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Monday, March 5, 2012

2000 से अधिक प्राचीन बुद्ध प्रतिमाओं की खोज

खबरों में इतिहास अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए यह ब्लाग इतिहास की नई खोजों व पुरातत्व, मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित खबरों को संकलित करके पेश करता है। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
 १- 2000 से अधिक प्राचीन बुद्ध प्रतिमाओं की खोज
 २- खुदाई में लक्ष्मी की प्राचीन मूर्ति मिली
 ३- खुदाई के दौरान भदुली में ईंट की एक प्राचीन दीवार मिली
 ४- भदुली खुदाई में मिली बुद्ध की छह प्रतिमाएं 
५- भदुली की खुदाई में मिला मनौती स्तूप
 ६- भदुली में मिला एक और बौद्ध स्तूप
 ७- पलामू में मिले दो बौद्ध स्तूप
  2000 से अधिक प्राचीन बुद्ध प्रतिमाओं की खोज
  http://www.samaylive.com/international-news-in-hindi/143321/-china-hebei-province-archaeologists-buddha-ancient-statues.html
 चीन के हेबेई प्रांत में पुरातत्वविदों ने बुद्ध की 2,000 से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं खोजी हैं। इन प्रतिमाओं की खोज से पता चलता है कि साम्यवादी देश में बौद्ध धर्म तब से ही लोकप्रिय है जब इसका भारत में प्रसार हुआ था। लिनझांग काउंटी के येशेंग स्थित एक ऐतिहासिक स्थल पर मिलीं बुद्ध की ये 2,895 प्रतिमाएं और उनके अवशेष पूर्वी वेई और उत्तरी क्वी काल (534-577) के हैं। ‘इन्स्टीट्यूट ऑफ आर्कयोलॉजी ऑफ द चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज’ और ‘हेबेई प्रॉवीन्शियल इन्स्टीट्यूट ऑफ कल्चरल हैरिटेज’ के पुरातत्वविदों के अनुसार, ये प्रतिमाएं सफेद संगमरमर और नीले पत्थरों से बनी हैं। कुछ प्रतिमाओं पर रंग किया गया है या कलई की गई है। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की खबर के अनुसार, ‘हेबेई प्रॉवीन्शियल ब्यूरो ऑफ कल्चरल हैरिटेज’ के एक अधिकारी झांग वेनरूई ने बताया कि प्रतिमाओं की लंबाई 20 सेन्टीमीटर से लेकर एक वास्तविक व्यक्ति के आकार तक की है। पुरातत्वविद संरक्षण और अनुसंधान के लिए इन प्रतिमाओं की मरम्मत कर रहे हैं। समझा जाता है कि करीब 2,000 साल पहले भारत से बौद्ध धर्म का चीन में प्रसार हुआ था। (भाषा)
 खुदाई में लक्ष्मी की प्राचीन मूर्ति मिली
 पश्चिम बंगाल के हावड़ा के सांकराइल थाना के माकुवा इलाके में खुदाई के दौरान लक्ष्मी की प्राचीन मूर्ति मिली है, जो काफी कीमती पत्थर की बताई जा रही है। बताया गया है कि शनिवार दोपहर उक्त इलाके में किसी काम के लिए खुदाई की जा रही थी। उसी समय मिट्टी के अंदर से कीमती पत्थर की मूर्ति मिली। फिलहाल जांच पड़ताल की जा रही है कि यह मूर्ति कितनी पुरानी है और किस पत्थर से निर्मित है। 
 ( ५-०३-२०१२ के अंक जनसत्ता कोलकाता से साभार) 
 खुदाई के दौरान भदुली में ईंट की एक प्राचीन दीवार मिली
 http://www.jagran.com/jharkhand/chatra-8816275.html
 झारखंड के चतरा में इटखोरी इलाके में पुरातत्व विभाग द्वारा भदुली में की जा रही खुदाई के दौरान ईंट की एक प्राचीन दीवार मिली है। यह प्राचीन मंदिर के बुनियाद से पांच फीट की दूरी पर स्थित है। एक फीट मिट्टी की कटाई के दौरान यह दीवार नजर आई है। दीवार में में प्राचीन ईटें सलीके से लगाई गई हैं। माना जा रहा है कि यह मंदिर के परिक्रमा स्थल के बाहरी हिस्से की दीवार हो सकती है। खुदाई के दौरान ध्वस्त मंदिर के शिखर का एक आमलक भी बरामद हुआ है। बताया जा रहा है कि प्राचीन मंदिर शिखर वाला रहा होगा। भारतीय पुरातत्व विभाग इटखोरी का प्राचीन इतिहास खंगालने का मन बना रहा है। इस बात का संकेत धार्मिक नगरी भदुली का भ्रमण करने के दौरान पुरातत्व विभाग की निदेशक शुभ्रा प्रमाणिक ने दिया है। उन्होंने विभाग के अधिकारियों को भदुली समेत प्रखंड के ग्रामीण इलाकों से बरामद प्राचीन प्रतिमाओं व ध्वस्त मंदिरों के अवशेष वाले स्थलों को चिह्नित करने का निर्देश दिया है। दरअसल पुरातत्व विभाग इटखोरी के भदुली के अलावा विभिन्न गांवों के पुरातात्विक अवशेषों को देखकर काफी प्रभावित हुआ है। पुरातत्व विभाग की निदेशक शुभ्रा प्रमाणिक का मानना है कि जो ऐतिहासिक धार्मिक नगरी भदुली से चारो ओर दस पंद्रह किलोमीटर के दायरे में प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं, उन स्थलों पर वर्तमान समय में भी प्राचीन प्रतिमाएं व खंडित मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं। निदेशिका ने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर दस पंद्रह किलोमीटर के दायरे में प्राचीन मंदिरों का अवशेष पाया जाना पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इस बात की खोज अवश्य होनी चाहिए कि किस काल में और किसने यहां मंदिरों का निर्माण कराया। उन्होंने बताया कि ज्ञान प्राप्ति से पूर्व गौतम बुद्ध का इस स्थल से जुड़ाव होने की बातें आ रही है। वास्तव में खोज के दौरान अगर यह सिद्ध हो जाता है, तो देश के मानचित्र पर यह क्षेत्र उभरकर सामने आ जाएगा। उन्होंने मौके पर मौजूद पुरातत्व विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद एन जी निकोसे को निर्देश दिया कि भदुली में खुदाई के दौरान आसपास के गांवों में उन स्थलों को चिह्नित किया जाए जहां प्राचीन मंदिरों के अवशेष पाए गए हैं। ऐसे स्थलों की सूची के साथ फोटोग्राफ तैयार कर उसे विभाग के दिल्ली कार्यालय में भेजा जाए। ( जागरण से साभार )

 भदुली खुदाई में मिली बुद्ध की छह प्रतिमाएं
 इटखोरी की ऐतिहासिक धार्मिक नगरी भदुली प्राचीन काल में मूर्ति व शिल्पकला का प्रसिद्ध केंद्र था। आठवीं से बारहवीं शताब्दी काल तक इटखोरी व इसके आसपास के क्षेत्रों में नागरीय सभ्यता थी। यह इलाका बिहार-बंगाल मार्ग पर स्थित था। यह कहना है भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीक्षण अभियंता एनजी निकोसे का। उन्होंने बताया कि पूरे झारखंड में भदुली जैसा महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल कोई नहीं है। उन्होंने करमा कला गांव के दौरा क्रम में बताया कि भदुली से प्राप्त प्राचीन मंदिरों व मूर्तियों के अवशेष से यह ज्ञात हुआ है कि यह सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं था। यहां बडे़ पैमाने पर पत्थरों को तराशकर प्रतिमाओं व कलाकृतियों का निर्माण किया जाता था। फिर यहीं से बिहार, बंगाल, उड़ीसा आदि क्षेत्रों में प्रतिमाएं भेजी जाती थीं। यहां मुख्य रूप से काले ग्रेनाइट की प्रतिमाएं व कलाकृतियां पाई गई हैं। खुदाई के पश्चात यहां आठवीं शताब्दी के पहले की सभ्यता होने के भी प्रमाण मिल सकते हैं। अब तक प्रतिमाएं व कलाकृतियां जमीन के ऊपरी सतह में मिली हैं। ये प्रमाण हैं कि यहां पहले भी सभ्यता थी। पुरातत्व विभाग को भदुली में बड़ी सफलता हाथ लगी है। सोमवार को खुदाई स्थल से एक पत्थर में तराशकर बनाई हुई भगवान बुद्ध की छह प्रतिमाएं मिली है। सभी प्रतिमाओं की मुद्राएं अलग-अलग हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार प्रतिमा नौवीं से दसवीं शताब्दी काल के बीच की है। कयास लगाया जा रहा है कि प्राचीन काल में यहां बौद्ध मंदिर रहा होगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद् एनजी निकोसे के अनुसार खुदाई में मिला सैंड स्टोन का पैनल एक फिट लंबा, आधा फिट ऊंचा है। इस पैनल में सवा दो इंच ऊंची भगवान बुद्ध की छह प्रतिमाएं तराशकर बनाई हुई हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं ध्यान मुद्रा में, कुछ धर्म चक्र मुद्रा में तो कुछ भूमि स्पर्श मुद्रा में हैं। जहां से यह प्रतिमा बरामद हुई है, उसे प्राचीन मंदिर का गर्भ गृह स्थल बताया जा रहा है। निकोसे ने बताया कि आगे की खुदाई में यहां काफी कुछ मिलने की संभावना है। उसी के आधार पर इस स्थान के बारे में दावे के साथ कुछ कहा जा सकेगा। फिलहाल विभाग ने गर्भ गृह स्थल में खुदाई का कार्य तेज कर दिया है। खुदाई स्थल से ही ईट की एक प्राचीन दीवार भी नजर आ रही है। हालांकि दीवार कितनी लंबी या चौड़ी है इसका खुलासा अभी नहीं हो सका है। भदुली से खुदाई के दौरान मिली हंस पर सवार मानव आकृति की प्रतिमा चंद्रकांता की है। यह खुलासा झारखंड राज्य कला एवं संस्कृति विभाग के पूर्व उप निदेशक हरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने किया है। उन्होंने बताया कि चंद्रकांता की प्रतिमा का संबंध बौद्ध धर्म से रहा है।

 भदुली की खुदाई में मिला मनौती स्तूप
 इटखोरी की ऐतिहासिक धार्मिक नगरी भदुली में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान एक मनौती स्तूप बरामद हुआ है। मनौती स्तूप के चारो ओर भगवान बुद्ध की अलग-अलग मुद्राओं में प्रतिमाएं बनी हुई है। मनौती स्तूपा की बरामदगी से पुरातत्व विभाग काफी उत्साहित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षण पुरातत्व विद एनजी निकोसे ने बताया कि भदुली में जिस स्थल पर प्राचीन मंदिर की बुनियाद मिली है उसके बाहरी भाग में यह मनौती स्तूप प्राप्त हुआ है। मनौती स्तूप की ऊंचाई 36 सेंटीमीटर है। इसमें भगवान बुद्ध की चार प्रतिमाएं बनी हुई है। जिसमें एक प्रतिमा ध्यान मुद्रा, दूसरी धर्म चक्र मुद्रा तथा तीसरी प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा में बनाई गई है। मिट्टी में दबे रहने के कारण चौथी प्रतिमा की मुद्रा का पता अभी तक नहीं लग पाया है। निकोसे ने बताया कि मनौती स्तूप हैंड स्टोन पत्थर से नौवीं- दसवीं शताब्दी के बीच निर्मित हुआ है। इसके आसपास हल्के लाल रंग के मृदभांड भी बरामद हुए हैं। मालूम हो कि जिस स्थल पर खुदाई का कार्य किया जा रहा है, पहले उसे जैन धर्म के दसवें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ स्वामी की जन्मभूमि माना जाता था। इस सवाल पर अधीक्षण पुरातत्व विद का कहना है कि जब तक बुनियाद के मध्य भाग में खुदाई पूरी नहीं हो जाती है तब तक यह कहना संभव नहीं है कि यहां मंदिर किस धर्म का रहा होगा।

भदुली में मिला एक और बौद्ध स्तूप 
इटखोरी की ऐतिहासिक धार्मिक नगरी भदुली में खुदाई के दौरान पुरातत्व विभाग ने एक और बौद्ध स्तूप ढूंढ निकाला है। भदुली में मिलने वाला यह दूसरा बौद्ध स्तूप है। जिसका निर्माण नौंवी-दसवीं शताब्दी में किया गया था। रविवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद एन जी निकोसे ने खुदाई स्थल का निरीक्षण करने के पश्चात कहा कि मनौती स्तूप के पीछे चल रही खुदाई के दौरान ईट की एक फर्श मिली है। दरअसल यह बौद्ध स्तूप का ऊपरी हिस्सा है। खुदाई पूरी पर पूरा स्तूप सामने आ जाएगा। निकोसे ने बताया कि यह बौद्ध स्तूप पहले मिले बौद्ध स्तूप से भी प्राचीन है। उन्होंने कहा कि एक ही स्थल पर दो बौद्ध स्तूप का मिलना पुरातात्विक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। विभाग इसका पूरा इतिहास लिखेगा ताकि देश व दुनिया के लोग इस स्थल की पौराणिकता से परिचित हो सकें। स्तूप में अस्थि कलश या अन्य कोई दूसरी चीज भी मिल सकती है। भदुली में खुदाई का कार्य शुरू कराने में अहम भूमिका निभाने वाले भंते तिस्सावरो ने खुदाई स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के पश्चात भंते ने कहा कि मनौती स्तूप के पीछे जिस स्थल की खुदाई पुरातत्व विभाग कर रहा है, वह कभी बौद्ध विहार का हिस्सा रहा होगा। उन्होंने बताया कि खुदाई के प्रारंभिक दौर में ही ईट की जमीन दिखलाई पड़ रही है। ईट की इस जमीन का क्षेत्र काफी लंबा चौड़ा प्रतीत हो रहा है। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस स्थल पर किस तरह की इमारत रही होगी। वैसे भंते तिस्सावरो का मानना है कि यहां बौद्ध स्तूप या बौद्ध मठ रहा होगा। निरीक्षण के दौरान भंते ने पुरातत्व विभाग के अब्दुल आरीफ, जयशंकर नायक तथा धर्मेद्र कुमार से खुदाई की जानकारी ली। उन्होंने बताया कि शीघ्र ही केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय से वार्ता कर यहां म्यूजियम निर्माण के लिए कहा जाएगा।

 पलामू में मिले दो बौद्ध स्तूप
 http://www.jagran.com/jharkhand/ranchi-7604479.html 
रांची के पलामू के हुसैनाबाद प्रखंड के पंसा व सहराविरा गांव में दो स्तूप मिले हैं। पिछले दिनों भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम ने इन गांवों का दौरा किया था। इस दौरे में ही इन स्तूपों का पता चला। झारखंड में अब तक बौद्धकालीन मूर्तियां व उनके अवशेष तो मिलते रहे हैं, स्तूप पहली बार मिले हैं। पिछले दिनों पलामू में ही रॉक पेंटिंग मिली थी। पंसा गांव हुसैनाबाद प्रखंड से 22 किमी दूर है और कबरा कला गांव से 4 किमी। गांव कोयल नदी के तट पर है। कबरा कला वह गांव हैं, जिसके विशाल टीले से पाषाण काल से लेकर ब्रिटिश काल के अवशेष मिलते हैं। इस गांव के टीले की खुदाई अभी तक नहीं हुई है। इसी गांव से 4 किमी दूर पंसा गाव हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची अंचल के अधीक्षक एन जी निकोशे बताते हैं कि स्तूप मिट्टी के बने हैं। इसकी परिधि 15 मीटर हैं और ऊंचाई आठ मीटर। स्तूप के ऊपर ईटों का भी इस्तेमाल हुआ है जिनकी साइज है 10 गुणा 7 गुणा तीन। सात गुणा पांच गुणा तीन। दस गुणा सात गुणा तीन सेंटी मीटर। यहां लाल रंग के मृदभांड भी पाए गए हैं। गांव वाले इस स्तूप पर पुआल या ओसावन करते हैं। उन्हें इसकी ऐतिहासिकता की जानकारी नहीं है। उनके लिए यह एक मिट्टी का टीला है। दूसरा स्तूप सहारविरा गांव में मिला है। यह पंसा गांव से 5 किमी दूर है। इस स्तूप की ऊंचाई तीन मीटर है और परिधि आठ मीटर। इसमें पके ईटों का भी इस्तेमाल हुआ है। स्तूप के बीच में पत्थर का स्तंभ है। स्तंभ के ऊपरी हिस्से पर बौद्ध की आकृति है। स्तंभ स्तूप में धंसा हुआ है। निकोश इसे 6वीं-7वीं शताब्दी का मानते हैं। स्तूप के ऊपर व आस-पास झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। स्तूप से झांकती बुद्ध की प्रतिमा अपनी कहानी खुद की बयां करती है। क्या होता है स्तूप स्तूप का शाब्दिक अर्थ ढेर होता है। एक गोल टीले के आकार की संरचना है जिसका प्रयोग पवित्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लिए किया जाता है। माना जाता है कभी यह बौद्ध प्रार्थना स्थल होते थे। स्तूप समाधि, अवशेषों अथवा चिता पर स्मृति स्वरूप निर्मित किया गया होता है।
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