इतिहास ब्लाग में आप जैसे जागरूक पाठकों का स्वागत है।​

Website templates

Thursday, October 8, 2015

नर्क में है जीवों के लिए अजब-गजब दंड का प्रावधान, हर बुरे कर्म के लिए अलग नर्क

 अगर आप आस्तिक हैं तो आप धर्मानुशासन से भी पूरी तरफ वाकिफ भी होंगे। हमारे धर्म में संसारी मानव को गलत कार्यों से रोकने के लिेए स्वर्ग व नरक का प्रावधान इस कदर रखा गया कि कोई उससे परे जाने की हिम्मत न कर सके। पुराणों व उपनिषदों वगैरह में इसका विस्तार से उल्लेख है। हिंदू धर्म के अलावा जैन व बौद्ध धर्म में भी कर्मो के आधार पर जीवन के संचालन की बात कहीं गई है। यह बेहद ही मनोवैज्ञानिक तरीके से समाज को नियत्रित करने का तरीका तलाशा गया जो आज भी सामाजिक नियंत्रण की बड़ी भूमिका निभाता है।
    हिंदू धर्मग्रन्थों यथा गरुड़ पुराण से लेकर कठोपन‌िषद् तक हर जगह मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्‍थ‌ित‌ि का उल्लेख क‌िया गया है। इनमें बताया गया है क‌ि धरती पर जीव जो भी कर्म करते हैं उनका फल उन्हें परलोक में म‌िलता है। यमराज कर्म के अनुसार जीव को स्वर्ग और नर्क में भेजते हैं। नर्क के बारे में कहा गया है क‌ि यहां जीवों को अजब-गजब दंड द‌िया जाता है और इसके ल‌िए अलग-अलग नर्क बने हुए हैं। पुराणों में  36 तरह के नर्क बताए गए हैं।
महावीच‌ि:
महावीच‌ि नाम का नर्क रक्त से भरा हुआ है इसमें वज्र के समान कांटे। इसमें गया हुआ जीव कांटों से ब‌िंधकर कष्ट पाता है। कहते हैं गाय का वध करने वाला इस नर्क में एक लाख वर्ष तक रहकर कष्ट भोगता है।
कुंभीपाक
इस नर्क में गर्म रेत और अंगारे ब‌िछे हुए हैं। इस नर्क में दूसरों की जमीन और धरोहर हड़पने वाले के अलावे ब्राह्मणों की हत्या करने वालों को भेजा जाता है।
रौरव
जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इस नर्क में ईख की तरह पेरा जाता जाता है।
मंजूस
इस नर्क में उन्हें दंड द‌िया जाता है जो न‌िर्दोष को बंदी बनाते हैं। यह नर्क जलते हुए सलाखों का बना है ज‌िसमें दोषी जीव को डालकर जलाया जाता है।
अप्रत‌िष्ठ
इस नर्क में उन लोगों को डाला जाता है जो धार्म‌िक व्यक्त‌ियों को कष्ट देते हैं। यह नर्क मल, मूत्र पीब से भरा हुआ है। इसमें पापी जीव को उलटा करके ग‌िराया जाता है।
व‌िलेपकः
इस नर्क में वैसे ब्राह्मण जाते हैं जो मद‌िरापान करते हैं। यह नर्क लाह की आग से जलता रहता है। इस आग में जीव को झोंक द‌िया जाता है।
महाप्रभ
यह नर्क बहुत ऊंचा है। इसमें बड़ा सा शूल गड़ा है। जो व्यक्त‌ि पत‌ि-पत्नी में व‌िभेद करवाकर उन्हें अलग करवाते हैं उन्हे इस नर्क में डालकर शूल से छेदा जाता है।
जयंती
इस नर्क में एक व‌िशाल चट्टान है। इस नर्क में परायी स्‍त्र‌ियों के साथ शारीर‌िक संबंध बनाने वाले को इसी चट्टान के नीचे दबाया जाता है।
शल्मल‌ि
यह नर्क जलते हुए कांटों से भरा हुआ है। इस नर्क में उन स्‍त्र‌ियों को जलते हुए शल्म‌ल‌ि वृक्ष का आल‌िंगन करना पड़ता है जो पर पुरुष से संबंध बनाती है। यहां परायी स्‍त्र‌ियों से संबंध बनाने और कुदृष्ट‌ि रखने वालों की यमदूत आंखें फोड़ देते हैं।
महारौरव
जो लोग खेत, खल‌िहान और गांव, घर में आग लगाते हैं उन्हें युगों तक इस नर्क में पकाया जाता है।
ताम‌िस्र
इस नर्क में यमदूत भयानक अस्‍त्र शस्‍त्र से चोरों की प‌िटाई करते हैं।
अस‌िपत्र
इस वन के पत्ते तलवार जैसे हैं। म‌ित्रों को धोखा देने वालों को इस वन में डाल द‌िया जाता है जहां वर्षों तक इस वन के पत्तों से कट फट कर जीव दुःखी होता रहता है।
करंभबालुका
यह नर्क कुएं जैसा है ज‌िसमें गर्म रेत, अंगारे और कांटे ब‌िछे हुए हैं जहां पाप कर्म करने वाले को 10 हजार वर्ष तक दंड भोगना पड़ता है
काकोल
कीड़े और पीब से भरे इस नर्क में उन्हें ग‌िराया जाता है जो दूसरों को द‌िए ब‌िना अकेले म‌िष्टान खाते हैं।
कड‍्मल
पंचयज्ञ को जो नहीं करते हैं उन्हें मल, मूत्र और रक्त से भरे इस नर्क में ग‌िराया जाता है।
त‌िलपाक
दूसरों को सताने वाले लोगों को इस नर्क में डाला जाता है जहां त‌िल से जैसे तेल न‌िकाला जाता है उसी प्रकार उन्हें पेर कर उन्हें दंड द‌िया जाता है।
महावट
यह नर्क मुर्दों और कीटों से भरा है। जो व्यक्त‌ि अपनी बेट‌ियों को बेचता है उसे इस नर्क में उलटा करके ग‌िराया जाता है।
महाभीम
यह नर्क सड़े हुए मांस और रक्त से भरा है जहां मांस, मद‌‌िरा और अखाद्य पदार्थों को खाने वालों को डाला जाता है
तैलपाक
इस नर्क में शरण में आए हुए लोगों की मदद नहीं करने वाले को तेल के कड़ाही में पकाया जाता है।
वज्रकपाट
वज्र के समान कठोर इस नर्क में उन लोगों को दंड द‌िया जाता है जो पशुओं पर अत्याचार करके उनका दूध बेचते हैं।
    इसके अलावा अन्य कई प्रकार के नर्क हैं ज‌िनमें न‌िरुच्छवास, अंड्गरोपचय, महापायी, महाज्वाल, क्रकच, गुडपाक, छुरधार, अंबरीष, वज्रकुठार, पर‌िताभ, कालसूत्र, कश्मल, उग्रगंध, दुर्धर, वज्रमहापीर।
कहते हैं मृत्यु के बाद हर क‌िसी की आत्मा को सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करके जीवों का न्याय करने वाले यमलोक के पास जाना पड़ता है। यमलोक के बारे में कहा जाता है क‌ि यह बहुत ही डरावना है। यहां जीवों को तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं।
 यमराज का ही दूसरा नाम धर्मराज है क्योंक‌ि यह धर्म और कर्म के अनुसार जीवों को अलग-अलग लोकों और योन‌ियों में भेजते हैं। धर्मात्मा व्यक्त‌ि को यह कुछ-कुछ व‌िष्‍णु भगवान की तरह दर्शन देते हैं और पाप‌ियों को उग्र रुप में।

Sunday, September 27, 2015

200 साल पुरानी 'रामनगर की रामलीला' दिखेगी टीवी पर


यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में शामिल देश की सबसे पुरानी 'रामनगर की मशहूर रामलीला' को पहली बार दूरदर्शन एक फिल्म के रूप में लगातार एक महीने तक दिखाएगा। करीब 200 साल से चली आ रही इस पुश्तैनी रामलीला को 27 सितंबर से 27 अक्टूबर तक हर रोज रात 8:30 बजे डी.डी भारती पर दिखाया जाएगा।

इसी दौरान राष्ट्रीय इंदिरा गांधी कला केंद्र भी हर रोज शाम 6:00 बजे से इस फिल्म का एक-एक अंश दिखाएगा। केंद्र ने इस रामलीला पर एक अनोखी प्रदर्शनी भी आयोजित की है। देश में किसी भी रामलीला पर यह पहली प्रदर्शनी है। साथ ही दूरदर्शन पहली बार किसी रामलीला को लगातार एक महीने दिखाएगा।

वाराणसी से 20 किलोमीटर दूर रामनगर में हर साल यह रामलीला होती है। रामनगर के महाराजा गत 200 सालों से इस रामलीला का आयोजन करते रहे हैं जो 31 दिन तक रोज होती है। देश के किसी भी हिस्से में इतने दिनों तक कोई भी रामलीला नहीं होती है।

प्रदर्शनी के संयोजक गौतम चटर्जी और दूरदर्शन के क्रिएटिव प्रोड्यूसर डॉ. गौरीशंकर रैना ने बताया कि रामनगर के महाराजा आदित्य नारायण सिंह ने इस रामलीला की शुरुआत की थी। बाद में उनके पुत्र महाराजा विभूति नारायाण इसे आयोजित करते रहे और अब उनके निधन के बाद उनके पुत्र महाराजा अनंत कुमार सिंह इसे आयोजित करते हैं।

हर साल महाराजा के गुरुकुल के बच्चे इस रामलीला के पात्र होते हैं। रामनगर के महाराजा ही इन बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च उठाते हैं और ये बच्चे 31 दिनों तक संयमित ढंग से खान-पान और आचरण भी करते हैं। उन्हें रामलीला के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हर साल गुरुकुल के नए बच्चे इस रामलीला में अभिनय करते हैं।

यह रामलीला रामनगर में 4 किलोमीटर के दायरे में 31 स्थानों पर जगह बदल-बदल कर होती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व निदेशक और मशहूर रंगकर्मी अनुराधा कपूर ने इस रामलीला पर पीएचडी भी की है। उनका कहना है कि यह रामलीला दुनिया का पहला गतिशील (मूविंग) नाट्य मचंन है जो हर दिन अलग अलग स्थानों पर किया जाता है। रामचरित मानस की चौपाइयों पर आधारित अवधि में होने वाली इस रामलीला में न तो कोई माइक होता है और न ही लाईट बल्कि पेट्रोमैक्स की रोशनी में इस रामलीला को खेला जाता है और 40 किलोमीटर दूर के गांवों से लाखों लोग इसे देखने आते हैं।

इस रामलीला की खासियत यह है कि रामलीला के दौरान रावण दहन या आतिशबाजी और मंच सज्जा के सभी कारीगर मुस्लिम होते हैं। रामलीला के पात्र वही होते हैं जो 200 साल से पुश्तैनी रूप से अभिनय करते रहे हैं। दूरदर्शन की करीब 40 लोगों की टीम ने पिछले साल 27 सितंबर से 27 अक्टूबर तक इस रामलीला की रिकॉर्डिंग की थी। उस रिकॉर्डिंग को एडिट कर इस साल इसे दिखाया जा रहा है।


Thursday, September 17, 2015

खुदाई में मिला विजयनगर का खजाना!

     तेलंगाना में खम्मम जिले के गर्लाबाय्याराम पुलिस थाना क्षेत्र में विजयनगर काल के 40 सोने के सिक्के और एक पीतल का बर्तन मिला है। तेलंगाना पुरातत्व और संग्रहालय की निदेशक सुनिता ने बताया कि सिक्कों की शुरुआती जांच में ये खजाना विजयनगर काल का लग रहा है। ये सिक्के तुलुव राजवंश के  राजा कृष्णदेवराय (1506-1530) और अच्युताराय (1530-1542) के काल के प्रतीत हो रहे हैं। सुनिता ने बताया कि गर्लाबाय्याराम के पुलिस के उप निरीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक यह खजाना पांच महीने पहले  पाथयातंडा शिवार में मिला था।
उन्होंने बताया कि इन कुछ सिक्कों पर बैठे हुए भगवान बालकृष्ण का चित्र अंकित है जिन्होंने अपने दाएं हाथ में मक्खन लिया हुआ है और उनका बायां हाथ पैर बांये पैर के घुटने पर है। सिक्के पर भगवान बालकृष्ण के बांई ओर शंख और दाई ओर चक्र रखा हुआ है।
    दूसरे तरह के सिक्के की एक तरफ दो सिर वाले गरुड़ को ऊपर की तरफ उड़ते हुए दिखाया गया है जिसने अपनी दोनों चोंचों और दोनों पंजों से एक हाथी को पकड़ा हुआ है।
   सिक्के के पीछे की तरफ नगरी भाषा में तीन लाइनों में श्री प्रा ता पा च्यु ता रा या लिखा हुआ है। ये सिक्के गोलाकार है और इनका वजन 1650 मिलिग्राम से लेकर 3380 मिलिग्राम तक है। (वार्ता)

Friday, August 28, 2015

गीता प्रेस, गोरखपुर में लगा 'ताला'

     शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने कभी हिन्दू धार्मिक पुस्तक पर 'गीता प्रेस, गोरखपुर' की लाइन न देखी हो। भारत में धर्म की गंगा बहाने वाली गीता प्रेस, गोरखपुर इन दिनों 'संकट' में है। खबरों के मुताबिक ट्रस्ट और कर्मचारियों के बीच विवाद से गीता प्रेस, गोरखपुर पर 25 दिनों से ताला लगा हुआ है। ट्रस्ट और कर्मचारियों के विवाद के बाद प्रेस बंद पड़ी है। हर हिन्दू को संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाली ‍गीता प्रेस, गोरखपुर वर्तमान में बदहाल स्थिति में है। 

हर हिन्दू धर्म को मानने वाले व्यक्ति के लिए गीता प्रेस, गोरखपुर एक तीर्थ की तरह है, लेकिन आज इस तीर्थ से ज्ञान की गंगा नहीं बह रही है। जानकारी के मुताबिक गीता प्रेस, गोरखपुर रोजाना करीब 50 हजार से ज्यादा धार्मिक पुस्तकें बेचती हैं।

कब हुई थी शुरुआत : गीता प्रेस, गोरखपुर की स्थापना 1923 में हुई थी। गीता प्रेस, गोरखपुर का संचालन कोलकाता स्थित गोविंद भवन संस्था करती है। आम लोगों के बीच सनातन धर्म के प्रचार के लिए गीता प्रेस की स्थापना की गई थी।

कम लागत पर पुस्तकें : प्रेस का स्थापना का उद्देश्य कम मूल्य पर धार्मिक किताबें उपलब्ध कराना था। गीता प्रेस, गोरखपुर धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है। प्रेस में करीब 780 पुस्तकों का प्रकाशन हिन्दी और संस्कृत में होता है।

गीता प्रेस वह पहली प्रेस है, जिसने नेपाली भाषा में रामायण का प्रकाशन किया था। इसकी लाइब्रेरी में कई दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं। इसके कुल में 35 प्रतिशत हिस्सा रामचरित मानस का है। गीता प्रेस बिना लाभ के पुस्तकों का विक्रय करती है। लागत से 40 से 90 प्रतिशत कम कीमतों पर किताबों को बेचा जाता है।  इस बात का उदाहरण है कि यहां छपी हनुमान चालीसा चाय से भी कम कीमत 2 रुपए में मिल जाती है।

यह है विवाद : खबरों के मुताबिक प्रेस में करीब 180 स्थायी और 300 अस्थायी कर्मचारी काम करते हैं। बताया जाता है कि ट्रस्ट और कर्मचारियों के बीच दो मांगों पर विवाद है। पहली, कर्मचारी सभी के लिए समान वेतन की मांग कर रहे हैं। दूसरी, अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने को लेकर है।

इसी विवाद के बाद बाद गीता प्रेस, गोरखपुर में छपाई का काम नहीं हो रहा है। खबरों के अनुसार ट्रस्ट ने कर्मचारियों पर मारपीट का आरोप भी लगाया है। मारपीट के आरोप में ट्रस्ट ने 17 कर्मचारियों को निलंबित किया है। कर्मचारी इन 17 कर्मचारियों को भी वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

किसी से नहीं लेती आर्थिक मदद : गीता प्रेस, गोरखपुर में हर महीने करीब 400 टन कागजों पर छपाई होती है। प्रेस इस पर किसी भी प्रकार की सब्सिडी नहीं लेती है। गीता प्रेस बाजार भाव पर ही कागजों की खरीदी करती है। गीता प्रेस की नीति के मुताबिक वह सरकार, संस्था या किसी व्यक्ति से भी किसी भी तरह की आर्थिक मदद भी नहीं ली जाती है।

गलती पर इनाम : गांधीजी की सलाह पर प्रेस की किसी धार्मिक पुस्तक पर विज्ञापन और किसी पुस्तक की समीक्षा नहीं छापी जाती है। यहां तक की किसी जीवित व्यक्ति का फोटो भी किसी पुस्तक में नहीं प्रकाशित किया जाता है। धार्मिक पुस्तक में किसी प्रकार की गलती होने पर बताने वाले पाठक को प्रेस इनाम भी देती है।

गीता प्रेस ने दी सफाई : इस पूरे विवाद पर गीता प्रेस गोरखपुर ने ट्‍वीट कर सफाई दी है कि गीता प्रेस को किसी प्रकार के अनुदान की आवश्यकता नहीं है। कर्मचारियों से बात चल रही है और सभी कर्मचारी जल्द काम पर लौटेंगे।
http://hindi.webdunia.com/regional-hindi-news/gita-press-gorakhpur-115082800076_1.html

Thursday, August 6, 2015

काशी के भूगर्भीय इतिहास में जुड़ेगा नया अध्याय

   
                    शहर के नीचे दबे अनजान नालों का बनेगा नक्शा
  विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक है काशी। इसे वर्तमान में बनारस या वाराणसी के नाम से जाना जाता है. यह शहर जितना पुराना है ,उतना ही रहस्यमय है इसकी संरचना की बात। इस शहर के पुराने सीवर और पेयजल की पुरानी पाईपलाइनें कहां से होकर गुजरती हैं, ठीक ठीक किसी को भी पता नहीं। अब शहर में मेट्रो केनिर्माण के कारण ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठनेवाला है। फिलहाल तो मुगलकालीन शाहीनाला का मामला सामने आया है। यह नाला आज भी अस्तित्व में है मगर कहां से कहां तक फैला है इसका किसी को भी ठीक पता नहीं हैं। इस कवायद से यह भी संभव है कि प्राचीन काशी के कुछ अनजाने रहस्यों से पर्दा उठेगा और शहर के पुराने सीवर व पानी के पाईपलाईनों का नक्शा तैयार हो पाए।

   मुगलकाल के दौरान ‘शाही नाला’ को ‘शाही सुरंग’ के नाम से जाना जाता था। इसकी खासियत यह बताई जाती है कि इसके अंदर से दो हाथी एक साथ गुजर सकते हैं। शहर के पुरनियों का कहना है कि अंग्रेजों ने इसी ‘शाही सुरंग’ के सहारे बनारस की सीवर समस्या सुलझाने का काम शुरू किया। जेम्स प्रिंसेप के अनुसार, इसका काम वर्ष 1827 में पूरा हुआ था। इसे लाखौरी ईंट और बरी मसाला से बनाया गया था। अस्सी से कोनिया तक इसकी लंबाई 24 किलोमीटर बताई जाती है।
    यह अब भी अस्तित्व में है लेकिन उसकी भौतिक स्थिति के बारे में सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है। पुरनियों के मुताबिक यह नाला अस्सी, भेलूपुर, कमच्छा, गुरुबाग, गिरिजाघर, बेनियाबाग, चौक, पक्का महाल, मछोदरी होते हुए कोनिया तक गया है।
    वाराणसी शहर के लिए पहेली बने ‘शाही नाला’ की भौतिक स्थिति के अध्ययन, बाधाओं को चिह्नित करने के साथ ही उसके जीर्णोद्धार की पहल शुरू हो गई है। मुगलकाल के दौरान ‘शाही नाला’ को ‘शाही सुरंग’ के नाम से जाना जाता था। रोबोटिक कैमरों के जरिये काशी के इस प्राचीन नाले के स्वरूप की जानकारी की जाएगी। इसके लिए जापान इंटरनेशनल को-आपरेशन एजेंसी (जायका) ने 92 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की निगरानी में चयनित निजी एजेंसी यह कार्य कराएगी। इसके लिए प्रारंभिक सर्वे शुरू हो गया है। तय कार्ययोजना के मुताबिक सितंबर बाद रोबोटिक सर्वे का काम शुरू हो जाएगा। प्राचीन ‘शाही नाला’ मौजूदा समय में भी शहर के सीवर सिस्टम का एक बड़ा आधार है लेकिन इसका नक्शा नगर निगम या जलकल के पास नहीं है। शहर की घनी आबादी से होकर गुजरा यह नाला पूरी तरह भूमिगत है।
     यह प्राचीन काशी की जलनिकासी व्यवस्था की एक नजीर भी है। शहर के पुरनिये बताते हैं कि अंदर ही अंदर शहर के कई अन्य छोटे-बड़े नाले इससे जुड़े हैं लेकिन इसकी भौतिक स्थिति का पता न होने से नालों के जाम होने या क्षतिग्रस्त होने पर उसकी मरम्मत तक नहीं हो पाती। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के महाप्रबंधक जेबी राय ने बुधवार को बताया कि यह हकीकत है कि इसका नक्शा नगर निगम या जलकल के पास नहीं है। इस प्राचीन नाले की मुख्य लाइन अस्सी से कोनिया तक 7.2 किलोमीटर लंबी है, जो भेलूपुर चौराहा, बेनियाबाग मैदान, मछोदरी होते हुए गुजरी है। इसकी सहायक लाइनें शहर के अन्य हिस्सों में फैली हैं। उदाहरण के तौर पर, अर्दली बाजार से आकर एक शाखा इसमें मिलती है। सितंबर बाद रोबोटिक कैमरों की मदद से इस नाले की भौतिक स्थिति का बारीकी से अध्ययन होगा।
    मंडलायुक्त सभागार में बुधवार को मेट्रो रेल परियोजना के संबंध में हुई बैठक के दौरान ‘शाही नाला’ के नक्शे के बारे में भी चर्चा हुई। जीएम जेबी राय ने बताया कि सर्वे के आधार पर इसका नक्शा तैयार किया जाएगा। सर्वे के बाद ही इसकी वास्तविक गहराई, लंबाई, चौड़ाई और अन्य संबंधित जानकारियों का पता चल पाएगा।

(  फोटो व सामग्री- साभार अमर उजाला-http://www.amarujala.com/feature/samachar/national/mystery-of-shahi-nala-in-varanasi-hindi-news-dk/?page=0)

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...