इतिहास ब्लाग में आप जैसे जागरूक पाठकों का स्वागत है।​ अगर इतिहासकार हैं और हिंदी में लिख सकते हैं तो इस ब्लाग का सदस्य बनकर लिखिए भी।​ लेखक बनने के लिए मुझे जीमेल करिए।

Website templates

नालंदा के तेलहारा में था बौद्धों का विशाल अध्ययन केंद्र

>> Friday, February 5, 2010

खबरों में इतिहास ( भाग-५)


अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास, कला, संस्कृति, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास से संबंधित होंगी। इस अंक में पढ़िए--------।

१-नालंदा के तेलहारा में भी था बौद्धों का विशाल अध्ययन केंद्र

२-प्राचीन भाषा बो को आगे ले जाने वाली कड़ी टूट गई

३-बारगढ़ ( उड़ीसा ) में ग्यारह दिन का शासक होता है ‘कंस’

४-सबसे पुराने पदचिन्ह मिले

नालंदा के तेलहारा में था बौद्धों का विशाल अध्ययन केंद्र
भगवान बुद्ध की पत्थर की एक प्रतिमा खुदाई में मिली है। तीन फीट ऊंची यह प्रतिमा ध्यानी बुद्ध यानी ध्यानवस्था में बुद्ध की है। बिहार के नालंदा जिले के तेलहारा में पहली फरवरी को खुदाई में मिली यह प्रतिमा पाल राजाओं के काल की बताई जा रही है। इस खुदाई स्थल से गोंद में बच्चा लिए हुए मां की तीन सेंटीमीटर ऊंची कांस्य प्रतिमा भी मिली है। पुरातत्तव विभाग के बिहार के अधिकारियों की टीम की देखरेख में एक महीने से यहां खुदाई की जा रही है। पुरातत्वविद अतुल कुमार वर्मा की अगुवाई में चल रहे इस प्रोजेक्ट को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने २६ दिसंबर २००९ को चालू किया था। वर्मा ने बताया कि अभी तक खुदाई से प्राप्त साक्षयों के आधार पर ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में यह स्थल काफी विशाल बौद्ध अध्ययन केंद्र रहा होगा। अभी बुद्ध की काले पत्थर वाली जो प्रतिमा मिली है वह महज १० फीट नीचे से मिली है। कुछ दिन पहले चामुंडा की कांसे की प्रतिमा भी यहीं से मिली है। उन्होंने बताया कि अभी तक की जो प्रतिमाएं मिली हैं, वह सभी या तो गुप्त काल या फिर पाल काल की हैं। वर्मा के राय में तेलहारा स्थल थेरवाद संप्रदाय के बौद्धों का मठ रहा होगा। इस स्थल की सर्वप्रथम खोज १८७२ में एस ब्रोडले ने की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में इस स्थल को तिलास-अकिया बताया है। ह्वेनसांग ने इस स्थल को अपने वृत्तांत में ति-लो-त्से-किया बताया है। ह्वेनसांग ने लिखा है कि तिलहारा में सातवीं शताब्दी में महायान संप्रदाय के सात मठ थे। यहीं हजारों बौद्ध भिक्षु महायान ग्रंथों का अध्ययन कर रहे थे।


प्राचीन भाषा बो को आगे ले जाने वाली कड़ी टूट गई

अंडमान में एक 85 वर्षीया महिला बोआ सीनियर के निधन के साथ ही प्राचीन भाषा बो को आगे ले जाने वाली कड़ी हमेशा के लिए टूट गई. भारत की एक अग्रणी भाषाविद प्रोफ़ेसर अन्विता अब्बी ने बोआ के निधन को भाषा विज्ञान के क्षेत्र में एक अपूरणीय क्षति बताया है क्योंकि वह दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक को बोलने वाली अंतिम व्यक्ति थीं. उल्लेखनीय है कि अंडमान की प्राचीन भाषाओं का स्रोत अफ़्रीका को माना जाता है. कई अंडमानी भाषाएँ तो 70 हज़ार साल तक पुरानी मानी जाती हैं. प्रोफ़ेसर अब्बी ने बीबीसी को बताया, "अपने माता-पिता की मौत के बाद पिछले 30-40 वर्षों से बोआ बो भाषा में बोलने वाली अंतिम व्यक्ति थीं." उन्होंने कहा, "बोआ अक्सर ख़ुद को बहुत अकेला महसूस करती थीं. अन्य लोगों से बातचीत के लिए उन्हें अंडमानी हिंदी सीखनी पड़ी थी."

ख़तरा आगे भी

प्रोफ़ेसर अब्बी ने कहा कि चूंकि अंडमानी भाषाओं को पाषाण युग से चली आ रही भाषाओं का अंतिम अवशेष माना जाता है, इसलिए कहा जा सकता है कि बोआ सीनियर के निधन से भाषाओं की गुत्थी का एक सिरा हमेशा के लिए खो गया. अंडमान की जनजातियों को चार समूहों में रखा जाता है- ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओन्गी और सेंटीनली. बोआ सीनियर ग्रेट अंडमानी समूह से थीं. अब इस जनजाति के 50 के क़रीब लोग ही बचे हैं जिनमें से अधिकतर बच्चे हैं. सर्वाइवल इंटरनेशनल संस्था के निदेशक स्टीफ़न कोरी ने बो भाषा के उन्मूलन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि मानव समाज का एक अनूठा अंश अब स्मृतियों में ही शेष रहेगा.

बारगढ़ ( उड़ीसा ) में ग्यारह दिन का शासक ‘कंस’

उड़ीसा में एक विशेष महोत्सव के दौरान पौराणिक मान्यताओं में मथुरा के शासक रहे ‘कंस’ के पात्र द्वारा अपने ‘दरबार’ में सरकारी अधिकारियों के साथ.साथ मंत्रियों तक को तलब करने की परंपरा है। वह सजेधजे हाथी पर बैठकर पूरे शहर की यात्रा भी करता है। यहां ‘धनु यात्रा’ महोत्सव के दौरान कंस का चरित्र अदा किया जाता है, जिसकी थीम महाभारत कालीन ‘कृष्णलीला’ से ली गयी है, जिसमें कंस अपने भांजों कृष्ण और बलराम को मारने के इरादे से उन्हें यात्रा देखने के लिए आमंत्रित करता है।

महोत्सव के दौरान कंस हर दिन कस्बे और इसके आसपास के इलाकों में जाता है और कुछ भी उसकी नजर से नहीं बचता, चाहे यातायात हो, सार्वजनिक सुविधाएं हों, पेयजल हो या फिर सफाई हो।कंस के पात्र ने 27 दिसंबर को बारगढ़ के जिला कलेक्टर को तलब किया और उनसे कहा कि कस्बे में सभी घरों में प्रसाधन सुविधाएं अच्छी तरह से होना सुनिश्चित करें। उसने अधिकारी से कहा, ‘‘मेरे राज्य में कोई बच्चा बीमारी से नहीं मरना चाहिए।’’ वर्ष 1994 में उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत बीजू पटनायक को कंस ने अपने ‘दरबार’ में बुलाया था और वह 11 दिन के इस राजा के समक्ष खुद पेश होने के लिए हेलीकॉप्टर से उड़कर भुवनेश्वर पहुंचे।

महोत्सव की शुरूआत देवकी और वासुदेव के विवाह से होती है और इसके बाद कृष्ण जन्म और अनेक घटनाक्रमों के साथ अत्याचारी शासक कंस का चित्रण होता है।( भाषा -३ जनवरी २०१० )

सबसे पुराने पदचिन्ह मिले

पदचिन्ह के आधार पर वैज्ञानिकों ने जानवर के इस तरह के होने का अनुमान लगाया हैवैज्ञानिकों ने दक्षिण पूर्वी पोलैंड में एक चौपाए जानवर के सबसे पुराने पदचिन्ह ढूँढ़ निकाले हैं.एक अज्ञात जानवर के पदचिन्ह पत्थर पर मिले हैं और वैज्ञानिकों का कहना है कि ये 39.7 करोड़ साल पुराने हैं.उन्होंने विज्ञान पत्रिका नेचर को बताया कि पदचिन्हों के फॉसिल्स में इस जानवर के खुरों के निशान साफ़ दिखाई दे रहे हैं. वैज्ञानिकों के इस दल का कहना है कि इस खोज से यह साबित होता है धरती पर रीढ़ वाले जानवर पहले के अनुमान से लाखों साल पहले ही अस्तित्व में आ गए थे. यह अंतर लगभग 20 लाख सालों का है.

मगरमच्छ की तरह

स्वीडन के अपसाला यूनिवर्सिटी के पेर एलबर्ग इस खोज दल के सदस्य है. उनका कहना है कि यह उनके करियर का सबसे चकित करने वाला फॉसिल है. पोलैंड के होली क्रॉस पहाड़ों पर स्थित पत्थर खदान में ये पदचिन्ह कई जगह दिखाई पड़े हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है मानों वहाँ इन चौपाए जानवरों का एक समूह रहा होगा.

उनका कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि ये जानवर मगरमच्छ की तरह रहे होंगे और ये ज़मीन और पानी दोनों में रहते रहे होंगे. हालांकि जिन रुपों में हम जानवरों को अब देखते हैं, उस रुप में आने में जानवरो को दसियों लाख साल लग गए थे. वैज्ञानिकों का कहना है कि पदचिन्हों से लगता है कि कुछ जानवर दो मीटर तक लंबे रहे होंगे.

स्वीडन और पोलैंड के वैज्ञानिकों ने इस जानवर के चलने के ढंग का भी अनुमान लगाने की कोशिश की है और बताया है कि वे अपने घुटनों, कुहनियों का उपयोग किस तरह किया करते थे.

Read more...

नष्ट हो रही है त्रिपुरा की ७०० साल पुरानी एक कलाकृति

>> Wednesday, December 30, 2009

खबरों में इतिहास ( भाग-४)

अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास या मिथकीय इतिहास से संबंधित होंगी। मूल रूप में देने के साथ इन खबरों का मूल लिंक भी है ताकि आपको मूल स्रोत की पहचान और प्रमाणिकता भी बनी रहे। इस अंक में पढ़िए--------।

१-नष्ट हो रही है त्रिपुरा की ७०० साल पुरानी एक कलाकृति


२-झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम




  
दक्षिण त्रिपुरा के घने जंगलों में पहाड़ पर उकेरी गई ५०० से लेकर ७०० साल पुरानी देवी प्रतिमा (कलाकृति ) उपेक्षित पड़ी हुई है। इतिहास के पन्नों में बतौर साक्ष्य जुड़ने से पहले ही नष्ट होने की कगार पर है। जहां यह पुरातात्विक महत्व की प्रतिमा अवस्थित है, वह इलाका देवतामुरा कहलाता है और पूरी तरह से निर्जन है। इसके ६० किलोमाटर के दायरे में सिर्फ घना जंगल है। गोमती नदी यहां से होकर गुजरती है। नदी के सतह से करीब २०० फीट सीधे ऊपर पहाड़ पर हिंदू देवी ( संभवतः दुर्गा ) की आकृति तराशी गई है।

दक्षिण त्रिपुरा के अमरपुर के पास रांगामांटी घाट से गोमती नदी में नाव से यहां पहुंचने में करीब तीन-चार घंटे लग जाते हैं। वही लौटनें में पांच घंटे से ज्यादा समय लग जाता है। लौटनें में ज्यादा समय इसलिए लगता है क्यों कि नाव को तब नदी की धारा के विपरीत चलना होता है। देवतामुरा चारों तरफ से हरियाली से घिरा ऐसा निर्जन इलाका है जहीं की नीरवता सिर्फ पक्षियों के यदा-कदा कोलाहल से ही टूटता है। त्रिपुरा के मशहूर कलाकार स्वपन नंदी, त्रिपुरा सरकार के सूचना, सास्कृतिक मामले व पर्यटन विभाग में निदेशक रह चुके सुभाष दास और एक आईटी प्रोफेशनल विशवजीत भट्टाचार्य व नाव खेने वाले केवट धर्म जमातिया ने इस इलाके का यात्रा की। विश्वजीत के मुताबिक यहां से गुजरना उस अमेजन नदी से गुजरने जैसा हो जिसमें अनाकोंडा का खौफ न हो। धर्म जमातीया का कहना है कि कुछ ङठी लोग ही यहां सकते हैं।

सुभाष दास की राय में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि सीधे पहाड़ पर जहां खड़े होने की भी जगह नहीं है, हिंदू देवी की आकृति प्राचीन कलाकारों ने कब तराशी होगी ? उनकी राय में यह ५०० से लेकर ७०० वर्ष तक पुरानी होगी।

कहा जाता है कि अमरपुर के राजा अमर माणिक्य ( १५७७- ८६ ई.) को मुगल शासक होतन खान आक्रमण करके हरा दिया। राजपाट छिन जाने पर राजा अमर ने गोमती नदी वाले घने जंगल में नदी के किनारे शरण ली। कहते हैं कि उनके साथ एक कलाकार ( मूर्तिकार ) भी था। शायद उसी ने इस दुर्म पहाड़ पर देवी दुर्गा जैसी आकृति पहाड़ काटकर बनाई होगी। इस स्थल को देखने गईं इस टीम को वहां लोहे के कुछ टुकड़े मिले जो इनकी राय में बंदूकों से चली गोलियां हैं। इन्हें देवी की आकृति के पास फायर की गई गोलियों से निशान भी देखने को मिले। इस बारें में स्वपन नंदी का कहना है कि यहां से नदी के रास्ते से गुजर रहे मुगल सिपाहियों ने शायद फायर किए होंगे। स्वपन नंदी इसे देवी दुर्गा की आकृति मानते हैं।नंदी के मुताबिक यहां मुगल सिपाही आए रहे होंगे और दुर्गा देवी की आकृति नष्ट करने की मंशा से फायर किए होंगे। नंदी आकृति के पास ही सुरा के ऐसे गिलास की आकृति होने की बात कहते हैं जिसे मुगल प्रयोग में लाते थे। उनका कहना है कि जब इस आकृति को मुगल सिपाही नष्ट नहीं कर पाए तो वहीं देवी की आकृति के नीचे एक सुरा की गिलास भी बना दिया। फिलहाल इस दुर्गम जगह में अवस्थित इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य का कई सालों से संरक्षण स्वपन नंदी और कुछ स्थानीय कलाकार कर रहे हैं। वे अमरपुर में ठहरकर देवतामुरा जाते हैं।


सुभाष दास की राय में इस स्थल को इतिहास के पन्नों में जोड़ने के लिए विशेषग्यों की तलाश है। कहते हैं कि देवतामुरा की आकृति कलाकारों ने कैसे तराशी होगी जबकि वहां खड़ा होना भी मुश्किल है। छिन्नी व हथौड़ियों के सहारे इस दुर्गम स्थल पर उन साधनहीन दिनों में ऐसी कलाकारी का नमूना पेश करना ताज्जुब की बात है। अगर आप उस स्थल को देखें तो आपको भी लगा होगा कि कलाकार वहां कैसे पहुंचे होंगे। यह प्राचीन युग का चमत्कार ही है। दास का कहना है कि उन्होंने दुनिया के की हैरतअंगेज स्थलों का दौरा किया है मगर देवतामुरा का यह पुरातात्विक महत्व का स्थल कम आश्चर्यजनक नहीं है। इसके बादजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और त्रिपुरा राज्य सरकार ने इसके संरक्षण में कभी रुचि नहीं दिखाई। यह आकृति संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही है। इतिहास के साक्ष्यों के प्रति ऐसी उदासीनता अक्षम्य है। या फिर कह सकते हैं इसको राजकीय संरक्षण देने के जिम्मेदार लोगों में इतिहास बोध का अभाव है। इन लोगों की राय में अगर फौरन संरक्षण नहीं मिला तो चार पांच सालों में यह कलाकृति में नष्ट हो जाएगी।

झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं बहादुरशाह जफर की पौत्रवधू


 आज के चमकते-दमकते और आर्थिक रू प से तेजी से बढ़ते भारत में इतिहास के सशक्त हस्ताक्षरों के वंशजों की दशा के बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं है। शायद इसीलिए मुगल शासन के अंतिम बादशाह बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम  आज झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं।
बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम वर्तमान में कोलकाता की एक छोटी-सी झुग्गी में रहती हैं और जीवन-यापन के लिए वह एक चाय की दुकान चला रही हैं। अब मुगलकाल के अंतिम नरेश की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम की जिंदगी को झुग्गियों से निकालने के लिए आगे आए हैं पत्रकार शिवनाथ झा। इस के लिए झा ने ‘प्राइम मिनिस्टर्स आॅफ इंडिया- भारत भाग्य विधाता’ नामक एक किताब लिखी है, जिसमें 1947 से अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल का लेखा-जोखा है।

झा इस किताब के माध्यम से सुल्ताना की जिंदगी को झुग्गियों से निकालने के काम में लगे हैं। झा इसमें सुल्ताना की दुर्दशा की कहानी को बताने के साथ ही, किताब की बिक्री से अर्जित राशि को सुल्ताना के जीवनस्तर को सुधारने में लगाएंगे। झा ने बताया कि मैंने इससे पहले शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां और 1857 के सैन्य विद्रोह के महान योद्धा टात्या टोपे के वंशज विजयराव टोपे को किताबों के माध्यम से आर्थिक मदद देने का सफल प्रयास किया। 2006 से मैं हरेक साल इस तरह के किसी एक व्यक्ति के ऊपर किताब लिखता हूं, जिससे उस व्यक्ति के जीवन स्तर में कुछ सुधार किया जा सके।

शिवनाथ ने कहा कि बिस्मिल्लाह खां साहब और टोपे की हमने हरसंभव मदद करने की कोशिश की। अब बारी सुल्ताना बेगम की है। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडेÞ सभी लोगों से इस तरह के लोगों को सहायता देने की अपील करते हुए कहा कि हम सभी को इस काम के लिए अपने-अपने स्तर से प्रयास करना चाहिए। अंग्रेजी भाषा में छपी ‘प्राइममिनिस्टर्स आॅफ इंडिया- भारत भाग्य विधाता’ में कुल 444 पन्ने हैं और इसमें जाने-माने इतिहासकार विपिन चंद्रा, लेखक इंद्रजीत बधवार, पत्रकार वीर सांघवी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद आदि लेखकों ने अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की समीक्षा की है।

इस किताब में कुछ ऐसे दुर्लभ फोटो लगाए गए हैं, जो आम तौर पर उपलब्ध नहीं होते। इसकी ऊंची कीमत इसको आम आदमी के पहुंच से दूर कर देती है। इस किताब की कीमत सात हजार नौ सौ 95 रुपए रखी गई है। लेकिन झा को उम्मीद है कि इस बार भी उनका प्रयास सफल होगा।( भाषा )।
 

Read more...

सारनाथ में ढाई हजार वर्ष पुरानी दीवार

>> Tuesday, December 29, 2009

खबरों में इतिहास ( भाग-३)

अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास या मिथकीय इतिहास से संबंधित होंगी। मूल रूप में देने के साथ इन खबरों का मूल लिंक भी है ताकि आपको मूल स्रोत की पहचान और प्रमाणिकता भी बनी रहे। इस अंक में पढ़िए--------।
१-सारनाथ में ढाई हजार वर्ष पुरानी दीवार

२-कांस्य युगीन आभूषण, हथियार सहित 12 हजार से ज्यादा वस्तुओं का संग्रह

३- 35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी

४-यूपी में मिलीं 300 साल पुरानी तलवारें

५-मंदिर जहां भगवान शिव पर चढ़ाए जाते हैं झाड़ू!

६-सोने की 300 साल पुरानी कुरान


सारनाथ में ढाई हजार वर्ष पुरानी दीवार मिली

  सारनाथ बुद्ध की तपोस्थली है। विश्व पर्यटन के नक्शे में होने के कारण प्रतिदिन हजारों की संख्या में विभिन्न देशों से यहां पर्यटक आते हैं। यहां पिछले आठ वर्षों से भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से गुप्तकाल के समय बने चौखंडी स्तूप परिसर की वैज्ञानिक तरीके से खुदाई तथा सफाई कार्य चल रहा है। मंगलवार की शाम कर्मचारियों ने सफाई के दौरान गुप्तकालीन ढाई हजार वर्ष पूर्व की दीवार देखी।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणविद अजय कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि स्तूप की गुप्तकालीन दीवार मिलने से पुराने इतिहास की सच्चाई सामने आ रही है। श्रीवास्तव के मुताबिक सारनाथ चौखंडी स्तूप पर ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध से बिछड़े उनके शिष्य सारनाथ में मिले थे। यह निर्माण उन्हीं अनुयायियों की देन है। इसके पूर्व भी दो दीवारें पहले ही खोजी जा चुकी हैं। प्राचीन स्वरूप बना रहे अब वैज्ञानिक विधि से उसे संरक्षित भी कराया जाएगा।

मिलने वाली दीवार उत्तर दिशा की ओर है। चौखंडी स्तूप की पूरी चौतरफा दीवार मिलने पर ही स्तूप की मजबूती की कार्य योजना भी बनाई जाएगी। इसी तरह सारनाथ की खुदाई में मिले अशोक स्तम्भ, जर्जर स्थिति में न हो इसलिए इसे संरक्षित करने में वैज्ञानिक टीम कार्य में लगी है।

कांस्य युगीन आभूषण हथियार सहित 12 हजार से ज्यादा वस्तुओं का संग्रह


 इटली की पुलिस ने पुरा महत्व की बहुमूल्य वस्तुओं का एक विशाल जखीरा बरामद किया है जिन्हें एक पेंशनर ने अपना निजी संग्रहालय बनाने के लिए स्वयं खुदाई कराके इकट्ठा किया था 1 वेनिस के पास पुलिस अधिकारियों ने जब इस व्यक्ति के घर छापा मारा तो कांस्य युगीन कंघे से लेकर आभूषण हथियार और बर्तनों सहित 12 हजार से ज्यादा वस्तुओं का संग्रह देखकर उनकी आंखें चौंधिया गयी

वेनिस पुलिस के कर्नल पीर लुइगी पिसानो ने बताया .. यह व्यक्ति अपने स्तर पर खुदाई करा रहा था 1 हमें इसके पास से अमूल्य धरोहर मिली है जो ईसा से 18 वीं पूर्व से लेकर 18 वीं सदी तक के 3600 वषो के इस कालखंड के इस क्षेत्र के पूरे इतिहास को समेटे है 1.. इटली के कानून के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को पुरातात्विक महत्व की कोई वस्तु या स्थान का पता चलता है तो उसे इसकी जानकारी सरकार को देनी होती है 1लेकिन पुलिस को लगातार अवैध खुदाई के माघ्यम से पुरा महत्व की वस्तुओं को हासिल करने वालों के खिलाफ नजर रखी पडती है



35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी मिली


जर्मनी में खोजकर्ताओं ने लगभग 35 हज़ार साल पुराना बाँसुरी खोज निकाला है और वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दुनिया का पहला संगीत यंत्र हो सकता है.ये बाँसुरी गिद्ध की हड्डी को तराश कर बनाई गई है. दक्षिणी जर्मनी में होल फेल्स की गुफ़ाओं से इसे निकाला गया है. यह उस समय का है जब आधुनिक मानव जाति यूरोप में बसना शुरु हुई थी.बांसुरी के इस्तेमाल से पता लगता है कि उस समय समाज संगठित हो रहा था और उनमें सृजन करने की क्षमता थी. विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि इससे ये पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि उस समय जाति का अस्तित्व कैसे बचा रहा.तूबिंजेन विश्वविद्यालय के पुरातत्व विज्ञानी निकोलस कोनार्ड ने बताया कि बांसुरी बीस सेंटीमीटर लंबी है और इसमें पाँच छेद बनाए गए हैं. इस बांसुरी के अलावा हाथी दाँत के बने दो बांसुरियों के अवशेष भी मिले हैं. अब तक इस इलाक़े से आठ बांसुरी मिली है.कोनार्ड कहते हैं, "साफ़ है कि उस समय भी समाज में संगीत का कितना महत्व था."

यूपी में मिलीं 300 साल पुरानी तलवारें


 उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के एक ईंट भट्ठे में खुदाई के दौरान प्राचीन काल की तलवारें और भाले मिले हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इनके लगभग 300 साल पुराने होने की संभावना जताई है।} बहराइच के दरगाह थाना-प्रभारी शिवपत सिंह ने रविवार को आईएएनएस को बताया कि सांसापारा गांव में शनिवार को एक ईंट भट्ठे में मजदूर फुट गहरी खुदाई के बाद प्राचीन शस्त्रों का जखीरा मिला। शस्त्रों को बाहर निकालकर पुलिस को इसकी सूचना दी गई।

तीन भाले भी मिले
सिंह ने बताया, "खुदाई में सात प्राचीन तलवारें और तीन भाले मिले हैं। तलवारों की लंबाई करीब दो मीटर और भालों की लंबाई लगभग चार मीटर है। दिखने में ये राजसी शस्त्र जैसे लगते हैं।" पुलिस ने जब पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों को फोन पर तलवारों और भालों की बनावट और रंग-रूप के बारे में बताया तो अधिकारियों ने इनके 300 साल पुराने होने की संभावना जताई।

मंदिर जहां भगवान शिव पर चढ़ाए जाते हैं झाड़ू!
   भगवान शिव पर बेलपत्र और धतूरे का चढ़ावा तो आपने सुना होगा, लेकिन उत्तर प्रदेश के एक शिव मंदिर में भक्त उनकी आराधना झाड़ू चढ़ाकर करते हैं।
    मुरादाबाद जिले के बीहाजोई गांव के प्राचीन शिवपातालेश्वर मंदिर (शिव का मंदिर) में श्रद्धालु अपने त्वचा संबंधी रोगों से छुटकारा पाने और मनोकामना पूर्ण करने के लिए झाड़ू चढाते हैं। इस मंदिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में भक्त सिर्फ मुरादाबाद जिले से ही नहीं बल्कि आस-पास के जिलों और दूसरे प्रांतों से भी आते हैं।
    मंदिर के एक पुजारी पंडित ओंकार नाथ अवस्थी ने आईएएनएस को बताया कि मान्यता है कि यह मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना है। इसमें झाड़ू चढ़ाने की रस्म प्राचीन काल से ही है। इस शिव मंदिर में कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक शिवलिंग है, जिस पर श्रद्धालु झाड़ू अर्पित करते हैं।

     पुजारी ने बताया कि वैसे तो शिवजी पर झ्झाड़ू चढ़ाने वाले भक्तों की भारी भीड़ नित्य लगती है, लेकिन सोमवार को यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धारणा है कि इस मंदिर की चमत्कारी शक्तियों से त्वचा के रोगों से मुक्ति मिल जाती है। इस धारणा के पीछे एक दिलचस्प कहानी है।
65 वर्षीय ग्रामीण मकरध्वज दीक्षित ने बताया कि गांव में भिखारीदास नाम का एक व्यापारी रहता था, जो गांव का सबसे धनी व्यक्ति था। वह त्वचा रोग से ग्रसित था। उसके शरीर पर काले धब्बे पड़ गये थे, जिनसे उसे पीड़ा होती थी।

    एक दिन वह निकट के गांव के एक वैद्य से उपचार कराने जा रहा था कि रास्ते में उसे जोर की प्यास लगी। तभी उसे एक आश्रम दिखाई पड़ा। जैसे ही भिखारीदास पानी पीने के लिए आश्रम के अंदर गया वैसे ही दुर्घटनावश आश्रम की सफाई कर रहे महंत के झाड़ू से उसके शरीर का स्पर्श हो गया। झाड़ू के स्पर्श होने के क्षण भर के अंदर ही भिखारी दास दर्द ठीक हो गया। जब भिखारीदास ने महंत से चमत्कार के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह भगवान शिव का प्रबल भक्त है। यह चमत्कार उन्हीं की वजह से हुआ है। भिखारीदास ने महंत से कहा कि उसे ठीक करने के बदले में सोने की अशर्फियों से भरी थैली ले लें। महंत ने अशर्फी लेने से इंकार करते हुए कहा कि वास्तव में अगर वह कुछ लौटाना चाहते हैं तो आश्रम के स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण करवा दें।

    कुछ समय बाद भिखारीदास ने वहां पर शिव मंदिर का निर्माण करवा दिया। धीरे-धीरे मान्यता हो गई कि इस मंदिर में दर्शन कर झाड़ू चढ़ाने से त्वचा के रोगों से मुक्ति मिल जाती है। हालांकि इस मंदिर में ज्यादातर श्रद्धालु त्वचा संबंधी रोगों से छुटकारा पाने के लिए आते हैं, लेकिन संतान प्राप्ति व दूसरी तरह की समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए भी श्रद्धालु भारी संख्या में मंदिर में झाड़ू चढ़ाने आते हैं। मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा झाड़ू चढ़ाए जाने के कारण यहां झाड़ुओं की बहुत जबरदस्त मांग है। मंदिर परिसर के बाहर बड़ी संख्या में अस्थाई झाड़ू की दुकानें देखी जा सकती हैं।


सोने की 300 साल पुरानी कुरान
  उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के हामिद परिवार को अपनी सोने की पुश्तैनी कुरान पर गर्व है और हो भी क्यों न अब तो केंद्र सरकार ने भी उसकी पहचान महत्वपूर्ण पांडुलिपि के रूप में की है। यह कोई साधारण कुरान नहीं, यह 300 साल पुरानी सोने की कुरान है, जिसको जौनपुर शहर के रहट्टा मुहल्ले में रहने वाला हामिद परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी संजोते आ रहा है। परिवार के मुखिया साजिद हमीद (55) ने कहा कि हमें आज फक्र है कि हमारी अनोखी सुनहरी कुरान को सरकार की तरफ से भी अहिमयत मिली है। हमारे जिले में ये तो पहले से ही सालों से ही चर्चा का विषय बनी रही है।

    इस कुरान का आकर्षण उसकी सोने की जिल्द है। 1756 पन्नों वाली कुरान में जहां जिल्द सोने की बारीक कलाकृतियों से गढ़ी हुई है, वहीं इसके पन्ने सोने के पत्ती के रूप में हैं। हामिद परिवार के मुताबिक पांच पीढ़ियों से उन्होंने यह कुरान संजोकर रखी है। साजिद के दादा वाजिद अली को यह उनके दादा से मिली थी और तब से पीढ़ी दर पीढ़ी हम लोग इसे संजोते आ रहे हैं।

मन्नत पूरी होने पर बनवाई थी

साजिद के अनुसार उनके परिवार की कोई एक मन्नत पूरी होने पर उनके पूर्वजों ने अल्लाह के लिए अपनी मोहब्बत जाहिर करने के लिए विशेष कारीगरों द्वारा ये कुरान बनवाई थी। अपने पूर्वजों से मिली कुरान का रखरखाव के लिए साजिद खास ध्यान देते हैं। सिर्फ इसी कुरान के लिए एक पारदर्शी आलमारी बनवाई है, जिसमें इसको रखा है। पढ़ने के लिए वो इसको नहीं निकालते क्योंकि उनका मानना है कि रोज खोलकर पढ़ने से इस कुरान के पन्नों को नुकसान पहुंच सकता है।

        वह कहते हैं कि मैं इसको किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता है। यह मेरे पूर्वजों की पहचान है। मैंने अभी से अपने बेटे को सख्त हिदायत दे दी है कि मेरे न रहने पर इस कुरान को मेरी याद सझकर उसी तरह संजोकर मिसाल कायम करेगा, जो हमारा परिवार वर्षो से करता आ रहा है।
    साजिद के मुताबिक कुछ समय पहले केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने जिला प्रशासन से संप साधा जिसके बाद कुछ अधिकारी मुझसे मिलने आए। उस समय मुझे बताया गया कि सरकार ने इसकी पहचान महत्वपूर्ण पांडुलुपि के रूप में की है और वह जब चाहेगी इस धरोहर को अपने संरक्षण में ले सकती है। अनोखी सुनहरी कुरान को रखने के लिए हामिद परिवार की वर्षो से केवल मुहल्ले ही नहीं पूरे जौनपुर में चर्चा होती है। उसे देखने के लिए लोगों को तांता लगा रहता है। पड़ोसी तौफीक अहमद कहते हैं कि हम लोगों को इस बात का फक्र है कि ऐसी नायाब चीज हमारे शहर में मौजूद है।

Read more...

Technorati

Add to Technorati Favorites

हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

चिट्ठाजगत Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा NARAD:Hindi Blog Aggregator www.blogvani.com

Lorem Ipsum

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

  © Blogger templates Palm by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP