Sunday, January 22, 2012

सूखे से बर्बाद हुआ अंकोरवाट

  पहले कहा गया था कि जिस शहर अंकोरवाट में दुनिया का सबसे बड़े मंदिर अंकोरवाट है, उस शहर का विनाश लंबी चली लड़ाईयों व जमीन के सही संतुलन न बनाए रखने ( अंधाधुंध दुरुपयोग ) के कारण हुआ। मगर अब नए शोध में कहा जा रहा है कि अकोरवाट शहर का विनाश सूखे के कारण हुआ। पर्यावरण में विनाशकारी परिवर्तन से ऊबारने के इंतजाम नहीं होने के कारण शहर को बचाया नहीं जा सका। हालांकि पर्यावरण को ही एकमात्र कारण भले नहीं माना जा सकता मगर यह भी प्रमुख कारण था।
  
गेट्स कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधार्थियों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का तो यही मानना है कि ६०० साल पहले इस शहर के पतन का प्रमुख कारण पर्यावरण में बदलाव के बाद पड़ा सूखा था। जबकि इस शहर में उत्कृष्ट जलप्रबंधन था।
कैम्ब्रिज के शोधार्थी मैरा बेथ डे समेत पूरी टीम  ख्मेर साम्राज्य के ११ वीं शताब्दी के इस खूबसूरत शहर अंकोरवाट के जलप्रबंधन का अध्ययन कर ही है। अंकोरवाट संयुक्त राष्ट्रसंघ की विश्व धरोहर सूची में शामिल दक्षिणपूर्व एशिया के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है।

 
अंकोरवाट मन्दिर अंकोरयोम नामक नगर में स्थित है, जिसे प्राचीन काल में यशोधरपुर कहा जाता था। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है। राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को १९८३ से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। इन प्रसंगों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं, असुरों और देवताओं के बीच अमृत मन्थन का दृश्य भी दिखाया गया है।
  विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहाँ केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं। सनातनी लोग इसे पवित्र तीर्थस्थान मानते हैं।
 अंकोरवाट जयवर्मा द्वितीय के शासनकाल (1181-1205 ई.) में कम्बोडिया की राजधानी था। अंकोरवाट का निर्माण कम्बुज के राजा सूर्यवर्मा द्वितीय (1049-66 ई.) ने कराया था और यह मन्दिर विष्णु को समर्पित है। यह मन्दिर एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है।  इसमें तीन खण्ड हैं, जिसमें प्रत्येक में सुन्दर मूर्तियाँ हैं और प्रत्येक खण्ड से ऊपर के खण्ड तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ हैं।प्रत्येक खण्ड में आठ गुम्बज हैं। जिनमें से प्रत्येक 180 फ़ुट ऊँची है। मुख्य मन्दिर तीसरे खण्ड की चौड़ी छत पर है। उसका शिखर 213 फ़ुट ऊँचा है और यह पूरे क्षेत्र को गरिमा मंडित किये हुए है।
मन्दिर के चारों ओर पत्थर की दीवार का घेरा है जो पूर्व से पश्चिम की ओर दो-तिहाई मील और उत्तर से दक्षिण की ओर आधे मील लम्बा है। इस दीवार के बाद 700 फ़ुट चौड़ी खाई है। जिस पर एक स्थान पर 36 फ़ुट चौड़ा पुल है। इस पुल से पक्की सड़क मन्दिर के पहले खण्ड द्वार तक चली गयी है। इस प्रकार की भव्य इमारत संसार के किसी अन्य स्थान पर नहीं मिलती है।
   भारत से सम्पर्क के बाद दक्षिण-पूर्वी एशिया में कला, वास्तुकला तथा स्थापत्यकला का जो विकास हुआ, उसका यह मन्दिर चरमोत्कृष्ट उदाहरण है।

  पतन का कारण सूखा होने के प्रमाण


१५वीं शताब्दी की लड़ाईयों व जमीन के अंधाधुंध दुरुपयोग से अंकोरवाट के पतन की कहानी से अलग मैरीबेथ को ११ वीं शताब्दी में ख्मेर साम्राज्य के बनवाए गए पूरे क्षेत्र के जलाशयों में जमे तलछट के जो नमून मिले हैं उससे इस क्षेत्र के १००० साल के पर्यावरण के इतिहास पर की जानकारी हासिल की है। इन साक्ष्यों के आधार पर इन पर्यावरणविदों को मानना है कि जब अंकोरवाट का पतन हुआ उस समय तक वहां का जलस्तर काफी नीचे चला गया था। इसने पर्यावरण के परिवर्तन में भारी भूमिका निभाई। हालांकि मैरीबेथ का कहना है कि पतन का यही एक अकेला कारण नहीं था। सामाजिक और राजनैतिक अस्थिरत के साथ पर्यावरण में बदलाव ने जो असंतुलन पैदा किया उससे लड़ने के लिए यह शहर तैयार नहीं था। अनियंत्रित सूखे ने तबाही मचा दी। शहरीकरण के कारण जंगलों की बेतहासा कटाई ने गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा किया। इतनी बड़ी विपदा से लड़ने में सक्षम नहीं था अंकोरवाट प्रशासन। नतीजे में अंकोरवाट शहर उजड़ गया।
  मैरीबेथ व उनकी टीम का यह शोध प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडमी आफ साइंस में प्रकाशित किया गया है। मैरीबेथ को भरोसा है कि पर्यावरण के कारण अंकोरवाट के पतन की यह कहानी आज पर्यावरण समस्या से निपटने की नसीहत होगी। वे कहती हैं कि- अंकोरवाट का जलप्रबंधन बहुत ही उच्चकोटि का था फिर भी पर्यावरण समस्या और उससे उपजी सामाजिक अस्थिरता से लड़ने में अक्षम साबित हुआ। यह शोध और किसी बात के लिए महत्वपूर्ण भले न हो मगर इस बात की नसीहत तो देता ही है कि पर्यावरण समस्या ने इतिहास के किसी दौर में कितनी तबाही मचाई होगी।
 
हम भी पुनः उसी समस्या के कगार पर
 हम आज भी पुनः उसी समस्या के कगार पर खड़े हैं। भारत में पंजाब में ६० साल बाद बर्फबारी देखने को मिली। बंगाल के कुछ इलाकों में इस साल की ठंड में घास पर बर्फ जमी मिली। हर बार १४ जनवरी मकरसंक्रांति के बाद तापमान बढ़ने लगता है मगर इस बार पारा नाचे ही गिरता जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस साल होली तक ठंड पड़ेगी। यह सब भी पर्यावरण असंतुलन के संकेत हैं। तो क्या हमारा भी हश्र अंकोरवाट का ही होगा ? क्या फिर हम हिमयुग की ओर बढ़ रहे हैं ?




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