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Sunday, February 26, 2012

30 हजार साल पुराने बीज से पौधे उगे

    30 हजार साल पहले के पौधे रूस में फिर से जीवन्त किए गए हैं। एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि रूसी वैज्ञानिकों ने साइबेरिया में मिले बीजों से पौधे उगाए हैं। रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेस की रिसर्चर स्वेतलाना याशिना और डेविड गिलिचिंस्की का कहना है कि हेर्बाकस सिलेन स्टेनोफिला के बीज अब तक के सबसे पुराने पौधे के बीज हैं जिन्हें फिर से जीवन मिला है। ये बीज कभी गिलहरियों ने जमा किए थे। ताजा रिसर्च प्राचीन काल के बायोलॉजिकल तत्वों के शोध में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इनमें से कुछ तो इस बीच लुप्त हो गए हैं। शोधकर्ताओं ने लिखा है कि वे धरती की सतह से गायब हो चुके पुराने जेनेटिक पूल की खोज में पर्माफ्रॉस्ट के महत्व को भी उजागर करते हैं। इससे पहले इस्राएल में मसादा किले में 2000 साल पुराने खजूर के बीज को उगाया गया था। रिसर्चरों का कहना है कि रेडियो कार्बन कालावधि से इस बात पुष्टि हुई है कि टिश्यू 31,800 साल पुराने हैं। यह स्टडी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस के मंगलवार के अंक में प्रकाशित हो रही है। इसमें रूस के उत्तर पूर्वी साइबेरिया में कोलिमा नदी के किनारे पर गिलहरी के 70 बिलों के पता चलने की बात कही गई है, जिसमें विभिन्न पौधों के लाखों बीज हैं। 'सभी बिल वर्तमान सतह से 20 से 40 मीटर की गहराई में मिले हैं और प्रातिनूतन युग के हाथी, गेंडा, घोड़े और हिरण जैसे जानवरों की हड्डियों वाली सतहों में स्थित थे।' शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्माफ्रॉस्ट ने बड़े फ्रीजर का काम किया और गिलहरियों द्वारा जमा बीज और फल बिना किसी बाधा के बंद दुनिया में औसत माइनस 7 डिग्री सेल्सियस तापमान पर दसियों हजार साल तक सुरक्षित रहे।

पुराने मैटेरियल से वैज्ञानिक नए नमूने इसलिए उगा पाए कि बिल बर्फ से ढके थे और उसके बाद नियमित रूप से जमे रहते थे और पिघलते नहीं थे। इसकी वजह से पर्माफ्रॉस्ट डिग्रेडेशन नहीं हुआ। मॉस्को के निकट अपनी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने पहले विकसित स्टेनोफिला से पौधे उगाने की कोशिश की। लेकिन जब उसमें सफलता नहीं मिली तो नियंत्रित प्रकाश और तापमान में पौधा उगाने के लिए प्लांट के टिश्यु का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिकों को काफी समय से पता है कि कुछ प्लांट सेल सही परिस्थितियों में लाखों साल तक सुरक्षित रह सकते हैं। पौधों को पुनर्जीवित करने के कुछ पिछले दावे वैज्ञानिक जांच पर खरे नहीं उतरे हैं, लेकिन याशिना और गिलिचिंस्की की टीम ने रेडियो कॉर्बन डेटिंग विधि का इस्तेमाल किया है ताकि साफ हो सके कि पर्माफ्रॉस्ट में मिले बीज और फल स्टेनोफिला के आधुनिक संदूषक नहीं हैं। कनाडा के यूकॉन पैलेऑनटोलॉजी प्रोग्राम के ग्रांट जजूला कहते हैं कि उन्हें कोई संदेह नहीं कि यह वैध दावा है। उत्तर अमेरिका में आर्कटिक लुपिन उन बीजों से उगाया गया जिन्हें 10,000 साल पुराना समझा गया था। जजूला ने हाल में रेडियो कॉर्बन विधि से पाया कि वे पुराने बीज न होकर आधुनिक प्रदूषित बीज थे।

दो करोड़ साल पुरानी झील के राज
रूस में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने दो करोड़ साल पुरानी झील 'लेक वोस्तोक' में छेद किया है। लेक वोस्तोक एक सबग्लेशियल झील है यानी हिमनदी के नीचे बनी मीठे पानी की झील। इस झील तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों को बर्फ में करीब चार किलोमीटर गहरा छेद करना पड़ा। लेक वोस्तोक अंटार्कटिका की सबसे बड़ी सबग्लेशियल झील है। वैज्ञानिक झील के नीचे के जीवन के बारे में जानकारी हासिल करना चाहते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से वे नए प्रकार के सूक्ष्मजीवों के बारी में जानकारी पा सकेंगे।

रूस की आरआईए समाचार एजेंसी को एक सूत्र ने इस बारे में बताया, 'हमारे वैज्ञानिकों ने 3768 मीटर तक छेद किया तब वह झील की सतह तक पहुंच पाए हैं।' आर्कटिक एंड अंटार्कटिक साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रवक्ता सेर्जी लेसेनकोव ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा कि यह एक 'महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि' है। लेसेनकोव ने कहा कि झील के ऊपर बर्फ में गैस के बुलबुले मिले हैं। यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए हो रहे शोध में मददगार साबित होंगे, 'क्योंकि इसकी निचली सतह चार लाख साल पहले बनी, इसलिए गैस के अणुओं की सरंचना को देख कर पता किया जा सकता है कि चार लाख साल पहले वातावरण कैसा था। इसी के आधार पर जलवायु परिवर्तन को पहचाना जा सकता है और भविष्य में होने वाले बदलावों का अनुमान लगाया जा सकता है।'

लेक वोस्तोक : हालांकि अब तक इसकी आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है। सूत्रों का कहना है कि सरकार को जल्द ही इसकी घोषणा करेगी। एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्टिन सीगर्ट ने इस बारे में कहा, 'अगर यह सच है और यह सफल है तो यह एक मील का पत्थर साबित होगा। रूसियों के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वे कई सालों से इस पर काम कर रहे हैं।' सीगर्ट ने कहा कि लेक वोस्तोक में मौजूद जीवों के बारे में जानकारी मिलने से वैज्ञानिक यह भी समझ पाएंगे कि क्या सौर मंडल में अन्य जगहों पर भी जीवन मौजूद है। लम्बे समय से वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा करते आए हैं कि क्या बृहस्पति और शनि के चांद पर भी जीवन हो सकता है। यहां भी झीलें पाई गई हैं और वे लेक वोस्तोक जैसी ही हैं। 1957 में पहली बार पूर्व सोवियत संघ के एक वैज्ञानिक ने इस झील के होने का दावा किया था। 1989 में इस पर काम शुरू किया गया और 1996 में पहली बार इसके होने की पुष्टि की गई।
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