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Wednesday, April 16, 2014

ययाति कौन थे ?

    हमें वेद-पुराणों में उल्लेखित ययाति के कुल-खानदान को याद रखना चाहिए, क्योंकि इसी से एशिया की जातियों का जन्म हुआ। ययाति से ही आगे चंद्रवंश चला जिसमें से यदुओं, तुर्वसुओं, आनवों और द्रुहुओं का वंश चला। जिस तरह बाइबल में याकूब के 12 पुत्रों से इसराइल-अरब की जाति बनी, उसी तरह ययाति के 5 पुत्रों से अखंड भारत (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड आदि) की जातियां बनीं। हालांकि ययाति के 10 पुत्र थे। याकूब और ययाति की कहानी कुछ-कुछ मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय हो सकता है।

जम्बूद्वीप के महान सम्राट कुरु

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पुरुवस को ऐल भी कहा जाता था। पुरुवस का विवाह उर्वशी से हुआ जिससे उसको आयु, वनायु, शतायु, दृढ़ायु, घीमंत और अमावसु नामक पुत्र प्राप्त हुए। अमावसु एवं वसु विशेष थे। अमावसु ने कान्यकुब्ज नामक नगर की नींव डाली और वहां का राजा बना। आयु का विवाह स्वरभानु की पुत्री प्रभा से हुआ जिनसे उसके 5 पुत्र हुए- नहुष, क्षत्रवृत (वृदशर्मा), राजभ (गय), रजि, अनेना। प्रथम नहुष का विवाह विरजा से हुआ जिससे अनेक पुत्र हुए जिसमें ययाति, संयाति, अयाति, अयति और ध्रुव प्रमुख थे। इन पुत्रों में यति और ययाति प्रीय थे।

ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे। ययाति ने कई स्त्रियों से संबंध बनाए थे इसलिए उनके कई पुत्र थे, लेकिन उनकी 2 पत्नियां देवयानी और शर्मिष्ठा थीं। देवयानी गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी, तो शर्मिष्ठा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री थीं। पहली पत्नी देवयानी के यदु और तुर्वसु नामक 2 पुत्र हुए और दूसरी शर्मिष्ठा से द्रुहु, पुरु तथा अनु हुए। ययाति की कुछ बेटियां भी थीं जिनमें से एक का नाम माधवी था। माधवी की कथा बहुत ही व्यथापूर्ण है।

ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1.पुरु, 2.यदु, 3.तुर्वस, 4.अनु और 5.द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने- अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुए।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा।- (हरिवंश पुराण, 1,30,29)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया। (महाभारत, 1,85,32)
ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुह्मु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए।

यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिए गए, उनका विवरण इस प्रकार है- यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती (चंबल), बेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण-पूर्व का भू-भाग मिला और द्रुहु को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दो-आब का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया।

1. पुरु का वंश : पुरु वंश में कई प्रतापी राजा हुए उनमें से एक थे भरत और सुदास। इसी वंश में शांतनु हुए जिनके पुत्र थे भीष्म। पुरु के वंश में ही अर्जुन पुत्र अभिमन्यु हुए। इसी वंश में आगे चलकर परीक्षित हुए जिनके पुत्र थे जन्मेजय।

2. यदु का वंश : यदु के कुल में भगवान कृष्ण हुए। यदुकुल की संपूर्ण जानकारी के लिए आगे क्लिक करें...चंद्रवंश : यदुवंश को जानिए...

3. तुर्वसु का वंश : तुर्वसु के वंश में भोज (यवन) हुए। ययाति के पुत्र तुर्वसु का वह्नि, वह्नि का भर्ग, भर्ग का भानुमान, भानुमान का त्रिभानु, त्रिभानु का उदारबुद्धि करंधम और करंधम का पुत्र हुआ मरूत। मरूत संतानहीन था इसलिए उसने पुरु वंशी दुष्यंत को अपना पुत्र बनाकर रखा था, परंतु दुष्यंत राज्य की कामना से अपने ही वंश में लौट गए।

महाभारत के अनुसार ययाति पुत्र तुर्वसु के वंशज यवन थे। पहले ये क्षत्रिय थे, पर ब्राह्मणों से द्वेष रखने के कारण इनकी गिनती शूद्रों में होने लगी। महाभारत युद्ध में ये कौरवों के साथ थे। इससे पूर्व दिग्विजय के समय नकुल और सहदेव ने इन्हें पराजित किया था।

4. अनु का वंश : अनु को ऋ‍ग्वेद में कहीं-कहीं आनव भी कहा गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह कबीला परुष्णि नदी (रावी नदी) क्षेत्र में बसा हुआ था। आगे चलकर सौवीर, कैकेय और मद्र कबीले इन्हीं आनवों से उत्पन्न हुए थे।

5. द्रुह्मु का वंश : द्रुह्मु के वंश में राजा गांधार हुए। ये आर्यावर्त के मध्य में रहते थे। बाद में द्रुहुओं? को इक्ष्वाकु कुल के राजा मंधातरी ने मध्य एशिया की ओर खदेड़ दिया। पुराणों में द्रुह्यु राजा प्रचेतस के बाद द्रुह्युओं का कोई उल्लेख नहीं मिलता। प्रचेतस के बारे में लिखा है कि उनके 100 बेटे अफगानिस्तान से उत्तर जाकर बस गए और 'म्लेच्छ' कहलाए।

ययाति के पुत्र द्रुह्यु से बभ्रु का जन्म हुआ। बभ्रु का सेतु, सेतु का आरब्ध, आरब्ध का गांधार, गांधार का धर्म, धर्म का धृत, धृत का दुर्मना और दुर्मना का पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेता के 100 पुत्र हुए, ये उत्तर दिशा में म्लेच्छों (अरबों) के राजा हुए।

* यदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। यदु और तुर्वस के विषय में ऐसा माना जाता था कि इंद्र उन्हें बाद में लाए थे। सरस्वती दृषद्वती एवं आपया नदी के किनारे भरत कबीले के लोग बसते थे। सबसे महत्वपूर्ण कबीला भरत का था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे संबद्ध थे। तुर्वस और द्रुह्यु से ही यवन और मलेच्छों का ‍वंश चला। इस तरह यह इतिहास सिद्ध है कि ब्रह्मा के एक पु‍त्र अत्रि के वंशजों ने ही यहुदी, यवनी और पारसी धर्म की स्थापना की थी। इन्हीं में से ईसाई और इस्लाम धर्म का जन्म हुआ। यहुदियों के जो 12 कबीले थे उनका संबंध द्रुह्मु से ही था। हालांकि यह शोध का विषय है।

ययाति की कहानी : ययाति की इस कहानी का वर्णन सभी जगह अलग-अलग मिलता है, लेकिन कहानी का मूल वही है। राजा ययाति संसार के प्रति आसक्त व्यक्ति था। 100 वर्ष जीने के बाद भी उनकी भोग-लिप्सा शांत नहीं हुई। कहते हैं कि उसकी 100 रानियां थीं। विषय-वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उससे घृणा हो गई और उसके मन में फिर से जवान बनने की अभिलाषा जाग्रत हो उठी, लेकिन जब उसका मृत्यु का समय आया तो वह थर्राने लगा। डर गया और यमराज से कुछ समय और जीने की याचना करने लगा। यमराज उसे मोहलत देकर चले जाते हैं। इस तरह यमराज दो-तीन बार और आते हैं और अंत में ययाति को ले जाने के लिए टस से मस नहीं होते।

यमराज के सामने ययाति गिड़गिड़ाने लग जाता है- कहने लगा, अभी तो मेरे बहुत काम बाकी है। अभी तो में अतृप्त और भूखा हूं। कुछ और मोहलत दे दीजिए। ऐसे इस तरह अचानक मत ले जाइए। अभी तो मैंने कुछ भोगा ही नहीं।

यमराज ने कहा कि आपकी उम्र कभी से ही पूरी हो चुकी है और अब आपको ले ही जाना पड़ेगा। लेकिन ययाति जब बहुत गिड़गिड़ाने लगा तो यमराज ने कहा- 'अच्छा ठीक है। इस शर्त पर अंतिम बार आपको छोड़ दिया जाता है वह यह कि अब तुम अपने किसी पुत्र की उम्र के बदले यहां और कुछ दिन रह सकते हो।'

अब ययाति अपने बेटों के समक्ष गिड़गिड़ाने लगा। जो बेटे 70 के, 60 के या 50 की उम्र के थे, वे जैसे-तैसे मना करके वहां से चले गए। बाद में यदु, तुर्वसु और द्रुहु ने भी जब मना कर दिया, तब उसने पुरु से पूछा। पुरु सबसे छोटा लड़का था।

पुरु ने कहा कि पिताश्री, मैं अपनी उम्र आपको दे देता हूं। जब आपका मन 100 साल भोगकर नहीं भरा, तब मेरा कहां भर पाएगा? तुम मुझे आशीर्वाद दो। ययाति बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि तू ही मेरा असली बेटा है। ये सब तो स्‍वार्थी हैं। तुझे बहुत पुण्‍य लगेगा। तूने अपने पिता को बचा लिया इसलिए तुझे स्वर्ग मिलेगा।

100 साल के बाद फिर मौत आई और बाप फिर गिड़गिडाने लगा और उसने कहा कि अभी तो कुछ भी पूरा नहीं हुआ है। ये 100 साल ऐसे बीत गए कि पता ही नहीं चला। पल में बीत गए। तब तक उसके 100 बेटे और पैदा हो चुके थे। नई-नई शादियां की थीं, मौत ने कहा, तो फिर किसी बेटे को भेज दो।

और ऐसा चलता रहा। ऐसा कहते हैं कि ऐसा 10 बार हुआ। कहानी बड़ी प्रीतिकर है। हजार साल का हो गया बूढ़ा, तब भी मौत आई और मौत ने कहा, अब क्‍या इरादे है?

ययाति हंसने लगा। उसने कहां, अब मैं चलने को तैयार हूं। यह नहीं कि मेरी इच्‍छाएं पूरी हो गईं, इच्‍छाएं वैसी की वैसी अधूरी हैं। मगर एक बात साफ हो गई कि कोई इच्‍छा कभी पूरी हो नहीं सकती। मुझे ले चलो। मैं ऊब गया। यह भिक्षापात्र भरेगा नहीं। इसमें तलहटी नहीं है। इसमें कुछ भी डालो, यह खाली का खाली रह जाता है।

राजा ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्हों ने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया।
इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्र थे- याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति। याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके कर दिया।

एक बार की बात है कि दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। शर्मिष्ठा अति सुन्दर राजपुत्री थी, तो देवयानी असुरों के महा गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी। दोनों एक दूसरे से सुंदरता के मामले में कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र उतार कर स्नान करने लगीं।

उसी समय भगवान शंकर पार्वती के साथ उधर से निकले। भगवान शंकर को आते देख वे सभी कन्याएं लज्जावश से बाहर निकलकर दौड़कर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगीं। शीघ्रता में शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस पर देवयानी अति क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से बोली, 'रे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।'

देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपने अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुएं में धकेल दिया। देवयानी को कुएं में धकेल कर शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् राजा ययाति आखेट करते हुए वहां पर आ पहुंचे और अपनी प्यास बुझाने के लिए वे कुएं के निकट गए तभी उन्होंने उस कुएं में वस्त्रहीन देवयानी को देखा।

जल्दी से उन्होंने देवयानी की देह को ढंकने के लिए अपने वस्त्र दिए और उसको कुएं से बाहर निकाला। इस पर देवयानी ने प्रेमपूर्वक राजा ययाति से कहा, 'हे आर्य! आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूं। हे क्षत्रियश्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण पुत्री हूं किन्तु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिए।' ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

देवयानी वहां से अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई तथा उनसे समस्त वृत्तांत कहा। शर्मिष्ठा के किए हुए कर्म पर शुक्राचार्य को अत्यन्त क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गए। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से मान-मनोन्वल करने लगे।

बड़ी मुश्किल से शुक्राचार्य का क्रोध शान्त हुआ और वे बोले, 'हे दैत्यराज! मैं आपसे किसी प्रकार से रुष्ठ नहीं हूं किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं पुनः तुम्हारा साथ देने लगूंगा।'

वृषपर्वा ने देवयानी को प्रसन्न करने के लिए उससे कहा, 'हे पुत्री! तुम जो कुछ भी मांगोगी मैं तुम्हें वह प्रदान करूंगा।' देवयानी बोली, 'हे दैत्यराज! मुझे आपकी पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में चाहिए।' अपने परिवार पर आए संकट को टालने के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया।

शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई।

देवयानी के पुत्रवती होने पर शर्मिष्ठा ने भी पुत्र की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र यदु तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्यु, अनु तथा पुरु हुए।

बाद में जब देवयानी को ययाति तथा शर्मिष्ठा के संबंध के विषय में पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर कहा, 'रे ययाति! तू स्त्री लम्पट है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।'

उनके शाप से भयभीत हो राजा ययाति गिड़गिड़ाते हुए बोले, 'हे दैत्य गुरु! आपकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुए अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है।' तब कुछ विचार कर के शुक्रचार्य जी ने कहा, 'अच्छा! यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तुम उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो।'

इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा, 'वत्स यदु! तुम अपने नाना के द्वारा दी गई मेरी इस वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था मुझे दे दो।' इस पर यदु बोला, 'हे पिताजी! असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। इसलिये मैं आपकी वृद्धावस्था को नहीं ले सकता।'

ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की मांग की, लेकिन सभी ने कन्नी काट ली। लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की मांग को स्वीकार कर लिया।

पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा, 'तूने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः मैं तुझे राज्याधिकार से वंचित करके अपना राज्य पुरु को देता हूं। मैं तुझे शाप भी देता हूं कि तेरा वंश सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेगा।'
- वेबदुनिया संदर्भ ग्रंथ ( http://hindi.webdunia.com/religion-sanatandharma-history/ )

Monday, March 31, 2014

ओड़ीशा में 3 से 4 हजार साल पुराने नरकंकाल मिले

  

ओड़ीशा के जाटनी कस्बा के पास हरिराजपुर ग्राम पंचायत के बाहरी इलाके के बंग गांव के पास असुराबिंधा में 13 मार्च 2014 को खुदाई के दौरान उत्कल विश्वविद्यालय के पुरातत्वविज्ञानियों को 3500 साल पुराने नरकंकाल मिले हैं। इनमें से एक महिला की है। यह जानकारी 14 मार्च को संवाददाताओं को विश्वविद्यालय के नृविज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने दी। यह खबर ओड़ीशा के ओड़ीशा सनटाईम्स, ओडिया अखबार समाज समेत कई अखबारों ने छापी है। जानकारी दे रहे उत्कल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर किशोर कुमार बासा, प्रोफेसर सविता आचार्य और दकन कालेज पुणे की डाक्टर बीना मुशरिफ त्रिपाठी ने बताया कि एक नरकंकाल 30 से35 वर्ष की महिला की है। अभी सही उम्र का पता करने के लिए कार्बन डेटिंग करायी जाएगी। इसके अलावा पुरुष नरकंकाल का डीएनए कराकर महिला से उसके कोई संबंध की भी जांच की जाएगी। दोनों नरकंकाल 3 से 4 फीट की दूरी पर पाे गए हैं। एक बर्तन के अंदर मिले शिशु नरकंकाल के लिंग का निर्धारण नहीं हो पाया है। यह शिशु पुरुष नरकंकाल के पास मिला है। सभी की हैदराबाद से कार्बन डेटिंग कराई जाएगी। इनकी मौत कैसे हुई होगी, इसका भी पता नहीं चल पाया है।
उठेगा 600 साल पुराने रहस्य से पर्दा..
 लंदन क्रॉसरेल परियोजना की खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को सामूहिक रूप से दफ़न किए गए लोगों के नर कंकाल मिले हैं. इन कब्रों के प्लेग से मरने वाले व्यक्तियों के अवशेष होने के संभावना है. फॉरेंसिक जाँच से कंकालों के 14वीं शताब्दी का होने का संकेत मिला है.सरकारी अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि प्लेग की महामारी के दौरान लंदन में हज़ारों लोगों को शहर के बाहर सामूहिक क़ब्रों में दफ़न किया गया था, लेकिन कब्रों की वास्तविक स्थिति एक रहस्य थी.पुरातत्वविदों का मानना है कि यह जगह चार्टरहाऊस चौक के पास स्थित बर्बिकन के करीब है.पुरातत्वविदों की योजना इस पूरे क्षेत्र में प्लेग से मारे गए लोगों के परिजनों की खोज करने की है. इस जगह कई क़ब्रों के होने के निशान मिले हैं.खुदाई के दौरान मिले कंकाल के दाँतों से प्लेग के बैक्टीरिया येरसिनिया परसिस्ट के डीएनए मिले हैं. .ये क़ब्रें वर्ष 1348 से साल 1350 के बीच की मानी जा रही हैं.क्रॉसरेल परियोजना के प्रमुख पुरातत्वविद् जे कार्वर इस खोज के बारे में कहते हैं, "इससे 660 साल पुराने रहस्य की गुत्थी सुलझ सकती है."जे कार्वर बताते हैं, "इस खुदाई से यूरोप की सबसे भयानक महामारी के दस्तावेज़ीकरण और उसे समझने में मदद मिलेगी. आगे की खुदाई से पता चलेगा कि हम अपनी उम्मीदों पर कितने खरे उतरेंगे."

Friday, March 14, 2014

दीपावली, नवरात्र और शिवरात्रि के समान महत्व का है होलिका दहन



होलिका दहन की पौराणिक व ऐतिहासिक कहानी आप भी जानते होंगे। कहते हैं कि विष्णु भक्त प्रह्लाद को जलाने के लिए प्रहलाद की बहन होलिका पिता के आदेश पर उसे गोंद में लेकर जलती अग्नि में बैठ गई थी मगर होलिका इसी अग्नि में जलकर राख हो गई और प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। मगर इस कहानी के अलावा भी है होलिका दहन का महत्व।

 होलिका दहन की रात को दीपावली, नवरात्र और शिवरात्रि के समान महत्व दिया गया है। शास्त्रों में इसे वर्ष की चार महारात्रियों में से एक बताया गया है। होलिका दहन की रात वैदिक विधि विधान के अनुसार कुछ उपाय किए जाए तो रोग एवं आर्थिक परेशानी के साथ ही कई अन्य तरह की समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।

घर में सुख-समृद्धि के लिए करें यह काम
होली की राख को घर के चारों ओर और दरवाजे पर छिड़कें। ऐसा करने से घर में नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश नहीं होता है। माना जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।

होली की रात यह उबटन लगाना न भूलें
होलिका दहन की रात घर के सभी सदस्यों को सरसों का उबटन बनाकर पूरे शरीर पर मालिश करना चाहिए। इससे जो भी मैल निकले उसे होलिकाग्नि में डाल दें। ऐसा करने से जादू, टोने का असर समाप्त होता है और शरीर स्वस्थ रहता है।

बुरी नजर से बचाव के लिए
गाय के गोबर में जौ, अरसी, कुश मिलाकर छोटा उपला बना लें। इसे घर के मुख्य दरवाजे पर लटका दें। ऐसा करने से नजर दोष, बुरी शक्तियों, टोने-टोटके से घर और घर में रहने वाले लोग सुरक्षित रहते हैं।

इसलिए होलिका की राख से तिलक किया किया जाता है
होलिका दहन के बाद अगली सुबह यानी धुलैंडी के दिन होलिकाग्नि की राख को माथे पर लगाएं। इसे लगाने का सही तरीका है बायीं ओर से दायीं ओर तीन रेखा खींचें। इसे त्रिपुण्ड कहते हैं। इसे लगाने से 27 देवता प्रसन्न होते हैं। शस्त्रों में बताया गया है कि पहली रेखा के स्वामी महादेव हैं, दूसरी रेखा के महेश्वर और तीसरी रेखा के शिव।

(साभार-अमर उजाला)

16 मार्च
स्नान-दान-व्रत की फाल्गुनी पूर्णिमा, हुताशनी पूर्णिमा-होलिका दहन सूर्यास्त से रात्रि 10.38 बजे के मध्य शुभफलदायक,
17 मार्च
होली-रंगोत्सव

इतिहास

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसेवसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।


  इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराणजैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र केरामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर काजोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था।अंतिम मुगल बादशाहबहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।[9]मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं।विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।

कहानियाँ



होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।  कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था। ( साभार- विकीपीडिया)


Monday, March 10, 2014

चीन में मिले 1,000 वर्ष पुराने हिन्दू मंदिर के खंडहर


   इतिहासकारों के अनुसार चीन के समुद्र से लगे औद्योगिक शहर च्वानजो में और उसके चारों ओर का क्षे‍त्र कभी हिन्दुओं का तीर्थस्थल था। वहां 1,000 वर्ष पूर्व के निर्मित हिन्दू मंदिरों के खंडहर पाए गए हैं। इसका सबूत चीन के समुद्री संग्रहालय में रखी प्राचीन मूर्तियां हैं।
वैसे वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं है, लेकिन 1,000 वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फुच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं।

द हिन्दू की खबर अनुसार चीन के एक पुराने शहर च्वानजो में 1,000 वर्ष वर्ष पूराने हिन्दू मंदिरों के खंडहर आज भी मौजूद हैं। इन खंडरों से प्राप्त मूर्तियां च्वानजो के समुद्री म्यूजियम में रखी है।
शहर में ही एक हिन्दू मंदिर में आज भी पूजा होती है लेकिन स्थानीय निवासी इसे महिला बोधिसत्व का मंदिर मानकर इसकी मूर्ति की पूजा करते हैं, हालांकि यह स्थान प्राचीनकाल में हरिवर्ष कहलाता था। (PTI, agencies)

Saturday, February 8, 2014

प्राचीनतम शहर काशी का रहस्य जानने के लिए शुरू हुई पुरातात्विक खुदाई

     दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी के रहस्यों और कालखंड को तलाशने के लिए दिल्ली ASI और पटना की टीम काशी के राजघाट पहुंची है। खुदाई के लिए ट्रैंच बनाकर मापन कर लिया गया है।
 पहले ट्रैंच A-1 में 92 सेमी की खुदाई भी हो चुकी है। अभी तक की खुदाई में कुछ बर्तनों के टुकड़े मिले हैं। जानकारों के मुताबिक खुदाई की गहराई का मापन मिलती जा रही मिटटी की सतहों पर ही डिसाइड होगा।
 1969 के बाद फिर से काशी की प्राचीनता को वैज्ञानिक आधार देने के लिए खुदाई की जा रही है। वैज्ञानिकों की टीम कार्बन डेटिंग के जरिए ये पता लगाएगी कि इस शहर की नगरीय सभ्यता कैसी और कितनी पुरानी है।
राजघाट में बीएचयू ने वर्ष 1960 से 1969 तक खुदाई कराई थी। खुदाई से इस तथ्य का खुलासा हुआ था कि ईसा पूर्व 8वीं शताब्दी से लेकर आज तक काशी में मानव जीवन रहा है। कई कालखंडों में यहां पर मानव जीवन होने के साक्ष्य भी मिले हैं।
 दिल्ली से आई ASI टीम के सहायक पुरातत्व विद राजेश यादव ने बताया कि ट्रैंच बनाकर खुदाई का काम शुरू हो गया है। उन्होंने बताया, माउंट (टीला ) कल्चर सीक्वल जानने के लिए वर्टिकल और डिटेल्ड खुदाई की जा रही है।
     इतिहासकार ओपी केजरीवाल ने बताया कि काशी में हो रही खुदाई विज्ञान और इतिहास को एक नया आधार देगी। ग्रंथों में बनारस का इतिहास महाभारत काल का मिलता है। इतिहास की कई किताबों में काशी कि सभ्यता का प्राचीन वर्णन मिलता है। खुदाई से जो चीजें मिलेंगी वो प्राचीनता की दिशा में एक नया इतिहास दुनिया को देंगी।
राजघाट के पास अवशेष स्थल पर खुदाई 1969 के बाद एक बार फिर ASI और ज्ञान प्रवाह की संयुक्त देख-रेख में खुदाई शुरू हो गई है। पुरातत्वविद और बीएचयू की पूर्व प्रो. विदुला जायसवाल ने बताया कि राजघाट के पुरातात्विक खंडहर से काशी की प्राचीनता का जो इतिहास ईसापूर्व 8 वीं शताब्दी यानि 2800 वर्ष का मिलता है।
इस बार खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों की कार्बन डेटिंग कराई जाएगी तभी पता चल पाएगा कि इस शहर का इतिहास कितना पुराना है।
सहायक पुरातत्वविद राजेश यादव ने बताया कि कार्बन डेटिंग आधुनिक विज्ञान में काफी विकसित प्रणाली है। खुदाई के दौरान प्राप्त जीव-जंतुओं के अवशेषों, बर्तन, नगर सभ्यता की ईटों और भी तमाम ऐसी चीजें होती हैं जिनका कार्बन कण और एक्टिव पदार्थों से काल खंड का पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिक आधार पर कार्बन डेटिंग ही प्राचीनता का सबसे पुख्ता प्रमाण दे सकता है। वहीं, इससे पहले भी अक्टूबर माह में पुरात्व विभाग ने एक और स्थान की खुदाई की थी। लखनऊ से 50 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा गांव में साधु शोभन सरकार के सपने से प्रेरित होकर सोने के लिए खुदाई भी की गई। वहां कुछ न मिलने पर आखिर कर खुदाई करने पहुंची टीम को अपना बोरिया बिस्तर बांध कर निकल जाना ही सही लगा।
 (स‌ाभार दैनिक जागरण-वाराणसी.)

डौंडिया खेड़ा: सोना तो नहीं, सोने से बड़ा खजाना मिला
 उन्नाव (उत्तर प्रदेश) के डौंडिया खेड़ा के महल में हुई खोदाई में सोना तो नहीं मिला, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को उससे भी बड़ा खजाना मिला है। खोदाई में निकले अवशेषों से ऐसे प्रमाण मिले हैं कि वहां का इतिहास तीन हजार साल पुराना है। यह तथ्य एएसआइ के लिए काफी अहम है। इससे पहले डौंडिया खेड़ा का इतिहास 7वीं सदी तक का ही माना जा रहा था।
एएसआइ के पहले महानिदेशक ने 1860 में प्रमाण जुटाए थे कि चीनी यात्री ह्वेन सांग ने सातवीं सदी में डौंडिया खेड़ा का भ्रमण किया था। उसने लिखा था कि डौंडिया खेड़ा में बौद्ध धर्म मानने वाले लोग उसे मिले थे। एएसआइ ने जब डौंडिया खेड़ा में राजा राव रामबख्श के महल की खोदाई की तो वहां मिले अवशेषों से प्राथमिक स्तर पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि वहां का इतिहास 2 हजार साल पुराना है। खोदाई में चमकीले मृदभांड, लाल बर्तन, हड्डी की नुकीली वस्तुएं, जानवरों की हड्डियां, सुपारी के आकार के पत्थर व लोहे की कीलें मिली थीं। एएसआइ की उत्खनन एवं अन्वेक्षण शाखा के निदेशक डॉ. जमाल हसन कहते हैं कि अवशेषों के अध्ययन से इस बात का पता चला है कि डौंडिया खेड़ा का इतिहास 3 हजार साल पुराना है। एएसआइ के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. बी आर मणि कहते हैं कि एएसआइ ने परीक्षण के लिए डौंडिया खेड़ा में खोदाई की अनुमति दी थी। विभाग ऐसी खोदाई कराता रहता है।
अंग्रेजों ने कर लिया था राजा रामबख्श के महल पर कब्जा
शोभन सरकार ने डौंडिया खेड़ा में एक हजार टन सोना दबा होने का दावा किया था। इसके बाद राजा राव रामबख्श के खंडहर हो चुके महल में एएसआइ ने 18 अक्टूबर को खोदाई शुरू कराई थी। जियोलॉजिकल ऑफ इंडिया ने एएसआइ को 29 अक्टूबर को रिपोर्ट दी थी, जिसमें उसने कहा था कि महल के नीचे सोना, चांदी या अन्य धातु दबी हो सकती है। राजा के महल में एक माह तक खोदाई चली और काम 19 नवंबर 2013 को पूरा हुआ। इस काम में 278751 रुपये खर्च हुए थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने महल पर कब्जा कर राजा राव रामबख्श को फांसी दे दी थी।
करीब 100 लोगों ने लगाई आरटीआइसोना मामले को लेकर एएसआइ के दिल्ली स्थित मुख्यालय में करीब 100 आरटीआइ लगाई गई हैं। इसमें लोगों ने पूछा है कि क्या सपनों के आधार पर भी एएसआइ खोदाई कराता है? क्या बाबाओं की बात पर भी एएसआइ भरोसा करता है? कई लोगों ने सोना निकालने के मामले पर होने वाले खर्च की जानकारी मांगी है।
(स‌ाभार दैनिक जागरण-[वी.के.शुक्ला], नई दिल्ली।)

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