्कीर्ण हैं । इसके अतिरिक्त् अशोक के समस्त शिलालेख लघुशिला स्तम्भ लेख एवं लघु लेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं । अशोक का इतिहास भी हमें इन अभिलेखों से प्राप्त होता है ।
अभी तक अशोक के ४० अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं । सर्वप्रथम १८३७ ई. पू. में जेम्स प्रिंसेप नामक विद्वान ने अशोक के अभिलेख को पढ़ने में सफलता हासिल की थी ।
रायपुरबा- यह भी बिहार राज्य के चम्पारण जिले में स्थित है ।
प्रयाग- यह पहले कौशाम्बी में स्थित था जो बाद में मुगल सम्राट अकबर द्वारा इलाहाबाद के किले में रखवाया गया था ।

अशोक के लघु स्तम्भ लेख

सम्राट अशोक की राजकीय घोषणाएँ जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं उन्हें लघु स्तम्भ लेख कहा जाता है जो निम्न स्थानों पर स्थित हैं-

१. सांची- मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में है ।

२. सारनाथ- उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में है ।

३. रूभ्मिनदेई- नेपाल के तराई में है ।

४. कौशाम्बी- इलाहाबाद के निकट है ।

५. निग्लीवा- नेपाल के तराई में है ।

६. ब्रह्मगिरि- यह मैसूर के चिबल दुर्ग में स्थित है ।

७. सिद्धपुर- यह ब्रह्मगिरि से एक मील उ. पू. में स्थित है ।

८. जतिंग रामेश्वैर- जो ब्रह्मगिरि से तीन मील उ. पू. में स्थित है ।

९. एरागुडि- यह आन्ध्र प्रदेश के कूर्नुल जिले में स्थित है ।

१०. गोविमठ- यह मैसूर के कोपवाय नामक स्थान के निकट है ।

११. पालकिगुण्क- यह गोविमठ की चार मील की दूरी पर है ।

१२. राजूल मंडागिरि- यह आन्ध्र प्रदेश के कूर्नुल जिले में स्थित है ।

१३. अहरौरा- यह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित है ।

१४. सारो-मारो- यह मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्थित है ।

१५. नेतुर- यह मैसूर जिले में स्थित है ।

अशोक के गुहा एवं स्तम्भ लेख

दक्षिण बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक तीन गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण प्राप्त हुए हैं । इन सभी की भाषा प्राकृत तथा ब्राह्मी लिपि में है । केवल दो अभिलेखों शाहवाजगढ़ी तथा मान सेहरा की लिपि ब्राह्मी न होकर खरोष्ठी है । यह लिपि दायीं से बायीं और लिखी जाती है ।
तक्षशिला से आरमाइक लिपि में लिखा गया एक भग्न अभिलेख कन्धार के पास शारे-कुना नामक स्थान से यूनानी तथा आरमाइक द्विभाषीय अभिलेख प्राप्त हुआ है ।



अशोक के स्तम्भ लेख

अशोक के स्तम्भ लेखों की संख्या सात है जो छः भिन्नन स्थानों में पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण पाये गये हैं । इन स्थानों के नाम हैं-

(१) दिल्ली तोपरा- यह स्तम्भ लेख प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पाया गया था । यह मध्य युगीन सुल्तान फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया । इस पर अशोक के सातों अभिलेख उत्कीर्ण हैं ।

(२) दिल्ली मेरठ- यह स्तम्भ लेख भी पहले मेरठ में था जो बाद में फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया ।

(३) लौरिया अरराज तथा लौरिया नन्दगढ़- यह स्तम्भ लेख बिहार राज्य के चम्पारण जिले में है ।

विराट नगर में अशोक के शिलालेख

राजस्थान के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने महाभारतकालीन विराटनगर में पहाड़ी चट्टान पर उत्कीर्ण सम्राट अशोक धर्मलेख को संरक्षित स्मारक घोषित किया है। जयपुर जिले के विराटनगर में भीम की डूँगरी के तले एक स्वतंत्र चट्टान पर यह धर्मलेख मौजूद है। इसके निकट ही अकबरी दरवाजा या मुगल गेट है, जिसमें मुगल कालीन भिति चित्रकारी है। कुछ माह पूर्व ही इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। पानी इत्यादि से सुरक्षा के उपायों के साथ ही इसके निकट एक दरवाजा लगाया गया है। इस चट्टान पर उत्कीर्ण आलेख को हिंदी और अंग्रेजी में अनूदित करके एक पृथक पट्ट भी शीघ्र लगाया जाएगा। अभी तक यह शिलालेख केन्द्र या राज्य सरकार की ओर से संरक्षित नहीं था। शिरोरेखाविहीन ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण एवं पाली भाषा में लिखित इस अभिलेख में आठ पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इसमें सम्राट प्रियदर्शी अशोक ने अपने बारे में कहा है 'अढ़ाई वर्ष से अधिक हुए हैं, मैं उपासक हुआ।' दरअसल यह धर्मलेख सम्राट अशोक के रूपनाथ एवं सहसराम लेख का विराटनगर संस्करण माना जाता है।

    वर्ष 1871-72 में कारलायल ने अपनी शोधयात्रा के दौरान इस शिलालेख को खोज निकाला था। बीच में पर्याप्त घिसा हुआ होने के कारण कारलायल ने भ्रमवश इसे दो भिन्न लेखों के रूप में मान लिया, लेकिन कालांतर में कनिघम ने इसका निराकरण कर दिया। ऐतिहासिक विराटनगर में अशोक महान के दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं। राजस्थान में प्राप्त यह प्राचीनतम अभिलेख बौद्ध धर्म के इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपने जमाने में विराटनगर की बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र के नाते पहचान थी।

भारत में ब्रिटिशकाल में कैप्टन बर्ट ने 1837 में विराटनगर से 12 मील उत्तर में स्थित भाब्रू गाँव से सम्राट अशोक का अभिलेखयुक्त शिलाफलक खोजा था। इसका आकार दो फुट गुणा दो फुट गुणा डेढ़ फुट है। यह माना जाता है कि मूलतः शिलाफलक बीजक की पहाड़ी से मिला था, जो कालांतर में भाब्रू पहुँच गया। बाद में यह सम्राट अशोक के भाब्रू बैराठ कोलकाता अभिलेख के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह कोलकाता में बंगाल एशियाटिक सोसायटी के भवन में जेम्सप्रिंसेप की मूर्ति के सामने लगा हुआ है।

अशोक ने इस अभिलेख के आरंभ में बौद्ध धर्म के त्रिरत्न बुद्ध धर्म और संघ में अपनी निष्ठा का उल्लेख किया है। सम्राट ने गर्व के साथ यह भी घोषणा की है कि भगवान बुद्ध ने जो कुछ कहा है, वह सब अच्छा ही कहा है। अभिलेख में बौद्ध धर्म के सात उद्धरणों के नाम भी गिनाए हैं।
राजस्थान के जयपुर जिले में शाहपुरा से 25 किलोमीटर दूर विराटनगर कस्बा अपनी पौराणिक ऐतिहासिक विरासत को आज भी समेटे हुए है। यह स्थल राजा विराट के मत्स्य प्रदेश की राजधानी के रूप में विख्यात था। यही पर पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय व्यतीत किया था। महाभारत कालीन स्मृतियों के भौतिक अवशेष तो अब यहां नहीं रहे किंतु यहां ऐसे अनेक चिन्ह हैं जिनसे पता चलता है कि यहां पर कभी बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाय के अनुयायियों का विशेष प्रभाव था। विराट नगर, जिसे पूर्व में वैराठ के नाम से भी जाना जाता था, के दक्षिण की ओर बीजक पहाड़ी है।विराट नगर की बुद्ध-धाम बीजक पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक चट्टान है जिस पर भब्रू बैराठ शिलालेख उत्कीर्ण है। इसे बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों के अलावा आम लोग भी पढ़ सकते थे। इस शिलालेख को भब्रू शिलालेख के नाम से भी जाना जाता था। यह शिलालेख पाली व ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ था।

    इसे सम्राट अशोक ने स्वयं उत्कीर्ण करवाया था ताकि जनसाधारण उसे पढ़कर तदनुसार आचरण कर सके। इस शिला लेख को कालान्तर में 1840 में ब्रिटिश सेनाधिकारी कैप्टन बर्ट द्वारा कटवा कर कलकत्ता के संग्रहालय में रखवा दिया गया। आज भी विराटनगर का यह शिलालेख वहां सुरक्षित रखा हुआ है। इसी प्रकार एक और शिला लेख भीमसेन डूंगरी के पास आज भी स्थित है। यह उस समय मुख्य राजमार्ग था।

    बीजक की पहाड़ी पर बने गोलाकार मन्दिर के प्लेटफार्म के समतल मैदान से कुछ मीटर ऊंचाई पर पश्चिम की तरफ एक चबूतरा है जिसके सामने भिक्षु बैठकर मनन व चिन्तन करते थे। यहीं पर एक स्वर्ण मंजूषा थी जिसमें भगवान बुद्ध के दो दांत एवं उनकी अस्थियां रखी हुई थीं। अशोक महान बैराठ में स्वयं आए थे। यहां आने के पहले वे 255 स्थानों पर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार कर चुके थे। बैराठ वर्षों तक बुद्धम् शरणम् गच्छामी, धम्मम् शरणम् गच्छामी से गुंजायमान रहा है।
अशोक ने बनवाया बोधगया का पहला मंदिर

महाबोधि मंदिर परिसर भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित चार पवित्र स्थलों में से एक और विशेष रूप से उनके बुद्धत्व की प्राप्ति का स्थल है. पहला मंदिर सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व 3 री शताब्दी में बनवाया था, और वर्तमान मंदिर 5 वीं से 6 वीं शताब्दी का है. यह भारत में पूर्ण रूप से ईंटों से बने शुरुआती बौद्ध मंदिरों में से एक है, यह गुप्त काल के अंतिम समय का है और आज भी विद्यमान है.

अभिलेख की प्रामाणिकता

मापदंड (i): विशाल 50 मीटर ऊँचा महाबोधि मंदिर 5 वीं से 6 ठी शताब्दी का है, और भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद प्राचीनतम मंदिरों में से एक है. यह मंदिर उस युग में ईंट से बने पूर्ण रूप से विकसित मंदिरों के भारतीय स्थापत्य की निपुणता के कुछ उदाहरणों में से एक है.
मापदंड (ii) महाबोधि मंदिर, भारत के ईंट से बने शुरुआती मंदिरों में से बचे हुए मंदिरों में से एक है, शताब्दियों तक स्थापत्य के विकास में इसका बहुत प्रभाव रहा है. मापदंड (iii) महाबोधि मंदिर स्थल बुद्ध के जीवन और उसके बाद, सम्राट अशोक ने पहला मंदिर, जंगला और स्मारक स्तंभ बनाया तब से पूजा से संबंधित घटनाओं का अभिलेख है.

मापदंड (iv) वर्तमान मंदिर प्राचीनतम में से एक हैं और गुप्त काल के उत्तराद्ध में पूरी तरह से ईंट की बनी सबसे प्रभावशाली संरचना है. तराशा गया पत्थर का जंगला पत्थर में शिल्प का प्रारंभिक उत्कृष्ट उदाहरण है.

मापदंड (vi) बोधगया का महाबोधि मंदिर परिसर का भगवान बुद्ध के जीवन से सीधा संबंध है, यही वह स्थान भी है जहाँ उन्होंने बुद्धत्व को प्राप्त किया था.
 
नेपाल के बौद्धस्तूप



भारतीय कैलेंडर की विकास यात्रा


प्राचीन भारत की झलक


धूमधाम से मनी सम्राट अशोक जयंती


बिहार और अशोक


इतिहास के पन्नों में बिहार


सफलता और उद्यम – अशोक का शिलालेख


इंस्क्रिप्‍शन्‍स ऑफ अशोक


Ashoka the Great


सम्राट अशोक



  

Tuesday, October 27, 2009

सात पुरियों में से एक है अयोध्या




    भारतवर्ष की प्राचीन सात पुरियों में से एक अयोध्या है। सात पुरियों की गणना इस प्रकार की जाती है।1. अयोध्या पुरी 2. मथुरा पुरी 3. माया पुरी 4. काशी पुरी 5. कांची पुरी 6.अवंतिकापुरी 7. द्वारिका पुरी । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि सभी का हमारे सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इनमें से अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि के संदर्भ में जानी जाती है हालाकि इस विषय को लेकर राजनैतिक विवाद जारी है। मैं यहां किसी संप्रदायिक या राजनैतिक विवाद की चर्चा नहीं कर रहा हूं बल्कि अयोध्या के बारे में ही कुछ कहना चाहता हूं। कुछ प्चलित कथाएं हैं अयोध्या के बारे में। हालाकि इनके भी साक्ष्य हमारे पौराणिक साहित्य में उपलब्ध हैं। आइए इन कथाओं के माध्य से अयोध्या को जानने की कोशिश करते हैं।




कब और किसने बसाया अयोध्या को ?

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, अयोध्यापुरी को मनु ने बसाया था, जबकि स्कंदपुराण कहता है कि यह नगरी विष्णु के सुदर्शन चक्र पर बसी है। कुछ मतों के अनुसार, अयोध्या श्रीरामचंद्र के धनुष के अग्रभाग पर स्थित है। कथा है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम पृथ्वी पर लीला समाप्ति के बाद समस्त अयोध्यावासियों को निज धाम ले गए। अयोध्या वीरान हो गई। बाद में श्रीराम के पुत्र कुश ने इसे फिर से बसाया। कहते हैं कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पटरानी रुक्मिणी के साथ अयोध्या आए थे। उनके नाम पर बना कुंड आज भी 'रुक्मिणी कुंड' के नाम से जाना जाता है।



विक्रमादित्य ने किया पुनरोद्धार



कलियुग में अयोध्या के पुनरोद्धार का श्रेय उज्जायिनी के राजा विक्रमादित्य को जाता है। मान्यता है कि एक बार उनके मन में भावना उठी कि हम सूर्यवंशी है, श्रीरामचंद्रजी की जन्मभूमि का पता लगाना चाहिए। एक दिन प्रात:काल सरयू नदी के किनारे उन्होंने देखा कि श्यामवर्ण का एक पुरुष काले रंग के घोड़े पर सवार होकर आया और उसने सरयू में डुबकी लगा दी। जब वह घुड़सवार सरयू से बाहर आया, तो वह गौरवर्ण तथा उसका घोड़ा सफेद रंग का दिखा। मान्यता है कि उन्होंने घुड़सवार से उसका परिचय पूछा, तो वह अश्वारोही बोला, 'मैं तीर्थराज प्रयाग हूं। पापियों के पाप धोते-धोते कलुषित हो जाता हूं। सरयू और अयोध्यापुरी के प्रताप से मैं पापों से मुक्त होकर वास्तविक स्वरूप में आ जाता हूं।' प्रयागराज ने उन्हे रामजन्मभूमि की खोज के लिए काशी जाने का परामर्श दिया। काशी पहुंचकर विक्रमादित्य अन्न-जल त्यागकर विश्वनाथ मंदिर के द्वार पर बैठ गए। विक्रमादित्य का संकल्प देखकर विश्वनाथ बूढ़े ब्राह्मण के वेश में आकर बोले- 'राजा! तुम यह गऊ और पोथी लेकर अयोध्या जाओ, जहां गऊ के थन से स्वत: दूध गिरेगा, उसे ही श्रीरामचंद्र की जन्मभूमि समझना। इसके बाद इस पोथी के आधार पर अयोध्या के प्राचीन स्थलों का पुनरोद्धार करना।'





मंदिर का निर्माण



अयोध्या में जिस स्थान पर गाय का दूध स्वत: थनों से बहने लगा, वहां विक्रमादित्य ने सुंदर मंदिर बनवाया, जिसमें एक भव्य शालिग्राम शिला पर श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सहित हनुमानजी की स्थापना की। 84 कसौटी के स्तंभों पर निर्मित 7 कलशों वाले श्रीरामजन्मभूमि मंदिर को 1528 में यवनों की सेना ने ध्वस्त कर दिया। उस समय श्रीराम-पंचायतन के विग्रह वाली शिला को सरयू में प्रवाहित कर दिया गया। कहा जाता है कि 1748 में महाराष्ट्रियन ब्राह्मण श्रीनरसिंहराव मोघे को लक्ष्मण घाट पर श्रीराम-पंचायतन शिला प्राप्त हुई। इसे उन्होंने अयोध्या के स्वर्गद्वार पर मंदिर बनवाकर बैठाया। एक ही शालिग्राम शिला पर सम्पूर्ण राम-पंचायतन बने होने के कारण यह देवालय 'श्रीकालेराम मंदिर' के नाम से विख्यात हो गया।



रामदूत बने क्षेत्राधिकारी



किंवदंतियों के अनुसार, जब श्रीरामचंद्र अयोध्यावासियों के साथ निजधाम जाने लगे, तो उन्होंने हनुमानजी को अयोध्या की सम्पूर्ण व्यवस्था सौंप दी। हनुमानगढ़ी में उनका दर्शन करके भक्त कृतार्थ हो जाते है।



प्रमुख तीर्थस्थल



सोने से बना कनक भवन सीताजी को कैकेयी माता ने मुंह-दिखाई में दिया था। वर्तमान भवन ओरछा स्टेट द्वारा बनवाया गया है। यहां युगल सरकार का दर्शन करके तीर्थयात्री कृतार्थ हो जाते हैं। इसके पास ही मत्तागजेन्द्रजी का स्थान है, जो विभीषणजी के पुत्र है। यहां से उत्तार में सप्तसागरतीर्थ है। पूर्वी भाग में अयोध्या की अधिष्ठात्री 'छोटी देवकाली' प्रतिष्ठित है। जन्मभूमि के निकट सीता रसोई एवं अग्निकोण में सीता कूप है। आगे रत्न सिंहासन मंदिर है। अयोध्या में गरुड़ द्वारा लाया गया मणि पर्वत है। अयोध्या के स्वर्गद्वार पर किया गया जप-तप, स्नान-दान, हवन, पूजा-पाठ अक्षय फलदायक होता है। सरयू में सहस्त्रधारा तीर्थ और लक्ष्मण टीले पर लक्ष्मण किला है। कार्तिक-शुक्ल-नवमी (अक्षय नवमी), देवोत्थान एकादशी और रामनवमी के दिन श्रद्धालु अयोध्या की परिक्रमा करते है। उत्तार प्रदेश के फैजाबाद जिले में स्थित अयोध्या की यात्रा रेल और सड़क मार्ग से आसानी से की जा सकती है। [साभार-अतुल टण्डन-याहू जागरण]



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अयोध्या-१
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Friday, September 25, 2009

कैसे बचेगा मथुरा का राधामाधव मंदिर ?

प्राचीन और मंदिरों के शहर के नाम से मशहूर मथुरा विभिन्न प्राचीन व्यापारिक मार्गों का केंद्र था। यहीं से पश्चिम एशिया के रोमन साम्राज्य, उत्तर में तक्षशिला पुष्कलावती और पुरूषपुर व मध्य एशिया चीन को जोड़ने वाला सिल्क रूट के रास्ते गुजरते थे। पांचवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी गौतम बुद्ध के समय यह महानगर बन चुका था। कुषाणों के समय में तो इसने अपना स्वर्णयुग भी देखा। तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में महान सम्राट अशोक से लेकर चाथी शताब्दी में गुप्त राजाओं के शासनकाल तक यह प्रमुख आर्थिक केंद्र बना रहा। आज के आधुनिक भारत में भी इसे देश के प्रमुख धार्मिक नगर का सम्मान हासिल है। मंदिरों का शहर वृंदावन यहीं से सिर्फ १५ किलोमाटर दूर यमुना के किनारे अवस्थित है जहां हर साल कम से कम पांच लाख पर्यटक और श्रद्धालु आते हैं।




इसी वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में एक है राधामाधव मंदिर। इसे जयपुर मंदिर भी कहते हैं। इसे जयपुर के महाराजा सवाई माधव ने १९१७ में बनवाया। इसे बनवाने में ३० साल लग गए। हाथ से नक्काशी किए हुए इस मंदिर में प्रयुक्त पत्थर कला के बेजोड़ नमूने हैं। इसमें राधा-माधव, आनंद बिहारी और हंस गोपाल की पूजा की जाती है।

कई स्वयंसेवी संस्थाएं आजकल वृंदावन में ‘राधा माधव मंदिर’ पर आंखें गड़ाए बैठी हैं। राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के अधीन उत्तर भारत के इस नायाब और कलात्मक मंदिर को हथियाने की दौड़ में एक फाउंडेशन सबसे आगे है। संस्था के ट्रस्टी सदस्यों के रूप में देशी और विदेशी उद्योगपति भी हैं। राजस्थान सरकार के अधिकारी अरबों रुपए की बेशकीमती संपत्ति को इस फाउंडेशन की सुपुर्दगी में देने के लिए मानों तैयार बैठे हैं।

जानकारी के मुताबिक मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, राधाकुंड आदि स्थानों पर राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के नियंत्रण में डेढ़ दर्जन मंदिर और उनसे जुड़ी अरबों रुपए की बेशकीमती जमीन है। इन सबके रखरखाव आदि की व्यवस्था के लिए वृंदावन के राधामाधव मंदिर परिसर में देवस्थान विभाग का दफ्तर है।

सहआयुक्त के दफ्तर के छोटे-बड़े कर्मचारी-अफसरों को राजस्थान के महाराजाओं द्वारा बड़े जतन से बनवाए गए मंदिरों की संपत्ति को गलत हाथों में जाने से बचाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। ब्रज में फैली पड़ी इस संपत्ति में वृंदावन का राधा माधव मंदिर स्थापत्य कला का अपूर्व नमूना है। इसे जयपुर के राजा सवाई माधव सिंह ने 1917 में बनवाया था। 56 एकड़ भूमि में बने इस मंदिर को पूरा होने में तीस साल लगे। भूर पत्थर के इस कलात्मक मंदिर में 66 कमरे, आठ हाल, 26 बरामदे व अनेक बगीचे हैं। वृंदावन के इस किलेनुमा मंदिर में सतरंगी इटेलियन संगमरमर की पच्चीकारी की हुई है। मंदिर के निर्माण के वक्त राजस्थान से पत्थर लाने के लिए राजा ने पंद्रह किलोमीटर लंबी मीटर गेज की रेल लाइन बिछवाई थी जो आज भी मौजूद है।

इतनी शानदार संपत्ति पर थोड़े ही समय पहले भरतपुर की एक न्यास ने दांत गड़ाए थे। राजस्थान सरकार और देवस्थान विभाग के आला अफसरों की मिलीभगत से राधा माधव मंदिर को न्यास को सौंपने की पूरी तैयारी कर ली गई थी लेकिन वृंदावन के नेताओं और जनता के हो-हल्ला मचाने पर सुपुर्दगी की कार्यवाही लटक गई। इसके बाद वृंदावन के ऊंचे रसूख वाले धर्माचार्यों ने इस मंदिर को अपनी सेवा में लेने की लिखा पढ़ी की। लेकिन उन्हें भी कामयाबी नहीं मिली। अब उक्त फाउंडेशन ने इसे हथियाने के लिए कमर कसी है। फाउंडेशन के स्थानीय कर्ताधर्ता एक पूर्व पत्रकार हैं। उन्होंने अपने संपर्कों से राजस्थान के मुख्य सचिव से तार जोड़ा। सूत्रों के मुताबिक देवस्थान विभाग के आला अधिकारी भी फाउंडेशन के हक में झुके नजर आते हैं। लेकिन वृंदावन स्थित देवस्थान विभाग का दफ्तर इस सुपुर्दगी को एकदम गलत ठहराता है। दफ्तर के सहआयुक्त ने अपने 21.4.2009 के पत्र से राजस्थान सरकार को अवगत कराया है कि मंदिर के आसपास 806099 वर्ग फीट खाली जमीन है जिसका वर्तमान मूल्य कई अरब रुपए है। मंदिर में विभाग द्वारा नियुक्त तीन पुजारी विधिवत निम्बार्क संप्रदाय के अनुसार पूजा पाठ कर रहे हैं और इसके रखरखाव में किसी प्रकार की बाधा नहीं आ रही है। उन्होंने लिखा है कि मंदिर की सुपुर्दगी के लिए भूमाफिया किस्म के व्यक्ति व संस्थाएं आवेदन करती रही हैं। उनकी नजर मंदिर की खाली पड़ी जमीन पर है। अगर किसी संस्था की सुपुर्दगी में मंदिर दिया जाता है तो इसे वापस लेना संभव नहीं होगा। इसके अलावा यह फाउंडेशन राजस्थान सार्वजनिक प्रन्यास अधिनियम 1959 के तहत पंजीकृत नहीं है। लिहाजा इस मंदिर को किसी भी संस्था की सुपुर्दगी में दिया जाना उचित नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक सहआयुक्त की इस रिपोर्ट को देवस्थान विभाग ने गंभीरता से नहीं लिया। मजेदार बात यह है कि राजनेताओं और अफसरों के वरदहस्त वाले उद्योगपतियों के फाउंडेशन ने उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर देवस्थान विभाग के मंदिरों को सुपुर्द करने की एक अन्य चिट्ठी राजस्थान सरकार को दी है।
  राधा माधव मंदिर के पास गौशाला चलाने वाले श्रीपाद बाबा के शिष्य बाबा दामोदर ने बताया कि वे चर्चित फाउंडेशन के कार्यकलापों से परिचित हैं। यदि राजस्थान सरकार ने राधा माधव मंदिर को निजी हाथों में सौंपा तो वे अनशन पर बैठेंगे। बाबा दामोदर ने फाउंडेशन के क्रियाकलापों की जानकारी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर दी है। (साभार-जनसत्ता)

Wednesday, August 26, 2009

कोलकाता और जाब चार्नाक

पूर्वी भारत कभी व्यापार और रोजगार का ऐसा केंद्र था जो देश विदेश के हर कोने से लोगों को यहां बरबस खींच लाता था। बंगाल में प्राचीन ताम्रलिप्ति बंदरगाह (जहां अब पश्चिम बंगाल का तमलुक शहर है)रोमांचक समुद्री यात्रा के लिए और कर्ण सुवर्ण (पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अब रांगामाटी जगह) व्यवसायियों की खातिर पड़ाव भी थी। चीनी यात्री फाहियान भी यहां से गुजरा था। उसी दौर से लेकर पाल शासकों की कर्मभूमि होने और भक्ति आंदोलन के युगपुरुष चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस व विवेकानंद की तपोभूमि बनने से मुगलों के बाद अंग्रेजों के शासन तक यह बंगाल और उसका प्रमुख शहर कोलकाता तमाम किंवदन्तियों से जुड़ गया। कोलकाता शहर का भद्र बंगाली समाज और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक चमक ने हर किसी को लुभाया। यहां के जादू-टोनों से लेकर रहन-सहन, परिधान और बंगाली बाबुओं के किस्से देश के कोने-कोने में लोग अपने रोचक संस्मरणों के तौर पर सुनाते हैं। कुल मिलाकर लोगों के जेहन में अजूबा शहर कोलकाता बसा हुआ है। अंग्रेजी शासन और आजादी के आंदोलनों के दौर के किस्से तो देश की हर भाषा-साहित्य में दर्ज भी हैं। यानी किस्सागोई से बिरहगीतों के मर्म और आजादी की लड़ाई के पराक्रम से नक्सलबाड़ी आंदोलन तक बंगाल और कोलकाता लोगों की मन:स्थिति को आंदोलित करता रहा है। लोगों के जेहन में बसी उन्हीं पुरानी यादों का कोलकाता फिर अचानक चर्चा का विषय तब बन गया जब इतिहास की नई खोजों ने जाब चार्नाक को कोलकाता का संस्थापक मानने से िनकार कर दिया। लोगों के उसी सपनों के शहर कोलकाता की बुनियाद पर इतिहासकारों ने कुछ सवाल खड़े किए हैं। सवाल शहर की उस खासियत पर तो नहीं जो लोगों के जेहन में है, बल्कि शहर के प्रादुर्भाव और उसके संस्थापक समझे गए जाब चार्नाक पर उठाए गए हैं।
करीब तीन सौ साल से भी पुराने पूर्वी भारत के सबसे आलीशान शहर कोलकाता के संस्थापक का गौरव हासिल किए ईस्ट इंडिया कंपनी के सौदागर जाब चार्नाक को ‘संस्थापक’ के सम्मान से बेदखल कर दिया गया है। बंगाल के इतिहास ने फिर करवट ली और इतिहास के कई पूर्व मान्य तथ्य झूठे साबित कर दिए गए। इस बार किसी शासक ने नहीं बल्कि अदालत ने फेरबदल किए। कोलकाता हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने १६ मई २००३ को ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि कोलकाता शहर का संस्थापक जाब चार्नाक नहीं था। इस फैसले के साथ ही न्यायमूर्ति एके माथुर और न्यायमूर्ति जेके विश्वास की खंडपीठ ने यह आदेश भी दिया कि इतिहास के पाठ्यक्रम में अब यह सुधार भी करना होगा। जाब चार्नाक विवाद पर अदालती हस्तक्षेप की जरूरत तब पड़ी जब कोलकाता महानगर के बेहला इलाके के सबरन रायचौधरी परिवार परिषद ने अदालत में एक जनहित चुनौती याचिका दायर करके बंगाल सरकार, नगर निगम, सूतानती परिषद, राज्य की शैक्षणिक संस्थाएं वगैरह को २४ अगस्त को कोलकाता का जन्म दिन नहीं मनाने का आदेश देने की अपील की। इसके बाद सरकार के निर्देश पर पांच इतिहासकारों की विशेषज्ञ समिति को इस विवाद पर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया। इतिहासकार निमाई साधन बोस की अगुवाई में पांच इतिहासकारों की समिति ने पिछले साल नवंबर में ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इस नई खोज को पश्चिम बंगाल सरकार के महाधिवक्ता बलाई राय की मंजूरी के बाद अदालत ने इसके प्रमाणिक होने की पुष्टि भी कर दी है।
इस नई अवधारणा के पहले इतिहास का मान्य तथ्य यह था कि जाब चार्नाक ने कोलकाता की स्थापना २४ अगस्त १६९० को तत्कालीन जमींदार सबरन रायचौधरी परिवार से तीन गांव सूतानती, गोबिंदपुर व कोलिकत्ता को खरीदकर की थी। मशहूर इतिहासकार सीआर विल्सन ने अपनी पुस्तक ‘ओल्ड फोर्ट विलियम इन बंगाल’ में लिखा है कि- ‘जाब चार्नाक ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यवसायी और हुगली नदी के किनारे स्थित एक कोठी का मुखिया था। शाइस्ता खां के बाद जब इब्राहिम खां मुगलों का बंगाल में सूबेदार बना तो उसके आमंत्रण पर जाब चार्नाक ने वह स्थान चुना जहां २४ अगस्त १६९० को कोलकाता नगरी की नींव पड़ी। अगले वर्ष उसको नवाब का फरमान मिला कि तीन हजार रुपए सालाना रकम देने पर अंग्रेजों के माल पर चुंगी मांफ कर दी जाएगी। इस प्रकार जाब चार्नाक ने तत्कालीन बंगाल में कलकत्ता महानगरी और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राज का शिलान्यास किया।’ इस पूर्व मान्यता के अनुसार कोलकाता शहर को हुगली के किनारे बसे तीन गांवों सूतानुती, गोबिंदपुर, कोलिकत्ता को मात्र १२०० रुपए में हासिल करके जाब चार्नाक ने बसाया। इन गांवों का ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम पट्टा जाब चार्नाक ने सबरन रायचौधरी परिवार से कराया जिसपर जाब चार्नाक के साले चार्ल्स आयर और सबरन रायचौधरी परिवार के एक सदस्य के हस्ताक्षर हैं।
पूर्वी भारत में व्यापार के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी और जाब चार्नाक को यह सुरक्षित व स्थायी ठिकाना मिलना बड़ी उपलब्धि थी। योरोप से एशिया तक व्यापार के लिए अग्रसर अंग्रेज व्यापारियों के लिए सूरत, मुंबई और मद्रास के बाद पूर्वी भारत में सूतानती एक ऐसा केंद्र मिल गया जहां ईस्ट इंडिया कंपनी के नुमाइंदे व्यापार के लिहाज से कारखाने खोले और बाद में फोर्ट विलियम की किलेबंदी करके अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल हुए। ईस्ट इंडिया कंपनी के पूर्वी भारत में यह नया कारखाना खोलने का जश्न २४ अगस्त १६९० को जाब चार्नाक ने हुगली के किनारे कंपनी का झंडा फहराकर मनाया। इतिहास में यही तारीख कोलकाता के जन्म दिन के रूप में दर्ज हो गई और जाब चार्नाक को भी इस शहर के संस्थापक का दर्जा मिल गया।
इस लेख में कलकत्ता की जगह कोलकाता का प्रयोग किया जा रहा है इस लिए यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि पहले इस शहर का नाम कलकत्ता ही था जिसे बदलने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार मार्च २००२ में एक विधेयक लाई और नया नाम कोलकाता प्रयोग में लाने का निर्देश दिया। यह अध्यादेश पहली जून २००२ से लागू हो गया। अब यहां के दस्तावेजों में भी परिवर्तन कर लिए गए हैं। मसलन कलकत्ता नगर निगम अब कोलकाता नगर निगम और कलकत्ता पुलिस अब कोलकाता पुलिस के नाम से जानी जाती है।
अब नई खोजों ने कोलकाता के स्थापना दिवस मनाने के उत्साह को ठंडा कर दिया है। इसके पहले हर साल २४ अगस्त को कोलकाता का ३१४वां जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता था। अब इतिहास की नई खोजों ने जाब चार्नाक को कोलकाता का संस्थापक मानने और २४ अगस्त को जन्मदिन मनाने से वंचित कर दिया है। मशहूर इतिहासकार निमाई बोस, सेंटर फार स्टडीज इन सोशल साइंसेज के पूर्व निदेशक प्रोफेसर बरुण दे, अरुण कुमार दासगुप्ता और दिलीप सिन्हा ने नौ पेज की अपनी रिपोर्ट में कोलकाता शहर की स्थापना के जो नए सिध्दांत प्रतिपादित किए हैं उसके मुताबिक कोलकाता अचानक शहर नहीं बना। सत्रहवीं शताब्दी के आखिर तक यह गावों के कई समूहों के विकसित होकर कस्बे में बदलने के बाद शहर में तब्दील हुआ। इसी आधार पर इन इतिहासकारों की राय है कि कोलकाता का न तो कोई एक जन्मदिन और न ही कोई एक संस्थापक निर्धारित हो सकता है। इसके अलावा इन इतिहासकारों का यह भी तर्क है कि जाब चार्नाक ने कोलकाता जैसे किसी शहर का २४ अगस्त १६९० को शिलान्यास नहीं किया था। खुद भी १६९३ ई. में मर गया। जाब चार्नाक के संस्थापक न मानने का सबसे मजबूत साक्ष्य इन इतिहासकारों ने पेश किया है कि जाब चार्नाक ने कभी अपने पत्रों में कोलकाता नाम का जिक्र नहीं किया। वह अपने पत्रों में इस जगह का नाम सूतानुती लिखा करता था। अर्थात् जाब चार्नाक के दिमाग में उस वक्त कोई शहर बसाने की बजाए सिर्फ एक सुरक्षित व्यापारिक केंद्र बनाने की ही योजना रही होगी। बावजूद इसके नई अवधारणा प्रतिपादित करने वाले ये इतिहासकार भी इस बात को मानते हैं कि कोलकाता के शहर के रूप में विकसित होने में जाब चार्नाक की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
जहां तक कोलकाता की प्राचीनता का सवाल है तो यह नाम ५०० साल से ज्यादा पुराना है क्यों कि प्राचीन दस्तावेजों में कोलकाता नाम का उल्लेख है। इनमें सबसे पुराना साक्ष्य बांग्ला साहित्य के ग्रन्थ ‘मानस मंगल’ का है। इसे १४९५ में विप्रदास पिपला ने लिखा है। इसमें कलकत्ता का उल्लेख है। मुगल सम्राट अकबर का दरबारी अबुल फजल भी अपने ग्रन्थ ‘आइने-अकबरी’ में बंगाल की सामाजिक-आर्थिक दशा का विवरण देते हुए ‘कलकत्ता’ का उल्लेख किया है। बांग्ला के मध्यकालीन कवि सनत घोषाल खुद को १६८० ई. में ‘कोलिकत्ता’ में पैदा हुआ बताते हैं। इन साक्ष्यों के आलोक में यह मानने में कोई अड़चन नहीं है कि जाब चार्नाक के यहां आकर बसने के पहले से कोलकाता नामक जगह थी। मगर यह कोई शहर नहीं था। इन कुछ गांवों को छोड़कर कालीघाट से लेकर सूतानुती तक जंगल था। जो सुंदरवन के जंगलों का विस्तार था।
इन सारे तर्कों के बावजूद इतिहास की कड़ियां यहां थोड़ी उलझ जाती हैं। पहली बात तो यह कि जब ‘कलकत्ता’ नामक जगह थी तो इसका उल्लेख जाब चार्नाक अपने पत्रों में क्यों नहीं करता था? यानी तब कलकत्ता नामक जगह जाब चार्नाक के खरीदे गए तीन गांवों की तुलना में शायद महत्वपूर्ण नहीं थी। ऐसे में अगर इन तीन गांवों से ही आगे चलकर कोलकाता शहर विकसित हुआ तो इस शहर का नाम कोलकाता ही रखने की क्या मजबूरी थी? शहर के नामकरण में ये तीन गांव क्यों प्रभावहीन साबित हुए? बहरहाल इस दिशा में इतिहासकारों की खोजें हीं कुछ खुलासा कर पाएंगी मगर जो ज्ञात है वह यह है कि जब जाब चार्नाक यहां आया तो उसने भी अपने लिए मिट्टी के घर बनवाए थे। यही वे केंद्र बिंदु थे जो कोलकाता शहर के विकास के ठोस कारण बने। दरअसल उसने उस प्रक्रिया का मौलिक ढांचा खड़ा किया जिसके कारण व्यापारियों और बाजार का एक केंद्र विकसित हुआ। इस तर्क को इस आधार पर माना जा सकता है कि अंग्रेजों के यहां अपने कारखाने खोलने और किलेबंदी के कारण बंगाल के दूर-दराज के जमींदार और व्यापारी यहीं आकर बसने लगे। धीरे-धीरे यह इलाका ग्रामीण बस्ती की जगह अभिजात्य वर्ग के कस्बे में बदल गया। उदाहरण स्वरूप कोलकाता शहर के बीडन स्ट्रीट की रामदुलाल देब ठाकुर बाड़ी के लोग उसके बाद ही आज के राजारहाट इलाके से यहां आए। यह बीडन स्ट्रीट, शोभाबाजार तब का सूतानुती ही है। इसी ठाकुरबाड़ी परिवार के एक सदस्य और कोलकाता की विरासत को सहेजकर रखने के काम में लगी ‘सूतानुती परिषद’ के संयुक्त सचिव के. के. देब बताते हैं कि उनके पूर्वज १७५२ ई. में यहां आए थे। उनके मुताबिक राजारहाट से सूतानुती आने की मुख्य वजह व्यापार-व्यवसाय की सुविधा और सुरक्षा थी। ये साक्ष्य भी यही साबित करते हैं कि जाब चार्नाक के प्रयासों से एक ऐसा व्यापारिक केंद्र विकसित हुआ जिसने कोलकाता जैसे शहर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दरअसल यहां आकर जाब चार्नाक के बसने और अपनी प्रशासनिक बस्ती तैयार करने की बड़ी वजह दूसरी योरोपीय कंपनियों के साथ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा थी। उसकी मंशा एक ऐसे केंद्र की स्थापना की थी जहां अंग्रेज व्यापारी सुविधा संपन्न और महफूज रह सकें तभी तो मुगल सम्राट औरंगजेब की अनुमति के बाद कैप्टन ब्रुक को जाब चार्नाक ने अपनी जहाज के साथ यहां आने का संदेश भेजा था। २८ अगस्त १६९० को बंगाल काउंसिल के साथ बातचीत के बाद अपने अंग्रेज साथियों को यहां लाया। तब जाब चार्नाक और उसकी दो सदस्यीय एलिस और पिची की काउंसिल व उसके बीस सिपाहियों ने पुरानी झोपड़ियों को मरम्मत करके रहने लायक बनाया। मिट्टी की दीवाल वाली नई झोपड़ियां भी बनाई। इसके बाद इसके इर्द-गिर्द तमाम घर बनते चले गए। जो बेहद बेतरतीब तरीके से बने। ईस्ट इंडिया का चीफ गवर्नर व सुपरवाइजर जान गोल्डस बोरो हुगली के किनारे जाब चार्नाक के स्थायी तौर पर बस्ती बना लेने के बाद १६९३ ई. में कोलकाता का दौरा किया था। तब बन चुकीं और बन रहीं बस्तियों के बारे में उसने लिखा है कि- सभी घर बेहद पास-पास बेतरतीब तरीके से बने हैं और जहां जिसकी मर्जी गड्ढा खोद लेता है। यानी जाब चार्नाक के रहते हुए भी लोग बड़े अव्यवस्थित तरीके से बिना किसी योजना के घर बना रहे थे। उस समय तक जो कस्बा विकसित हुआ उसमें कोई व्यवस्थित शहर बसाने की किसी योजना की झलक तक नहीं दिखाई देती। मोटे तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक जरूरतों के मद्देनजर १७०७ ई. तक अंग्रेज पूरी तरह से यहां बस गे थे। कोलकाता तभी जाकर सही मायने में टाउन में तब्दील हुआ। १६९६ ई. से १७१५ ई. के बीच फोर्टविलियम की किलेबंदी की गई। उसी ओल्ड फोर्टविलियम की जगह आज कस्टम हाउस और जनरल पोस्ट आफिस है। मौजूदा फोर्टविलियम के लिए दूसरी जगह बाद में चुनी गई। आज का डलहौसी इलाका उनमें से एक है जहां अंग्रेजों ने आवास और दफ्तर व्यवस्थित तरीके से बना लिए थे। सूतानुती, गोबिंदपुर और कोलिकत्ता के बाद इस इलाके में चौरंगी से मैदान तक का वह इलाका भी शामिल हो गया जहां कभी सुंदरवन का घना जंगल था और टाईगर बेखौफ घूमा करते थे। इतना व्यवस्थित होने और एक शहर में तब्दील होने में कई दशक बीत गए और तब तक ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी सत्ता जमा चुकी थी। इसके बाद ही प्लासी के युध्द में नवाब सिराजुद्दौला को धूल चटाकर भारत में सत्ता की हिस्सेदार बन गई।
कोलकाता शहर बनने की इस पूरी प्रक्रिया को जाब चार्नाक की शहर बसाने की किसी योजना ने नहीं पूरा किया बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद के अधिकारियों की कोशिशों का नतीजा था। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कोलकाता शहर का कोई एक संस्थापक कैसे हो सकता है? मगर इस सत्य को नकारना भी इतिहास के साथ बेमानी होगी कि कोलकाता शहर अस्तित्व में इसी के बाद आया।
कोलकाता के जन्मदिन २४ अगस्त को शहर की एक संस्था सूतानुती परिषद १९९२ से उत्सव के तौर पर मनाती रही है। हालांकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद नई परिस्थितियों पर विचार के लिए परिषद ने एक बैठक में तय किया कि वह हर साल की तरह २४ अगस्त को ही सूतानुती उत्सव मनाएगी। कोलकाता के जन्मदिन २४ अगस्त को ही उत्सव मनाने के पीछे परिषद के संयुक्त सचिव केके देब तर्क देते हैं कि इसके पहले भी वे लोग जन्म दिन नहीं मनाते थे। यह संस्था तो शहर की विरासत के संरक्षण के लिए गठित की गई है और सूतानुती उत्सव में हमारी चर्चा का विषय भी विरासत को बचाने से ही संबंधित होता है। केके देब भी बड़ी ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करते हैं कि २४ अगस्त कोलकाता का जन्मदिन तो नहीं हो सकता मगर इस सत्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके बाद से ही वह प्रक्रिया शुरू हुई जिससे गुजरकर कोलकाता शहर का स्वरूप सामने आया। और हम उसी कोलकाता की विरासत के संरक्षण में लगे हुए हैं। परिषद के गठन और उसकी उपलब्धियों का हवाला देते हुए केके देब बताते हैं कि शुरू में कुछ जागरूक लोगों ने शोभाबाजार नाट्यमंदिर को एक प्रमोटर के हाथों बेचे जाने का विरोध किया। केके देब के साथ कुछ और जागरूक नागरिकों ने नगर निगम से इसे छुड़ाने और इसके जीर्णोध्दार की अपील की। फिलहाल नगर निगम ही इसकी देखरेख में लगा है। इसी घटना के बाद इन नागरिकों ने महसूस किया कि एक ऐसी परिषद होनी चाहिए जो शहर की ऐसी तमाम इमारतों व सास्कृतिक विरासत की रक्षा कर सके। इसी के तहत १९९२ में सूतानुती परिषद का गठन किया गया।
कोलकाता के जन्म दिन के विवाद से जुड़ा एक और परिषद है सांखेर बाजार के पास बारिशा स्थित सबरन रायचौधरी परिवार परिषद। कोलकाता का २४ अगस्त को जन्म दिन मनाने का रायचौधरी परिवार ही प्रबल विरोधी रहा है। रायचौधरी परिवार का कहना है कि वे जाब चार्नाक से पहले इस इलाके के जमींदार थे। जाब चार्नाक तो बाद में आया और उनसे ही तीन गांवों की जमींदारी खरीदी थी। ऐसे में कैसे जाब चार्नाक कोलकाता का संस्थापक हो सकता है? इसी आधार पर सबरन रायचौधरी परिवार परिषद ने कोलकाता हाई कोर्ट में याचिका दायर करके जन्मदिन और जाब चार्नाक के संस्थापक की अवधारणा को चुनौती दी थी।
कोलकाता के जन्मदिन की अवधारणा को खारिज तो इसी शहर के मशहूर इतिहासकार पीटी नायर भी कर चुके हैं। जाब चार्नाक पर लिखी अपनी पुस्तक में उन्होंने इस मिथक को ही गलत ठहराया है कि कोलकाता का २४ अगस्त १६९० ई. को जन्म हुआ और जाब चार्नाक इसके जनक थे। पीटी नायर ने कोलकाता पर ढेर सारी किताबें लिखी हैं। इनमें से एक पुस्तक ‘रेनेशां’ भी है जिसे उन्होंने कोलकाता का दौरा करने वाले योरोपीय यात्रियों की ३५ डायरियों और पत्रों को आधार बनाकर लिखा है। यह पुस्तक कोलकाता के इतिहास पर मौलिक सामग्री का दस्तावेज है। कुल मिलाकर तब तो नहीं पर अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद पीटी नायर भी सच साबित हो गए हैं।
कोलकाता नगर निगम के पूर्व मेयर सुब्रत मुखर्जी ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे कभी भी कोलकाता का जन्मदिन नहीं मनाते थे। मेयर का भी मानना है कि गांवों से धीरे-धारे कोलकाता का विकास हुआ।
संभवत: अब करीब ५०० साल से अधिक पुराने उस साक्ष्य को मान्यता प्रदान की जाएगी जिसमें कोलकाता का जिक्र है। यह साक्ष्य है १४९५ ई. का विप्रदास का ग्रन्थ मानस मंगल। नवीन अवधारणा के तहत कोलकाता की प्राचीनता ५०० साल से अधिक मानी जानी चाहिए। संभव है कि इतिहासकार कोई और साक्ष्य ढूंढ पाएं और तब शायद कोलकाता को और प्राचीन होना साबित किया जा सकेगा।
इस नई अवधारणा से ‘कोलकाता’ की प्राचीनता भले निर्धारित हो सकती है मगर भरपूर साक्ष्यों के अभाव में अभी यह साबित करना मुश्किल होगा कि ‘कोलकाता शहर’ भी इतना पुराना है। फिलहाल उपलब्ध साक्ष्य यही बताते हैं कि शहर तो अस्तित्व में जाब चार्नाक और ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद ही आया। सूतानुती परिषद भी इसी तथ्य को मानता है। इतिहास अपने जितने पन्ने खोले चाहे बंद करे मगर नई अवधारणा से इस शहर के लोगों की वह एकरूपता बिखर गई है जो उनको संवेदनात्मक रूप से जोड़े रखने की कारक थी। ऐसे लोगों को समायोजित होने में वक्त लगेंगे। जहां तक उत्सव मनाने की बात है तो सूतानुती परिषद उसी दिन उत्सव मनाना तय किया है।
सबरन रायचौधरी परिवार कोलकाता के सौभाग्य प्रतीक पुरुष के रूप में अपने ही पूर्वज और १७वीं शताब्दी के समाज सुधारक लक्ष्मीकांत रायचौधरी को अपनाया है। लक्ष्मीकांत ने उस वक्त के समाज से कुलीनता और बहुविवाह जैसी बुराईयों को खत्म करने की लड़ाई लड़ी थी। सबरन रायचौधरी परिवार परिषद के प्रवक्ता और सहायक सचिव देवर्षि रायचौधरी का दावा है कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर और राजा राममोहन राय से काफी पहले लक्ष्मीकांत रायचौधरी ने समाज सुधार आंदोलन शुरू किया था। फिलहाल सबरन रायचौधरी परिवार परिषद लक्ष्मीकांत को कोलकाता के संस्थापक के रूप में पेश नहीं है। यह तो समय ही बताएगा कि ये आयोजन सिर्फ पारिवारिक कार्यक्रमों तक सिमटकर रह जाएंगे या फिर कोलकाता की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण भी साबित होंगे। जो भी हो मगर इन आयोजनों में वह सार्वजनिकता कैसे आएगी जो गलत ही सही पर संवेदनात्मक तौर पर कोलकाता के लोगों को एक मंच प्रदान करती थी। दरअसल इतिहास की और भी ऐसी तमाम घटनाएं हैं जिनपर सारे इतिहासकार एकमत नहीं हो पाए हैं। ऐसे ही तथ्य लोगों में और इतिहास की ऐतिहासिकता के बारे में भ्रम पैदा करते हैं। हकीकत यह है कि जब तक किसी अवधारणा में प्रमाणिक एकरूपता नहीं होती आमलोग उसे अपनी संवेदनाओं से जोड़ ही नहीं पाते हैं। कोलकाता की नई अवधारणा भी संवेदनात्मक तौर पर अभी इसी दौर में है।

Friday, July 10, 2009

दुर्गति में है मथुरा का संग्रहालय

मथुरा आर्कियोलाजिकल म्यूजियम

करीब तीन हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति का आइना बना मथुरा का राजकीय संग्रहालय आज बुरी तरह अस्त-व्यस्त है। दुनियाभर में प्रसिद्ध यह संग्रहालय दर्शकों की बाट जोहता दिखाई पड़ता है। इस संग्रहालय को देखने आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या लगातार घट रही है। संग्रहालय की यह दुर्गति पिछले एक दशक में हुई है।
मजेदार बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार का संस्कृति विभाग मथुरा म्यूजियम के विस्तार पर करोड़ों रुपए खर्च करने में जुटा है। म्यूजियम के विस्तार की नीति संबंधित अफसरों के माफिक आई है पर म्यूजियम के रखरखाव के लिए घातक सिद्ध हुई है। जानकारी के मुताबिक मथुरा म्यूजियम की इमारत की मरम्मत का काम 1999 में शुरू हुआ। इसके लिए तीन चौथाई म्यूजियम दर्शकों के लिए बंद करना पड़ा। करीब 300 बेशकीमती व लाजवाब मूर्तियों को गोदाम में बंद कर दिया गया। म्यूजियम अधिकारियों के निकम्मेपन का एक नमूना यह है कि एक दशक पूर्व बंद किया तीन चौथाई म्यूजियम आज भी बंद है।
मथुरा म्यूजियम पर सबसे लंबी हुकूमत जितेंद्र प्रसाद की रही। टुक़ड़ों-टुकड़ों में जितेंद्र दस वर्ष से ज्यादा मथुरा म्यूजियम के निदेशक रहे। यहां से उनका तबादला लखनऊ हुआ और फिर रिटायर हुए। मथुरा म्यूजियम की दुर्गति के लिए जितेंद्र कुमार को दोषी मान उनके कार्यकलापों की जांच की बात करते हैं। जितेंद्र कुमार के सत्ता के गलियारों में अच्छे रिश्तों के कारण मथुरा म्यूजियम के विस्तार के लिए 8 करोड़ रुपए की रकम स्वीकृत हुई थी।
मथुरा-वृंदावन गोविंद मंदिर

म्यूजियम के बगल में एक दूसरी इमारत के निर्माण का कार्य और पुरानी इमारत की मरम्मत का कार्य जितेंद्र के वक्त में शुरू हुआ। यह कार्य उप्र जल निगम की निर्माण शाखा इकाई कर रही है। म्यूजियम कर्मचारियों का कहना है कि धीमी गति से चलने वाले इस घटिया कार्य की अनेक शिकायतें प्रदेश सरकार से की गईं लेकिन कड़ी कार्यवाही के बजाय जल निगम के अधिकारियों को इनाम मिलता रहा है। अब म्यूजियम में सुरक्षा के लिए लगाए गए सीसी कैमरे, फर्नीचर, एसी आदि सामान खरीदने का जिम्मा भी जल निगम के पास है। यह सब बढ़िया कमीशन ज्यादा काम के सिद्धांत पर चल रहा है।
मालूम हो मथुरा म्यूजियम बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म की हजारों वर्ष पुरानी दुर्लभ मूर्तियों के संग्रह के लिए विश्वविख्यात है। अनेक दुर्लभ मूर्तियां नष्ट हो रही हैं। इनकी हिफाजत के लिए तैनात रसायन वैज्ञानिक लखनऊ म्यूजियम की सेवा कर रहा है। रानी विक्टोरिया की सौ वर्ष पुरानी अष्ट धातु की मूर्ति खुले आकाश के नीचे पड़ी है। इस मूर्ति के हाथों में एक दंड और एक ग्लोब था। इसे चोर ले उड़े। मथुरा पुलिस फिल्मी अंदाज में चोरों की तलाश कर रही है।
मथुरा-वृंदावन रंगजी मंदिर

म्यूजियम के पास एक अमूल्य पुस्तकालय है। इसकी 40 हजार पुस्तकों पर अब खतरा मंडरा रहा है। शहर के बुद्धिजीवियों के मध्य म्यूजयिम का पुस्तकालय काफी लोकप्रिय रहा है। इतिहास के छात्र इस पुस्तकालय का भरपूर उपयोग करते रहे हैं लेकिन आज इधर का रुख करने वाला कोई नहीं। पुस्तकालय की छत चूने से अधिकांश पंखे खराब पड़े हैं। पुस्तकालय भवन में म्यूजियम के संस्थापक एफएस ग्राउज के सम्मान में आयोजन होते थे। इस वर्ष ग्राउज सप्ताह नहीं मना।
म्यूजियम में कुल 32 कर्मचारी हैं। अनेक पद रिक्त पड़े हैं। सभी कर्मचारी म्यूजियम की दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। वे किसकी शिकायत किससे करें। मुंह खोलने पर खुद के ऊपर गाज गिरने का डर है। (साभार-जनसत्ता )।

मथुरा संग्रहालय, व्रज, भगवान श्रीकृष्ण संबंधित सामग्री के लिंक उनके आमुख के साथ दिए गए हैं। कृपया इस लिंक से पढ़ें पूरा विवरण। इस पोस्ट के फोटो भी इन्हीं लिंक से साभार लिए गए हैं।


कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्
----------ऋग्वेद संहिता में कृष्ण के नाम का उल्लेख जरूर मिलता है; किंतु यह नाम तो उसमें एक असुर राजा का है। बौद्ध और जैन धर्मग्रंथ तो कृष्ण को बिलकुल अलग रीति से पहचानते हैं। जिस कृष्ण का हमें यहाँ दर्शन करना है, वह कृष्ण तो मुख्य रूप से महाभारत के हैं। हरिवंशपुराण के हैं, श्रीमद्भागवत के हैं और विष्णुपुराण एवं ब्रह्मवैवर्तपुराण के मुख्य रूप से, तथा पद्मपुराण अथवा वायुपुराण जैसे किसी पुराण के अंश रूप हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि यह दर्शन भी संपूर्ण है। लेखक की दृष्टि आंशिक हो सकती है कहीं रुचि-भेद से प्रेरित दृष्टि भी हो सकती है और कहीं इस दृष्टि की साहसिक मर्यादा भी हो सकती है।‘श्रीकृष्ण-डार्लिंग ऑफ ह्युमेनिटी’ नामक एक ग्रंथ में उसके लेखक ए.एस.पी.अय्यर ने एक सरस कथा लिखी है। एक अति बुद्धिशाली व्यक्ति को कृष्ण के अस्तित्व के बारे में शंका थी। उन्होंने एक संत के सामने अपनी शंका प्रस्तुत की-‘मुझे प्रतीत होता है कि कृष्ण कोरी कल्पना का पात्र है। वास्तव में ऐसा कोई पुरुष हुआ ही नहीं।’ उन्होंने कहा।‘यह बात है ? क्या आपका वास्तव में अस्तित्व है ?’ संत ने जवाबी प्रश्न किया।‘अवश्य।’ उस विद्वान ने विश्वासपूर्वक कहा।‘आपको कितने मनुष्य पहचानते हैं ?’‘कम-से-कम पाँच हजार तो अवश्य। मैं प्रोफेसर हूँ, विद्वान हूँ, लेखक हूँ, आदि।’‘अच्छा-अच्छा ! अब यह कहिए कि कृष्ण को कितने मनुष्य पहचानते हैं ?’‘करोड़ों, कदाचित् अरबों भी हो सकते हैं।’ विद्वान ने सिर खुजलाया।‘और यह कितने वर्षों से ?’‘कम-से-कम इस काम को तीन हजार वर्ष तो हुए ही हैं।’‘अब मुझे यह कहिए कि चालीस वर्ष की आपकी आयु में जो पाँच हजार मनुष्य आपको पहचानते हैं, उनमें से कितने आपको पूजते हैं ?’‘पूजा ? पूजा किसकी ? मुझे तो कोई पूजता नहीं ?’‘और कृष्ण को तीन हजार वर्षों बाद भी करोड़ों मनुष्य अभी भी पूजते हैं। अब आप ही निर्णय करें कि वास्तव में आपका अस्तित्व है अथवा कृष्ण का।’-----

मथुरा संग्रहालय
मथुरा का यह विशाल संग्रह देश के और विदेश के अनेक संग्रहालयों में वितरित हो चुका है। यहाँ की सामग्री लखनऊ के राज्य संग्रहालय में, कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में, मुम्बई और वाराणासी के संग्रहालयों में तथा विदेशों में मुख्यत: अमेरिका के 'बोस्टन' संग्रहालय में, 'पेरिस' व 'झुरिच' के संग्रहालयों व लन्दन के ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित है। परन्तु इसका सबसे बड़ा भाग मथुरा संग्रहालय में प्रदर्शित है। इसके अतिरिक्त कतिपय व्यक्तिगत संग्रहों में भी मथुरा की कलाकृतियाँ हैं।--------

अतीत का अद्यतन अस्तित्व-मथुरा
---------मथुरा नगरी जो कि भगवान कृष्ण, महावीर और बुद्ध जैसे महापुरुषों से अनन्य संबंध रखती है, इसका एक लंबा, बहुआयामी और बहुरंगा इतिहास है। मथुरा हिन्दू, जैन और बौद्ध अनुयायिओं का तीर्थ स्थल है। यहां कला की विविध विधाएं और धर्मोपदेश फव्वारें से निसृत बुदबुदों के समान, भारतीय संस्कृति में विलीन होते देखे जाते हैं। मथुरा जो कि अब एक छोटा शहर है ओर भगवान कृष्ण की जन्मभूमि के रुप में प्रसिद्ध है, किसी समय में एक अविस्मरणीय व्यवसायिक केन्द्र और दक्षिण और उत्तर पथ का संपात स्थल है। मथुरा वासियों के लिए व्यापार ही मुख्य व्यवसाय था। कारवां आते-जाते हुए कुछ समय यहां रुकते थे।---

मथुरा का पौराणिक परिचय

व्रज का इतिहास

मंदिर की भव्यता देख दंग रह गया था गजनवी

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