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Tuesday, October 21, 2014

एशिया के सबसे पुराने भारतीय संग्रहालय के डिजिटलीकरण की योजना

 
दो सौ साल पुराने भारतीय संग्रहालय को एशिया का सबसे पुराना संग्रहालय माना जाता है। अब इसे आधुनिक बनाने और सजाने संवारने के लिए लंदन के नेशनल हिस्ट्री म्यूजियम (एनएचएम) के विशेषज्ञों से संपर्क किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य संग्रहालय में रखी चीजों का डिजिटलीकरण करना, योजना तैयार करना और इसे एक आधुनिक शोध केंद्र के रूप में स्थापित करना है। भारतीय संग्रहालय प्राधिकरण के साथ हुई बैठक में एनएचएम के अंतरराष्ट्रीय संपर्क प्रमुख ने ऐसे विचार व्यक्त किए। उन्होंने विज्ञान की गुत्थियों का सार्वजनिक जीवंत प्रदर्शन, विलुप्त प्रजातियों का जीवंत कलात्मक प्रदर्शन जैसे विचार साझा किए।
मालूम हो कि भारतीय संग्रहालय की स्थापना दो फरवरी 1814 में हुई और फिलहाल इसे पुनर्निर्मित करने के पहले चरण की शुरुआत की गई है, जिसके अंतर्गत इसके सांस्कृतिक विरासत वाले हिस्से को पुनर्निर्मित किया जा रहा है। इसके बाद संग्रहालय के प्राकृतिक इतिहास वाले हिस्से को पुनर्निमित किया जाएगा। भारतीय संग्रहालय और  एनएचएम दोनों ही लगभग दो सौ वर्ष पुराने हैं और ऐतिहासिक रूप से कुछ मायनों में जुड़े भी हुए हैं।
सूत्रों के मुताबिक प्राकृतिक इतिहास का दस्तावेजीकरण करते हुए संग्रहालय को ताजातरीन वैज्ञानिक खोजों को भी ध्यान में रखना होगा और उन्हें एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करना होगा। एनएचएम में सात करोड़ नमूने संगृहीत हैं और इस मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है। संग्रहालय के इस विशाल संग्रहण में सूक्ष्मदर्शी से देखे जा सकने वाले बेहद सूक्ष्म जीवों से लेकर कभी पृथ्वी के सबसे विशालकाय स्तनपायी जीव मैमथ (हाथी) का कंकाल भी शामिल है। एनएचएम में 1750 से लेकर बीसवीं सदी तक की तीस हजार महत्वपूर्ण भारतीय कलाकृतियों का संग्रह है, जो बताता है कि ब्रिटिश राज की नजरों में भी भारत के समृद्ध प्राकृतिक इतिहास का क्या महत्व था।
  भारतीय संग्रहालय के प्रबंध निदेशक के मुताबिक, दोनों संग्रहालय वैज्ञानिक आदान-प्रदान में भी एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। उन्होंने बताया कि एनएचएम के पास प्राकृतिक इतिहास के संग्रह का अनुभव विश्व में सबसे ज्यादा है, इसलिए हम विश्व में सबसे अच्छा बनने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। हम अभी केंद्र सरकार से आखिरी अनुमति मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनके मुताबिक दूसरे चरण के पुनर्निर्माण कार्य पर विचार चल रहा है और एनएचएम से मिलने वाले परामर्श के आधार पर हम आगे बढ़ेंगे। (साभार-जनसत्ता )

यहां मिला है समुद्र मंथन का प्रमाण


गुजरात के सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में स्थित है मंदराचल पर्वत

बिहार के भागलपुर के पास  भी स्थित है एक मंदराचल पर्वत 

   समुद्र मंथन को अगर लाइफ  मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाए तो हम पाएंगे कि सीधे-सीधे किसी को अमृत (परमात्मा) नहीं मिलता। उसके लिए पहले मन को विकारों को दूर करना पड़ता है तथा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना पड़ता है। समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला था। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेन्द्रियां, 5 जनेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं। 

देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन की कथा हम सभी जानते हैं। इस कथा के अनुसार देवता व असुरों ने नागराज वासुकि की नेती बनाकर मंदराचल पर्वत की सहायता को समुद्र को मथा था। समुद्र मंथन से ही लक्ष्मी, चंद्रमा, अप्सराएं व भगवान धन्वन्तरि अमृत लेकर निकले थे। 
आर्कियोलॉजी और ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने सूरत जिले के पिंजरात गांव के पास समुद्र में मंदराचल पर्वत होने का दावा किया है।  आर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी के अनुसार बिहार के भागलपुर के पास स्थित भी एक मंदराचल पर्वत है और गुजरात के समुद्र से निकला यह पर्वत भी उसी का हिस्सा लग रहा है।

   बिहार और गुजरात में मिले इन दोनों पर्वतों का निर्माण एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से हुआ है। इस तरह यह दोनों पर्वत एक ही हैं। जबकि आमतौर पर ग्रेनाइट पत्थर के पर्वत समुद्र में नहीं मिला करते। इसलिए गुजरात के समुद्र में मिला यह पर्वत शोध का विषय है। खोजे गए पर्वत के बीचोंबीच नाग आकृति भी मिली है। पर्वत पर नाग आकृति मिलने से ये दावा और भी पुख्ता होता है। 


जानिए समुद्र मंथन की पूरी कथा

धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और ये भी बताया कि समुद्र मंथन को अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले।
 
1- कालकूट विष
समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) इस इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।
2- कामधेनु
समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।
3- उच्चैश्रवा घोड़ा
समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ  मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की गति ही सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत (परमात्मा) चाहिए तो अपने मन की गति पर विराम लगाना होगा। तभी परमात्मा से मिलन संभव है।
 4- ऐरावत हाथी
 समुद्र मंथन में चौथे नंबर पर ऐरावत हाथी निकला, उसके चार बड़े-बड़े दांत थे। उनकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने रख लिया। ऐरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का और उसके चार दांत लोभ, मोह, वासना और क्रोध का। चमकदार (शुद्ध व निर्मल) बुद्धि से ही हमें इन विकारों पर काबू रख सकते हैं।
5- कौस्तुभ मणि
समुद्र मंथन में पांचवे क्रम में निकली कौस्तुभ मणि, जिसे भगवान विष्णु ने अपने ह्रदय पर धारण कर लिया। कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब आपके मन से सारे विकार निकल जाएंगे, तब भक्ति ही शेष रह जाएगी। यही भक्ति ही भगवान ग्रहण करेंगे।  
 6- कल्पवृक्ष
 समुद्र मंथन में छठे क्रम में निकला इच्छाएं पूरी करने वाला कल्पवृक्ष, इसे देवताओं ने स्वर्ग में स्थापित कर दिया। कल्पवृक्ष प्रतीक है आपकी इच्छाओं का। कल्पवृक्ष से जुड़ा लाइफ  मैनेजमेंट सूत्र है कि अगर आप अमृत (परमात्मा) प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं तो अपनी सभी इच्छाओं का त्याग कर दें। मन में इच्छाएं होंगी तो परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है।
7- रंभा अप्सरा
समुद्र मंथन में सातवे क्रम में रंभा नामक अप्सरा निकली। वह सुंदर वस्त्र व आभूषण पहने हुई थीं। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। ये भी देवताओं के पास चलीं गई। अप्सरा प्रतीक है मन में छिपी वासना का। जब आप किसी विशेष उद्देश्य में लगे होते हैं तब वासना आपका मन विचलित करने का प्रयास करती हैं। उस स्थिति में मन पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।
 8- देवी लक्ष्मी
 समुद्र मंथन में आठवे स्थान पर निकलीं देवी लक्ष्मी। असुर, देवता, ऋषि आदि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं, लेकिन लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण कर लिया। लाइफ  मैनेजमेंट के नजरिए से लक्ष्मी प्रतीक है धन, वैभव, ऐश्वर्य व अन्य सांसारिक सुखों का। जब हम अमृत (परमात्मा) प्राप्त करना चाहते हैं तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन हमें उस ओर ध्यान न देकर केवल ईश्वर भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए।
9- वारुणी देवी
समुद्र मंथन से नौवे क्रम में निकली वारुणी देवी, भगवान की अनुमति से इसे दैत्यों ने ले लिया। वारुणी का अर्थ है मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। नशा कैसा भी हो शरीर और समाज के लिए बुरा ही होता है। परमात्मा को पाना है तो सबसे पहले नशा छोडऩा होगा तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है।
 10- चंद्रमा
समुद्र मंथन में दसवें क्रम में निकले चंद्रमा। चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चंद्रमा प्रतीक है शीतलता का। जब आपका मन बुरे विचार, लालच, वासना, नशा आदि से मुक्त हो जाएगा, उस समय वह चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए ऐसा ही मन चाहिए। ऐसे मन वाले भक्त को ही अमृत (परमात्मा) प्राप्त होता है।
11- पारिजात वृक्ष
इसके बाद समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकला। इस वृक्ष की विशेषता थी कि इसे छूने से थकान मिट जाती थी। यह भी देवताओं के हिस्से में गया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष के निकलने का अर्थ सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति है। जब आप (अमृत) परमात्मा के इतने निकट पहुंच जाते हैं तो आपकी थकान स्वयं ही दूर हो जाती है और मन में शांति का अहसास होता है।
12- पांचजन्य शंख
समुद्र मंथन से बारहवें क्रम में पांचजन्य शंख निकला। इसे भगवान विष्णु ने ले लिया। शंख को विजय का प्रतीक माना गया है साथ ही इसकी ध्वनि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। जब आप अमृत (परमात्मा) से एक कदम दूर होते हैं तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद यानी स्वर से भर जाता है। इसी स्थिति में आपको ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
13 व 14- भगवान धन्वन्तरि व अमृत कलश
 समुद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले। भगवान धन्वन्तरि प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन के। जब आपका तन निरोगी और मन निर्मल होगा तभी इसके भीतर आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी।
    समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेंद्रियां, 5 जननेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं।

(साभार-दैनिक भाष्कर http://religion.bhaskar.com/news-hf/DHA-UTS-deepawali-2014-here-is-found-the-evidence-of-churning-sea-know-life-management-a-4783039-PHO.html)

Wednesday, August 20, 2014

ताजमहल से जुड़े इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा उठाया

आगरा के किले से लेकर ताजमहल तक के रास्ते में 50 के करीब मुगल बाग थे

 उन्नीसवीं सदी के कुछ फोटो निगेटिवों की जांच पड़ताल ने ताजमहल से जुड़े इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा उठाया। इन तस्वीरों के माध्यम से यह पता चला कि आगरा के किले से लेकर ताजमहल तक के रास्ते में 50 के करीब मुगल बाग थे।
यह निगेटिव उन 220 दुर्लभ चित्रों के संग्रह का हिस्सा हैं जिसमें ताजमहल और विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी पहली तस्वीरें शामिल हैं। वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पर इनसे जुड़ी एक प्रदर्शनी चल रही है जो 30 सितंबर तक जारी रहेगी। इस केंद्र की सदस्य सचिव दीपाली खन्ना ने कहा कि इस प्रदर्शनी में ताज से जुड़े पहले निगेटिव हैं। मेरा मानना है कि भारत में इन्हें पहली बार ही प्रदर्शित किया जा रहा है। इतिहासकार आभा कौल ने इन निगेटिवों की जांच करके पता लगाया कि ताजमहल से लेकर आगरा के किले के बीच 50 मुगल उद्यान थे।
प्रदर्शनी में ताज की पहली तस्वीर लेने वाले जॉन मूरे के चित्र भी शामिल किए गए हैं। इसके अलावा भारत के पड़ोसी देश जैसे कि नेपाल, बर्मा और सीलोन के भी ऐतिहासिक चित्र इस प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं जिन्हें उस समय के ब्रिटिश अधिकारियों, यूरोपीय और स्थानीय लोगों ने उतारा था। इसके अलावा प्रथम युद्ध चित्रक राजा दीन दयाल के चित्र भी यहां प्रदर्शित किए गए हैं। नई दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा)।

छत्तीसगढ़ में होगी फॉसिल पार्क की स्थापना

   छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के कोरिया जिले में फॉसिल पार्क की स्थापना करने का फऐसला किया है। सरकारी सूत्रों ने बुधवार को यहां बताया कि छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में मेरीन फॉसिल पार्क की स्थापना की जाएगी। राज्य सरकार के वन विभाग इसे बनाएगा।
अधिकारियों ने बताया कि कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ के पास हसदेव नदी के किनारे एक बड़े इलाके में मेरीन फॉसिल (समुद्रीय जीवाश्म) की मौजूदगी प्रकाश में आई है। वन विभाग के अधिकारियों को भ्रमण के दौरान इसकी जानकारी मिली। उन्होंने बताया कि लखनऊ  स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट आॅफ पेलियोबाटनी के वैज्ञानिकों ने भी जिले के आमाखेरवा गांव सहित आसपास के स्थल का दौरा किया। उन्होंने भी बड़े पैमाने पर फॉसिल की उपस्थिति की पुष्टि कर दी है। जीवाश्मों के अध्ययन और विश्लेषण के लिए बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट भारत सरकार का एक प्रमुख प्रामाणिक संस्थान है।
संस्थान के वैज्ञानिकों ने इन जीवाश्मों को लगभग 25 करोड़ साल पुराना परमियन भूवैज्ञानिक काल के आसपास का ठहराया है। उन्होंने भी इस क्षेत्र को जिओहेरिटेज के रूप में विकसित करने की सिफारिश राज्य सरकार से की है।
अधिकारियों ने बताया कि राज्य सरकार ने फॉसिल पार्क विकसित करने के लिए 17 लाख 50 हजार रुपए का प्रावधान किया है। इलाके की सुरक्षा के लिए चैनलिंक सहित चौकीदार हट और अन्य पर्यटक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। रायपुर, 20 अगस्त (भाषा)।

Wednesday, August 6, 2014

खुदाई में निकला दो हजार साल पुराना शिवलिंग !

   छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पुरातत्व विभाग को खुदाई के दौरान द्वादश ज्योतिर्लिगों वाले पौरुष पत्थर से बना शिवलिंग मिला है. माना जा रहा है कि यह दो हजार वर्ष पुराना है. सिरपुर में मिले इस शिवलिंग को काशी विश्वनाथ जैसा शिवलिंग बताया जा रहा हैं. छत्तीसगढ़ के पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा का दावा है कि यह दो हजार साल पुराना है और राज्य में मिला अब तक का सबसे प्राचीन व विशाल शिवलिंग है.
   पुरातत्वविदों का कहना है कि वाराणसी के काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग जैसा है सिरपुर में मिला यह शिवलिंग. यह बेहद चिकना है. खुदाई के दौरान पहली शताब्दी में सरभपुरिया राजाओं के द्वारा बनाए गए मंदिर के प्रमाण भी मिले. इस शिवलिंग में विष्णु सूत्र (जनेऊ) और असंख्य शिव धारियां हैं.

  सूबे के सिरपुर में साइट नंबर 15 की खुदाई के दौरान मिले मंदिर के अवशेषों के बीच 4 फीट लंबा 2.5 फीट की गोलाई वाला यह शिवलिंग निकला है. बारहवीं शताब्दी में आए भूकंप और बाद में चित्रोत्पला महानदी की बाढ़ में पूरा मंदिर परिसर ढह गया था. मंदिर के खंभे नदी के किनारे चले गए. सिरपुर में कई सालों से चल रही खुदाई में सैकड़ों शिवलिंग मिले हैं. इनमें से गंधेश्वर की तरह यह शिवलिंग भी साबूत निकला है.

भूकंप और बाढ़ से गंधेश्वर मंदिर भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था. पर यहां मौजूद सफेद पत्थर से बना शिवलिंग सुरक्षित बच गया. सिरपुर में मिले गंधेश्वर शिवलिंग की विशेषता उससे निकलने वाली तुलसी के पौधे जैसी सुगंध है. इसलिए इसे गंधेश्वर शिवलिंग कहा जा रहा है.

पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा ने बताया कि ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता बैडलर ने 1862 में लिखे संस्मरण में एक विशाल शिवमंदिर का जिक्र किया है. लक्ष्मण मंदिर परिसर के दक्षिण में स्थित एक टीले के नीचे राज्य के संभवत: सबसे बड़े और प्राचीन शिव मंदिर की खुदाई होना बाकी है. जो भविष्य में यहां से प्राप्त हो सकती हैं.

   पुरातत्व के जानकारों के अनुसार भूकंप और बाढ़ ने सिरपुर शहर को 12वीं सदी में जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया था. कालांतर में नदी की रेत और मिट्टी की परतें शहर को दबाती चलीं गईं. टीलों को कई मीटर खोदकर शहर की संरचना को निकाला गया. खुदाई में मिले सिक्कों, प्रतिमाओं, ताम्रपत्र, बर्तन, शिलालेखों के आधार पर उस काल की गणना होती गई.

   साइट पर खुदाई की गहराई जैसे-जैसे बढ़ती है, प्राचीन काल के और सबूत मिलते जाते हैं. जमीन में जिस गहराई पर शिवलिंग मिला, उसके आधार पर इसे दो हजार साल पुराना माना गया है. बहरहाल यहां मिल रहे शिवलिंग पुरातत्व के जानकारों के लिए अब शोध का विषय बनता जा रहा है। (साभार-http://aajtak.intoday.in/story/2000-years-old-shivling-is-found-at-mahasamand-1-774834.html )

Friday, July 4, 2014

आखिर क्या हुआ कि नष्ट हो गई प्राचीन द्वारिका

 
द्वारका नगर ( पुराणों में वर्णित और मिले अवशेषों के आधार पर नगर का चित्र )
समुद्र में मिले द्वारका नगर के अवशेष 
मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक नए नगर की स्थापना की थी। कहना चाहिए कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वारिका नष्ट हो गई? किसने किया द्वारिका को नष्ट? क्या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गई द्वारिका? क्या किसी आसमानी ताकत ने नष्ट कर दिया द्वारिका को या किसी समुद्री शक्ति ने उजाड़ दिया द्वारिका को। आखिर क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका और फिर बाद में वह समुद्र में डूब गई।

इस सवाल की खोज कई वैज्ञानिकों ने की और उसके जवाब भी ढूंढे हैं। सैकड़ों फीट नीचे समुद्र में उन्हें ऐसे अवशेष मिले हैं जिसके चलते भारत का इतिहास बदल गया है। अब इतिहास को फिर से लिखे जाने की जरूरत बन गई है।

द्वारिका का परिचय : कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। ये 7 नगर हैं- द्वारिका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है।

गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका। द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।
आज की द्वारका 

द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। यहां द्वारिकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर होने के साथ ही अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहां के बहुत से प्राचीन मंदिर तोड़ दिए। यहां से समुद्र को निहारना अति सुखद है।

कृष्ण क्यों गए थे द्वारिका : कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया।

कृष्ण अपने 18 नए कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए। यहीं 36 वर्ष राज्य करने के बाद उनका देहावसान हुआ। द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
द्वारिका के समुद्री अवशेषों को सबसे पहले भारतीय वायुसेना के पायलटों ने समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए नोटिस किया था और उसके बाद 1970 के जामनगर के गजेटियर में इनका उल्लेख किया गया। उसके बाद से इन खंडों के बारे में दावों-प्रतिदावों का दौर चलता चल पड़ा। बहरहाल, जो शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर कर दी।

एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्‍पनिक नगर है, लेकिन इस कल्‍पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्‍ट प्रो. एसआर राव ने।

प्रो. राव ने मैसूर विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्‍य पुरातत्‍व विभाग ज्‍वॉइन कर लिया था। उसके बाद भारतीय पुरातत्‍व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। साथ में उन्‍हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष उन्‍होंने खोजे। उस जगह पर भी उन्‍होंने खुदाई में कई रहस्‍य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।

नौसेना और पुरातत्व विभाग की संयुक्त खोज : पहले 2005 फिर 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। उन्होंने ऐसे नमूने एकत्रित किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए।

गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ निकाला।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन दुर्लभ नमूनों को देश-विदेशों की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा। मिली जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिन्धु घाटी सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते, लेकिन ये इतने प्राचीन थे कि सभी दंग रह गए।

नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर) एके सिन्हा के अनुसार द्वारिका में समुद्र के भीतर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई थी और 10 मीटर गहराई तक किए गए इस उत्खनन में सिक्के और कई कलाकृतियां भी प्राप्त हुईं।

इस समुद्री उत्खनन के बारे में सहायक नौसेना प्रमुख रियर एडमिरल एसपीएस चीमा ने तब बताया था कि इस ऐतिहासिक अभियान के लिए उनके 11 गोताखोरों को पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रशिक्षित किया और नवंबर 2006 में नौसेना के सर्वेक्षक पोत आईएनएस निर्देशक ने इस समुद्री स्थल का सर्वे किया। इसके बाद इस साल जनवरी से फरवरी के बीच नौसेना के गोताखोर तमाम आवश्यक उपकरण और सामग्री लेकर उन दुर्लभ अवशेषों तक पहुंच गए। रियर एडमिरल चीमा ने कहा कि इन अवशेषों की प्राचीनता का वैज्ञानिक अध्ययन होने के बाद देश के समुद्री इतिहास और धरोहर का तिथिक्रम लिखने के लिए आरंभिक सामग्री इतिहासकारों को उपलब्ध हो जाएगी।

इस उत्खनन के कार्य के आंकड़ों को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने पेश किया गया। इन विशेषज्ञों में अमेरिका, इसराइल, श्रीलंका और ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। नमूनों को विदेशी प्रयोगशालाओं में भी भेजा गया ताकि अवशेषों की प्राचीनता के बारे में किसी प्रकार की त्रुटि का संदेह समाप्त हो जाए।

द्वारिका पर ताजा शोध : 2001 में सरकार ने गुजरात के समुद्री तटों पर प्रदूषण के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी द्वारा एक सर्वे करने को कहा। जब समुद्री तलहटी की जांच की गई तो सोनार पर मानव निर्मित नगर पाया गया जिसकी जांच करने पर पाया गया कि यह नगर 32,000 वर्ष पुराना है तथा 9,000 वर्षों से समुद्र में विलीन है। यह बहुत ही चौंका देने वाली जानकारी थी।

माना जाता है कि 9,000 वर्षों पूर्व हिमयुग की समा‍प्ति पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण यह नगर समुद्र में विलीन हो गया होगा, लेकिन इसके पीछे और भी कारण हो सकते हैं।

कैसे नष्ट हो गई द्वारिका : वैज्ञानिकों के अनुसार जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए। द्वारिका भी उन शहरों में से एक थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है। ( साभार- वेबदुनिया-http://hindi.webdunia.com/religion-sanatandharma-history )

यह जानकारी अंग्रेजी में इस लिंक पर देखें----
http://www.iskcondesiretree.net/forum/topics/dwaraka-a-lost-city-recovered

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