Sunday, April 17, 2011

कोलकाता की खोज करने वाले जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील

खबरों में इतिहास ( भाग-13 )
अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील
२-नेपाल ने भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की
3-10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र
जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील
मान्यता थी कि कोलकाता के संस्थापक जाब चार्नक थे। कोलकाता हाईकोर्ट में इतिहासकारों की दायर एक याचिका में अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर संस्थापक की मान्यता पर रोक लगा दी। ( पूरा विवरण इस पीडीएफ से पढ़ें -बेदखल हुए जाब चार्नाक  )

अब भी लोग कोलकाता की खोज का श्रेय उन्हें ही देते हैं। कोलकाता की खोज करने वाले जॉब चार्नक तीन सौ साल पहले हावड़ा जिले के उलबेड़िया पहुंचे थे। तब यहां मुगल साम्राज्य कायम था। इतिहास का ज्यादातर हिस्सा भले ही नष्ट हो गया हो, लेकिन लोग आज भी कोलकाता के साथ चार्नक को जरूर याद करते हैं। हालांकि हावड़ा वालों को और खास करके उलबेड़िया के लोगों को यह याद नहीं है कि कभी इतिहास पुरुष चार्नक उनके इलाके में भी रहते थे। महीनों तक हावड़ा जिले में रहने वाले चार्नक के मकान की दशा देख कर खंडहर भी सोचेगा कि उसकी हालत कुछ बेहतर है।

मकान के तौर पर महज ढाई टूटे हुए खंभे और कुछ ईट-पत्थर ही शेष बचे हैं। पास में रहने वाले गोपाल दास के मुताबिक किसी जमाने में साहेब बाड़ी के तौर पर प्रसिद्ध मकान को लोग नीली कोठी के नाम से जानते थे। बचपन में सुना था कि वे यहां रहते थे। इससे ज्यादा कुछ पता नहीं है। मकान के आसपास जरूर दूसरे भवन बन चुके हैं।
उलबेड़िया के इतिहासकार असित हाजरा के मुताबिक हेमेंद्र बनर्जी के हावड़ा इतिहास और सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि 1687 में चार्नक उलबेड़िया आए थे। वे यहां औद्योगिक केंद्र की स्थापना करना चाहते थे। इस बारे में ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल काउंसिल को सिफारिश भी की थी।
उनका कहना है कि इतिहास के पन्नों से यह जानकारी भी मिलती है कि व्यापारिक कारणों से नवाब के लठैतों ने चार्नक को जमकर पीटा भी था। इसके बाद 24 अगस्त 1690 की दोपहर उन्होंने इलाके को सदा के लिए अलविदा कह दिया और यहां से कूच कर गए। तीन साल तक अंग्रेज बहादुर इलाके में रहे और इसके लिए उन्होंने एक मकान बनवाया था,जिसे लोग साहेब बाड़ी भी कहते थे। लगभग 20 साल पहले यहां एक विशाल दीवार और दरवाजे के हिस्से दिखाई देते थे, लेकिन अब सब कुछ गायब हो गया है। उनका कहना है कि यहां से वे सूतानूटी गए। अगर यहीं बस जाते तो आज कोलकाता नहीं होता और उसकी जगह उलबेड़िया ही विश्व व्यापार का केंद्र बन चुका होता।

स्थानीय लोगों की बात तो छोड़िए उलबेड़िया नगरपालिका के चेयरमैन देवदास घोष यह सुनकर हैरत में पड़ जाते हैं कि सचमुच चार्नक उनके इलाके में आकर ठहरे थे। इसी तरह हाटकालीगंज इलाके में चार्नक के मकान से महज 50 मीटर की दूरी पर रहने वाले एक दुकानदार सवाल पूछते हैं कि सचमुच चार्नक कभी यहां रहते थे, ऐसा तो उन्होंने कभी किसी से नहीं सुना जबकि वे सालों से यहां रह रहे हैं। (साभार-जनसत्ता)।
यह भी पढ़िए- कोलकाता को किसने बसाया
भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की

नेपाल ने पड़ोसी भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी की अनुकृति बनाए जाने की खबरों को खारिज किया है और कहा कि जापान और युनेस्को द्वारा शुरू की गई संरक्षण परियोजनाओं के कारण नेपाल में बुद्ध के पवित्र जन्म स्थान की मान्यता बरकरार रहेगी।नेपाल के संस्कृति मंत्रालय के सचिव मोद राज दोत्तेल ने कहा कि युनेस्को ने 1997 में लुम्बिनी को बुद्ध की जन्मस्थली बताते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि भारत युनेस्को के घोषणा पत्र को मानने वाले 200 देशों में से एक है। बुद्ध भला दो स्थानों पर जन्म कैसे ले सकते हैं। नेपाल का लुम्बिनी ही वह स्थान है, जहां उनका जन्म हुआ था। पुरातत्वविदों का कहना है कि बुद्ध के दक्षिणी नेपाल के राजवंश में पैदा लेने का सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय सम्राट अशोक द्वारा 249 ईसा पूर्व में लुम्बिनी की यात्रा के दौरान यहां स्थापित किए गया शिलालेख है, जिसपर लिखा है, "ईश्वर के प्रिय राजा पियादशी (अशोक) ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में खुद बुद्ध साक्यमुणि के जन्मस्थान की राजकीय यात्रा की, उन्होंने यहां शिला लगवाई.. और लुम्बिनी गांव पर लगने वाला कर घटा दिया।"

लुम्बिनी के बुद्ध का जन्म स्थान होने का एक अन्य ऐतिहासिक प्रमाण वह पाषाण चित्र है, जो नेपाली राजा रिपु मल्ला के आदेश पर बनाया गया था। रिपु मल्ला ने 1312 ईस्वी में लुम्बिनी की तीर्थयात्रा के समय इस चित्र बनाने का आदेश दिया था। इसमें बुद्ध की माता और महारानी एक हाथ से एक पेड़ को पकड़ी हुई है, जबकि उसके बगल में एक नवजात शिशु एक कमल की पंखुड़ी पर खड़ा है। यह पाषाण शिल्प अपने निर्माण के समय से ही इस स्थान पर लगा हुआ है। यहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालु सम्राट अशोक द्वारा लगवाए गए शिलाओं और पाषाण चित्र को दूध और जल से नहलाते हैं। जापान सरकार के खर्च पर इन शिलाओं और पाषाण शिल्प के संरक्षण की एक परियोजना चलाई जा रही है। माना जाता है कि बुद्ध का जन्म 623 ईसा पूर्व में हुआ था, लेकिन 624 ईसा पूर्व से 560 ईसा पूर्व के बीच कुछ और तिथियों का भी उल्लेख मिलता है।

लुम्बिनी में अभी अनेक बौद्ध मठ चल रहे हैं और यह वर्तमान दक्षिणी नेपाली जिला रुपनदेही में स्थित है। यहां से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिलौराकोट को बुद्ध के समय के कपिल वस्तु की राजधानी माना जाता है। इधर कुछ रिपोर्टों में हालांकि उत्तर प्रदेश के पिपराहवा को तत्कालीन कपिलवस्तु की राजधानी बताया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के एक जिले का नाम सिद्धार्थ नगर होने और यहां लुम्बिनी तथा तिलौराकोट की अनुकृति बनाने की खबरों से नेपाल के नागरिकों को चिंता हो रही है कि इससे तीर्थयात्रियों में यह भ्रम फैल सकता है कि बुद्ध का जन्म भारत में हुआ था। ( काठमांडो-एजंसियां )

10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र

मुगल शासक जहाँगीर का आदमकद चित्र 10 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ। यह अब तक के ज्ञात बड़े मुगल चित्रों में एक है। सत्तरहवीं सदी का यह चित्र बोन्हमास इंडियन एवं इस्लामिक नीलामी घर में मंगलवार को नीलाम हुआ। स्वर्ण एवं वाटरकलर से बने इस चित्र में जहांगीर ने स्वर्णजड़ित सिंहासन पर आसीन हैं।

नीलामीघर क प्रमुख एलीस बेली ने कहा कि यह 17 वीं सदी का दुलर्भतम एवं वांछित चित्र है और इस काल का ऐसा कोई चित्र नहीं है जो नीलाम हुआ हो। इस प्रकार की कोई दूसरी कलाकृति ज्ञात नहीं है और इसके महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। यह कलाकृति मध्य पूर्व के संग्रहालय द्वारा खरीदी गई।

बेली ने कहा कि इस चित्र से के असाधारण विवरण और जटिलता दर्शकों को मोह लेती है। हम इसे बेचकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि यह 1617 के आसपास की तस्वीर है और जब जहाँगीर मांडू में थे तब इसे चित्रकार अबुल हसन ने बनाया था। ( नई दिल्ली, बुधवार, 6 अप्रैल 2011 -भाषा )

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