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Thursday, February 19, 2015

वलसाड़ में दो गैरपारंपरिक हनुमान व शिवमंदिर, बगल में गदा रखे हनुमान और शयन मुद्रा में भगवान शिव का शिलाखंड शिवलिंग

  आखिर में यह भी पढ़ें----इतिहास बजरंगबली का, शोध और मिथकीय इतिहास

   वलसाड़ में दो गैरपारंपरिक हनुमान व शिवमंदिर, बगल में गदा रखे हनुमान और शयन मुद्रा में भगवान शिव का शिलाखंड शिवलिंग
पिछले दिनों ( 6 फरवरी से 13 फरवरी के मध्य ) मैं अपने भांजे सोनू ( नीरज कुमार सिंह) की शादी में गुजरात के वापी शहर गया था। वापी गुजरात का औद्योगिक शहर है जो अरब सागर के किनारे केंद्र शासित प्रदेश दमन का जुड़वा शहर है। वापी गुजरात के वलसाड़ जिले के अंतर्गत आता है। मैं यह भौगोलिक विवरण इसलिए दे रहा हूं ताकि जब मैं वहां के कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बताऊं तो आपको यह जानने में आसानी हो कि वह स्थल कहां और कैसा है। हो सकता है कि आप भी वहां गए हों।
   शादी से लौटकर मैं वापी में ही अपने दूसरे भांजे डब्बू ( अजीत सिंह ) के घर गया। कई सालों से वापी मैं अपने जीजाजी रामजन्म सिंह के घर जाता रहा हूं मगर न तो वलसाड़ के कुछ ऐतिहासिक स्थलों पर जा पाया और नही अपने दूसरे भांजे अजीत के यहां गया। हालांकि पहले के दौरे में दमन में अरब सागर के किनारे स्थित पुर्तगालियों के किले और धरमपुर के ऐतिहासिक शिवमंदिर को देखा। पुर्तगाली ज्यादातर तो चले गए हैं मगर अब भी भारी तादाद में पुर्तगाली परिवार दमन में मौजूद हैं। स्थानीय परिवेश से संतुलन बनाए हुए हैं। खपड़ैल व लकड़ी के विशिष्ट किस्म के इनके घरों को देखने से लगता है कि इस शहर की आबोहवा कभी पुर्तगाली थी। केंद्र सरकार और दमन प्रशासन ने शहर की इस खिचड़ी विशिष्टता को बनाए रखा है। भांजी रागिनी के सौजन्य से मैंने इन जगहों को देखा था। मगर इन सबमें ऐसा ज्यादा कुछ विशेष नहीं दिखा जिसे विस्तार से आपको बताना चाहिए था। मगर इस बार वलसाड़ के दो स्थलों को दिखाने जब अजीत ले गया तभी मैंने समझ लिया कि इनके बारे में लोगों को बताना चाहिए। मिथकीय इतिहास की यह भी एक जरूरी कड़ी लगी मुझे। इस संदर्भ में मैं वलसाड़ स्थित पारनेरा पार्डी का मारुतिधाम मंदिर और तड़केश्वर महादेव मंदिर की चर्चा करूंगा। तड़केश्वर महादेव तो ऐसा मंदिर है, जिसके बारे तरह-तरह के किस्से प्रचलित हैं। दोनों मंदिर पारंपरिक हनुमान मंदिर और शिवमंदिरों से बिल्कुल अलग हैं।



  पारनेरा पार्डी का मारुतिधाम मंदिर साधारणत: एक आम हनुमान मंदिर लगता है मगर जब इस मंदिर में दाखिल हुआ तब इसकी विशिष्टता समझ में आई। काफी बड़े परिसर में फैले इस मंदिर में पुजारियों का तामझाम कम था। हालाकि यहां जो पुजारी नियुक्त है वह यहां हमेशा उपलब्ध नहीं रहता। इस मंदिर की खासियत बजरंगबली की मूर्ति में है। साधारणत: हनुमान मंदिरों में बजरंगबली गदा अपने साथ रखते हैं। मगर यहां उनकी गदा बगल में रखी हुई है। यह मुझे विचित्र लगा। ऐसा कोई प्रसंग भी मुझे नहीं मालूम जिसमें बजरंगबली को ऐसी मुद्रा में होने की बात कही गई हो। दीवार में पत्थर पर उकेरी गई इस मूर्ति में गदा दाहिनी तरफ रखी हुई है। यहां मैं मंदिर व इस मंदिर में स्थित इस मूर्ति दोनों का फोटो दे रहा हूं। बगल में गदा रखी हुई हनुमान की इस मूर्ति का आप भी अवलोकन करें।



   दूसरा है तड़केश्वर महादेव मंदिर। इस मंदिर के बारे दो कहानियां प्रचलित हैं। पहली कथा उस शिवलिंग के बारे में है, जो शिवलिंग जैसा नहीं बल्कि एक शिलाखंड है और उसे भगवान की शयन मुद्रा की मूर्ति बताई जाती है। ज्यादातर शिवमंदिरों में या तो भगवान शिव या शिव-पार्वती की प्रतिमाएं होती हैं। अधिकतर शिवमंदिरों में प्रतिमाओं की जगह शिवलिंग की स्थापनी रहती है। इस मायने में यह मंदिर बहुत ही विशिष्ट है। मैंने ऐसा कोई शिवमंदिर नहीं देखा जहां शिवलिंग की जगह शयनमुद्रा में एक शिलाखंड है। इसशिलाखंड को एक सर्प आकृति घेरे हुए है। कहा जाता है दूसरे समुदाय के 50-60 लोग इस शिलाखंड को कहीं और ले जाना चाहते थे मगर वे इस शिलाखंड को वे लोग उठा नहीं पााए। कथा यह भी है कि इस शिलाखंड को ले जाने की कोशिश करने वाले वहीं जलकर भस्म हो गए। इन भस्म हुए लोगों की भी मजार मंदिर से थोड़ी दूर पर बनी हुई है।
 एक और कथा यह है कि काफी दिनों बाद एक भक्त को भगवान ने दर्शन देकर मंदिर बनाने का आदेश दिया। उसने मंदिर बनवाकर इसमें इस शिलाखंड की स्थापना करवाई। मगर मंदिर बनने के साथ ही इसकी छत उड़ गई। कई बार छत बनवाने का प्रयास हुआ मगर हर बार छत उड़ जाती थी। तब भगवान ने उस भक्त को फिर स्वप्न दिया किया कि छत मत बनाओ। मुझे सुबह की पहली चाहिए। तब से इस शिवमंदिर की छत खुली हुई है। इनका नाम भी इसी आधार पर तड़केश्वर महादेव पड़ा। यानी तड़के सुबह की धूप वाले महादेव। मंदिर इस हिसाब से बना है कि सूरज की पहली किरण महादेव के शयनमुद्रा शिलाखंड पर पड़ती है। यह दोनों गैरपारंपरिक मंदिर देशभर के तमाम हनुमान व शिवमंदिरों से अलग हैं। यहां मैं तड़केश्वर महादेव मंदिर और शिलाखंड वाले शिवलिंग दोनों का चित्र दे रहा हूं। वहां फोटो खींचना मना है मगर इस आदेश का उल्लंघन करके मैंने फोटो खींचा। इसके लिए मैं मंदिर प्रबंधन से क्षमा चाहूंगा। मेरा इतिहासकार मन धैर्य खो बैठा और लोगों को इस मंदिर से परिचित कराने के लिए फोटो खींच लिया। मंदिर के इतिहास के बारे में दरवाजे पर गुजराती में लिखा हुआ है। आप भी अगर वलसाड़ जाएं तो इन दोनों मंदिरों को अवश्य देखें। प्रसंगवश मैंने यहां हनुमान   जी के प्रादुर्भाव, महत्ता व इतिहास के बारे में दिया है। कृपया उसका भी अवलोकन करें। इसे मैंने वेबदुनिया से साभार लिया है।

इतिहास बजरंगबली का, शोध और मिथकीय इतिहास  
एक वेबसाइट का दावा है कि प्रत्येक 41 साल बाद हनुमानजी श्रीलंका के जंगलों में प्राचीनकाल से रह रहे आदिवासियों से मिलने के लिए आते हैं। वेबसाइट के मुताबिक श्रीलंका के जंगलों में कुछ ऐसे कबीलाई लोगों का पता चला है जिनसे मिलने हनुमानजी आते हैं।
हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। वे कहां रहते हैं, कब-कब व कहां-कहां प्रकट होते हैं और उनके दर्शन कैसे और किस तरह किए जा सकते हैं।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है। हनुमान को छोड़कर और किसी देवी-देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है। द्वंद्व में रहने वाले का हनुमानजी सहयोग नहीं करते हैं। हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं। किसी भी व्यक्ति को जीवन में श्रीराम की कृपा के बिना कोई भी सुख-सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती है। श्रीराम की कृपा प्राप्ति के लिए हमें हनुमानजी को प्रसन्न करना चाहिए। उनकी आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम तक पहुंच नहीं सकता। हनुमानजी की शरण में जाने से सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इसके साथ ही जब हनुमानजी हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी भी अन्य देवी, देवता, बाबा, साधु, ज्योतिष आदि की बातों में भटकने की जरूरत नहीं।

युवाओं के आइडल बजरंग बली

हनुमान इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमानजी की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम है। बहुत से लोग किसी बाबा, देवी-देवता, ज्योतिष और तांत्रिकों के चक्कर में भटकते रहते हैं और अंतत: वे अपना जीवन नष्ट ही कर लेते हैं... क्योंकि वे हनुमान की भक्ति-शक्ति को नहीं पहचानते। ऐसे भटके हुए लोगों का राम ही भला करे।

क्यों प्रमुख देव हैं हनुमान : हनुमानजी 4 कारणों से सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं। पहला यह कि वे रीयल सुपरमैन हैं, दूसरा यह कि वे पॉवरफुल होने के बावजूद ईश्वर के प्रति समर्पित हैं, तीसरा यह कि वे अपने भक्तों की सहायता तुरंत ही करते हैं और चौथा यह कि वे आज भी सशरीर हैं। इस ब्रह्मांड में ईश्वर के बाद यदि कोई एक शक्ति है तो वह है हनुमानजी। महावीर विक्रम बजरंगबली के समक्ष किसी भी प्रकार की मायावी शक्ति ठहर नहीं सकती।

क्या हनुमानजी बंदर थे? : हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। नए शोधानुसार प्रभु श्रीराम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ था। श्रीराम के जन्म के पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था अर्थात आज (फरवरी 2015) से लगभग 7129 वर्ष पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम कपि था।
हनुमानजी के संबंध में यह प्रश्न प्राय: सर्वत्र उठता है कि 'क्या हनुमानजी बंदर थे?' इसके लिए कुछ लोग रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ 'वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम' आदि विशेषण पढ़कर उनके बंदर प्रजाति का होने का उदाहरण देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन का प्रत्यक्ष चमत्कार इसका प्रमाण है। यह ‍भी कि उनकी सभी जगह सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनके पशु या बंदर जैसा होना सिद्ध होता है। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है।

दरअसल, आज से 9 लाख वर्ष पूर्व मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। ये सभी पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है।

हनुमानजी का जन्म स्‍थान कहां है, जानिए

पहला जन्म स्थान : हनुमानजी की माता का नाम अंजना है, जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। हनुमानजी के पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। माता-पिता के कारण हनुमानजी को आंजनेय और केसरीनंदन कहा जाता है। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वे वानरों की कपि नाम की जाति से थे। केसरीजी कपि क्षेत्र के राजा थे। कपिस्थल कुरु साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। हरियाणा का कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। यह कैथल ही पहले कपिस्थल था। कुछ लोग मानते हैं कि यही हनुमानजी का जन्म स्थान है।
दूसरा जन्म स्थान : गुजरात के डांग जिले के आदिवासियों की मान्यता अनुसार डांग जिले के अंजना पर्वत में स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजी का जन्म हुआ था।

तीसरा स्थान : कुछ लोग मानते हैं कि हनुमानजी का जन्म झारखंड राज्य के उग्रवाद प्रभावित क्षे‍त्र गुमला जिला मुख्‍यालय से 20 किलोमीटर दूर आंजन गांव की एक गुफा में हुआ था।

अंत में आखिर कहां जन्म लिया? : 'पंपासरोवर' अथवा 'पंपासर' होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। यहां स्थित एक पर्वत में एक गुफा भी है जिसे रामभक्तनी शबरी के नाम पर 'शबरी गुफा' कहते हैं। इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध 'मतंगवन' था। हंपी में ऋष्यमूक के राम मंदिर के पास स्थित पहाड़ी आज भी मतंग पर्वत के नाम से जानी जाती है। कहते हैं कि मतंग ऋषि के आश्रम में ही हनुमानजी का जन्म हआ था। मतंग नाम की आदिवासी जाति से हनुमानजी का गहरा संबंध रहा है

क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी?
 हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे।
कलयुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं। हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है। धर्म की स्थापना और रक्षा का कार्य 4 लोगों के हाथों में है- दुर्गा, भैरव, हनुमान और कृष्ण।

चारों जुग परताप तुम्हारा : लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं- यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।

अर्थात : 'हे वीर श्रीराम! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें।' इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- 'एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।'

अर्थात् : 'हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी।'

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।

1. त्रेतायुग में हनुमान : त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरीनंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे। वाल्मीकि 'रामायण' में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है।

2. द्वापर में हनुमान : द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं। इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है। महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाते हैं। इस तरह एक बार हनुमानजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरूड़ की शक्ति के अभिमान का मान-मर्दन करते हैं।

3. कलयुग में हनुमान : यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगेगी। कलियुग में हनुमानजी ने अपने भ‍क्तों को उनके होने का आभास कराया है।
ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे- 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।'

कहां रहते हैं हनुमानजी? : हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।

''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''

अर्थात : कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- 'अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ।।'

गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन : गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं।

वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? : इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है।

पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।

कैसे पहुंचे गंधमादन : पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे। गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत उड़िसा में भी बताया जाता है लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं।

मकरध्वज था हनुमानजी का पुत्र : अहिरावण के सेवक मकरध्वज थे। मकरध्वज को अहिरावण ने पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया था।
पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे तब कैसे कोई उनका पुत्र हो सकता है? वाल्मीकि रामायण के अनुसार उनके पुत्र की कथा हनुमानजी के लंकादहन से जुड़ी है।
हनुमानजी की ही तरह मकरध्वज भी वीर, प्रतापी, पराक्रमी और महाबली थे। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी।

क्यों सिन्दूर चढ़ता है हनुमानजी को? : हनुमानजी को सिन्दूर बहुत ही प्रिय है। इसके पीछे ये कारण बताया जाता है कि एक दिन भगवान हनुमानजी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा माता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही है। हनुमानजी ने जब माता से पूछा, तब माता ने कहा कि इसे लगाने से प्रभु राम की आयु बढ़ती है और प्रभु का स्नेह प्राप्त होता है।

तब हनुमानजी ने सोचा जब माता इतना-सा सिन्दूर लगाकर प्रभु का इतना स्नेह प्राप्त कर रही है तो अगर मैं इनसे ज्यादा लगाऊं तो मुझे प्रभु का स्नेह, प्यार और ज्यादा प्राप्त होगा और प्रभु की आयु भी लंबी होगी। ये सोचकर उन्होंने अपने सारे शरीर में सिन्दूर का लेप लगा लिया। इसलिए कहा जाता है कि भगवान हनुमानजी को सिन्दूर लगाना बहुत पसंद है।

पहली हनुमान स्तुति : हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी?

जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।

विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की वकालत की। इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया और हनुमानजी से कहा कि आपका विभीषण को शरण देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट समझना ठीक नहीं है।


इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि तुम लोग विभीषण को ही देखकर अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी ओर से भी तो देखो, मैं क्यों और क्या चाहता हूं...। फिर कुछ देर हनुमानजी ने रुककर कहा- जो एक बार विनीत भाव से मेरी शरण की याचना करता है और कहता है- 'मैं तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं। यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण को अवश्य शरण दी जानी चाहिए।'

इंद्रा‍दि देवताओं के बाद धरती पर सर्वप्रथम विभीषण ने ही हनुमानजी की शरण लेकर उनकी स्तुति की थी। विभीषण को भी हनुमानजी की तरह चिरंजीवी होने का वरदान मिला है। वे भी आज सशरीर जीवित हैं। विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है। विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र को 'हनुमान वडवानल स्तोत्र कहते हैं।

सब सुख लहे तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।

हनुमान की शरण में भयमुक्त जीवन : हनुमानजी ने सबसे पहले सुग्रीव को बाली से बचाया और सुग्रीव को श्रीराम से मिलाया। फिर उन्होंने विभीषण को रावण से बचाया और उनको राम से मिलाया। हनुमानजी की कृपा से ही दोनों को ही भयमुक्त जीवन और राजपद मिला। इसी तरह हनुमानजी ने अपने जीवन में कई राक्षसों और साधु-संतों को भयमुक्त और जीवनमुक्त किया है।

हनुमानजी की पत्नी का नाम : क्या अपने कभी सुना है कि हनुमानजी का विवाह भी हुआ था? आज तक यह बात लोगों से छिपी रही, क्योंकि लोग हिन्दू शास्त्र नहीं पढ़ते और जो पंडित या आचार्य शास्त्र पढ़ते हैं वे ऐसी बातों का जिक्र नहीं करते हैं लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं हनुमानजी का एक ऐसा सच जिसको जानकर आप रह जाएंगे हैरान...

आंध्रप्रदेश के खम्मम जिले में एक मंदिर ऐसा विद्यमान है, जो प्रमाण है हनुमानजी के विवाह का। इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा के साथ उनकी पत्नी की प्रतिमा भी विराजमान है। इस मंदिर के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। माना जाता है कि हनुमानजी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद पति-पत्नी के बीच चल रहे सारे विवाद समाप्त हो जाते हैं। उनके दर्शन के बाद जो भी विवाद की शुरुआत करता है, उसका बुरा होता है।

हनुमानजी की पत्नी का नाम सुवर्चला था। वैसे तो हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और आज भी वे ब्रह्मचर्य के व्रत में ही हैं, विवाह करने का मतलब यह नहीं कि वे ब्रह्मचारी नहीं रहे। कहा जाता है कि पराशर संहिता में हनुमानजी का किसी खास परिस्थिति में विवाह होने का जिक्र है। कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण ही बजरंगबली को सुवर्चला के साथ विवाह बंधन में बंधना पड़ा।

इस संबंध में एक कथा है कि हनुमानजी ने भगवान सूर्य को अपना गुरु बनाया था। हनुमानजी भगवान सूर्य से अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सूर्य कहीं रुक नहीं सकते थे इसलिए हनुमानजी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ-साथ उड़ना पड़ता था और भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देते। लेकिन हनुमानजी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक दिन धर्मसंकट खड़ा हो गया।

कुल 9 तरह की विद्याओं में से हनुमानजी को उनके गुरु ने 5 तरह की विद्याएं तो सिखा दीं, लेकिन बची 4 तरह की विद्याएं और ज्ञान ऐसे थे, जो केवल किसी विवाहित को ही सिखाए जा सकते थे। हनुमानजी पूरी शिक्षा लेने का प्रण कर चुके थे और इससे कम पर वे मानने को राजी नहीं थे। इधर भगवान सूर्य के सामने संकट था कि वे धर्म के अनुशासन के कारण किसी अविवाहित को कुछ विशेष विद्याएं नहीं सिखा सकते थे। ऐसी स्थिति में सूर्यदेव ने हनुमानजी को विवाह की सलाह दी।

अपने प्रण को पूरा करने के लिए हनुमानजी ने विवाह करने की सोची। लेकिन हनुमानजी के लिए वधू कौन हो और कहां से वह मिलेगी? इसे लेकर सभी सोच में पड़ गए। ऐसे में सूर्यदेव ने अपनी परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमानजी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद हनुमानजी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई। इस तरह हनुमानजी भले ही शादी के बंधन में बंध गए हो, लेकिन शारीरिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं।

एक वेबसाइट का दावा है कि प्रत्येक 41 साल बाद हनुमानजी श्रीलंका के जंगलों में प्राचीनकाल से रह रहे आदिवासियों से मिलने के लिए आते हैं। वेबसाइट के मुताबिक श्रीलंका के जंगलों में कुछ ऐसे कबीलाई लोगों का पता चला है जिनसे मिलने हनुमानजी आते हैं।

इन कबीलाई लोगों पर अध्ययन करने वाले आध्यात्मिक संगठन 'सेतु' के अनुसार पिछले साल ही हनुमानजी इन कबीलाई लोगों से मिलने आए थे। अब हनुमानजी 41 साल बाद आएंगे। इन कबीलाई या आदिवासी समूह के लोगों को 'मातंग' नाम दिया गया है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मातंग ऋषि का आश्रम है, जहां हनुमानजी का जन्म हुआ था।

वेबसाइट सेतु एशिया ने दावा किया है कि 27 मई 2014 को हनुमानजी श्रीलंका में मातंग के साथ थे। सेतु के अनुसार कबीले का इतिहास रामायणकाल से जुड़ा है। कहा जाता है कि भगवान राम के स्वर्ग चले जाने के बाद हनुमानजी दक्षिण भारत के जंगलों में लौट आए थे और फिर समुद्र पार कर श्रीलंका के जंगलों में रहने लगे। जब तक पवनपुत्र हनुमान श्रीलंका के जंगलों में रहे, वहां के कबीलाई लोगों ने उनकी बहुत सेवा की।

जब हनुमानजी वहां से जाने लगे तब उन्होंने वादा किया कि वे हर 41 साल बाद आकर वहां के कबीले की पीढ़ियों को ब्रह्मज्ञान देंगे। कबीले का मुखिया हनुमानजी के साथ की बातचीत को एक लॉग बुक में दर्ज कराता है। 'सेतु' नामक संगठन इस लॉग बुक का अध्ययन कर उसका खुलासा करने का दावा करता है।

हनुमान दर्शन और कृपा : हनुमानजी बहुत ही जल्द प्रसन्न होने वाले देवता हैं। उनकी कृपा आप पर निरंतर बनी रहे इसके लिए पहली शर्त यह है कि आप मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें अर्थात कभी भी झूठ न बोलें, किसी भी प्रकार का नशा न करें, मांस न खाएं और अपने परिवार के सदस्यों से प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रखें। इसके अलावा प्रतिदिन श्रीहनुमान चालीसा या श्रीहनुमान वडवानल स्तोत्र का पाठ करें। मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। इस तरह ये कार्य करते हुए नीचे लिखे उपाय करें...

हनुमान जयंती या महीने के किसी भी मंगलवार के दिन सुबह उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। 1 लोटा जल लेकर हनुमानजी के मंदिर में जाएं और उस जल से हनुमानजी की मूर्ति को स्नान कराएं।

पहले दिन एक दाना साबुत उड़द का हनुमानजी के सिर पर रखकर 11 परिक्रमा करें और मन ही मन अपनी मनोकामना हनुमानजी को कहें, फिर वह उड़द का दाना लेकर घर लौट आएं तथा उसे अलग रख दें।

दूसरे दिन से 1-1 उड़द का दाना रोज बढ़ाते रहें तथा लगातार यही प्रक्रिया करते रहें। 41 दिन 41 दाने रखने के बाद 42वें दिन से 1-1 दाना कम करते रहें। जैसे 42वें दिन 40, 43वें दिन 39 और 81वें दिन 1 दाना। 81वें दिन का यह अनुष्ठान पूर्ण होने पर उसी दिन, रात में श्रीहनुमानजी स्वप्न में दर्शन देकर साधक को मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद देते हैं। इस पूरी विधि के दौरान जितने भी उड़द के दाने आपने हनुमानजी को चढ़ाए हैं, उन्हें नदी में प्रवाहित कर दें। ( अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' ) http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/mystery-of-lord-hanuman-115021200016_1.html

Sunday, January 4, 2015

आर्यों ने ही बसाया था हड़प्पा सभ्यता को - रामशरण शर्मा

 हड़प्पा सभ्यता आर्यों की पूर्ववर्ती सभ्यता - संजीव कुमार सिंह

   भारत में आर्य बाहर से आए या फिर स्वदेशी थे, इस बात पर बरसों से जारी चर्चा के बीच भारत के कई इतिहासकार मानते हैं कि भारत में आर्यों का आगमन 1500 ईसा पूर्व मध्य एशिया से हुआ।
प्रसिद्ध इतिहासकार रामशरण शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत का इतिहास’ में लिखा है कि आर्य हिंद-यूरोपीय परिवार की भाषाएं बोलते थे, जो अपने परिवर्तित रूपों में आज भी समूचे यूरोप और ईरान में व भारतीय उपमहादेश के अधिकतर भागों में बोली जाती हैं। लगभग 1600 ईसा पूर्व के कस्साइट अभिलेखों और सीरिया में मिले अभिलेखों में आर्य नामों का उल्लेख है। उनसे पश्चिम एशिया में आर्य भाषा-भाषियों की उपस्थिति का पता चलता है।
राष्ट्रीय संग्रहालय के पुरातत्त्ववेत्ता और प्रकाशन विभाग के प्रभारी संजीव कुमार सिंह ने बताया कि आर्य मूल रूप से भारतीय हैं। वे हड़प्पा सभ्यता को आर्यों की पूर्ववर्ती सभ्यता मानते हैंं। सिंह ने बताया कि आर्य संस्कृति का इतिहास लेखन औपनिवेशिक सोच के आधार पर हुआ है। अंग्रेजी इतिहासकारों ने एक खास वर्ग को बाहरी बताकर समाज को बांटने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक इतिहासकारों ने हड़प्पा के बहुत कम स्थलों की खोज के आधार पर निष्कर्ष निकाला था कि हड़प्पा सभ्यता और आर्य सभ्यता अलग-अलग हैं। अब जबकि 2700 से अधिक हड़प्पाई स्थलों की खोज हो चुकी है, तो इसके आधार पर कहा जा सकता है कि हड़प्पा सभ्यता आर्यों की ही सभ्यता थी।
सिंह ने अपनी पुस्तक ‘ग्लोरी दैट वाज हड़प्पन सिविलाइजेशन’ में इन सभी स्थलों की विस्तृत सूची दी है। सिंह ने इसके पीछे तर्क दिया कि हड़प्पा सभ्यता के लोथल से अग्निकुंड के साक्ष्य मिले हैं। अर्थात हड़प्पा सभ्यता में अग्नि को विशेष महत्त्व प्राप्त था। वहीं आर्यों में भी अग्नि को विशेष महत्त्व प्राप्त था। सिंह ने बताया कि अगर भाषाई आधार को छोड़ दिया जाए तो इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि आर्य मध्य एशिया से आए। केवल भाषा के आधार पर तो हम यह भी कह सकते हैं कि यूरोपीय लोगों का मूल स्थान भारत ही था और वे यहीं से यूरोप गए क्योंकि हमारे यहां प्राचीनकाल में उन्नत नौकायन के साक्ष्य मिले हैं। उन्होंने बताया कि हड़प्पा के स्थलों से मिले घोड़े के साक्ष्य के आधार पर भी कहा जा सकता है कि आर्यों ने ही हड़प्पा को बसाया था। ( साभार-  (भाषा)। नई दिल्ली, 4 जनवरी )




कोलकाता की जनरल पोस्ट आॅफिस में क्षतिग्रस्त हो रही हैं ऐतिहासिक महत्त्व वाली सामग्रियां

   कोलकाता की जनरल पोस्ट आॅफिस के एक शताब्दी पुराने डाक संग्रहालय में निरीक्षक की अनुपस्थिति और रखरखाव के अभाव के कारण यहां रखी ऐतिहासिक महत्त्व वाली सामग्रियां क्षतिग्रस्त हो गई हैं। एक साल से भी अधिक समय से बंद पड़ा संग्रहालय खस्ता हालत में है। जीपीओ के अधिकारी जल्द मरम्मत करवाने के लिए भारतीय संग्रहालय से मदद मांग रहे हैं। डाक संग्रहालय जीपीओ के भूतल पर स्थित है।
1806 में निर्माणाधीन जीपीओ की दुर्लभ तस्वीर की एक झलक लेने के लिए जहां क्षतिग्रस्त दीवारों से गिरे मलबे के ढेर को पार कर अलमारी के पीछे तक जाना पड़ता है, वहीं उस दौर में इस इमारत के सामने बने खूबसूरत बगीचों की तस्वीर जमीन पर गिरी पड़ी है और धूल फांक रही है। बगीचों वाले उस क्षेत्र को अब पार्किंग क्षेत्र बना दिया गया है। ब्रिटिशकालीन दौर के देश के नक्शे अब संग्रहालय की सीलन भरी दीवारों के कारण एक-दूसरे से अलग होते नजर आते हैं। जनवरी 1890 की तारीख वाले पुराने डाक नक्शे ‘बेहर सर्कल’ के साथ-साथ सीलन वाली दीवारों ने बंगाल और असम सर्कल रूट के यातायात चार्ट को, देश के रेलवे तंत्र के एक अन्य नक्शे (अप्रैल 1904) को और ब्रिटिश राज के समय के देश की हवाई डाक सेवा के नक्शे को भी नुकसान पहुंचाया है।
इन सब सामानों में से सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों- नोबल विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के हस्ताक्षर और एक अन्य नोबल विजेता सीवी रमण के हस्ताक्षर वाली डाकघर की जीवन बीमा पॉलिसी को सेलोफेन शीट में लपेटकर रखा गया है। लेकिन उन्हें भी तत्काल देखभाल की जरूरत है। संग्रहालय में कई वस्तुएं पर्याप्त रखरखाव के अभाव में खतरे के कगार पर हैं। कई वस्तुएं जगह की कमी के कारण जमीन पर पड़ी हैं।
कोलकाता जीपीओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा- हम जानते हैं कि इन नक्शों और कागजों को तत्काल संरक्षित नहीं किया गया तो वे हमेशा के लिए नष्ट हो जाएंगे। इतने अधिक ऐतिहासिक महत्त्व की चीजें रखने के लिए इस संग्रहालय में जरूरी बुनियादी सुविधाओं के अभाव की बात स्वीकार करते हुए अधिकारी ने कहा कि पुरानी तस्वीरों और मुहरों को संरक्षित करने के लिए जीपीओ भारतीय संग्रहालय की मदद मांग रहा है।
उन्होंने कहा- हमारे पास इस तरह के संग्रहालय के लिए पर्याप्त अवसंरचना नहीं है। न तो हमारे पास निरीक्षक है और न ही प्रदर्शन में रखी गई वस्तुओं के संरक्षण के लिए कोई तकनीकी सहायक ही है।
उन्होंने कहा कि हमने भारतीय संग्रहालय के अधिकारियों से मदद मांगी है। हम इन नक्शों व मुहरों के संरक्षण के लिए संरक्षण विशेषज्ञ को नियुक्त करेंगे। दीवारों पर सीलन-रोधी परत चढ़ाने के अलावा डाक विभाग के अधिकारी संग्रहालय में बिजली की तारों की मौजूदा व्यवस्था को बदलने और ‘फायर एग्जिट’ बनाने की भी योजना तैयार कर रहे हैं। ( साभार-  (भाषा)। कोलकाता, 4 जनवरी )

Tuesday, October 21, 2014

एशिया के सबसे पुराने भारतीय संग्रहालय के डिजिटलीकरण की योजना

 
दो सौ साल पुराने भारतीय संग्रहालय को एशिया का सबसे पुराना संग्रहालय माना जाता है। अब इसे आधुनिक बनाने और सजाने संवारने के लिए लंदन के नेशनल हिस्ट्री म्यूजियम (एनएचएम) के विशेषज्ञों से संपर्क किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य संग्रहालय में रखी चीजों का डिजिटलीकरण करना, योजना तैयार करना और इसे एक आधुनिक शोध केंद्र के रूप में स्थापित करना है। भारतीय संग्रहालय प्राधिकरण के साथ हुई बैठक में एनएचएम के अंतरराष्ट्रीय संपर्क प्रमुख ने ऐसे विचार व्यक्त किए। उन्होंने विज्ञान की गुत्थियों का सार्वजनिक जीवंत प्रदर्शन, विलुप्त प्रजातियों का जीवंत कलात्मक प्रदर्शन जैसे विचार साझा किए।
मालूम हो कि भारतीय संग्रहालय की स्थापना दो फरवरी 1814 में हुई और फिलहाल इसे पुनर्निर्मित करने के पहले चरण की शुरुआत की गई है, जिसके अंतर्गत इसके सांस्कृतिक विरासत वाले हिस्से को पुनर्निर्मित किया जा रहा है। इसके बाद संग्रहालय के प्राकृतिक इतिहास वाले हिस्से को पुनर्निमित किया जाएगा। भारतीय संग्रहालय और  एनएचएम दोनों ही लगभग दो सौ वर्ष पुराने हैं और ऐतिहासिक रूप से कुछ मायनों में जुड़े भी हुए हैं।
सूत्रों के मुताबिक प्राकृतिक इतिहास का दस्तावेजीकरण करते हुए संग्रहालय को ताजातरीन वैज्ञानिक खोजों को भी ध्यान में रखना होगा और उन्हें एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करना होगा। एनएचएम में सात करोड़ नमूने संगृहीत हैं और इस मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है। संग्रहालय के इस विशाल संग्रहण में सूक्ष्मदर्शी से देखे जा सकने वाले बेहद सूक्ष्म जीवों से लेकर कभी पृथ्वी के सबसे विशालकाय स्तनपायी जीव मैमथ (हाथी) का कंकाल भी शामिल है। एनएचएम में 1750 से लेकर बीसवीं सदी तक की तीस हजार महत्वपूर्ण भारतीय कलाकृतियों का संग्रह है, जो बताता है कि ब्रिटिश राज की नजरों में भी भारत के समृद्ध प्राकृतिक इतिहास का क्या महत्व था।
  भारतीय संग्रहालय के प्रबंध निदेशक के मुताबिक, दोनों संग्रहालय वैज्ञानिक आदान-प्रदान में भी एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। उन्होंने बताया कि एनएचएम के पास प्राकृतिक इतिहास के संग्रह का अनुभव विश्व में सबसे ज्यादा है, इसलिए हम विश्व में सबसे अच्छा बनने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। हम अभी केंद्र सरकार से आखिरी अनुमति मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनके मुताबिक दूसरे चरण के पुनर्निर्माण कार्य पर विचार चल रहा है और एनएचएम से मिलने वाले परामर्श के आधार पर हम आगे बढ़ेंगे। (साभार-जनसत्ता )

यहां मिला है समुद्र मंथन का प्रमाण


गुजरात के सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में स्थित है मंदराचल पर्वत

बिहार के भागलपुर के पास  भी स्थित है एक मंदराचल पर्वत 

   समुद्र मंथन को अगर लाइफ  मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाए तो हम पाएंगे कि सीधे-सीधे किसी को अमृत (परमात्मा) नहीं मिलता। उसके लिए पहले मन को विकारों को दूर करना पड़ता है तथा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना पड़ता है। समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला था। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेन्द्रियां, 5 जनेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं। 

देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन की कथा हम सभी जानते हैं। इस कथा के अनुसार देवता व असुरों ने नागराज वासुकि की नेती बनाकर मंदराचल पर्वत की सहायता को समुद्र को मथा था। समुद्र मंथन से ही लक्ष्मी, चंद्रमा, अप्सराएं व भगवान धन्वन्तरि अमृत लेकर निकले थे। 
आर्कियोलॉजी और ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में मंदराचल पर्वत होने का दावा किया है।  आर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी के अनुसार बिहार के भागलपुर के पास स्थित भी एक मंदराचल पर्वत है और गुजरात के समुद्र से निकला यह पर्वत भी उसी का हिस्सा लग रहा है।

   बिहार और गुजरात में मिले इन दोनों पर्वतों का निर्माण एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से हुआ है। इस तरह यह दोनों पर्वत एक ही हैं। जबकि आमतौर पर ग्रेनाइट पत्थर के पर्वत समुद्र में नहीं मिला करते। इसलिए गुजरात के समुद्र में मिला यह पर्वत शोध का विषय है। खोजे गए पर्वत के बीचोंबीच नाग आकृति भी मिली है। पर्वत पर नाग आकृति मिलने से ये दावा और भी पुख्ता होता है। 


जानिए समुद्र मंथन की पूरी कथा

धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और ये भी बताया कि समुद्र मंथन को अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले।
 
1- कालकूट विष
समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) इस इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।
2- कामधेनु
समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।
3- उच्चैश्रवा घोड़ा
समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ  मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की गति ही सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत (परमात्मा) चाहिए तो अपने मन की गति पर विराम लगाना होगा। तभी परमात्मा से मिलन संभव है।
 4- ऐरावत हाथी
 समुद्र मंथन में चौथे नंबर पर ऐरावत हाथी निकला, उसके चार बड़े-बड़े दांत थे। उनकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने रख लिया। ऐरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का और उसके चार दांत लोभ, मोह, वासना और क्रोध का। चमकदार (शुद्ध व निर्मल) बुद्धि से ही हमें इन विकारों पर काबू रख सकते हैं।
5- कौस्तुभ मणि
समुद्र मंथन में पांचवे क्रम में निकली कौस्तुभ मणि, जिसे भगवान विष्णु ने अपने ह्रदय पर धारण कर लिया। कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब आपके मन से सारे विकार निकल जाएंगे, तब भक्ति ही शेष रह जाएगी। यही भक्ति ही भगवान ग्रहण करेंगे।  
 6- कल्पवृक्ष
 समुद्र मंथन में छठे क्रम में निकला इच्छाएं पूरी करने वाला कल्पवृक्ष, इसे देवताओं ने स्वर्ग में स्थापित कर दिया। कल्पवृक्ष प्रतीक है आपकी इच्छाओं का। कल्पवृक्ष से जुड़ा लाइफ  मैनेजमेंट सूत्र है कि अगर आप अमृत (परमात्मा) प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं तो अपनी सभी इच्छाओं का त्याग कर दें। मन में इच्छाएं होंगी तो परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है।
7- रंभा अप्सरा
समुद्र मंथन में सातवे क्रम में रंभा नामक अप्सरा निकली। वह सुंदर वस्त्र व आभूषण पहने हुई थीं। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। ये भी देवताओं के पास चलीं गई। अप्सरा प्रतीक है मन में छिपी वासना का। जब आप किसी विशेष उद्देश्य में लगे होते हैं तब वासना आपका मन विचलित करने का प्रयास करती हैं। उस स्थिति में मन पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।
 8- देवी लक्ष्मी
 समुद्र मंथन में आठवे स्थान पर निकलीं देवी लक्ष्मी। असुर, देवता, ऋषि आदि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं, लेकिन लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण कर लिया। लाइफ  मैनेजमेंट के नजरिए से लक्ष्मी प्रतीक है धन, वैभव, ऐश्वर्य व अन्य सांसारिक सुखों का। जब हम अमृत (परमात्मा) प्राप्त करना चाहते हैं तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन हमें उस ओर ध्यान न देकर केवल ईश्वर भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए।
9- वारुणी देवी
समुद्र मंथन से नौवे क्रम में निकली वारुणी देवी, भगवान की अनुमति से इसे दैत्यों ने ले लिया। वारुणी का अर्थ है मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। नशा कैसा भी हो शरीर और समाज के लिए बुरा ही होता है। परमात्मा को पाना है तो सबसे पहले नशा छोडऩा होगा तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है।
 10- चंद्रमा
समुद्र मंथन में दसवें क्रम में निकले चंद्रमा। चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चंद्रमा प्रतीक है शीतलता का। जब आपका मन बुरे विचार, लालच, वासना, नशा आदि से मुक्त हो जाएगा, उस समय वह चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए ऐसा ही मन चाहिए। ऐसे मन वाले भक्त को ही अमृत (परमात्मा) प्राप्त होता है।
11- पारिजात वृक्ष
इसके बाद समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकला। इस वृक्ष की विशेषता थी कि इसे छूने से थकान मिट जाती थी। यह भी देवताओं के हिस्से में गया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष के निकलने का अर्थ सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति है। जब आप (अमृत) परमात्मा के इतने निकट पहुंच जाते हैं तो आपकी थकान स्वयं ही दूर हो जाती है और मन में शांति का अहसास होता है।
12- पांचजन्य शंख
समुद्र मंथन से बारहवें क्रम में पांचजन्य शंख निकला। इसे भगवान विष्णु ने ले लिया। शंख को विजय का प्रतीक माना गया है साथ ही इसकी ध्वनि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। जब आप अमृत (परमात्मा) से एक कदम दूर होते हैं तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद यानी स्वर से भर जाता है। इसी स्थिति में आपको ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
13 व 14- भगवान धन्वन्तरि व अमृत कलश
 समुद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले। भगवान धन्वन्तरि प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन के। जब आपका तन निरोगी और मन निर्मल होगा तभी इसके भीतर आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी।
    समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेंद्रियां, 5 जननेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं।

(साभार-दैनिक भाष्कर http://religion.bhaskar.com/news-hf/DHA-UTS-deepawali-2014-here-is-found-the-evidence-of-churning-sea-know-life-management-a-4783039-PHO.html)

Wednesday, August 20, 2014

ताजमहल से जुड़े इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा उठाया

आगरा के किले से लेकर ताजमहल तक के रास्ते में 50 के करीब मुगल बाग थे

 उन्नीसवीं सदी के कुछ फोटो निगेटिवों की जांच पड़ताल ने ताजमहल से जुड़े इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा उठाया। इन तस्वीरों के माध्यम से यह पता चला कि आगरा के किले से लेकर ताजमहल तक के रास्ते में 50 के करीब मुगल बाग थे।
यह निगेटिव उन 220 दुर्लभ चित्रों के संग्रह का हिस्सा हैं जिसमें ताजमहल और विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी पहली तस्वीरें शामिल हैं। वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पर इनसे जुड़ी एक प्रदर्शनी चल रही है जो 30 सितंबर तक जारी रहेगी। इस केंद्र की सदस्य सचिव दीपाली खन्ना ने कहा कि इस प्रदर्शनी में ताज से जुड़े पहले निगेटिव हैं। मेरा मानना है कि भारत में इन्हें पहली बार ही प्रदर्शित किया जा रहा है। इतिहासकार आभा कौल ने इन निगेटिवों की जांच करके पता लगाया कि ताजमहल से लेकर आगरा के किले के बीच 50 मुगल उद्यान थे।
प्रदर्शनी में ताज की पहली तस्वीर लेने वाले जॉन मूरे के चित्र भी शामिल किए गए हैं। इसके अलावा भारत के पड़ोसी देश जैसे कि नेपाल, बर्मा और सीलोन के भी ऐतिहासिक चित्र इस प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं जिन्हें उस समय के ब्रिटिश अधिकारियों, यूरोपीय और स्थानीय लोगों ने उतारा था। इसके अलावा प्रथम युद्ध चित्रक राजा दीन दयाल के चित्र भी यहां प्रदर्शित किए गए हैं। नई दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा)।

छत्तीसगढ़ में होगी फॉसिल पार्क की स्थापना

   छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के कोरिया जिले में फॉसिल पार्क की स्थापना करने का फऐसला किया है। सरकारी सूत्रों ने बुधवार को यहां बताया कि छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में मेरीन फॉसिल पार्क की स्थापना की जाएगी। राज्य सरकार के वन विभाग इसे बनाएगा।
अधिकारियों ने बताया कि कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ के पास हसदेव नदी के किनारे एक बड़े इलाके में मेरीन फॉसिल (समुद्रीय जीवाश्म) की मौजूदगी प्रकाश में आई है। वन विभाग के अधिकारियों को भ्रमण के दौरान इसकी जानकारी मिली। उन्होंने बताया कि लखनऊ  स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट आॅफ पेलियोबाटनी के वैज्ञानिकों ने भी जिले के आमाखेरवा गांव सहित आसपास के स्थल का दौरा किया। उन्होंने भी बड़े पैमाने पर फॉसिल की उपस्थिति की पुष्टि कर दी है। जीवाश्मों के अध्ययन और विश्लेषण के लिए बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट भारत सरकार का एक प्रमुख प्रामाणिक संस्थान है।
संस्थान के वैज्ञानिकों ने इन जीवाश्मों को लगभग 25 करोड़ साल पुराना परमियन भूवैज्ञानिक काल के आसपास का ठहराया है। उन्होंने भी इस क्षेत्र को जिओहेरिटेज के रूप में विकसित करने की सिफारिश राज्य सरकार से की है।
अधिकारियों ने बताया कि राज्य सरकार ने फॉसिल पार्क विकसित करने के लिए 17 लाख 50 हजार रुपए का प्रावधान किया है। इलाके की सुरक्षा के लिए चैनलिंक सहित चौकीदार हट और अन्य पर्यटक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। रायपुर, 20 अगस्त (भाषा)।

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