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Monday, September 5, 2016

बलूचिस्तान का प्राचीन इतिहास और समस्या की वजहें...

  
     यह पूछा जा सकता है कि जिस तरह कुछ मुट्ठीभर भारतीय कश्मीरी सुन्नी मुसलमान पाकिस्तान के बहकावे में आकर अलगाववाद की बात करते हैं उसी तरह क्या बलूचिस्तान के बलूची और पख्तून नहीं करते हैं? यदि हिन्दुस्तान, बलूचिस्तान का पक्ष लेता है तो क्या यह उसी तरह नहीं है जिस तरह कि पाकिस्तान, कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है? यदि ऐसा है तो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में फर्क ही क्या है? ...इस सवाल के जवाब के लिए हमें इतिहास में जाकर वर्तमान में आना होगा और फिर समझना होगा कि क्यों पाकिस्तान गलत है और क्यों हिन्दुस्तान सही।
भारतीय कश्मीर जैसी नहीं है बलूचिस्तान की हकीकत। हां, यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हालात बलूचिस्तान जैसे ही हैं। बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि मेजर जनरल अकबर खान के निर्देश पर 27 मार्च 1948 को उनकी मातृभूमि पर अवैध ढंग से कब्जा कर लिया गया जिसने 'ऑपरेशन गुलमर्ग' में भारत से कश्मीर क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा हथियाया था। तब से 5 बार हुए विद्रोह में हजारों बलूच देशभक्त और पाकिस्तानी सैनिक मारे जा चुके हैं। दूसरी ओर 3 बार हुए युद्ध में हजारों कश्मीरी पंडित, शिया मुसलमान, अहमदी मुसलमान, भारतीय सैनिक, बांग्लादेशी शहीद हो गए हैं। यह पाकिस्तान ही है जिसके कारण दक्षिण एशिया में आतंक का साम्राज्य कायम है।

भारत का बंटवारा जिस आधार पर और जिस तरीके से हुआ उससे यही सिद्ध होता है कि कांग्रेस और उसके नेता मुस्लिम लीग और अंग्रेजों के सामने कमजोर सिद्ध हुए। पिछले 67 वर्षों तक भारत पर कांग्रेसियों का ही राज रहा है। युद्ध के मैदान में जीत और वार्ता की मेज पर पराजय इस दौर में भारत की नियति बनी रही। हजारों भारतीयों के बलिदान और सैनिकों की शहीदी को कांग्रेसियों ने पाकिस्तान के हित में कर दिया। हारकर भी बेनजीर भुट्टो के पिता जीत गए और बाद में बेनजीर ने कश्मीर में एक मिसाल कायम कर दी।


बलूचिस्तान का प्राचीन इतिहास :
भारत पिछले 15,000 वर्षों से अस्तित्व में है। अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान और हिन्दुस्तान सभी भारत के हिस्से थे। 'अखंड भारत' कहने का अर्थ यही है। लेकिन भारत का बंटवारा जिस आधार पर और जिस तरीके से हुआ उससे यही सिद्ध होता है कि कांग्रेस और उसके नेता मुस्लिम लीग और अंग्रेजों के सामने कमजोर सिद्ध हुए।

बलूचिस्तान आर्यों की प्राचीन धरती आर्यावर्त का एक हिस्सा है। प्राचीन काल में वैदिक युग में पारस (कालांतर में फारस) से लेकर गंगा, सरयू और ब्रह्मपुत्र तक की भूर्मी आर्यों की भूमि थी जिसमें सिंधु घाटी का क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण था। आर्यों के पंचनंद या पंचकुल अर्थात पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुहु के कुल में से किसी एक कुल के हैं। भारत का प्राचीन इतिहास कहता है कि अफगानी, बलूच, पख्तून, पंजाबी, कश्मीरी आदि पश्‍चिम भारत के लोग पुरु वंश से संबंध रखते हैं अर्थात वे सभी पौरव हैं।
पुरु वंश में ही आगे चलकर कुरु हुए जिनके वंशज कौरव कहलाए। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों में से पुरु का धरती के सबसे अधिक हिस्से पर राज था। बलूच भी मानते हैं कि हमारे इतिहास की शुरुआत 9 हजार वर्ष पूर्व हुई थी।

बलूचिस्तान में माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ हिंगलाज माता का है। बलूचिस्तान की भूमि पर दुर्गम पहाड़ियों के बीच माता का मंदिर है जहां माता का सिर गिरा था। यह मंदिर बलूचिस्तान के राज्य मंज में स्थित हिंगोल नदी के पास स्थित पहाड़ी पर है। इस स्थान पर भगवान श्रीराम, परशुराम के पिता जमदग्नि, गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देवजी भी आ चुके हैं। चारणों की कुल देवी हिंगलाज की माता ही थी। ये चारण लोग बलूची ही थे और आज इनका नाम कुछ और कबीले से जुड़ा हुआ है। बलूचिस्तान में भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्तियां पाई गईं। यहां किसी काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था।

बलूचिस्तान भारत के 16 महा-जनपदों में से एक जनपद संभवत: गांधार जनपद का हिस्सा था। चन्द्रगुप्त मौर्य का लगभग 321 ईपू का शासन पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था। दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कम्बोज, गांधार, कैकय, वाल्हीक बलख, अभिसार (राजौरी), कश्मीर, मद्र, यदु, तृसु, खांडव, सौवीर सौराष्ट्र, कुरु, पांचाल, कौशल, शूरसेन, किरात, निषाद, मत्स, चेदि, उशीनर, वत्स, कौशाम्बी, विदेही, अंग, प्राग्ज्योतिष (असम), घंग, मालवा, अश्मक, कलिंग, कर्णाटक, द्रविड़, चोल, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, आंध्र तथा सिंहल सहित लगभग 200 जनपद महाभारत में वर्णित हैं। इनमें से प्रमुख 30 ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था।

मेहरगढ़ की सभ्यता : मेहरगढ़ की सभ्यता को सिंधु घाटी की हड़प्पा और मोहनजोदोरों से भी प्राचीन माना जाता है। बलूचिस्तान में एक स्थान है बालाकोट। बालाकोट नालाकोट से लगभग 90 किमी की दूरी पर बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में स्थित था। यहां से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पा कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण मेहरगढ़ का स्थान बलूचिस्तान के कच्ची मैदानी के क्षेत्र में है। मेहरगढ़ की संस्कृति और सभ्यता को 7 हजार ईसापूर्व से 2500 ईसापूर्व के बीच फलीफूली सभ्यता माना जाता है। यहां से इस काल के अवशेष पाए गए हैं। मेहरगढ़ आज के बलूचिस्तान में बोलन नदी के किनारे स्थित है।

कंकड़-पत्थरों को जोड़कर बलूचिस्तान में जो बांध बने उन्हें गबरबंध कहा जाता है और यह हड़प्पा युग से पहले बनने लगे थे। इनका निर्माण बाढ़ रोकने, बाढ़ में आई उपजाऊ मिट्टी को थामने के लिए होता था। गबरबंध के काल का पता लगाना कठिन है। वहां पाए गए बर्तनों के आधार पर उन्हें हड़प्पा-पूर्व काल का बताया जाता है।

फ्रांसीसी ऑर्कियोलॉजिस्ट प्रोफेसर जैरिग के हवाले से पाकिस्तान टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ईसा पूर्व (बीसी) 6,000 में यहां बोलन नदी क्षेत्र में किसानों द्वारा गेहूं, जौ और खजूर की खेती करने के प्रमाण मिले हैं। बाढ़ के पानी को संचित करने के लिए किसानों ने बड़े-बड़े गड्ढे बना रखे थे। बाढ़ खत्म होने पर वे कपास की खेती करते और मिट्टी के बरतन बनाते थे।

इतिहासकार पाषाण काल में यहां इनसानी बस्तियां होने की संभावना जताते हैं। ईसा के जन्म से पहले यह इलाका ईरान और टिगरिस व यूफ्रेट्स के रास्ते बेबीलोन की प्राचीन सभ्यता से व्यापार और वाणिज्य के जरिए जुड़ चुका था। बलूचिस्तान के सिबिया आदिवासियों से ईसा पूर्व 326 में विश्व विजयी अभियान पर निकले सिकंदर से भिड़ंत हुई थी। यहीं से सिल्करुट गुजरता है।
बलूचिस्तान का वर्तमान भूगोल : यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम पाकिस्तान, ईरान के दक्षिण-पूर्वी प्रांत सिस्तान तथा बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत तक फैला हुआ है, लेकिन इसका अधिकांश इलाका पाकिस्तान के कब्जे में है, जो पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा है। इसी इलाके में अधिकांश बलूच आबादी रहती है। यह सबसे गरीब और उपेक्षित इलाका भी है।

सीधी भाषा में कहें तो बलूचिस्तान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से पर ईरान, दक्षिण-पश्चिमी हिस्से पर अफगानिस्तान और पश्चिमी भाग पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है। सबसे बड़ा हिस्सा तकरीबन पाकिस्तान के कब्जे में है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस संपूर्ण क्षेत्र में यूरेनियम, गैस और तेल के भंडार पाए गए हैं।

सामरिक दृष्टि से बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह ईरान, अफगान और भारत को टारगेट करने के लिए अच्छा बेस बन सकता है। इसके जवाब में भारत ने 2003 में ईरान के साथ ओमान की खाड़ी में होर्मूज जलडमरू के बाहर चाबहार पोर्ट के विकास का समझौता किया है। यह बंदरगाह बलूचिस्तान-ईरान की सीमा के पास ईरान के सिस्तान प्रांत में है। इससे पाकिस्तान से गुजरे बिना ही भारत, अफगानिस्तान पहुंच सकता है। 2015 में यह डील फाइनल हुई और अब वहां विकास कार्य शुरू हो चुका है।

बलूचिस्तान पर किस तरह किया अंग्रेजों ने कब्जा


 अफगानिस्तानी की आजादी और मध्यकाल का बलूचिस्तान : 18 अगस्त 1919 को अफगानिस्तान को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी। हालांकि इससे कहीं पहले अफगानिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बन चुका था। 26 मई 1739 को दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह अकबर ने ईरान के नादिर शाह से संधि कर अफगानिस्तान उसे सौंप दिया था। 17वीं सदी तक 'अफगानिस्तान' नाम का कोई राष्ट्र नहीं था। अफगानिस्तान नाम का विशेष-प्रचलन अहमद शाह दुर्रानी के शासनकाल (1747-1773) में ही हुआ। तभी यह एक स्वतंत्र राष्ट्र बना था।
वर्ष 711 में मुहम्मद-बिन-कासिम और फिर 11वीं सदी में महमूद गजनवी ने बलूचिस्तान पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के बाद बलूचिस्तान के लोगों को इस्लाम कबूल करना पड़ा। 15वीं सदी में बलोच सरदार मीर चकर ने बिखरे हुए बलोची समुदायों को एकत्रित किया और दक्षिणी अफगानिस्तान, पंजाब और सिंध के कुछ हिस्सों पर आधिपत्य जमा लिया था। इसके बाद अगले 300 सालों तक यहां मुगलों और गिलजियों का शासन रहा।

अकबर के शासन काल में बलूचिस्तान मुगल साम्राज्य के अधीन था। इस क्षेत्र का शासन पर्शिया को हस्तांतरित करने से पूर्व वर्ष 1638 तक मुगलों ने इसे अपने अधीन बनाए रखा। ‘आइन-ए-अकबरी’ के मुताबिक, 1590 में यहां के ऊपरी इलाकों पर कंधार के सरदार का कब्जा था, जबकि कच्ची इलाका मुल्तान के भक्कड़ सरदार के अधीन था। केवल मकारान इलाके पर मलिकों व अन्य समुदायों का स्वतंत्र रूप से नियंत्रण था।

बलूचिस्तान पर अंग्रेजों का कब्जा : दरअसल, बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन 1666 में स्थापित मीर अहमद के कलात की खानत को अपना आधार मानता है। मीर नसीर खान के 1758 में अफगान की अधीनता कबूल करने के बाद कलात की सीमाएं पूरब में डेरा गाजी खान और पश्चिम में बंदर अब्बास तक फैल गईं। ईरान के नादिर शाह की मदद से कलात के खानों ने ब्रहुई आदिवासियों को एकत्रित किया और सत्ता पर काबिज हो गए।

‘प्रथम अफगान युद्ध (1839-42) के बाद अंग्रेंजों ने इस क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया। 1869 में अंग्रेजों ने कलात के खानों और बलूचिस्तान के सरदारों के बीच झगड़े की मध्यस्थता की। वर्ष 1876 में रॉबर्ट सैंडमेन को बलूचिस्तान का ब्रिटिश एजेंट नियुक्त किया गया और 1887 तक इसके ज्यादातर इलाके ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए।

अंग्रेजों से बलूचिस्तान की आजादी का संघर्ष : अंग्रेजों ने बलूचिस्तान को 4 रियासतों में बांट दिया- कलात, मकरान, लस बेला और खारन। 20वीं सदी में बलूचों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इसके लिए 1941 में राष्ट्रवादी संगठन अंजुमान-ए-इत्तेहाद-ए-बलूचिस्तान का गठन हुआ। वर्ष 1944 में जनरल मनी ने बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का स्पष्ट विचार रखा। इधर, आजम जान को कलात का खान घोषित किया गया। लेकिन आजम जान खान सरदारों से जा मिला। उसकी जगह नियुक्त  उसका उत्तराधिकारी मीर अहमद यार खान अंजुमन के प्रति तो वह अपना समर्थन व्यक्त करता था, लेकिन वह अंग्रेजों से रिश्ते तोड़ कर बगावत के पक्ष में नहीं था। यही कारण था कि बाद में अंजुमन को कलात स्टेट नेशनल पार्टी में बदल दिया गया।

आजम जान खान ने इस पार्टी को 1939 में गैरकानूनी घोषित कर दिया। ऐसे में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पकड़ लिया गया या उन्हें निर्वासन झेलना पड़ा। 1939 में अंग्रेजों की राजनीति के तहत बलूचों की मुस्लिम लीग पार्टी का जन्म हुआ, जो हिन्दुस्तान के मुस्लिम लीग से जा मिली। दूसरी ओर एक ओर नई पार्टी अंजुमन-ए-वतन का जन्म हुआ जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गई। अंजुमन के कांग्रेस के साथ इस जुड़ाव में खान अब्दुल गफ्फार खान की भूमिका अहम थी। मीर यार खान ने स्थानीय मुस्लिम लीग और राष्ट्रीय मुस्लिम लीग दोनों को भारी वित्तीय मदद दी और मुहम्मद अली जिन्ना को कलात राज्य का कानूनी सलाहकार बना लिया।

जिन्ना की सलाह पर यार खान 4 अगस्त 1947 को राजी हो गया कि ‘कलात राज्य 5 अगस्त 1947 को आजाद हो जाएगा और उसकी 1938 की स्थिति बहाल हो जाएगी।’ उसी दिन पाकिस्तानी संघ से एक समझौते पर दस्तखत हुए। इसके अनुच्छेद 1 के मुताबिक ‘पाकिस्तान सरकार इस पर रजामंद है कि कलात स्वतंत्र राज्य है जिसका वजूद हिन्दुस्तान के दूसरे राज्यों से एकदम अलग है।’

लेकिन अनुच्छेद 4 में कहा गया कि ‘पाकिस्तान और कलात के बीच एक करार यह होगा कि पाकिस्तान कलात और अंग्रेजों के बीच 1839 से 1947 से हुए सभी करारों के प्रति प्रतिबद्ध होगा और इस तरह पाकिस्तान अंग्रेजी राज का कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक उत्तराधिकारी होगा।’

अनुच्छेद 4 की इसी बात का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने कलात के खान को 15 अगस्त 1947 को एक फरेबी और फंसाने वाली आजादी देकर 4 महीने के भीतर यह समझौता तोड़कर 27 मार्च 1948 को उस पर औपचारिक कब्जा कर लिया। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के बचे 3 प्रांतों को भी जबरन पाकिस्तान में मिला लिया था।

भारत का विभाजन और बलूचिस्तान : मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन, लॉर्ड वावल के स्थान पर वाइसराय नियुक्त हुए। 8 मई 1947 को वीपी मेनन ने सत्ता अंतरण के लिए एक योजना प्रस्तुत की जिसका अनुमोदन माउंटबेटन ने किया। कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और कृपलानी थे जबकि मुस्लिम लीग की ओर से मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली और अब्दुल निश्तार थे जिन्होंने विचार-विमर्श करने के बाद इस योजना को स्वीकार किया। प्रधानमंत्री एटली ने इस योजना की घोषणा हाउस ऑफ कामंस में 3 जून 1947 को की थी इसीलिए इस योजना को 3 जून की योजना भी कहा जाता है। इसी दिन माउंटबेटन ने विभाजन की अपनी घोषणा प्रकाशित की।

इस योजना के अनुसार पंजाब और बंगाल की प्रांतीय विधानसभाओं के वे सदस्य, जो मुस्लिम बहुमत वाले जिलों का प्रतिनिधित्व करते थे, अलग एकत्र होकर और गैरमुस्लिम बहुमत वाले सदस्य अलग एकत्र होकर अपना मत देकर यह तय करेंगे कि प्रांत का विभाजन किया जाए या नहीं, दोनों भागों में विनिश्‍चित सादे बहुमत से होगा। प्रत्येक भाग यह भी तय करेगा कि उसे भारत में रहना है या पाकिस्तान में? पश्‍चिमोत्तर सीमा प्रांत में और असम के सिलहट जिले में जहां मुस्लिम बहुमत है वहां जनमत संग्रह की बात कही गई। दूसरी ओर इसमें सिन्ध और बलूचिस्तान को भी स्वतं‍त्र निर्णय लेने के अधिकार दिए गए। बलूचिस्तान के लिए निर्णय का अधिकार क्वेटा की नगरपालिका को दिया गया।

(उल्लेखनीय है कि भारत में राजर्षि टंडन ने धर्म आधारित विभाजन और 3 जून की योजना के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन उनकी आवाज नेहरू और जिन्ना की आवाज के आगे कुछ नहीं थी। गांधीजी ने मौन व्रत धारण कर लिया था। पंजाब और बंगाल के हिन्दू नहीं चाहते थे कि प्रांत का बंटवारा धर्म के आधार पर हो, लेकिन कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के आगे घुटने टेक दिए थे। मुस्लिम लीग किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी। वह तो ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को मिलाकर पाकिस्तान बनाना चाहती थी। ...संभवत: नेहरू ने यह सोचा हो या आशा की हो कि इस तरह के बंटवारे से पाकिस्तान से सांप्रदायिक समस्या का हल हो जाएगा और दोनों देश शांतिपूर्वक रहेंगे।)

उस वक्त भारत, अफगानिस्तान और ईरान के हवाले से बलूचिस्तान के लिए यह बहस की गई थी कि आप भारत के साथ रहना चाहेंगे, ईरान के साथ रहना चाहेंगे, अफगानिस्तान के साथ रहना चाहेंगे या कि आजाद रहना चाहेंगे। उस दौरान पाकिस्तान के साथ विलय के लिए किसी भी प्रकार का करार पास नहीं हुआ था। तब यह समझाया गया था कि इस्लाम के नाम से बलूच पाकिस्तान के साथ विलय कर लें। लेकिन तब बलूचों ने यह यह मसला उठाया कि अफगानिस्तान और ईरान भी तो इस्लामिक मुल्क है तो उनके साथ क्यों नहीं विलय किया जाए? हम पाकिस्तान के साथ ही क्यों रहें, जबकि उनकी और हमारी भाषा, पहनावा और संस्कृति उनसे जुदा है।


 बलूचिस्तान का पाकिस्तान में जबरन विलय : अंत में यह निर्णय हुआ कि बलूच एक आजाद मुल्क बनेगा। कलात के खान ने बलूची जनमानस की नुमाइंदगी करते हुए बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय करने से साफ इंकार कर दिया था। यह पाकिस्तान के लिए असहनीय स्थिति थी। अंतत: पाकिस्तान ने सैनिक कार्रवाई कर जबरन बलूचिस्तान का विलय कर लिया। यह आमतौर से माना जाता है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने अंतिम स्वाधीन बलूच शासक मीर अहमद यार खान को पाकिस्तान में शामिल होने के समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया था।
4 अगस्त 1947 को लार्ड माउंटबेटन, मिस्टर जिन्ना, जो बलू‍चों के वकील थे, सभी ने एक कमीशन बैठाकर तस्लीम किया और 11 अगस्त को बलूचिस्तान की आजादी की घोषणा कर दी गई। विभाजन से पूर्व अखंड भारत की 556 रियासतों में बलूचिस्तान भी शामिल नहीं था। हालांकि इस घोषणा के बाद भी माउंटबेटन और पाकिस्तानी नेताओं ने 1948 में बलूचिस्तान के निजाम अली खान पर दबाव डालकर इस रियासत का पाकिस्तान में जबरन विलय कर दिया। अली खान ने बलोच संसद से अनुमति नहीं ली थी और दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए थे। बलूच इस निर्णय को अवैधानिक मानते हैं, तभी से राष्ट्रवादी बलोच पाकिस्तान की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्ष छेड़े हुए हैं।

14 और 15 अगस्त 1947 में भारत नहीं बल्कि एक ऐसा क्षेत्र आजाद हुआ जिसे बाद में पाकिस्तान और हिन्दुस्तान कहा गया। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के पहले बलूचिस्तान 11 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। हिन्दुस्तान की आजादी से 3 दिन पहले ही बलूचिस्तान को आजाद कर दिया था। यह बात सभी जानते थे। 14 अगस्त को पाकिस्तान बना और 15 अगस्त को हिन्दुस्तान आजाद हुआ।


1947 में भारतीय कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला :
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। विलय-पत्र का खाका हूबहू वही था जिसका भारत में शामिल हुए अन्य सैकड़ों रजवाड़ों ने अपनी-अपनी रियासत को भारत में शामिल करने के लिए उपयोग किया था। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया।
हालांकि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो चुका था। जम्मू और कश्मीर पर वार्ता भी पूरी हो चुकी थी, बस महाराजा के दस्तखत करना बाकी थे। फिर भी जिन्ना ने परिस्थिति का लाभ उठाते हुए 22-24 अक्टूबर 1947 को कबाइली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर में भेज दिया। कश्मीर में खून की नदियां बहा दी गईं। इस खूनी खेल को देखकर कश्मीर के शासक राजा हरिसिंह भयभीत होकर जम्मू लौट आए। वहां उन्होंने भारत से सैनिक सहायता की मांग की, लेकिन सहायता पहुंचने में बहुत देर हो चुकी थी। नेहरू की जिन्ना से दोस्ती थी। वे यह नहीं सोच सकते थे कि जिन्ना ऐसा कुछ कर बैठेंगे। लेकिन जिन्ना ने ऐसा कर दिया और लगभग आधे जम्मू और कश्मीर पर कब्जा कर लिया। तभी से यह मामला उलझा हुआ है।

1948 में बलूचिस्तान पर पाकिस्तानी हमला : जबकि 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान अधिकृत रूप से एक आजाद मुल्क बन चुका था फिर भी 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर हमला कर उसको अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद पहली बगावत निसार खान और अब्दुल करीम खान ने कर दी। 1948 में बलूच राजकुमार अब्दुल करीम खान के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई और गोरिल्ला पद्धति से पाकिस्तानी सेना के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया गया, जो अभी तक जारी है।

1958 में इस सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व कर रहे नवाब नवरोज खान को उनके सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और नवरोज खान के बेटों और भतीजों को फांसी दे दी गई।

1948 से 1980 तक अफगानिस्तान के सुल्तान बलूचिस्तान में आजादी की जंग की मदद करते रहे। 1980 के बाद रूस समर्थित अफगान सरकारों ने भी बलोच लोगों को पूरी मदद देनी जारी रखी। आज भी अफगानिस्तान की ओर से बलोच लड़ाकों को राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक समर्थन प्राप्त है। अत: पाकिस्तान द्वारा भारत पर बलूचिस्तान में बगावत करवाने का आरोप पूर्णतया बेबुनियाद और भारत विरोधी पाकिस्तानी साजिशों का नया पैंतरा है।

बलूचों का पाकिस्तानी सेना से संघर्ष और सेना की बर्बरता.....


 बलूचों का पाकिस्तान से लंबा संघर्ष : पाकिस्तान में बलूच राष्ट्रवादियों के संघर्ष के कई लंबे-लंबे दौर चले हैं। पहली लड़ाई तो बंटवारे के फौरन बाद 1948 में छिड़ गई थी। उसके बाद 1958-59, 1962-63 और 1973-77 के दौर में संघर्ष तेज रहा। ये लड़ाइयां हिंसक भी रहीं, मगर अहिंसक प्रतिरोध के दौर भी चले। मौजूदा अलगाववादी संघर्ष का हिंसक दौर 2003 से शुरू हुआ। इसमें सबसे प्रमुख संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को बताया जाता है जिसे पाकिस्तान और ब्रिटेन ने प्रतिबंधित घोषित कर रखा है। इसके अलावा भी कई छोटे संगठन सक्रिय हैं। इनमें लश्कर-ए-बलूचिस्तान और बलूच लिबरेशन यूनाइटेड फ्रंट प्रमुख हैं। 2006 में बलूच नेता अकबर बुगती को कत्ल कर दिया गया। इसके बाद संघर्ष और बढ़ गया।
पाकिस्तान की बर्बर कार्रवाई के चलते बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तान सरकार के मुख्य ठिकानों पर हमले करने शुरू किए। राजधानी क्वेटा के फौजी ठिकाने, सरकारी इमारतों और फौजियों तथा सरकारी अधिकारियों को निशाना बनाया जाने लगा। पाकिस्तान की फौजी कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जानें गईं और हजारों लोग लापता बताए जाते हैं जिनमें 2,000 महिलाएं और सैकड़ों बच्चे हैं।

2006 में बलूचिस्तान की जंगे आजादी को बड़ा झटका लगा। पाकिस्तानी सैनिकों की कार्रवाई में कलात के खान बुगाटी शहीद हो गए और हजारों की तादाद में बलूची विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया। बड़े पैमाने पर मानवाधिकार का हनन हुआ। मानवाधिकार समूहों के मुताबिक वहां फर्जी मुठभेड़ों में लगातार मौतों और लापता लोगों की तादाद बढ़ रही है।

परवेज मुशर्रफ के काल में अत्याचार अपने चरम पर रहा। पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी पूर्व फौजी शासक परवेज मुशर्रफ की गिरफ्तारी के आदेश दिए गए थे। कुछ मानवाधिकार संगठनों के मोटे अनुमान के मुताबिक 2003 से 2012 के बीच पाकिस्तानी फौज ने 8000 लोगों को अगवा किया। 2008 में करीब 1100 बलूच लापता बताए जाते हैं। सड़कों पर कई बार गोलियों से बिंधी और अमानवीय अत्याचार के निशान वाली लाशें पाई जाती रही हैं।

बलूचिस्तान के साथ पाकिस्तान ने कैसा-कैसा अन्याय किया है उसकी लंबी सूची है। पाकिस्तानी सेना के पूर्व सेनापति टिक्का खां ने बलूचों की सामूहिक हत्याएं की थीं इसलिए आज भी वहां की जनता उन्हें 'बलूचों के कसाई' के नाम से याद करती है। बलूचों का अपहरण पाकिस्तान में एक सामान्य बात है।

दूसरी ओर मीर हजारा खान बजरानी मरी कबीले से संबंध रखते हैं। उनके विरुद्ध पाकिस्तान की आईएसआई ने मोर्चा खोल रखा है। सरकार के विरुद्ध राष्ट्रवादी कबीलों ने 'बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी' गठित कर ली है। सरदार अताउल्ला के नेतृत्व में पिछले दिनों लंदन में एक बैठक हुई जिसमें मुहाजिर कौमी मूवमेंट के नेता अल्ताफ हुसैन, पख्तून मिल्ली अवाम के नेता मोहम्मद खान अचकजई और सिन्धी नेता सैयद इमदाद शाह उपस्थित थे। अपनी बैठक में इन नेताओं ने द्विराष्ट्र के सिद्धांत की कड़ी आलोचना करते हुए पाकिस्तान के खिलाफ आवाज बुलंद करने की अपील की।

एक और बलूच नेता गुलाम मोहम्मद बलूच, जिन्होंने बीएनएम का गठन किया था, ने बलूचिस्तान की आजादी के लिए अपनी अंतिम सांस तक संघर्ष किया। उन्हें उनके वकील और पूर्व मंत्री कचकोल अली के चैंबर से उनके सहायक लाला मुनीर बलूच और बलूच रिपब्लिकन पार्टी के नेता शेर मोहम्मद बलूच के साथ अगवा किया गया था। 5 दिनों बाद पिडरक में भेड़ें चरा रहे स्थानीय लोगों ने इनके क्षत-विक्षत शव को देखा। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सैन्य गुप्तचरों से धमकियों के बाद उनके अधिवक्ता कचकोल अली को बलूचिस्तान छोड़ना पड़ा, जो अब ओस्लो (नॉर्वे) में निर्वासन में रह रहे हैं।

आतंकवादी नहीं हैं बलूच : बलूचिस्तान के लोग इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने का कार्य नहीं करते हैं जबकि उन्हें तो पाकिस्तानी फौज के अलावा पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों से भी चुनौती मिल रही है। कश्मीर में इसके उलट स्थिति है। पाक अधिकृत कश्मीर में कई आतंकवादी कैंप चल रहे हैं, जो भारतीय कश्मीर को जला रहे हैं। आजादी के लगभग 40 वर्षों तक कश्मीर के सुन्नी लोग आतंक की राह पर नहीं चले थे लेकिन बेनजीर और मुशर्रफ के काल के बीच उनको चरणबद्ध तरीके से भारत के खिलाफ खड़ा किया गया।

बलूची तो 1948 से ही अपनी आजादी की जंग लड़ रहे हैं। उन पर एक ओर से जहां पाकिस्तानी फौज अत्याचार कर रही है वहीं दूसरी ओर लगभग 2010 से पाकिस्तानी तालिबान और कट्टर सुन्नी गुटों- लश्कर-ए-जांघी और जमायत-ए-इस्लामी ने भी अपने हमले तेज कर दिए हैं जिसके चलते अब बलूचों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। ये कट्टरपंथी सुन्नी संगठन बलूच मुसलमानों के साथ ही हिन्दुओं और शिया समुदाय तथा अन्य अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाते हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक इन हमले से हजारों अल्पसंख्‍यकों की जानें चली गई और करीब 3,00,000 लोग विस्थापित हैं, जो सिन्ध और भारत में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।

बाहरी और पंजाबी की बसाहट बलूचिस्तान में : ऐसी परिस्‍थिति में पाकिस्तानी हुक्मरानों ने वहां का जनसंख्‍या गणित बदलने के लिए हाल के दिनों में अपनी परियोजनाओं के लिए बाहर से लोगों को लाकर बसाने की नीति शुरू की थी। उनकी दलील थी कि बलूच आबादी में साक्षरता दर बेहद कम होने और हुनरमंद लोगों की कमी की वजह से ऐसा करना जरूरी है। इस नीति के चलते पाकिस्तान ने कई इलाकों में बलूचों को अल्पसंख्यक बना दिया है।

ग्वादर बंदरगाह, चीन और पाकिस्तान, जानिए क्या है हकीकत...

ग्वादर बंदरगाह : बलूचों का आंदोलन उस वक्त तेज हो गया, जब पाकिस्तान ने उनकी भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा चीन के हवाले कर दिया। चीन यहां अपने दक्षिणी प्रांतों से पाकिस्तान में आर्थिक कॉरिडोर का एक अहम पड़ाव बनाना चाहता है। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ। हालांकि इस पर पूरा नियंत्रण पाकिस्तान की संघीय सरकार का है। इसके निर्माण में चीनी इंजीनियर या मजदूर ही लगाए गए हैं। बलूच लोगों को तकरीबन इससे बाहर रखा गया है। आसपास की जमीनें भी कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों ने बलूच लोगों से लेकर भारी मुनाफे में चीन को बेच दी हैं।
प्राकृतिक संसाधनों से भरे इस इलाके में लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब है। आज भी यहां लोग बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। ग्वादर पोर्ट डेवलपमेंट के नाम पर इस भरपूर संपदा पर चीन ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। 1952 में इस प्रांत के डेरा बुगती में गैस भंडार का पता चला और दो वर्ष बाद उत्पादन शुरू हो गया। हालांकि, उसका फायदा समूचे सिंध और पंजाब को हुआ, लेकिन बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा को इस पाइपलाइन से 1985 में जोड़ा गया। इसी क्षेत्र के चगाई मरुस्थल में 2002 में एक सड़क परियोजना शुरू की गई, जो चीन के साथ तांबा, सोना और चांदी उत्पादन करने की पाकिस्तान की योजना है। इससे हासिल मुनाफे में 75 फीसदी हिस्सेदारी चीन की है और 25 फीसदी पाकिस्तान की। बलूचिस्तान को इसमें से कुछ नहीं मिलता है। कहते जरूर है कि 2 फीसदी दिया जाता है।

बंदरगाह की सचाई ये है
 दरअसल, चीन सामरिक दृष्टि से भारत और अन्य देशों से निपटने के लिए एक सुरंग बना रहा है। चीन और पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होते हुए 200 किमी लंबी सुरंग बनाने का समझौता किया था। रणनीतिक लिहाज से अहम इस इलाके में सुरंग को बनाने पर 18 अरब डॉलर का भारी-भरकम खर्च किए जाने की योजना है। पीओके से गुजरने वाले पाक-चीन आर्थिक गलियारे से चीन का सामरिक हित भी जुड़ा है।

दरअसल, यह पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान के विकास नहीं, भारत पर दबाव बनाने की ही रणनीति का एक हिस्सा है। यह सुरंग अरब सागर में बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन में काशघर से जोड़ेगी। महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह के अलावा कश्मीर का एक बहुत बड़ा भू-भाग अक्साई चिन पाकिस्तान ने चीन को दे दिया है, जहां पर पूर्ण रूप से चीन का ही नियंत्रण है।

भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार चीनी सेना पीओके में पाकिस्तानी सैनिकों को हथियार संबंधी ट्रेनिंग दे रही है। बीएसएफ की खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेनिंग प्रोग्राम राजौरी सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा के उस पार चल रहा है। यह अभ्यास पाक के अग्रिम रक्षा ठिकानों पर हो रहा है, वहीं बीएसएफ की अन्य एक सूचना के मुताबिक श्रीगंगानगर सेक्टर के उस पार कुछ पाक सैन्य इकाइयों ने चौकियों पर रेंजर्स का स्थान ले लिया है। पाक सेना और रेंजर्स भारतीय सैनिकों और संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए रणनीतिक ठिकानों और चौकियों पर अचूक निशानेबाज तैनात करने की योजना बना रहे हैं।

बलूचिस्तान का प्राकृतिक खजाना और चीन-पाक की लूट


चीन की उपस्थिति से भड़के बलूच : बलूच जनता चीन की उपस्थिति और अपनी उपेक्षा से और भड़क गई। पाकिस्तानी फौज ने इस नाराजगी को दबाने के लिए बर्बर कार्रवाई का रास्ता अपनाया और हजारों बलूचों को मौत के घाट उतार दिया। आखिरकार मजबूर होकर 2004 में बलूच अलगाववादियों ने हमला कर 3 चीनी इंजीनियरों को मार दिया और इस संघर्ष को पूरे इलाके में फैला दिया।
बलूचों से समझौता : 2005 में बलूच सियासी लीडर नवाब अकबर खान और मीर बलूच मर्री ने बलूचिस्तान की स्वायत्तता के लिए पाकिस्तान सरकार को 15 सूत्री एजेंडा दिया। इनमें प्रांत के संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण और फौजी ठिकानों के निर्माण पर प्रतिबंध की मांग प्रमुख थी। इसी दौरान 15 दिसंबर 2005 को पाकिस्तानी फ्रंटियर कॉर्प्स के मेजर शुजात जमीर डर और ब्रिगेडियर सलीम नवाज के हेलीकॉप्टर पर कोहलू में हमला हुआ और दोनों घायल हो गए। बाद में पाकिस्तान ने नवाब अकबर खान बुगती को परवेज मुशर्रफ पर रॉकेट हमले का दोषी मानते हुए उन पर हमला किया। पाकिस्तानी फौज से लड़ते हुए नवाब अकबर खान शहीद हो गए।

इसके बाद पाकिस्तान के अत्याचार और बढ़ गए। अप्रैल 2009 में बलूच नेशनल मूवमेंट के सदर गुलाम मोहम्मद बलूच और दो अन्य नेताओं लाला मुनीर और शेर मुहम्मद को कुछ बंदूकधारियों ने एक छोटे-से दफ्तर से अगवा कर लिया। 5 दिन बाद 8 अप्रैल को गोलियों से बिंधे उनके शव एक बाजार में पड़े पाए गए। इस वारदात से पूरे बलूचिस्तान में हफ्तों तक बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों और हिंसा तथा आगजनी का दौर चला। आखिर इसका नतीजा यह हुआ कि 12 अगस्त 2009 को कलात के खान मीर सुलेमान दाऊद ने खुद को बलूचिस्तान का शासक घोषित कर दिया और आजाद बलूचिस्तान काउंसिल का गठन किया।

इसी काउंसिल के धन्यवाद प्रस्ताव का जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लाल किले के भाषण में किया। इसके दायरे में पाकिस्तान के अलावा ईरान के इलाकों को भी शामिल किया गया लेकिन अफगानिस्तान वाले हिस्से को छोड़ दिया गया। काउंसिल का दावा है कि इसमें नवाबजादा ब्रहमदाग बुगती सहित सभी गुटों का प्रतिनिधित्व है। सुलेमान दाऊद ने ब्रिटेन का आह्वान किया कि बलूचिस्तान पर गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ विश्व मंच पर आवाज उठाने की उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।

बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर चीनियों और पाकिस्तानियों का कब्जा : बलूच लोगों को सबसे अधिक यह बात परेशान कर रही है कि उनके संसाधनों का दोहन पाकिस्तान और चीन कर रहा है और उनके हिस्से में कुछ भी नहीं आ रहा है। न उनके लोगों को रोजगार है, न शिक्षा, न बिजली-पानी और न ही संसाधनों का कुछ हिस्सा जिसके चलते उन्हें गुरबत में जीना पड़ रहा है।

बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस के भंडार के अलावा यूरेनियम, पेट्रोल, तांबा और ढेर सारी दूसरी धातुएं भी हैं। यहां के सुई नामक जगह पर मिलने वाली गैस से पूरे पाकिस्तान की आधी से ज्यादा जरूरत पूरी होती है लेकिन इसके बदले स्थानीय बलूची लोगों को न तो रोजगार मिला और न ही रॉयल्टी। हालांकि दिखावे के लिए दी गई रॉयल्टी भी यह कहकर वापस ले ली जाती है कि गैस निकालने की लागत अधिक है। इससे बलूचिस्तान पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। बलूचिस्तान पर पाकिस्तान अपनी हुकूमत तो चलाना चाहता है लेकिन बलूची लोगों को राजनीतिक या आर्थिक अधिकार देने को तैयार नहीं लिहाजा बलूचिस्तान में विरोध की आवाज बुलंद हो गई है जिसे दबाना अब पाक के बस की बात नहीं।

बलूचों के बारे में कहा जाता है कि वे मरने के लिए तैयार हैं, लेकिन झुकने के लिए नहीं। एक अकेले बलूच ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तकरीर में आजादी के नारे लगाए थे लेकिन सेना और पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी। बलूचों की इसी जिद के चलते आज तक आजादी का संघर्ष अववरत जारी है। एक बलूच का कहना है कि पाकिस्तानी फौज हम पर जितने जुल्म करेगी हम भी उतनी ही ताकत से और उभरकर सामने आएंगे। वे हमारी बहनों-बेटियों के साथ बलात्कार करते हैं, हमारे बच्चों को मौत के घाट उतार दे रहे हैं। हमारा अस्तित्व खत्म करने पर आए हैं तो हम क्या करेंगे? हम भी उनको नहीं छोड़ेंगे। हम मरते दम तक लड़ेंगे।
      source---http://hindi.webdunia.com/current-affairs/balochistan-history-and-politics-116082300014_1.html



Thursday, October 8, 2015

नर्क में है जीवों के लिए अजब-गजब दंड का प्रावधान, हर बुरे कर्म के लिए अलग नर्क

 अगर आप आस्तिक हैं तो आप धर्मानुशासन से भी पूरी तरफ वाकिफ भी होंगे। हमारे धर्म में संसारी मानव को गलत कार्यों से रोकने के लिेए स्वर्ग व नरक का प्रावधान इस कदर रखा गया कि कोई उससे परे जाने की हिम्मत न कर सके। पुराणों व उपनिषदों वगैरह में इसका विस्तार से उल्लेख है। हिंदू धर्म के अलावा जैन व बौद्ध धर्म में भी कर्मो के आधार पर जीवन के संचालन की बात कहीं गई है। यह बेहद ही मनोवैज्ञानिक तरीके से समाज को नियत्रित करने का तरीका तलाशा गया जो आज भी सामाजिक नियंत्रण की बड़ी भूमिका निभाता है।
    हिंदू धर्मग्रन्थों यथा गरुड़ पुराण से लेकर कठोपन‌िषद् तक हर जगह मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्‍थ‌ित‌ि का उल्लेख क‌िया गया है। इनमें बताया गया है क‌ि धरती पर जीव जो भी कर्म करते हैं उनका फल उन्हें परलोक में म‌िलता है। यमराज कर्म के अनुसार जीव को स्वर्ग और नर्क में भेजते हैं। नर्क के बारे में कहा गया है क‌ि यहां जीवों को अजब-गजब दंड द‌िया जाता है और इसके ल‌िए अलग-अलग नर्क बने हुए हैं। पुराणों में  36 तरह के नर्क बताए गए हैं।
महावीच‌ि:
महावीच‌ि नाम का नर्क रक्त से भरा हुआ है इसमें वज्र के समान कांटे। इसमें गया हुआ जीव कांटों से ब‌िंधकर कष्ट पाता है। कहते हैं गाय का वध करने वाला इस नर्क में एक लाख वर्ष तक रहकर कष्ट भोगता है।
कुंभीपाक
इस नर्क में गर्म रेत और अंगारे ब‌िछे हुए हैं। इस नर्क में दूसरों की जमीन और धरोहर हड़पने वाले के अलावे ब्राह्मणों की हत्या करने वालों को भेजा जाता है।
रौरव
जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इस नर्क में ईख की तरह पेरा जाता जाता है।
मंजूस
इस नर्क में उन्हें दंड द‌िया जाता है जो न‌िर्दोष को बंदी बनाते हैं। यह नर्क जलते हुए सलाखों का बना है ज‌िसमें दोषी जीव को डालकर जलाया जाता है।
अप्रत‌िष्ठ
इस नर्क में उन लोगों को डाला जाता है जो धार्म‌िक व्यक्त‌ियों को कष्ट देते हैं। यह नर्क मल, मूत्र पीब से भरा हुआ है। इसमें पापी जीव को उलटा करके ग‌िराया जाता है।
व‌िलेपकः
इस नर्क में वैसे ब्राह्मण जाते हैं जो मद‌िरापान करते हैं। यह नर्क लाह की आग से जलता रहता है। इस आग में जीव को झोंक द‌िया जाता है।
महाप्रभ
यह नर्क बहुत ऊंचा है। इसमें बड़ा सा शूल गड़ा है। जो व्यक्त‌ि पत‌ि-पत्नी में व‌िभेद करवाकर उन्हें अलग करवाते हैं उन्हे इस नर्क में डालकर शूल से छेदा जाता है।
जयंती
इस नर्क में एक व‌िशाल चट्टान है। इस नर्क में परायी स्‍त्र‌ियों के साथ शारीर‌िक संबंध बनाने वाले को इसी चट्टान के नीचे दबाया जाता है।
शल्मल‌ि
यह नर्क जलते हुए कांटों से भरा हुआ है। इस नर्क में उन स्‍त्र‌ियों को जलते हुए शल्म‌ल‌ि वृक्ष का आल‌िंगन करना पड़ता है जो पर पुरुष से संबंध बनाती है। यहां परायी स्‍त्र‌ियों से संबंध बनाने और कुदृष्ट‌ि रखने वालों की यमदूत आंखें फोड़ देते हैं।
महारौरव
जो लोग खेत, खल‌िहान और गांव, घर में आग लगाते हैं उन्हें युगों तक इस नर्क में पकाया जाता है।
ताम‌िस्र
इस नर्क में यमदूत भयानक अस्‍त्र शस्‍त्र से चोरों की प‌िटाई करते हैं।
अस‌िपत्र
इस वन के पत्ते तलवार जैसे हैं। म‌ित्रों को धोखा देने वालों को इस वन में डाल द‌िया जाता है जहां वर्षों तक इस वन के पत्तों से कट फट कर जीव दुःखी होता रहता है।
करंभबालुका
यह नर्क कुएं जैसा है ज‌िसमें गर्म रेत, अंगारे और कांटे ब‌िछे हुए हैं जहां पाप कर्म करने वाले को 10 हजार वर्ष तक दंड भोगना पड़ता है
काकोल
कीड़े और पीब से भरे इस नर्क में उन्हें ग‌िराया जाता है जो दूसरों को द‌िए ब‌िना अकेले म‌िष्टान खाते हैं।
कड‍्मल
पंचयज्ञ को जो नहीं करते हैं उन्हें मल, मूत्र और रक्त से भरे इस नर्क में ग‌िराया जाता है।
त‌िलपाक
दूसरों को सताने वाले लोगों को इस नर्क में डाला जाता है जहां त‌िल से जैसे तेल न‌िकाला जाता है उसी प्रकार उन्हें पेर कर उन्हें दंड द‌िया जाता है।
महावट
यह नर्क मुर्दों और कीटों से भरा है। जो व्यक्त‌ि अपनी बेट‌ियों को बेचता है उसे इस नर्क में उलटा करके ग‌िराया जाता है।
महाभीम
यह नर्क सड़े हुए मांस और रक्त से भरा है जहां मांस, मद‌‌िरा और अखाद्य पदार्थों को खाने वालों को डाला जाता है
तैलपाक
इस नर्क में शरण में आए हुए लोगों की मदद नहीं करने वाले को तेल के कड़ाही में पकाया जाता है।
वज्रकपाट
वज्र के समान कठोर इस नर्क में उन लोगों को दंड द‌िया जाता है जो पशुओं पर अत्याचार करके उनका दूध बेचते हैं।
    इसके अलावा अन्य कई प्रकार के नर्क हैं ज‌िनमें न‌िरुच्छवास, अंड्गरोपचय, महापायी, महाज्वाल, क्रकच, गुडपाक, छुरधार, अंबरीष, वज्रकुठार, पर‌िताभ, कालसूत्र, कश्मल, उग्रगंध, दुर्धर, वज्रमहापीर।
कहते हैं मृत्यु के बाद हर क‌िसी की आत्मा को सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करके जीवों का न्याय करने वाले यमलोक के पास जाना पड़ता है। यमलोक के बारे में कहा जाता है क‌ि यह बहुत ही डरावना है। यहां जीवों को तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं।
 यमराज का ही दूसरा नाम धर्मराज है क्योंक‌ि यह धर्म और कर्म के अनुसार जीवों को अलग-अलग लोकों और योन‌ियों में भेजते हैं। धर्मात्मा व्यक्त‌ि को यह कुछ-कुछ व‌िष्‍णु भगवान की तरह दर्शन देते हैं और पाप‌ियों को उग्र रुप में।

Sunday, September 27, 2015

200 साल पुरानी 'रामनगर की रामलीला' दिखेगी टीवी पर


यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल देश की सबसे पुरानी 'रामनगर की मशहूर रामलीला' को पहली बार दूरदर्शन एक फिल्म के रूप में लगातार एक महीने तक दिखाएगा। करीब 200 साल से चली आ रही इस पुश्तैनी रामलीला को 27 सितंबर से 27 अक्टूबर तक हर रोज रात 8:30 बजे डी.डी भारती पर दिखाया जाएगा।

इसी दौरान राष्ट्रीय इंदिरा गांधी कला केंद्र भी हर रोज शाम 6:00 बजे से इस फिल्म का एक-एक अंश दिखाएगा। केंद्र ने इस रामलीला पर एक अनोखी प्रदर्शनी भी आयोजित की है। देश में किसी भी रामलीला पर यह पहली प्रदर्शनी है। साथ ही दूरदर्शन पहली बार किसी रामलीला को लगातार एक महीने दिखाएगा।

वाराणसी से 20 किलोमीटर दूर रामनगर में हर साल यह रामलीला होती है। रामनगर के महाराजा गत 200 सालों से इस रामलीला का आयोजन करते रहे हैं जो 31 दिन तक रोज होती है। देश के किसी भी हिस्से में इतने दिनों तक कोई भी रामलीला नहीं होती है।

प्रदर्शनी के संयोजक गौतम चटर्जी और दूरदर्शन के क्रिएटिव प्रोड्यूसर डॉ. गौरीशंकर रैना ने बताया कि रामनगर के महाराजा आदित्य नारायण सिंह ने इस रामलीला की शुरुआत की थी। बाद में उनके पुत्र महाराजा विभूति नारायाण इसे आयोजित करते रहे और अब उनके निधन के बाद उनके पुत्र महाराजा अनंत कुमार सिंह इसे आयोजित करते हैं।

हर साल महाराजा के गुरुकुल के बच्चे इस रामलीला के पात्र होते हैं। रामनगर के महाराजा ही इन बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च उठाते हैं और ये बच्चे 31 दिनों तक संयमित ढंग से खान-पान और आचरण भी करते हैं। उन्हें रामलीला के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हर साल गुरुकुल के नए बच्चे इस रामलीला में अभिनय करते हैं।

यह रामलीला रामनगर में 4 किलोमीटर के दायरे में 31 स्थानों पर जगह बदल-बदल कर होती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व निदेशक और मशहूर रंगकर्मी अनुराधा कपूर ने इस रामलीला पर पीएचडी भी की है। उनका कहना है कि यह रामलीला दुनिया का पहला गतिशील (मूविंग) नाट्य मचंन है जो हर दिन अलग अलग स्थानों पर किया जाता है। रामचरित मानस की चौपाइयों पर आधारित अवधि में होने वाली इस रामलीला में न तो कोई माइक होता है और न ही लाईट बल्कि पेट्रोमैक्स की रोशनी में इस रामलीला को खेला जाता है और 40 किलोमीटर दूर के गांवों से लाखों लोग इसे देखने आते हैं।

इस रामलीला की खासियत यह है कि रामलीला के दौरान रावण दहन या आतिशबाजी और मंच सज्जा के सभी कारीगर मुस्लिम होते हैं। रामलीला के पात्र वही होते हैं जो 200 साल से पुश्तैनी रूप से अभिनय करते रहे हैं। दूरदर्शन की करीब 40 लोगों की टीम ने पिछले साल 27 सितंबर से 27 अक्टूबर तक इस रामलीला की रिकॉर्डिंग की थी। उस रिकॉर्डिंग को एडिट कर इस साल इसे दिखाया जा रहा है।


Thursday, September 17, 2015

खुदाई में मिला विजयनगर का खजाना!

     तेलंगाना में खम्मम जिले के गर्लाबाय्याराम पुलिस थाना क्षेत्र में विजयनगर काल के 40 सोने के सिक्के और एक पीतल का बर्तन मिला है। तेलंगाना पुरातत्व और संग्रहालय की निदेशक सुनिता ने बताया कि सिक्कों की शुरुआती जांच में ये खजाना विजयनगर काल का लग रहा है। ये सिक्के तुलुव राजवंश के  राजा कृष्णदेवराय (1506-1530) और अच्युताराय (1530-1542) के काल के प्रतीत हो रहे हैं। सुनिता ने बताया कि गर्लाबाय्याराम के पुलिस के उप निरीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक यह खजाना पांच महीने पहले  पाथयातंडा शिवार में मिला था।
उन्होंने बताया कि इन कुछ सिक्कों पर बैठे हुए भगवान बालकृष्ण का चित्र अंकित है जिन्होंने अपने दाएं हाथ में मक्खन लिया हुआ है और उनका बायां हाथ पैर बांये पैर के घुटने पर है। सिक्के पर भगवान बालकृष्ण के बांई ओर शंख और दाई ओर चक्र रखा हुआ है।
    दूसरे तरह के सिक्के की एक तरफ दो सिर वाले गरुड़ को ऊपर की तरफ उड़ते हुए दिखाया गया है जिसने अपनी दोनों चोंचों और दोनों पंजों से एक हाथी को पकड़ा हुआ है।
   सिक्के के पीछे की तरफ नगरी भाषा में तीन लाइनों में श्री प्रा ता पा च्यु ता रा या लिखा हुआ है। ये सिक्के गोलाकार है और इनका वजन 1650 मिलिग्राम से लेकर 3380 मिलिग्राम तक है। (वार्ता)

Friday, August 28, 2015

गीता प्रेस, गोरखपुर में लगा 'ताला'

     शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने कभी हिन्दू धार्मिक पुस्तक पर 'गीता प्रेस, गोरखपुर' की लाइन न देखी हो। भारत में धर्म की गंगा बहाने वाली गीता प्रेस, गोरखपुर इन दिनों 'संकट' में है। खबरों के मुताबिक ट्रस्ट और कर्मचारियों के बीच विवाद से गीता प्रेस, गोरखपुर पर 25 दिनों से ताला लगा हुआ है। ट्रस्ट और कर्मचारियों के विवाद के बाद प्रेस बंद पड़ी है। हर हिन्दू को संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाली ‍गीता प्रेस, गोरखपुर वर्तमान में बदहाल स्थिति में है। 

हर हिन्दू धर्म को मानने वाले व्यक्ति के लिए गीता प्रेस, गोरखपुर एक तीर्थ की तरह है, लेकिन आज इस तीर्थ से ज्ञान की गंगा नहीं बह रही है। जानकारी के मुताबिक गीता प्रेस, गोरखपुर रोजाना करीब 50 हजार से ज्यादा धार्मिक पुस्तकें बेचती हैं।

कब हुई थी शुरुआत : गीता प्रेस, गोरखपुर की स्थापना 1923 में हुई थी। गीता प्रेस, गोरखपुर का संचालन कोलकाता स्थित गोविंद भवन संस्था करती है। आम लोगों के बीच सनातन धर्म के प्रचार के लिए गीता प्रेस की स्थापना की गई थी।

कम लागत पर पुस्तकें : प्रेस का स्थापना का उद्देश्य कम मूल्य पर धार्मिक किताबें उपलब्ध कराना था। गीता प्रेस, गोरखपुर धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है। प्रेस में करीब 780 पुस्तकों का प्रकाशन हिन्दी और संस्कृत में होता है।

गीता प्रेस वह पहली प्रेस है, जिसने नेपाली भाषा में रामायण का प्रकाशन किया था। इसकी लाइब्रेरी में कई दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं। इसके कुल में 35 प्रतिशत हिस्सा रामचरित मानस का है। गीता प्रेस बिना लाभ के पुस्तकों का विक्रय करती है। लागत से 40 से 90 प्रतिशत कम कीमतों पर किताबों को बेचा जाता है।  इस बात का उदाहरण है कि यहां छपी हनुमान चालीसा चाय से भी कम कीमत 2 रुपए में मिल जाती है।

यह है विवाद : खबरों के मुताबिक प्रेस में करीब 180 स्थायी और 300 अस्थायी कर्मचारी काम करते हैं। बताया जाता है कि ट्रस्ट और कर्मचारियों के बीच दो मांगों पर विवाद है। पहली, कर्मचारी सभी के लिए समान वेतन की मांग कर रहे हैं। दूसरी, अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने को लेकर है।

इसी विवाद के बाद बाद गीता प्रेस, गोरखपुर में छपाई का काम नहीं हो रहा है। खबरों के अनुसार ट्रस्ट ने कर्मचारियों पर मारपीट का आरोप भी लगाया है। मारपीट के आरोप में ट्रस्ट ने 17 कर्मचारियों को निलंबित किया है। कर्मचारी इन 17 कर्मचारियों को भी वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

किसी से नहीं लेती आर्थिक मदद : गीता प्रेस, गोरखपुर में हर महीने करीब 400 टन कागजों पर छपाई होती है। प्रेस इस पर किसी भी प्रकार की सब्सिडी नहीं लेती है। गीता प्रेस बाजार भाव पर ही कागजों की खरीदी करती है। गीता प्रेस की नीति के मुताबिक वह सरकार, संस्था या किसी व्यक्ति से भी किसी भी तरह की आर्थिक मदद भी नहीं ली जाती है।

गलती पर इनाम : गांधीजी की सलाह पर प्रेस की किसी धार्मिक पुस्तक पर विज्ञापन और किसी पुस्तक की समीक्षा नहीं छापी जाती है। यहां तक की किसी जीवित व्यक्ति का फोटो भी किसी पुस्तक में नहीं प्रकाशित किया जाता है। धार्मिक पुस्तक में किसी प्रकार की गलती होने पर बताने वाले पाठक को प्रेस इनाम भी देती है।

गीता प्रेस ने दी सफाई : इस पूरे विवाद पर गीता प्रेस गोरखपुर ने ट्‍वीट कर सफाई दी है कि गीता प्रेस को किसी प्रकार के अनुदान की आवश्यकता नहीं है। कर्मचारियों से बात चल रही है और सभी कर्मचारी जल्द काम पर लौटेंगे।
http://hindi.webdunia.com/regional-hindi-news/gita-press-gorakhpur-115082800076_1.html

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