<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494</id><updated>2012-01-28T04:31:28.178+05:30</updated><category term='मानव और कुत्ते'/><category term='लखनऊ'/><category term='बालथाल'/><category term='स्पाइस रूट'/><category term='भगवान बुद्ध'/><category term='Egypt'/><category term='चीन'/><category term='नई दुनिया'/><category term='महाबोधि मंदिर'/><category term='नीतिश कुमार'/><category term='गायकवाड़ राजपरिवार'/><category term='ताराडीह'/><category term='वृंदावन'/><category term='भूतनाथ मंदिर'/><category term='जाब चार्नाक'/><category term='अयोध्या'/><category term='पिरामिड'/><category term='भारत की जाति व्यवस्था'/><category 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ramcharitmanas'/><category term='महान सम्राट अशोक'/><category term='रॉक पेंटिग'/><category term='कोलकाता'/><category term='अमरपुर'/><category term='मथुरा का राजकीय संग्रहालय'/><category term='rock painting of kaimur'/><title type='text'>इतिहास</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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विकास का भी गवाह रहा है। नवपाषाण युग में, इसे व्यवस्थित जीवन शैली की शुरूआत के रूप में परि‍भाषि‍त किया गया जो बाद में जटिल सभ्यता के रूप में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      ताओवाद और कन्फ्यूशियस विद्यालयों के विचार विश्व की दो प्रमुख दार्शिनक धाराओं को चीन के उपहार थे। "मृत्यु के बाद जीवन 'की अवधारणा पर निर्मित   प्राचीन चीनी सम्राटों के मकबरे बेमिसाल हैं। चीन ने एक आश्चर्यजनक वास्तुकला के रूप में बनाई गयी अपनी "चीन की महान दीवार" जैसे निर्माण से दुनिया को हैरान कर दिया। कागज, रेशम, मृतिका - शिल्प और कांस्य से बनी हुई कुछ उल्लेखनीय श्रेणी की वस्तुएं हैं जिनपर इतिहास के प्रारंभिक काल में चीन का पूरी तरह से अधिकार था। गुणवत्ता, विविधता और प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति चिन्हों   की समृद्धि और इनसे जुड़ी शानदार प्रौद्योगिकियों के मामले में, चीन का दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन में करीब 12 हजार वर्ष पूर्व प्रारंभ हुए नवपाषण युग ने (सभाओं, मछली पकड़ने और शिकार करने ) जैसी अर्थव्यवस्था से उत्पादन रूपी अर्थव्यवस्था में होता बदलाव देखा । इस संदर्भ में, मध्य चीन में पीलगंग संस्कृति, लियांगझू संस्कृति और यांगशाओ संस्कृति महत्वपूर्ण रही हैं। व्यवस्थित कृषि के  विकास ने बर्तनों और औजारों सहित  विभिन्न संबंधित गतिविधियों में भी मदद प्रदान की। पत्थर के टुकड़ो से बने हथियारों की जगह अच्छी तरह से तराशे गये उपकरणों ने ले ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि और उससे संबंधित जरूरतों को पूरा करने के लिए कुदाल, चक्की के पाट, दरांती, हलों के फल, कुल्हाड़ी, बसूली जैसे पत्थरों के औजार थे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; समय बीतने के साथ प्राचीन लोगों ने बर्तनों का उत्पादन किया और काफी हद तक अपने दैनिक जीवन में सुधार कर लिया। विभिन्न रंगों से चित्रित मिट्टी के बर्तनों ने अपनी खास छटा बिखेरी। रंगों से चित्रित कलाओँ ने लोगों की गतिविधियों के साथ साथ प्रारंभिक युग की कलात्मक प्रतिभा को भी प्रस्तुत किया।&lt;br /&gt;खासतौर पर शांग और झोउ राजवंशों ने (18 वीं सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी बीसीई तक) प्राचीन दुनिया के उत्कृष्ट धातु शिल्प में विशेष उपलब्धि हासिल की। प्राचीन चीन में बनाये गये कांस्य के अनेक पात्र वास्तव में आश्चर्यजनक हैं। कांस्य पर की जाने वाली पालिश के बाद यह चमकीले सुनहरे रंग की आभा देता है और देखने में बहुत खूबसूरत लगता है। लेकिन चीन की क्षारीय मिट्टी कांस्य के लिए उपयुक्त है और इसको आकर्षक हरे और नीले रंग में परिवर्तित करने के बाद यह आंखों को मूल धातु से ज्यादा सुन्दर लगता है। हथियारों के लिए  कांस्य का उपयोग प्रारम्भ हो गया (कुल्हाड़ी, बरछी, कटार, तलवारें) छेनी, बसूला, आरी और खेती के उपकरण फावड़ों, फावड़ियों, दंराती, मछली हुक को भी बनाया जाने लगा। कब्र में मिलने वाले हथियार इनके स्वामियों की शक्ति को दर्शाते हैं और साथ ही यह भी पता चलता है कि दैनिक जीवन में इनका उपयोग होता था लेकिन खाना पकाने-बनाने के बर्तन, खाना रखने के कन्‍टेनर, मदिरा और जल आदि‍ रखने के बर्तन और उनकी सुंदरता एवं उच्च शिल्प ने चीन और विदेशों का सबसे ज्यादा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वे इनका उपयोग अपने देवताओं और पूर्वजों को बलिदान करने में किया करते थे और बाद में इन्हें मृत व्यक्ति के साथ दफना दिया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांस्य को ढाल कर वस्तुओं का निर्माण भारी गोल बर्तनों को बनाने में किया जाता था। चीनी कांसे का उपयोग संगीत वाद्ययंत्र, वजन और माप यंत्र, रथ  एवं घोड़े का साजो-सामान, गहने और दैनिक उपयोग की विविध वस्‍तुओं को बनाने में भी करते थे। उनको अति‍रि‍क्‍त घुंडि‍यों, हैडिंलों और घनी सजावट के साथ बनाया जाता था।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांसे के मामले में एक पृथक उत्‍कृष्‍ट श्रेणी कांस्‍य दर्पण है। इसके सामने का हि‍स्‍सा काफी चमकदार है और पि‍छला हि‍स्‍सा वि‍भि‍न्‍न सजावटी डि‍जायनों और शि‍लालेखों से ढका है। अधि‍कांश गोल है तो कुछ चौकोर और कुछ का आकार फूलों की पंखुड़ि‍यों जैसा है तो कुछ हैंडि‍ल के साथ हैं। ये अधि‍कांशत: हान राजवंश और तांग राजवंश की युद्धरत अवधि‍ से संबंधि‍त हैं।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       चीनी कला वस्‍तुओं में हरि‍ताश्‍म से बनी वस्‍तुओं का एक वि‍शेष स्‍थान है। हरि‍ताश्‍म एक हल्‍का हरा, सलेटी और भूरे रंग का खूबसूरत सघन पत्‍थर है। इस प्रकार से  यह ना सि‍र्फ आंखों को भाता है बल्‍कि‍ स्‍पर्श करने में भी अच्‍छा है। इसकी शुरूआत नवपाषाण युग में पत्‍थर उद्योग के वि‍स्‍तार के रूप में हुई। चीनी हरि‍ताश्‍म को पुण्‍य और भलाई के पत्‍थर के रूप में मानते थे और उनका वि‍श्‍वास था कि‍ इस तरह के गुणों को अपने स्‍वजनों को दि‍या जा सकता है। इसलि‍ए, हरि‍ताश्‍म का उपयोग वि‍शेष अनुष्‍ठानों और संस्‍कार क्रि‍या-कलापों में आमतौर पर कि‍या जाता था लेकि‍न इसका उपयोग गहनें, पेंडेंट और छोटे पशुओं की आकृति‍ बनाने में भी कि‍या जाता था। आमतौर पर, हरि‍ताश्‍म से बनी वस्‍तुओं को संस्‍कार के लि‍ए बनी वस्‍तुओं, धारण और दफनाई जाने वाली वस्‍तुओं की श्रेणी में बांटा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका तकनीकी कारण यह भी था कि‍ हरि‍ताश्‍म के भारी गोल आकार में होने के कारण इसे पतले, तीखे और घुमावदार आकारों में नहीं ढाला जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीनी मि‍ट्टी से बने बर्तन चीन की सजावटी कला का सबसे स्‍थाई पहलू हैं और जि‍समें उच्‍च गुणवत्‍ता वाली मुल्‍तानी मि‍ट्टी की उपलब्‍धता को प्रमुख महत्‍व दि‍या गया था। वे अपनी बेहतर सतह और शानदार रंगों के लि‍ए उल्‍लेखनीय हैं जि‍न्‍हें अग्‍नि‍ की अत्‍याधुनि‍क तकनीक से प्राप्‍त कि‍या गया है। थोड़े से आयरन ऑक्‍साईड को मि‍लाकर उच्‍च ताप से हरि‍त रोगन तैयार कि‍या जाता और आमतौर पर सीलाडॉन ग्‍लेज कहे जाने वाले एक हल्‍के ताप के वातावरण में बर्तन को पकाया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     चीनी के बर्तनों की उपस्‍थि‍ति‍ के साथ चीन में चीनी बर्तनों के इति‍हास में एक नये युग की शुरूआत हुई। करीब 3500 वर्ष पूर्व, शांग काल में, एक सफेद पत्‍थर उपयोग में आया जो चीनी मि‍ट्टी के बर्तनों के ही समान था और बाद में इसका वि‍कसि‍त उपयोग पूर्वी हान, तांग, संग, युआंन, मिंग और किंग राजवंशों&lt;br /&gt;में कि‍या गया।&lt;br /&gt;मि‍ट्टी के बर्तनों के बाद आदि‍म सफेद मि‍ट्टी के बर्तनों बने और सफेद मि‍ट्टी के बर्तनों का बदलाव नीले और सफेद ग्‍लेज मि‍श्रि‍त बर्तनों में हुआ। ग्‍लेज मि‍श्रि‍त लाल रंग से रंगे मि‍ट्टी के बर्तन भी प्रचलन में रहे। इसके बाद, वि‍वि‍ध रंगों से बने मि‍ट्टी के बर्तन प्रचलि‍त हुए। चीन में बने चीनी के बर्तन अपने वि‍भि‍न्‍न आकारों और डि‍जाइनों, गहनों की चमक और इसके कपड़े अपनी अनुकूलता और उज्‍जवलता के लि‍ए जाने जाते हैं। मि‍ट्टी के बर्तनों के मामले में चीनी बर्तन उद्योग ने चीन को वि‍श्‍वभर में प्रसि‍द्धि‍ दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; तांग राजवंश के वि‍वि‍ध रंगों से बने बर्तनों में शीशे और आकार के बीच मनोहर पंक्‍ति‍यों को उकेरने पर जोर दि‍या गया। लेकि‍न इस समयावधि‍ को आमतौर पर उल्‍लेखनीय रूप से तीन रंगों से मि‍श्रि‍त कांच कला युक्‍त मि‍ट्टी के बर्तनों की उत्‍कृष्‍ट श्रेणी के रूप में जाना जाता है। इन्‍हें गहरे नीले आकाश, बैंगनी, गहरे पीले और गेरूएं, गहरे और हल्‍के हरे और लाल रंग से सजाया जाता था इन रंगों को अग्‍नि‍ के हल्‍के तापमान से बनी उपयुक्‍त धातु ऑक्‍साइड के मि‍श्रण से तैयार कि‍या जाता था। वि‍वि‍ध रंगों के संगम ने ति‍रंगे बर्तनों को वि‍शेष आकर्षक बना दि‍या और ये तांग राजवंश के काल में दफनाने वाली वस्‍तुओं में सबसे लोकप्रि‍य बन गये। इस श्रेणी के मि‍टटी के बर्तनों में मानव और पशुओं की आकृति‍यां इनकी सर्वश्रेष्‍ठ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किंन और हांन राजवंशों से मृतक लोगों के साथ बड़ी मात्रा में शानदार समानों और मि‍ट्टी के बर्तनों को दफनाने की प्रथा आरंभ हुई। चीनी सम्राटों का मानना था कि‍ मरने के बाद लोग एक नई दुनि‍या में जीवन जीने के लि‍ए जाते हैं और इसलि‍ए उनके मरने के बाद वे सबकुछ अपने साथ ले जाना चाहते थे जि‍सका उपयोग उन्‍होंने अपने जीवनकाल में कि‍या था। इसलि‍ए, सम्राट के मकबरे का एक बड़ा टीला सा बन जाता था जि‍समें बहुत से बर्तनों, अनाज के भंडार, हथि‍यार, पशु, दैनि‍क उपयोग की वस्‍तुओं, घोड़ों, रथों और मुहरों आदि‍ को दफन कि‍या जाता था। टेराकोट्टा सेना और टेराकोट्टा योद्धा मृतक और उसके बाद के जीवन को मानने वालों में प्राचीन चीनी अंति‍म संस्‍कार के सबसे स्‍पष्‍ट उदाहरण हैं। उन्‍होंने शाही अंति‍म संस्‍कार की रस्‍मों को पूरी तरह से नि‍भाया। भूमि‍गत कब्रों में अपने भारी कवच के साथ दफनाए गये योद्धाओं के हाथों में उनके हथि‍यार यह दि‍खाते थे कि‍ वे अपने सम्राट की रक्षा के लि‍ए कि‍सी भी समय अपनी जान कुर्बान करने के लि‍ए तैयार हैं। अपने खूबसूरत रेशम के लि‍बास के साथ हजारों की संख्‍या में महि‍ला गणि‍काएं नृत्‍य कर रही हैं और सुअरों, घोड़ो, पशु, भेड़, बकरि‍यों, कुत्‍तों और मुर्गि‍यों को उनके भोजन के लि‍ए उनके साथ बांध दि‍या जाता था।               &lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;भारत&amp;nbsp;और चीन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;दुनिया की दो अद्भुत प्राचीन सभ्यताओं, भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक संबंध दो शताब्दी से ज्यादा पुराने हैं। दोनों देश प्राचीन रेशम मार्ग के माध्यम से जुड़े थे। लेकिन भारत से चीन गये बौद्ध धर्म का परिचय आपसी संबंधों के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम था जिसने चीन में बौद्ध कला और वास्तुकला के निर्माण और चीनी बौद्ध भिक्षुओं जैसे फा-जियान, जुनजांग और इजिंग की भारत यात्रा को एक नये संबंध से जोड़ दिया। भारत से चीन आए बौद्ध धर्म का परिचय धार्मिक प्रति‍माओं के रूप में सामने आया जो अंततः स्‍वयं के एक वर्ग के रूप में विकसित हुआ और वेई, सुई, तांग, संग, मिंग और किंग राजवंशों के उत्‍कृष्‍ट काल तक पहुँचा। इन बौद्ध मूर्तियों को उत्‍कृष्‍ट शिल्प कौशल के माध्‍यम से पत्‍थर के साथ-साथ कांसे से बनाया गया और तांग काल में यह अपने चरमोत्कर्ष तक पहुंची। अपने वि‍कास के दौरान, चीनी मूर्तिकला को विविधता प्रदान करने के लि‍ए नये रूपों और शैलि‍यों को आत्‍मसात कि‍या गया। द यून गंग, द लांगमेन और दाजू ग्रोटोज इस क्षेत्र की कृति‍यों के सि‍र्फ कुछ एक उदाहरण हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दोनों देशो के बीच ऐतिहासिक मित्रता के आदान-प्रदान को और बढ़ाने के लिए वर्ष 2006 को भारत-चीन मित्रता वर्ष के रूप में घोषित किया गया था। इस वर्ष के एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर, वर्ष 2006-07 के दौरान चीन के चार प्रमुख शहरों- बीजिंग, झेंग्झौ चूंगकींग, और गुआंगज़ौ में "प्राचीन चीन की निधि" पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में चीन के लोगों के लिए उनके ही घर में भारतीय कला से जुड़ी सौ कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया। इसके बाद, वर्ष 2011 में भारत के चार शहरों- नई दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और कोलकाता में भी "प्राचीन चीन की निधि" पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी का आयोजन संयुक्त रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और चीन के सांस्कृतिक विरासत प्रशासन द्वारा किया गया। इस प्रदर्शनी के दौरान निओलिथिक से क्विंग राजवंश की विभिन्न कलाओं से जुड़ी सौ प्राचीन काल की वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया। चीनी वस्तुओं की विभिन्न श्रेणियों जैसे आभूषणों, सजावटी वस्तुओं,मिट्टी और धातु आदि से बने बर्तनों का प्रदर्शन नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में फिलहाल जारी प्रदर्शनी में किया गया। यह प्रदर्शनी 20 मार्च, 2011 तक चली। इस प्रदर्शनी का उद्देश्य दोनों देशों के लोगों के बीच मित्रता के संबंध को और मजबूत बनाना था।&lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;साभार- http://www.pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-1379002389720735426?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/1379002389720735426/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=1379002389720735426' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1379002389720735426'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1379002389720735426'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/blog-post_25.html' title='प्राचीन चीन - जटिल सभ्यता की पराकाष्ठा'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-4094964070397581279</id><published>2012-01-25T17:30:00.003+05:30</published><updated>2012-01-25T19:38:31.158+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायनासोर'/><title type='text'>डायनासोर के 19 करोड़ साल पुराने बसेरे की खोज</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b style="color: #38761d;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;th rowspan="2" style="background-color: yellow; color: blue;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; खबरों में इतिहास &lt;br /&gt;&amp;nbsp; अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;१-डायनासोर के 19 करोड़ साल पुराने बसेरे की खोज&lt;br /&gt;२-इंसान और कुत्ते का रिश्ता 30 हज़ार साल पुराना&lt;/b&gt;&lt;/th&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b style="color: #38761d;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;डायनासोर के 19 करोड़ साल पुराने बसेरे की खोज&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण अफ्रीका के जीवाश्म वैज्ञानिकों को डायनासोर के अंडों का एक ऐसा ठिकाना मिला है जो अब से पहले मिले सभी जगहों से करीब दस करोड़ साल पुराना है। इसकी खोज करने वाले जीवाश्म वैज्ञानिकों को इस जगह से ऐसे दस अलग-अलग बसेरे मिले हैं जिनमें 6-7 सेंटीमीटर लंबे कम से कम 34 अंडे मिले हैं। ये जीवाशेष 'प्रोसॉरोपोड मैसोपोन्डिलस' प्रजाति के डायनासोर का है जो लंबी गर्दन वाले सॉरोपोड प्रजाति के डायनासोर डिप्लोडोकस से संबंधित है। इन ठिकानों से मिली जानकारी के अनुसार ये डायनासोर अंडे देने के लिए बार-बार इन कीड़ा स्थलों पर लौट कर आते थे और यहां झुंड में अंडे देकर वापस चले जाते थे, इस प्रक्रिया को उपनिवेशीय तरीके से घर बसाना कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;19 करोड़ साल पुराने अवशेष :&lt;/b&gt; इस 19 करोड़ साल पुराने अवशेषों में डायनासोर के भ्रूणीय कंकाल भी मिले हैं जिनका वर्णन राष्ट्रीय विज्ञान एकेडेमी में किया गया है। ये कंकाल दक्षिण अफ्रीका के गोल्डन गेट नेश्नल पार्क में एक 25 मीटर लंबे चट्टान में पाए गए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इस तरह के कई और स्थल इन चट्टानों में समाए हुए हैं जो समय बीतने पर अपने आप नज़र आने शुरू हो जाएंगे। लेकिन इस ताजा खोज ने अब तक पृथ्वी में डायनासोर के इतिहास के बारे में मिली जानकारियों को काफी हद तक विस्तृत किया है। रॉयल ओनटारियो म्यूजियम में वर्टीब्रेट पैलियनटोलॉजी विभाग में सहायक संरक्षक के पद पर तैनात डेवि़ड इवांस कहते हैं, 'वैसे तो डायनासोर के अवशेषों के बारे में हमें अब तक व्यापक जानकारी हासिल हो चुकी है, लेकिन उनके प्रजनन संबंधी जानकारियों का अब भी का काफी अभाव है, खासकर इनकी शुरुआती पीढ़ी के बारे में।' डेविड आगे कहते हैं, 'इन 19 करोड़ साल पहले पुराने प्रजनन स्थलों की जानकारी के बाद हमें पहली बार डायनासोर के शुरुआती पीढ़ियों के विकास को दर्शाने वाले इतिहास की अनोखी जानकारी मिल सकेगी जिससे अब से पहले तक हम अनजान थे।' साभार-बीबीसी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इंसान और कुत्ते का रिश्ता 30 हज़ार साल पुराना&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;&amp;nbsp;http://www.samaylive.com/international-news-in-hindi/139462/dog-human-being-canine-man-s-friend-animal-world.html&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;कुत्ते इंसान के न सिर्फ सबसे अच्छे मित्र हैं बल्कि सबसे प्राचीनतम मित्र रहे हैं. यह बात एक नये अध्ययन में सामने आई है। लंदन से प्राप्त एक समाचार के अनुसार एरिजोना विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पता चला कि मानव और कुत्तों के बीच पिछले 30 हजार सालों से रिश्ता रहा है. साथ ही यह भी पाया गया है कि यह वही जानवर है जो सबसे पहले इंसान का पालतू जानवर बना।&lt;br /&gt;शोधकर्ताओं ने साइबेरिया में 33 हजार साल पुराने कुत्ते के अवशेषों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है. उनके अध्ययन से ही पता चला है कि उस दौर में भी यह जानवर इंसान का पालतू था। शोधकर्ता ग्रेग होडगिन्स ने फॉक्स न्यूज से दावा किया है कि 33 हजार साल पुराने इन अवशेषों से पता चला है कि उस दौर में&amp;nbsp; कुत्ते इंसान के करीब थे। उन्होंने कहा कि आमतौर पर हम सोचते हैं कि इतिहास में बकरी, गाय, भेड़ आदि इंसान के पालतू जानवर रहे होंगे. लेकिन मानव और कुत्तों का इस दौर में भी खास रिश्ता था।&amp;nbsp; &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-4094964070397581279?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/4094964070397581279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=4094964070397581279' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4094964070397581279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4094964070397581279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/19.html' title='डायनासोर के 19 करोड़ साल पुराने बसेरे की खोज'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-8100010022121959455</id><published>2012-01-22T17:13:00.000+05:30</published><updated>2012-01-22T17:15:39.902+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंकोरवाट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कंबोडिया'/><title type='text'>सूखे से बर्बाद हुआ अंकोरवाट</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-avu6vahMqnQ/Txv1LKSIeRI/AAAAAAAAEOE/hAPBWXRv7wA/s1600/Angkor+Wat+Temple.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="http://3.bp.blogspot.com/-avu6vahMqnQ/Txv1LKSIeRI/AAAAAAAAEOE/hAPBWXRv7wA/s640/Angkor+Wat+Temple.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp; पहले कहा गया था कि&amp;nbsp;जिस&amp;nbsp;शहर&amp;nbsp;अंकोरवाट में दुनिया&amp;nbsp;का सबसे बड़े मंदिर अंकोरवाट&amp;nbsp;है,&amp;nbsp;उस&amp;nbsp;शहर का विनाश लंबी चली लड़ाईयों व जमीन के सही संतुलन न बनाए &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;रख&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; ( अंधाधुंध दुरुपयोग ) के कारण हुआ। मगर&amp;nbsp;अब नए शोध&amp;nbsp;में कहा जा रहा है कि अकोरवाट शहर का विनाश सूखे के कारण हुआ। पर्यावरण में विनाशकारी परिवर्तन से&amp;nbsp;ऊबारने के इंतजाम नहीं होने के कारण&amp;nbsp;शहर को &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;बचा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;या नहीं जा सका। हालांकि पर्यावरण को ही एकमात्र कारण&amp;nbsp;भले नहीं माना&amp;nbsp;जा&amp;nbsp;सकता&amp;nbsp;मगर यह भी प्रमुख कारण था।  &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;  &lt;/span&gt;गेट्स कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधार्थियों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम का तो यही मानना है कि ६०० साल पहले इस शहर के पतन का प्रमुख कारण पर्यावरण में बदलाव के बाद&amp;nbsp;पड़ा सूखा था। जबकि इस शहर में उत्कृष्ट जलप्रबंधन था।&lt;br /&gt; कैम्ब्रिज के&amp;nbsp;शोधार्थी मैरा बेथ डे समेत&amp;nbsp;पूरी टीम&amp;nbsp; ख्मेर साम्राज्य के&amp;nbsp;११&amp;nbsp;वीं&amp;nbsp;शताब्दी के  इस खूबसूरत शहर अंकोरवाट के जलप्रबंधन का अध्ययन कर ही है। अंकोरवाट संयुक्त राष्ट्रसंघ की विश्व धरोहर सूची में शामिल&amp;nbsp;दक्षिणपूर्व&amp;nbsp;एशिया&amp;nbsp;के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;अंकोरवाट मन्दिर अंकोरयोम नामक नगर में स्थित है, जिसे प्राचीन काल में यशोधरपुर कहा जाता था। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है। राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को १९८३ से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। इन प्रसंगों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं, असुरों और देवताओं के बीच अमृत मन्थन का दृश्य भी दिखाया गया है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp; विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहाँ केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं। सनातनी लोग इसे पवित्र तीर्थस्थान मानते हैं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अंकोरवाट जयवर्मा द्वितीय के शासनकाल (1181-1205 ई.) में कम्बोडिया की राजधानी था। अंकोरवाट का निर्माण कम्बुज के राजा सूर्यवर्मा द्वितीय (1049-66 ई.) ने कराया था और यह मन्दिर विष्णु को समर्पित है। यह मन्दिर एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है।&amp;nbsp; इसमें तीन खण्ड हैं, जिसमें प्रत्येक में सुन्दर मूर्तियाँ हैं और प्रत्येक खण्ड से ऊपर के खण्ड तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ हैं।प्रत्येक खण्ड में आठ गुम्बज हैं। जिनमें से प्रत्येक 180 फ़ुट ऊँची है। मुख्य मन्दिर तीसरे खण्ड की चौड़ी छत पर है। उसका शिखर 213 फ़ुट ऊँचा है और यह पूरे क्षेत्र को गरिमा मंडित किये हुए है।&lt;br /&gt;मन्दिर के चारों ओर पत्थर की दीवार का घेरा है जो पूर्व से पश्चिम की ओर दो-तिहाई मील और उत्तर से दक्षिण की ओर आधे मील लम्बा है। इस दीवार के बाद 700 फ़ुट चौड़ी खाई है। जिस पर एक स्थान पर 36 फ़ुट चौड़ा पुल है। इस पुल से पक्की सड़क मन्दिर के पहले खण्ड द्वार तक चली गयी है। इस प्रकार की भव्य इमारत संसार के किसी अन्य स्थान पर नहीं मिलती है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भारत से सम्पर्क के बाद दक्षिण-पूर्वी एशिया में कला, वास्तुकला तथा स्थापत्यकला का जो विकास हुआ, उसका यह मन्दिर चरमोत्कृष्ट उदाहरण है। &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&amp;nbsp; &lt;b style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;पतन का कारण सूखा होने के प्रमाण&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;१५वीं शताब्दी की लड़ाईयों व जमीन के अंधाधुंध दुरुपयोग से अंकोरवाट के पतन की कहानी से अलग मैरीबेथ को&amp;nbsp;११&amp;nbsp;वीं&amp;nbsp;शताब्दी में ख्मेर साम्राज्य के बनवाए गए&amp;nbsp;पूरे क्षेत्र&amp;nbsp;के जलाशयों&amp;nbsp;में&amp;nbsp;जमे तलछट के&amp;nbsp;जो नमून मिले&amp;nbsp;हैं उससे इस क्षेत्र के १००० साल के पर्यावरण के&amp;nbsp;इतिहास पर&amp;nbsp;की जानकारी हासिल की है। इन&amp;nbsp;साक्ष्यों के आधार पर इन पर्यावरणविदों को मानना है कि जब अंकोरवाट का पतन हुआ उस समय तक वहां का जलस्तर काफी नीचे चला गया था। इसने पर्यावरण के परिवर्तन में भारी भूमिका निभाई। हालांकि मैरीबेथ का कहना है कि पतन का यही एक अकेला कारण नहीं था। सामाजिक और राजनैतिक अस्थिरत के साथ&amp;nbsp;पर्यावरण&amp;nbsp;में बदलाव ने&amp;nbsp;जो असंतुलन पैदा किया उससे लड़ने के लिए यह शहर तैयार नहीं था। अनियंत्रित सूखे ने तबाही मचा&amp;nbsp;दी। शहरीकरण के कारण जंगलों की बेतहासा कटाई ने गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा किया। इतनी बड़ी विपदा से लड़ने में सक्षम नहीं था अंकोरवाट प्रशासन। नतीजे में अंकोरवाट शहर उजड़ गया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मैरीबेथ व उनकी टीम का यह शोध प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडमी आफ साइंस में प्रकाशित किया गया है। मैरीबेथ को भरोसा है कि पर्यावरण के कारण अंकोरवाट के पतन की यह कहानी आज पर्यावरण समस्या से निपटने की नसीहत होगी। वे कहती हैं कि- अंकोरवाट का जलप्रबंधन बहुत ही उच्चकोटि का था फिर भी पर्यावरण समस्या और उससे उपजी सामाजिक अस्थिरता से लड़ने में अक्षम साबित हुआ। यह शोध और किसी बात के लिए महत्वपूर्ण भले न हो मगर इस बात की नसीहत तो देता ही है कि पर्यावरण समस्या ने इतिहास के किसी दौर में&amp;nbsp;कितनी तबाही मचाई होगी। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;हम भी पुनः उसी समस्या के कगार पर &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;हम आज भी पुनः उसी समस्या के कगार पर खड़े हैं। भारत में पंजाब में ६० साल बाद बर्फबारी देखने को मिली। बंगाल के कुछ इलाकों में इस साल की ठंड में&amp;nbsp;घास पर बर्फ जमी मिली। हर बार १४ जनवरी मकरसंक्रांति के बाद तापमान बढ़ने लगता है मगर&amp;nbsp;इस बार पारा नाचे ही गिरता जा रहा है।&amp;nbsp;कहा&amp;nbsp;जा&amp;nbsp;रहा है कि इस साल होली तक ठंड पड़ेगी। यह सब भी पर्यावरण असंतुलन के संकेत हैं। तो क्या हमारा भी हश्र अंकोरवाट का ही होगा ? क्या&amp;nbsp;फिर हम हिमयुग की ओर बढ़ रहे हैं ? &lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-8100010022121959455?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/8100010022121959455/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=8100010022121959455' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8100010022121959455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8100010022121959455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/blog-post_22.html' title='सूखे से बर्बाद हुआ अंकोरवाट'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-avu6vahMqnQ/Txv1LKSIeRI/AAAAAAAAEOE/hAPBWXRv7wA/s72-c/Angkor+Wat+Temple.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-893056559247629599</id><published>2012-01-20T21:19:00.000+05:30</published><updated>2012-01-20T21:19:27.618+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पेरु'/><title type='text'>सेटेलाइट की मदद से पेरु के प्राचीन स्थलों की खोज</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://hindi.webdunia.com/samayik-bbchindi/1111212108_1.htm"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;पेरु में स्थित प्राचीन स्थलों की खोज और उन पर शोध&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;पिछले चार साल से इटली के पुरातत्वविद सेटेलाइट तकनीक के जरिए पेरु में स्थित प्राचीन स्थलों की खोज और उन पर शोध करने का काम कर रहे हैं। इटली के पुरातत्वविदों की ये टीम सेटेलाइट के जरिए प्राप्त की गई तस्वीरों की मदद से ये काम कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर ये टीम देश के दक्षिणी भाग में हज़ारों साल पहले नाज्का सभ्यता द्वारा सूखे पठार पर उकेरे गए पशुओं के चित्रों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।&lt;br /&gt;मिस्र में सालों से सेटेलाइट तस्वीरों की मदद से वहाँ के ऐसे प्राचीन स्थलों के बारे जाना जा सका है जिसें आमतौर पर नहीं देखा जा सकता था। लेकिन ये तकनीक दक्षिणी अमरीका में कुछ मायनों में नई है। पेरु कई प्राचीन सभ्यताओं का जन्म स्थल रहा है जिसमें से एक 'इंका सभ्यता' भी थी। पेरू में अनुमानित एक लाख ऐसे पुरातन स्थल है जिनमें से केवल कुछ को ही खोजा जा सका है।&lt;br /&gt;सेटेलाइट से खोज : इटली के पुरातत्वविदों की टीम की अगुवाई कर रहे निकोल मेसिनी का कहना है कि इस तकनीक की मदद से उन स्थलों को खोजने में मदद मिलेगी जो आसमान सी ली गई तस्वीरों में नहीं दिखाई देती है।&lt;br /&gt;उनका कहना है कि सेटेलाइट द्वारा ली गई तस्वीरों से वैज्ञानिकों को मिट्टी और पत्थरों की परतों को हटाकर उनके भीतर, या फिर घने जंगलों में भी देख पाएंगे। मसिनी का कहना है, 'पेरु में ज़्यादातर पुरातात्विक स्थान ऐसे है जहां पहुंचना कठिन है। जैसे वहां सीयरा नाम का एक मरुस्थल है जिसपर सीधे तौर पर और ना ही आसमान से निगरानी रखा जा सकती है। ऐसी स्थिति में निगरानी या स्थिति पर नजर रखना केवल सैटेलाइट डेटा की मदद से ही संभव है।'&lt;br /&gt;साल 2008 में मेसिनी की टीम ने इन्फ्रा रेड और बहुआयामी तस्वीरों की मदद से पेरु के गहरे मरुस्थल में जाकर प्राचीन अडोब पिरामिड को खोज निकाला था। लेकिन सैटेलाइट की इस तकनीक का और एक महत्वपूर्ण उपयोग है।&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए इराक़ में इसका इस्तेमाल खाड़ी युद्ध से पहले और बाद में प्राचीन स्थलों में हुई लूटपाट के बाद हुए प्रभावों को जानने के लिए किया गया।&lt;br /&gt;मेसिनी का मानना है कि पेरु में एक बड़े क्षेत्रफल में सभ्यता फैला हुई है लेकिन शोध करने के संसाधन कम है। सैटेलाइट तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन से वैज्ञानिक ये भी पता लगा सकते है कि मानव गतिविधियों से इन पुरातात्विक स्थलों पर कोई नकारात्मक प्रभाव हुआ है।&lt;br /&gt;इटली के पुरातत्वविदों का मानना है कि सैटेलाइट के ज़रिए अध्ययन मंहगा है, लेकिन पेरु में पर्यटन राजस्व का तीसरा बड़ा स्रोत है ऐसे में वे इस खर्च की भरपाई कर लेगा।&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://hindi.webdunia.com/samayik-bbchindi/1111212108_1.htm"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;हजारों साल पहले भी खाए जाते थे पॉपकॉर्न!&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक नए शोध में पाया गया है कि उत्तरी पेरू के लोग साधारण अनुमान से 1,000 साल पहले भी पॉपकॉर्न खाया करते थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें पेरू में मकई के फूले हुए दाने मिले हैं, जो कि इस बात का संकेत है कि वहां रहने वाले लोग इसका इस्तेमाल मकई का आटा और पॉपकॉर्न बनाने में करते थे।&lt;br /&gt;वॉशिंगटन के प्राकृतिक इतिहास संग्राहलय के मुताबिक पाए गए मकई के फूले हुए दानों में से सबसे पुराने करीब 6,700 साल पुराने थे। 'स्मिथसोनियन म्यूजम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री' के न्यू वर्ल्ड आर्केलॉजी विभाग की निरीक्षक डोलोर्स पिपर्नो ने कहा कि मैक्सिको में 9,000 साल पहले मकई को जंगली घास के जरिए उगाया जाता था।&lt;br /&gt;उनका कहना था कि उनकी शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि साउथ अमेरिका में मकई के आने के एक हजार साल बाद ये महाद्वीप के दूसरे क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाया गया।&lt;br /&gt;शोधकर्ताओं की टीम को मकई के बालों के अवशेष पारेदोन्स और हुआका प्रीटा नाम के प्राचीन स्थलों पर मिला। हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि उस समय मकई लोगों के आहार का अहम हिस्सा नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-893056559247629599?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/893056559247629599/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=893056559247629599' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/893056559247629599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/893056559247629599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/blog-post_20.html' title='सेटेलाइट की मदद से पेरु के प्राचीन स्थलों की खोज'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-941464214940075047</id><published>2012-01-18T21:29:00.003+05:30</published><updated>2012-01-18T21:29:44.023+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चीन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्रेट वॉल ऑफ चाईना&apos;'/><title type='text'>चीन के ४४००० प्राचीन खंडहर, मंदिर व अन्य सांस्कृतिक स्थल गायब !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&amp;nbsp; &lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;चीन का कहना है कि उसके 44,000 प्राचीन खंडहर, मंदिर और अन्य सांस्कृतिक स्थल गायब हो चुके हैं.देश में धरोहरों की पहली गणना में यह तथ्य सामने आए है, गणना में 20 साल लगे।&lt;br /&gt;पाया गया है कि जिन प्राचीनतम धरोहरो की छाप अभी तक चीन में बची हुई है वो भी विलुप्ति की ओर बढ़ रहे है. क़रीब एक चौथाई तो काफ़ी खराब स्थिति में हैं।&lt;br /&gt;चीन के सरकारी मीडिया ने एक अधिकारी के हवाले से बताया कि इस तरह के बहुत सारे स्थान असुरक्षित थे और उन्हें निर्माण की योजनाओं के तहत गिराया गया था।&lt;br /&gt;चीन के सांस्कृतिक धरोहरों की देखरेख करने वाले विभाग की ओर से कराई गई गणना में सात लाख धरोहरों को पंजीकृत किया गया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;सर्वेक्षण के उप-निदेशक लिउ शियाओ ने सरकारी मीडिया को बताया कि व्यवसायिक प्रयोग के लिए इमारतों के निर्माण से इन अवशेषों को नुकसान पहुँचा है। आंकड़ों के अनुसार टेराकोटा के लड़ाकुओं का क्षेत्र शांक्सी प्रांत सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा जहाँ 3,500 सांस्कृतिक स्थल गायब हुए हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-E9RrGft-CjA/TxbsS_GguQI/AAAAAAAAEN4/fOQiMqpT3Hs/s1600/greatwallchina.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/-E9RrGft-CjA/TxbsS_GguQI/AAAAAAAAEN4/fOQiMqpT3Hs/s1600/greatwallchina.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/china/2011/12/111231_china_temples_ac.shtml"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;"ग्रेट वॉल ऑफ़ चाईना" भी खतरे में&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हालांकि धरोहरों की इस गिनती में किसी इमारत या स्मारक का नाम नहीं लिया गया है।&lt;br /&gt;पत्रकारों के मुताबिक़ 'ग्रेट वॉल ऑफ चाईना' भी घिसाव और अनाधिकृत विकास का सामना कर रही है क्योंकि वहां घूमने गए पर्यटक संरक्षण के नियमों की पाबंदी नही करते है जिसका स्थानीय ग्रामीण व्यवसायिक फ़ायदा उठाते हैं। कहा जाता है कि चीन के किन राजवंश के हिस्से की दीवार पर दो साल पहले कुछ लोगों ने सोने की खोज में छेद कर दिए थे। &lt;a href="http://www.blogger.com/goog_501366783"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;b&gt;(&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/goog_501366783"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;साभार-बीबीस&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;ी&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/china/2011/12/111231_china_temples_ac.shtml"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;b&gt; )&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-941464214940075047?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/941464214940075047/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=941464214940075047' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/941464214940075047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/941464214940075047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/blog-post_18.html' title='चीन के ४४००० प्राचीन खंडहर, मंदिर व अन्य सांस्कृतिक स्थल गायब !'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-E9RrGft-CjA/TxbsS_GguQI/AAAAAAAAEN4/fOQiMqpT3Hs/s72-c/greatwallchina.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-1131114695749326107</id><published>2012-01-03T21:12:00.000+05:30</published><updated>2012-01-03T21:12:01.594+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='‘रामचरित मानस’ ramcharitmanas'/><title type='text'>काशीराज के सरस्वती भंडार कक्ष के लॉकर में रखी है रामचरित मानस की असली पांडुलिपि</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;वाराणसी में पिछले दिनों तुलसीघाट से चोरी गई तुलसीदास रचित रामचरित मानस की पांडुलिपि असली नहीं है। इसका रहस्यमय खुलासा करते हुए गोस्वामी तुलसीदास के मित्र राय टोडर की 14वीं पीढ़ी के सदस्य वयोवृद्ध आनंद बहादुर सिंह द्वारा किए जाने से पूरे मानस परिवार से जुड़े लोग व पुलिस प्रशासन अवाक है। आनंद बहादुर ने अपने भदैनी स्थित आवास&amp;nbsp;पर जनसत्ता&amp;nbsp;के&amp;nbsp;वाराणसी संवाददाता अरविंद कुमार से बातचीत में बताया कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस की 1704 की असली पांडुलिपि काशीराज के सरस्वती भंडार कक्ष के लॉकर में रखी है। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास रामलीला समिति बतौर मंत्री सिंह ने कहा कि तुलसीघाट स्थित हनुमान मंदिर से चोरी गई रामचरित मानस, तुलसीदास रचित पांडुलिपि नहीं है। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पिछले दो सौ वर्ष से घाट पर रामलीला के समय का संचालन जिस मानस पांडुलिपि से किया जाता है उसके तुलसीदास के तिरोधान के 200 वर्ष बाद लिखे जाने के संकेत मिलते हैं। असली पांडुलिपि के अंत में गोस्वामी जी ने पुष्पिका को रेखांकित किए थे। जबकि चोरी गई पांडुलिपि के अंत में पुष्पिका न होने से रचनाकार वर्ष अज्ञात सर्वविदित है। असली रामचरित मानस&amp;nbsp;के चोरी का प्रश्न ही नहीं है। वह काशीराज के सरस्वती भंडार में संग्रहीत है।&amp;nbsp;हालांकि तुलसीघाट स्थित हनुमान मंदिर से दो सौ साल पुरानी मानस पांडुलिपि की तलाश में पुलिस प्रशासन बरामदगी के लिए गंभीर है। जनता को इसमें सहयोग करना चाहिए ताकि सच सामने आ सके। काशीराज संस्करण का मूल पाठ तैयार करने के दौरान आचार्य पं. विश्वनाथ मिश्र के साथ तुलसीघाट पर रखी दोनों पांडुलिपि का अध्ययन किया गया था। प्रकाशित संस्करण का भूमिका में उल्लेख है कि 1704 की प्रति अखाड़े के पूर्ववर्ती महंत लक्ष्मण दास ने काशीराज को हनुमत जयंती के अवसर पर भेंट कर दी थी जो आज भी काशीराज के महल में खास पोथी के नाम से राजमहल के लॉकर में सुरक्षित है, जबकि घाट से चोरी गई पांडुलिपि हनुमान जी प्रतिमा के पास ही गद्दी पर विराजमान रही, जो कि तुलसीदास जी द्वारा रचित नहीं है। &lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के सचिव आनंद बहादुर ने बताया कि उनकी पीढ़ी गोस्वामी जी के समय से ही संकटमोचन मंदिर व हनुमान मंदिर की परंपराओं से जुड़ी हैं। वे खुद भी पूर्व महंत बाकेराम मिश्र के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में कार्य कर चुके हैं। 1947 से ही गोस्वामी तुलसीदास रामलीला की देखरेख कर रहे हैं। उधर संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र ने कहा कि चोरी गई पांडुलिपि तुलसीदास रचित न होने की बाबत प्रशासन को पहले भी अवगत करा चुके हैं।&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; रामचरित मानस की पांडुलिपि के चोरी होने से संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो वीरभद्र मिश्र भी काफी दु:खी हैं। पांडुलिपि की चोरी हो जाने से काशी के डीएम रवींद्र व डीआईजी रामकुमार मौके पर पहुंचकर रामचरित मानस की हनुमान मंदिर से चोरी हो गई मानस की पड़ताल कराने लगे। पुलिस व गुप्तचरों की टीम, दक्षिण भारत के कई जिलों में खोज के लिए भेज दी गई है। इस विषय पर तुलसीघाट व मंदिर से जुड़े डा. विशंभर नाथ मिश्र भी मानस की चोरी हो जाने पर काफी मर्माहित हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;(खबर&amp;nbsp;जनसत्ता&amp;nbsp;से साभार )।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-1131114695749326107?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/1131114695749326107/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=1131114695749326107' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1131114695749326107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1131114695749326107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='काशीराज के सरस्वती भंडार कक्ष के लॉकर में रखी है रामचरित मानस की असली पांडुलिपि'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-1889384876036158833</id><published>2011-12-23T23:08:00.001+05:30</published><updated>2011-12-23T23:10:43.707+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='‘रामचरित मानस’ ramcharitmanas'/><title type='text'>प्राचीन हस्तलिखित ‘रामचरित मानस’ की चोरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4vbAE0AEtmE/TvS8afuS4lI/AAAAAAAAENQ/TdhinDp87KE/s1600/tulsidas.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="476" src="http://4.bp.blogspot.com/-4vbAE0AEtmE/TvS8afuS4lI/AAAAAAAAENQ/TdhinDp87KE/s640/tulsidas.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; गंगा किनारे तुलसीघाट के तुलसी मंदिर से गुरुवार को प्राचीन रामचरित मानस की हस्तलिखित प्रति चोरी हो गई। मंदिर के एक तरफ के द्वार की कुंडी तोड़कर चोर ‘रामचरित मानस’ के दो भागों के अलावा एक वाल्मीकि रामायण और चांदी का एक मुकुट भी साथ ले गए। अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) मानसिंह चौहान ने बताया कि मंदिर के पुजारी दुर्गा शंकर मिश्र की तहरीर पर भेलूपूर थाने में मामला दर्ज किया गया है। पुजारी के मुताबिक, दिन में दस बजे मंदिर खोलते वक्त एक द्वार की कुंडी टूटी हुई मिली। पुजारी की सूचना पर जिलाधिकारी रवींद्र और पुलिस उप महानिरीक्षक राम कुमार भी देर रात मौके पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। डाग स्क्वाड के साथ पुलिस टीम ने चोरों का सुराग पाने की नाकाम कोशिश की।वाराणसी, 23 दिसंबर (भाषा)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-1889384876036158833?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/1889384876036158833/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=1889384876036158833' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1889384876036158833'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1889384876036158833'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/12/blog-post_23.html' title='प्राचीन हस्तलिखित ‘रामचरित मानस’ की चोरी'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-4vbAE0AEtmE/TvS8afuS4lI/AAAAAAAAENQ/TdhinDp87KE/s72-c/tulsidas.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-7768625534656925155</id><published>2011-12-13T22:22:00.001+05:30</published><updated>2011-12-13T22:22:38.166+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुफा मानव'/><title type='text'>मिला सबसे पुराना बिस्तर</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-t61wNQOapnQ/TueCXnS6blI/AAAAAAAAEM4/nmeuz9RaUlM/s1600/old-bed265_1323474253.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/-t61wNQOapnQ/TueCXnS6blI/AAAAAAAAEM4/nmeuz9RaUlM/s1600/old-bed265_1323474253.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp; पुरातत्ववेताओं ने दावा किया है कि उन्होंने बिस्तर के सबसे पुराने साक्ष्य खोज निकाले हैं। जिसमें गुफा मानव मच्छरों को भगाने वाले पौधों का उपयोग करते थे। उनका अनुमान है कि इस बिस्तर पर गुफा मानव करीब 77,000 वर्ष पहले सोया करते थे. डेली मेल की खबर के मुताबिक, जोहान्सबर्ग में यूनिवर्सिटी ऑफ द विटवाटरसैंड के लीन वाडले के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में एक गुफा में पत्तों और तनों से बना एक बिस्तर खोजा है।&lt;br /&gt;सिबुदु खनन क्षेत्र में कम से कम तीन भिन्न सतहों में बिस्तर के साक्ष्य मिले हैं। इस बिस्तरों पर 38 हजार से 77 हजार वर्ष पहले लोग सोया करते थे।&lt;br /&gt;सोने की जगह के अलावा इस बिस्तरों में मच्छर भगाने वाले रसायनों का भी प्रयोग किया गया है ताकि मच्छर दूर रहें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: xx-small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;(साभार-समय लाइव।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-7768625534656925155?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/7768625534656925155/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=7768625534656925155' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7768625534656925155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7768625534656925155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='मिला सबसे पुराना बिस्तर'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-t61wNQOapnQ/TueCXnS6blI/AAAAAAAAEM4/nmeuz9RaUlM/s72-c/old-bed265_1323474253.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-517166067629527560</id><published>2011-11-09T22:52:00.003+05:30</published><updated>2011-11-09T22:57:20.023+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लखनऊ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इमामबाड़ा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अवध के नवाब'/><title type='text'>ढह रही हैं अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतें</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-PVgvLw12wvs/Trq1-QGlauI/AAAAAAAAEJ8/x_AVK7AAXaE/s1600/lucknow.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="131" src="http://4.bp.blogspot.com/-PVgvLw12wvs/Trq1-QGlauI/AAAAAAAAEJ8/x_AVK7AAXaE/s200/lucknow.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;  उत्तर प्रदेश की&amp;nbsp;राजधानी लखनऊ&amp;nbsp;में  अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।  अवध के पहले बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने जो छतरमंजिल बनवाई थी उसका पोर्च मंगलवार को अचानक ढह गया।  आसिफुद्दौला के बनवाए रूमी दरवाजा में  दरार आ गई है तो वाजिद अली शाह के  पिता अमजद अली शाह का मकबरा अतिक्रमण का शिकार है। शाहनजफ इमामबाड़ा के परिसर को शादी ब्याह के लिए भाड़े पर दिया जाता है। शादी ब्याह और पाटिर्यों के चलते यहां शोर शराबा और खाना पीना भी चलता है।  खाना बनाने के लिए भठ्ठियां सुलगती रहती हैं और धुआं  ऐतिहासिक ईमारत को नुकसान पहुंचता है। इसका निर्माण भी बादशाह गाजिउद्दीन हैदर ने 1816-17 में करवाया था। बड़ा इमामबाड़ा परिसर से लेकर छोटा इमामबाड़ा परिसर में  लोगों ने मकान  से लेकर दुकान  तक खोल ली है। यह बानगी है लखनऊ की  ऐतिहासिक ईमारतों की बदहाली की। &lt;br /&gt;मंगलवार को छतरमंजिल का 15 फुट ऊंचा और तीस फुट लंबा पोर्च अचानक गिर जाने के बाद सब की नींद खुली है। यह ऐतिहासिक इमारत है और कई दशक से इसमे सेंट्रल ड्रग रिसर्च सेंटर की प्रयोगशाला चल रही है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के निदेशक राकेश तिवारी के  मुताबिक यह इमारत जर्जर हो चुकी है। सीडीआरआई को करीब एक दशक पहले ही इसकी जानकारी दे दी गई थी पर इसे खाली नहीं किया गया। यह बताता है कि किस तरह ऐतिहासिक धरोहरों की अनदेखी की जा रही है।  नवाबों के वंशज और अभिनेता जाफर मीर अब्दुल्ला ने जनसत्ता से कहा-सरकार तो चाहती है यह सब ऐतिहासिक इमारते गिर जाएं क्योकि वह तो नया इतिहास बना रहे  हैं। उनके स्मारक यहां बन रहे हैं जिनका इस अवध की जमीन से कोई रिश्ता नहीं रहा । जिन लोगों ने अवध का निर्माण किया उनके स्मारक ढह रहे हैं। भारी ट्रैफिक के कारण रूमी दरवाजे में दरार आ चुकी है तो इमामबाड़ा में अतिक्रमण बढ़ रहा है।  सिबटेनाबाद इमामबाड़ा के गेट पर तो सरकार ने ही अतिक्रमण कर लिया है। &lt;br /&gt;जाफर मीर अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट की सांस्कृतिक समिति के सेक्रेट्री जनरल(रिटायर) और स्वीडन में बसे मशहूर वास्तुकला विशेषज्ञ प्रोफेसर सतीश चंद्रा का हवाला देते हुए कहा कि इन ईमारतों का रख रखाव भी ठीक से नहीं हो रहा है।  सतीश चंद्रा का भी यही मानना है कि ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण में जो सामग्री इस्तेमाल की जा रही है उससे काफी नुकसान पहुंच सकता है। इन इमारतों को दुरुस्त करने का काम पोटर्लैंड सीमेंट, सुर्खी, चूना और मौरंग आदि की मदद से किया जा रहा है। इनसे इमारतों की  पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे संकट और बढ़ रहा है। अब्दुल्ला ने आगे कहा-अवध की इन इमारतों की खास बात यही है कि इन इमारतों में जो पोरेसिटी होती है उसी के चलते दीवारों के कान होते है वाला मुहावरा भी मशहूर हुआ और भूल भुलैया में दीवार के एक छोर पर कोई कागज फाड़े तो दूसरे छोर पर आवाज सुनी जा सकती थी। पर इमारतों की मरम्मत के चलते यह पोरेसिटी खत्म हो रही है जिससे इन इमारतों को नुकसान पहुंच रहा है। &lt;br /&gt;एमिटी विश्विद्यालय के आकिर्टेक्ट विभाग के कुछ छात्रों ने  इन इमारतों के हालात का अध्ययन कर कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटाई हैं। अध्ययन के मुताबिक लखनऊ की पहचान रूमी दरवाजा में जो दरार आई है यदि उसे जल्द दुरुस्त नहीं किया गया तो आसिफुद्दौला की यह धरोहर इतिहास के पन्नो से गायब हो जाएगी। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के पिता अमजद अली शाह का मकबरा सिबटेनाबाद हजरत गंज में है। यह  शिया लोगों का महत्त्वपूर्ण स्थल है। यह भवन भी भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के संरक्षित भवनों में से एक है।  इस इमामबाड़े पर लोगों ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे आप किसी मुहल्ले में खड़े हैं। इमामबाड़े में अंदर जाने पर आपको गैस  एजंसी से लेकर चाट की दुकान तक मिल जाएगी। और लोग अतिक्रमण करे तो समझ में आता है सरकारी महकमा भी इस काम में पीछे नहीं है।  हजरत गंज को खुबसूरत बनाने के नाम पर पर इस इमामबाड़े के मुख्य गेट पर बड़ा सा फव्वारा बना दिया गया जिससे अब कोई धार्मिक जलूस आदि भी बाहर नहीं आ सकता। &lt;br /&gt;ऐसी ही स्थिति बड़ा इमामबाड़ा की है । इसको अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने 1784 में बनवाया था। यहां पर भी लोगों ने कब्ज़ा जमा रखा है। इमामबाड़े के बाहर के हिस्से में एक होटल वाले ने कब्ज़ा कर रखा है। बाहर वह ठेला लगाता है व इमामबाड़े के अंदर की तरफ उसकी रसोई है। इमामबाड़े के अंदर की तरफ, मस्जिद के पीछे की तरफ व नीचे लोगों ने अवैध कब्ज़ा जमा रखा है। छोटा इमामबाड़ा  में बाहर- अंदर दोनों जगह लोगों ने  कब्ज़ा कर रखा है। यहां बाकायदा इन परिवारों का चौका चूल्हा जलता है। कहने को तो यह भी पुरातत्त्व विभाग का संरक्षित भवन है पर इसकी देख रेख करने वाला कोई है ऐसा देख कर नहीं लगता। करीब दर्जन भर इमारतें जर्जर हो चुकी हैं। &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( साभार-जनसत्ता,&amp;nbsp;अंबरीश कुमार )&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-517166067629527560?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/517166067629527560/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=517166067629527560' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/517166067629527560'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/517166067629527560'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='ढह रही हैं अवध के नवाबों की ऐतिहासिक ईमारतें'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-PVgvLw12wvs/Trq1-QGlauI/AAAAAAAAEJ8/x_AVK7AAXaE/s72-c/lucknow.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-8794443806708047049</id><published>2011-10-21T17:12:00.000+05:30</published><updated>2011-10-21T17:12:17.415+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ताराडीह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाबोधि मंदिर'/><title type='text'>पुरातात्विक स्थल ताराडीह</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-fOh_x95Zgjs/TqFaWzH0RTI/AAAAAAAAEGs/03PDfWgV9Hw/s1600/taradih.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="239" src="http://2.bp.blogspot.com/-fOh_x95Zgjs/TqFaWzH0RTI/AAAAAAAAEGs/03PDfWgV9Hw/s320/taradih.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बिहार&amp;nbsp;के&amp;nbsp;गया शहर स्थित महाबोधि मंदिर के पश्चिम स्थित पुरातात्विक स्थल ताराडीह का सौंदर्यीकरण होगा. इसके लिए योजना बना कर पर्यटन विभाग को भेजने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;मगध प्रमंडल के आयुक्त विवेक कुमार सिंह ने भी पिछले दिनों इस पर चर्चा की थी और उसके अनुपालन के लिए पर्यटन और कला-संस्कृति विभाग को निर्देश दिया है। ताराडीह भारत का एक मात्र ऐसा उत्खनन स्थल है जहां नव प्रस्तर काल से वर्तमान काल तक के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वर्षे बाद शुरू हुआ प्रयास&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;चार दिसंबर, 2000 को बिहार सरकार के कला,संस्कृति व युवा विभाग ने इसके सौंदर्यीकरण का प्रयास किया था. विभागीय मंत्री अशोक कुमार सिंह बोधगया ताराडीह गौतम वन पुरातत्व परिसर के सौंदर्यीकरण और संरक्षण के कार्ये का शिलान्यास भी किया था, लेकिन 11 वर्ष बीत गये पर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखायी। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रेम दासा ने इस पुरातात्विक स्थल के विकास में रुचि दिखायी थी पर 1993 में उनकी हत्या हो जाने के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यहां मिले हैं ऐतिहासिक अवशेष&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, बिहार अंचल द्वारा1981-82 में इस पुरातात्विक स्थल का उत्खनन डॉ अजीत कुमार सिन्हा के निर्देशन में शुरू हुआ था. यहां से मिले सामान को बोधगया के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है. यहां सात कालों के अवशेष मिले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने महत्वपूर्ण धरोहर को संरक्षित करने के बजाय उन्हें मिट्टी से भर दिया गया है. आज यह स्थल देखरेख के अभाव में मल, मूत्र त्याग और कूड़ा फेंकने का स्थल बन कर रह गया है। यहां हुई खुदाई में तमाम पुरातात्विक चीजें मिली हैं।&lt;br /&gt;&lt;b style="color: #38761d;"&gt;* नव पाषाण युग - पत्थर के मनके, सूई, पत्थर के खिलौने।&lt;br /&gt;* ताम्र युग - धातु की सूई, मनके, बरतन, हांडी।&lt;br /&gt;* कृष्ण-लोहित व कृष्ण मृदभाड - मिट्टी के बरतन, मिट्टी के बने मनुष्य के सिर, मिट्टी की सूई।&lt;br /&gt;* उत्तरी कृष्ण मांजित मृदभांड - हैडल लगे बरतन व चूल्हा।&lt;br /&gt;* कुषाण कालीन - बुद्ध की मूर्ति, पत्थर मनका, धातु की सूई, चूल्हे के अवशेष।&lt;br /&gt;* गुप्त काल - अभिलेखयुक्त बुद्ध की मूर्ति, सिर विहीन मूर्ति, बौद्ध मठ।&lt;br /&gt;* पाल युग - बुद्ध की मूति, बौद्ध मठ ।&lt;/b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;a href="http://www.prabhatkhabar.com/node/74112"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(साभार-प्रभात खबर)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-8794443806708047049?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/8794443806708047049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=8794443806708047049' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8794443806708047049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8794443806708047049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/10/blog-post_21.html' title='पुरातात्विक स्थल ताराडीह'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-fOh_x95Zgjs/TqFaWzH0RTI/AAAAAAAAEGs/03PDfWgV9Hw/s72-c/taradih.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-4045471173282285346</id><published>2011-10-10T17:52:00.002+05:30</published><updated>2011-10-12T15:37:01.180+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानव और कुत्ते'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवाश्म'/><title type='text'>ऐतिहासिक कालीन कुत्तों के अवशेष</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-ooBwT7MKTS4/TpLioto3vbI/AAAAAAAAEGI/T7pZy1Ixoho/s1600/10-ancient-dogs-300.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" src="http://3.bp.blogspot.com/-ooBwT7MKTS4/TpLioto3vbI/AAAAAAAAEGI/T7pZy1Ixoho/s400/10-ancient-dogs-300.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-GG1AQoGXJKM/TpLjUtmEoRI/AAAAAAAAEGQ/vERerFbnVj8/s1600/dog-fossilesss.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="133" src="http://1.bp.blogspot.com/-GG1AQoGXJKM/TpLjUtmEoRI/AAAAAAAAEGQ/vERerFbnVj8/s200/dog-fossilesss.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;ऐतिहासिक समय मे जैविक व्‍यवस्‍थाओ की जानकारी हमको अवशेषो का अध्‍ययन करने से मिलती है। जीवाश्‍म वैज्ञानिको को तीन पूर्व &lt;a href="http://www.blogger.com/%20http://hindi.oneindia.in/news/2011/10/10/remains-of-ancient-dogs-found-london-aid0205.html"&gt;ऐतिहासिक कालीन कुत्‍तो के अवशेष&lt;/a&gt; प्राप्‍त हुए है। वैज्ञानिको का ऐसा अनुमान है कि इस अवशेष से पूर्व ऐतिहासिक कालीन कई महत्‍वपूर्ण जानकारी हमारे सामने निकल कर आएगी।&lt;br /&gt;जीवाश्म वैज्ञानिकों ने पूर्व ऐतिहासिक कालीन तीन कुत्तों के अवशेषों की खोज की है और उनका दावा है कि यह खोज मानव और कुत्ते के बीच की शुरूआती संबंधों को दर्शाने वाला हो सकता है। रायल बेलजियन इंस्टि्टयूट आफ नेचुरल साइंसेज के नेतृत्व वाले दल का दावा है कि मरने के बाद पुरापाषाणकालिक कुत्तों के दिमागों को भी हटाया गया है जो जानवरों की आत्मा को मुक्त करने की मानवीय कोशिश की ओर संकेत करता है।&lt;br /&gt;दिमाग को हटाने के लिए कुत्तों की खोपडि़यों में छेद किया गया है। इस दल के प्रमुख मितजे गेरमोनपरे ने कहा कि उत्तरी क्षेत्र के बहुत सारे लोगों का मानना है मस्तिष्क में आत्मा का निवास होता है। ऐसे ही लोगों में से कुछ व्यक्तियों ने मरे हुए जानवरो की खोपड़ी में छिद्र किया ताकि उसकी आत्मा मुक्त हो सके। डेली मेल के मुताबिक तीसरे कुत्ते के मुंह में बड़ा हड्डी फंसा हुआ है और उसके बारे में जीवाश्म वैज्ञानिकों का मानना है कि मरने के बाद उसके मुंह में किसी व्यक्ति ने रीति रिवाज के तहत ऐसा किया है।&lt;br /&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-4045471173282285346?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/4045471173282285346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=4045471173282285346' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4045471173282285346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4045471173282285346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='ऐतिहासिक कालीन कुत्तों के अवशेष'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-ooBwT7MKTS4/TpLioto3vbI/AAAAAAAAEGI/T7pZy1Ixoho/s72-c/10-ancient-dogs-300.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-7461505111765041724</id><published>2011-09-20T23:56:00.001+05:30</published><updated>2011-09-20T23:56:48.584+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैमूर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rock painting of kaimur'/><title type='text'>कैमूर की पहाड़ियों में मिले मध्य पाषाण काल के कई दुर्लभ अवशेष आज भी उपेक्षित</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;मानव विकास के इतिहास के साक्षी हैं ये शैल चित्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-_rYRsXeVHhI/TnjaX8EYopI/AAAAAAAAEBs/7dCp3yYm2tU/s1600/rock+Painting+kaimur.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="252" src="http://1.bp.blogspot.com/-_rYRsXeVHhI/TnjaX8EYopI/AAAAAAAAEBs/7dCp3yYm2tU/s320/rock+Painting+kaimur.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/--T8_bUEpLmM/TnjakY1654I/AAAAAAAAEBw/WZQ5XCqmZOo/s1600/rock+Painting+kaimur1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="215" src="http://1.bp.blogspot.com/--T8_bUEpLmM/TnjakY1654I/AAAAAAAAEBw/WZQ5XCqmZOo/s320/rock+Painting+kaimur1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;मध्य प्रदेश के भीमबेटका के मध्य पाषाण काल के आसपास के शैल चित्रों (रॉक पेंटिंग) पर दुनिया की नजर पड़ने के बाद यूनेस्को ने इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दे दिया, लेकिन बिहार के रोहतास जिले की कैमूर पर्वतीय शृंखला में हाल ही में मिले मध्य पाषाण काल के शैल चित्रों सहित न जाने ऐसे कितने दुर्लभ अवशेष है, जो आज भी उपेक्षित हैं।&lt;br /&gt;कैमूर की पहाड़ियों और तलहटियों में कुछ पुरातत्व विज्ञानियों, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जानकारों ने जिन शैल चित्रों की खोज की है अभी उससे कहीं अधिक धरोहर अनछुई हैं। एक उत्साही इतिहासकार ने हाल में खोज कर उसे दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: orange;"&gt;इतिहासकार डा श्याम सुंदर तिवारी ने रोहतास में नौहट्टा, तिलौथू और आसपास के क्षेत्र में कैमूर पर्वतीय इलाके में दर्जनों शैल आश्रय (रॉक शेल्टर) में शैल चित्रों की खोज की है। बीएचयू के पुरातत्त्ववेत्ता प्रो बीपी सिंह के साथ सेन्हुआर, पैसरा, खैरडही, नरहन और अगियाबीर जैसे स्थानों पर शैल चित्र के शोध कार्य में सहयोग कर चुके तिवारी मानते हैं कि उन्होंने जिन शैल चित्रों को खोजा है, वे मध्य पाषाण से लेकर नव पाषाण काल के हो सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;तिवारी के अनुसार ये शैल चित्र धाऊ पत्थर को पीस कर पतले ब्रश से उकेरे गए हैं। इससे उस समय के लोगों के चित्रकला कौशल की भी जानकारी मिलती है। यह बात सही भी है कि मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत शृंखला में भीमबेटका में खोजे गए शैल चित्र जिस प्रकार चर्चित हुए, देश में इस प्रकार के कई धरोहरों को वैसा सम्मान नहीं मिल पाया। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र में खोजे गए शैल चित्र भी उन्हीं श्रेणी के हैं, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।&lt;br /&gt;पुरातत्व विज्ञानियों ने पुरापाषाण, मध्य पाषाण और नव पाषाण काल के अवशेषों के लिए विंध्य कैमूर शृंखला और गंगा के मैदानी इलाकों की मानव सभ्यता के इतिहास के प्रमुख स्थलों के रूप में पहचान की है। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र उनमें काफी महत्व रखता है। &amp;nbsp;तिवारी ने जिले के दक्षिणी भाग में कैमूर पहाड़ी पर 21 नए रॉक शेल्टर की खोज की है जो शैल चित्रों के विशाल खजाने साबित हो सकते हैं। कार्बन डेंटिंग पद्धति से कालावधि के बारे में निर्धारण कर इन्हें इनकी सही पहचान देना बहुत जरूरी है। इनके संरक्षण की जरूरत है, क्योंकि इनका लगातार क्षरण हो रहा है।&lt;br /&gt;कैमूर की पहाड़ियों में खोजे गए शैल चित्र मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाए पाषाण चित्रों की तरह अमूल्य है और लगातार इनका क्षरण हो रहा है। ये बिखरे पड़े हैं। इस उत्साही पुरातत्व प्रेमी ने दुर्लभ शैल चित्र वाले रॉक शेल्टर को रोहतास के नौहट्टा के बजरमरवा के धानी बांध जंगल के पास खोज निकाला है।&lt;br /&gt;उन्होंने तिलौथू में फुलवरिया में गड़के और कछुआर की पहाड़ियों में तीन शैल आश्रय में बने शैल चित्रों की खोज की है। इसके अलावा अघौरा प्रखंड के बेचिरागी महाकोल में पांच, बनरमोरा पहाड़ी में दो शैल आश्रयों, दारीहारा में दो, सड़की में तीन, सारोदाग के करमू चौतरा पहाड़ी में दो और तुरवाडीह जंगल में तीन शैल आश्रय मिले हैं। &lt;br /&gt;तिवारी बताते हैं कि शैल आश्रयों में शैल चित्रों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि कैमूर की इन पहाड़ियों में प्राचीन काल में बस्तियां बसी थी, जो अब धरोहर और साक्ष्य के रूप में विशाल चट्टानों पर दर्ज हो चुके हैं। इन्हें गुफाओं में रहने के दौरान मानवों ने अंकित किया है। कैमूर के पर्वतीय क्षेत्रों में मिले इन शैल चित्रों में बाघ जैसे पशु को मानव द्वारा पालतू कुत्तों के जरिए घेरते हुए दिखाया गया है। शैल चित्रों में सूअर, बाघ, बैल आदि पालतू जानवरों को दिखाया गया है। सारोदाग में एक गैंडे का चित्र बना है।&lt;br /&gt;धर्मशालामान में हाथी और उसके बच्चों के भागने और हिरण के शिकार को दर्शाया गया है। वहीं दारीहारा में चनैनमान में एक अज्ञात लिपि भी दिखी है। बंधा गांव के दक्षिण में चनैन मान से मिले शैलचित्र में नाच करते महिला पुरुष और पालतू पशुओं को दर्शाया गया है। इससे पहले रोहतास में सेनुवार, सकास, मलांव और कैमूर के अकोढी आदि गांवों में नवपाषाण काल के अवशेषों की खोज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास और पुरातत्व विभाग ने की थी।&lt;br /&gt;प्रो बीपी सिंह के निर्देशन में हुई खुदाई के बाद रेडियो कार्बन डेटिंग पद्धति से जांच के बाद इन अवशेषों के 2200 से 1950 ईस्वी पूर्व के होने के प्रमाण मिले हैं। सारण के चिरांद में पाए गए नव पाषाण युग के अवशेषों से भी पहले के हैं।&lt;br /&gt;डा तिवारी कहते हैं कि कैमूर की पहाड़ियों में फैले इन शैल चित्रों की खोज का काम 1867 में ब्रिटिश काल में हुआ था। उसके बाद बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के सदस्यों ने कुछ शैल आश्रय की खोज की। 1999-2000 में कर्नल उमेश प्रसाद की अगुआई में भी कुछ शैल आश्रयों पर नजर पड़ी थी।&lt;br /&gt;नई खोजी गई रॉक पेंटिंग्स के बारे में ध्यान दिलाने पर जिलाधिकारी अनुपम कुमार ने कहा कि हजारों साल पुराने शैल चित्र और शैल आश्रय मानव विकास इतिहास के साक्षी हैं। ये धरोहर हैं। कला संस्कृति विभाग को इनके संरक्षण के बारे ध्यान दिलाया जाएगा। &amp;nbsp;(सासाराम, 19 सितंबर (भाषा)।&lt;br /&gt;See Also This Article------ Click On Heading&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://carrick.tribe.net/photos/091c390f-3dc7-4632-9cbc-54358de1427f"&gt;Mesolithic period rock paintings kaimur hills - India&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-7461505111765041724?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/7461505111765041724/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=7461505111765041724' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7461505111765041724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7461505111765041724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='कैमूर की पहाड़ियों में मिले मध्य पाषाण काल के कई दुर्लभ अवशेष आज भी उपेक्षित'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-_rYRsXeVHhI/TnjaX8EYopI/AAAAAAAAEBs/7dCp3yYm2tU/s72-c/rock+Painting+kaimur.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-7735452126009980992</id><published>2011-08-11T23:15:00.000+05:30</published><updated>2011-08-11T23:15:53.052+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हुमायूं का मकबरा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आदिलशाह महल'/><title type='text'>ताजमहल के पहले बना था हुमायूं का मकबरा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-wbqq8rUUTvI/TkQUTHp2NDI/AAAAAAAADxM/A0vczK-sGHI/s1600/The-Gate-of-The-Palace-of-Adil-Shah.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-pEchpQWeY_Y/TkQUKDaLOzI/AAAAAAAADxI/LMmrtrZ7mrw/s1600/humayun-tomb1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="239" src="http://4.bp.blogspot.com/-pEchpQWeY_Y/TkQUKDaLOzI/AAAAAAAADxI/LMmrtrZ7mrw/s320/humayun-tomb1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मुगल शासक हुमायूं का मकबरे को देखकर लगता है कि इस पर गुजरते वक्त की परछाई नहीं पड़ी है। आज भी इस मकबरे का अनछुआ सौंदर्य बेहद प्रभावशाली है। यह मकबरा ताजमहल की पूर्ववर्ती इमारत है। इसी के आधार पर बाद में ताजमहल का निर्माण हुआ। हुमायूं की मौत 19 जनवरी 1556 को शेरशाह सूरी की बनवाई गई दो मंजिला इमारत शेरमंडल की सीढ़ियों से गिर कर हुई थी। इस इमारत को हुमायूं ने ग्रंथालय में तब्दील कर दिया था। मौत के बाद हुमायूं को यहीं दफना दिया गया।&lt;br /&gt;पुरातत्वविद वाईडी शर्मा के मुताबिक, हुमायूं का मकबरा 1565 में उसकी विधवा हमीदा बानू बेगम ने बनवाया था। मकबरे का निर्माण पूरा होने के बाद हुमायूं के पार्थिव अवशेष यहां लाकर दफनाए गए। पूरे परिसर में सौ से अधिक कब्र हैं जिनमें हुमायूं, उसकी दो रानियों और दारा शिकोह की कब्र भी है। दारा शिकोह की उसके भाई औरंगजेब ने हत्या करवा दी थी। विश्व विरासत स्थल में शामिल इसी स्थान से 1857 की क्रांति के बाद ब्रितानिया फौजों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार किया था। फिर निर्वासित कर बर्मा (वर्तमान म्यामां) भेज दिया था।&lt;br /&gt;इतिहासकारों के मुताबिक, हुमायूं के मकबरे के स्थापत्य के आधार पर ही शाहजहां ने दुनिया का आठवां अजूबा ताजमहल बनाया। इसके बाद इसी आधार पर औरंगजेब ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ‘बीबी का मकबरा’ बनवाया, जिसे दक्षिण का ताजमहल कहा जाता है। यह इमारत मुगलकालीन अष्टकोणीय वास्तुशिल्प का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसका इस्लामिक स्थापत्य स्वर्ग के नक्शे को प्रदर्शित करता हैं।&lt;br /&gt;मकबरा परिसर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर ईसा खान की कब्र है। यह कब्र इतनी खूबसूरत है कि अनजान पर्यटक इसे ही हुमायूं का मकबरा समझ लेते हैं। ईसा खान हुमायूं के प्रतिद्वंद्वी शेर शाह सूरी के दरबार में था। इसके अष्टकोणीय मकबरे के आसपास खूबसूरत मेहराबें और छत पर छतरियां बनी हैं। कुल 30 एकड़ क्षेत्र में फैले बगीचों के बीच हुमायूं का मकबरा एक ऊंचे प्लेटफार्म पर बना है, जो मुगल वास्तुकला का शानदार नमूना है। भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर संगमरमर और बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल हुआ। मकबरे में बलुआ पत्थरों की खूबसूरत जाली से छन कर आती रोशनी मानो आंखमिचौली करती है।&lt;br /&gt;हुमायूं का मकबरा एक विशाल कक्ष में है। इसके ठीक पीछे अफसरवाला मकबरा है। कोई नहीं जानता कि यह मकबरा किसने बनवाया, यहां किसे दफनाया गया। इस मकबरे का हुमायूं के मकबरे से क्या संबंध है। हुमायूं के मकबरे के पास ही अरब सराय है। दीवारों से घिरी इस इमारत में हुमायूं के मकबरे के निर्माण के लिए फारस से आए शिल्पकार रहते थे। सिरेमिक की टाइलों से सजी अरब सराय में कई झरोखे और रोशनदान हैं। &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;( साभार-नई दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा)।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-MQb7MXSZz-4/TkQUabTeCRI/AAAAAAAADxQ/tDXrM1YGD0Y/s1600/The-Gate-of-The-Palace-of-Adil-Shah+%25281%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="241" src="http://4.bp.blogspot.com/-MQb7MXSZz-4/TkQUabTeCRI/AAAAAAAADxQ/tDXrM1YGD0Y/s320/The-Gate-of-The-Palace-of-Adil-Shah+%25281%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;प्राचीन गोवा के 16वीं सदी के एक प्राचीन किले का निर्माण किस राजवंश ने किया ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-wbqq8rUUTvI/TkQUTHp2NDI/AAAAAAAADxM/A0vczK-sGHI/s1600/The-Gate-of-The-Palace-of-Adil-Shah.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="241" src="http://1.bp.blogspot.com/-wbqq8rUUTvI/TkQUTHp2NDI/AAAAAAAADxM/A0vczK-sGHI/s320/The-Gate-of-The-Palace-of-Adil-Shah.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;गोवा में विरासतों के संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर मतभेद हैं कि प्राचीन गोवा के 16वीं सदी के एक प्राचीन किले का निर्माण किस राजवंश ने किया। विरासत कार्यकर्ताओं का मानना है कि आदिलशाह महल के प्रसिद्ध द्वार का निर्माण कदंब वंश के हिंदू राजाओं ने करवाया था। लेकिन, एएसआई के अधिकारियों का कहना है कि इसका निर्माण मुसलिम शासक आदिल शाह ने कराया था।&lt;br /&gt;विरासत संरक्षणकर्ता संजीव सरदेसाई का कहना है कि एएसआई ने आदिलशाह महल के द्वार पर इस आशय की एक पट्टिका लगाई है। लेकिन द्वार के दोनों तरफ ग्रेनाइट की जाली में शेर, मोर, फूल और हिंदू देवताओं की आकृति से साफ होता है कि यह हिंदू कदंब राजाओं ने बनवाया है।&lt;br /&gt;पुराने गोवा के सेंट कजेटान चर्च के सामने यह ऐतिहासिक इमारत यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों की सूची में भी शामिल की गई है। एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद डाक्टर शिवानंदा राव का कहना है कि इस इमारत को पुर्तगाली दौर के समय से अधिसूचित किया गया है। कुछ लोग इसके विपरीत दावा कर रहे हैं। जब तक एएसआई इस जगह की खुदाई नहीं करेगा तब तक कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;सरदेसाई ने कहा कि यह अजीब लगता है कि एक मुसलिम शासक अपने किले के प्रवेश द्वार पर हिंदू देवताओं की आकृति बनवाएगा। गोवा हेरिटेज एक्शन ग्रुप के अधिशासी सदस्य और सक्रिय विरासत संरक्षणकर्ता प्रजल शखरदांडे का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में अनेक बार एएसआई के अधिकारियों को पत्र लिखा है। लेकिन अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है। गोवा पर एक समय कदंब वंश का राज था जिसके बाद 1469 से बीजापुर के आदिलशाह ने यहां शासन किया था।&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt; (&amp;nbsp;साभार-पणजी, 11 अगस्त (भाषा)।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-7735452126009980992?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/7735452126009980992/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=7735452126009980992' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7735452126009980992'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7735452126009980992'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/08/blog-post_11.html' title='ताजमहल के पहले बना था हुमायूं का मकबरा'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-pEchpQWeY_Y/TkQUKDaLOzI/AAAAAAAADxI/LMmrtrZ7mrw/s72-c/humayun-tomb1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-2908319151152141666</id><published>2011-08-10T23:08:00.002+05:30</published><updated>2011-08-10T23:33:12.764+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शेरशाह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली का इतिहास'/><title type='text'>दिल्ली के इतिहास का आइना है ‘पुराना किला’</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-F3IlmLuQ7Bk/TkLBcPmFgHI/AAAAAAAADwY/0UdhcPuIMe8/s1600/old-fort-delhi-600.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="230" src="http://3.bp.blogspot.com/-F3IlmLuQ7Bk/TkLBcPmFgHI/AAAAAAAADwY/0UdhcPuIMe8/s320/old-fort-delhi-600.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; दिल्ली का इतिहास जानने के लिए पुराना किले के उत्खनन में मिले अवशेष महत्त्वपूर्ण रहे हैं। इतिहास के मुताबिक पहले मुगल बादशाह बाबर का बेटा हुमायूं 1530 में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा और तीन साल बाद उसने एक शहर ‘दीनपनाह’ की नींव रखी। &amp;nbsp;छह साल बाद शेरशाह सूरी ने&amp;nbsp;&amp;nbsp;हुमायूं&amp;nbsp;&amp;nbsp; को हराकर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा कर लिया और दीनपनाह को नष्ट कर उस स्थान पर नया दुर्ग शेरगढ़ बनवाया। इतिहासकार वाईडी शर्मा ने लिखा है कि 1955 में पुराने किले के दक्षिण पूर्वी भाग में परीक्षण के तौर पर खुदाई हुई, चित्रित भूरे बर्तनों के टुकड़े निकले। इन बर्तनों के बारे में &lt;b&gt;कुछ इतिहासकारों ने अनुमान लगाया कि वे ईसा पूर्व 1000 साल पुराने थे और फिर इस स्थान के महाभारत काल से जुड़े होने की बात को बल दिया गया। &amp;nbsp;सन् 1969 में पूर्वी दीवार में जल द्वार तक जाने वाले रास्ते के साथ उत्खनन फिर शुरू &amp;nbsp;किया गया। यह 1973 तक चलता रहा। इससे मिले चित्रित बर्तन से बस्ती के बारे में तो पता नहीं चला, लेकिन मौर्यकाल से लेकर प्रारंभिक मुगल काल तक के स्तर विन्यास उभरकर सामने आए।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-fXCbTt-6_aQ/TkLA3RZsg5I/AAAAAAAADwU/onqdpoDjAxk/s1600/S_Purana_Qila.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/-fXCbTt-6_aQ/TkLA3RZsg5I/AAAAAAAADwU/onqdpoDjAxk/s320/S_Purana_Qila.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;यह भी तथ्य है कि सन् 1913 तक यहां मजबूत दीवारों से घिरा एक गांव था। इस गांव का नाम इंद्रपत था। &amp;nbsp;इसी आधार पर कुछ लोगों ने यह परिकल्पना की कि पुराने किले इंद्र्रप्रस्थ के अवशेषों पर बना है। वैसे पुराने किले के हर कोने पर बुर्ज और पश्चिम में मजबूत दीवार हैं। इसमें तीन द्वार - हुमायूं दरवाजा, तलाकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा हैं। आजकल लोग बड़ा दरवाजा होकर ही किले के अंदर जाते हैं। दक्षिण का द्वार हुमायूं दरवाजा कहलाता है। इतिहासकार वाईडी शर्मा के मुताबिक तलाकी दरवाजे की अस्पष्ट लिखावट में हुमायूं का जिक्र है जिससे लगता है कि इस द्वार का निर्माण या मरम्मत हुमायूं ने कराई। &amp;nbsp;किले के अंदर स्थित वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने ‘कला ए कुहना’ मस्जिद को शेरशाह ने बनवाया था। पुराने किले के अंदर अब तक बची कुछ इमारतों में से एक इस मस्जिद का मध्य भाग सफेद संगमरमर से बना है, लेकिन शायद इस पत्थर की कमी की वजह से शेष भाग गहरे लाल बलुआ पत्थरों से बनाया गया।&lt;br /&gt;अंदर मेहराबों वाले पांच द्वार हैं। अंदर ही संगमरमर की एक पट्टिका है जिस पर लिखा है - जब तक पृथ्वी पर लोग रहेंगे तब तक यह जगह किसी के नियंत्रण में न रहे और यहां आ कर लोग हमेशा खुश रहें। शेरशाह ने पास में ही दो मंजिली इमारत शेरमंडल का निर्माण कराया था, जिसे देखकर लगता है कि यह एक आरामगाह थी। शेरशाह से अपनी सल्तनत दोबारा हासिल करने के बाद हुमायूं ने इस इमारत को ग्रंथालय में तब्दील कर दिया था। 19 जनवरी 1556 को इसी ग्रंथालय की सीढ़ियों से गिर जाने से उसकी मौत हो गई थी। शेरमंडल के पश्चिम में विशाल हमाम है।&lt;br /&gt;इतिहासकारों के मुताबिक शेरशाह ने पुराना किले का निर्माण अधूरा छोड़ दिया था और जब हुमायूं ने दोबारा सत्ता हासिल की तो इसे पूरा कराया। पुराना किले के सामने 1561 में निर्मित खैरु ल मंजिल मस्जिद है। यहां जिस कक्ष में नमाज पढ़ी जाती है उसके बीच की मेहराब में एक शिलालेख है जिस पर लिखा है कि यह मस्जिद सम्राट अकबर के शासनकाल में उनकी धाय मां माहम अंगा ने बनवाई थी। खैरुल मंजिल मस्जिद के सामने शेरशाह द्वार है जो शायद शेरगढ़ का दक्षिणी द्वार था। लाल पत्थरों से बने इस द्वार को लाल दरवाजा भी कहा जाता है।&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;(साभार--नई दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा)।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-2908319151152141666?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/2908319151152141666/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=2908319151152141666' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/2908319151152141666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/2908319151152141666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/08/blog-post_6401.html' title='दिल्ली के इतिहास का आइना है ‘पुराना किला’'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-F3IlmLuQ7Bk/TkLBcPmFgHI/AAAAAAAADwY/0UdhcPuIMe8/s72-c/old-fort-delhi-600.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-1800625591405574967</id><published>2011-08-10T21:57:00.000+05:30</published><updated>2011-08-10T21:57:31.863+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शाहजहांनाबाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जामा मस्जिद'/><title type='text'>सातवीं दिल्ली की स्थापना मुगल बादशाह शाहजहां ने की</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;भोजीला पहाड़ी पर बनाई गई थी जामा मस्जिद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; सातवीं दिल्ली की स्थापना मुगल बादशाह शाहजहां ने की और इसके लिए 1638 में यमुना के पश्चिम में व सलीमगढ़ किले के दक्षिण में एक ऊंचा स्थल चुना गया। इसके पश्चिमोत्तर भाग को झोजीला पहाड़ी और मध्य भाग को भोजीला पहाड़ी कहा जाता था। भोजीला पहाड़ी पर ही प्रसिद्ध जामा मस्जिद बनवाई गई, जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।&lt;br /&gt;पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक शाहजहांनाबाद को घेरने वाली प्राचीर 1650 में बनी। इसके निर्माण में चार महीने और डेढ़ लाख रुपए लगे थे। पहले यह दीवार पत्थरों से बनाई गई थी लेकिन मिट्टी की चिनाई के कारण यह पहली बारिश के बाद नष्ट हो गई। बाद में इसका पुनर्निर्माण कराया गया और चिनाई चूने से की गई। 27 फुट ऊंची और 12 फुट चौड़ी इस प्राचीर में 30 फुट ऊंची 27 बुर्जियां भी बनवाई गईं लेकिन इसमें तोप चढ़ाने की व्यवस्था नहीं थी।&lt;br /&gt;शहर की योजना सन 1857 तक अपने मूल रू प में मौजूद रही। लेकिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की जीत के बाद शहर और किले का मूल रू प काफी बदल गया। जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा किया तो उन्होंने इस प्राचीर की मरम्मत की और गोलाकार बुर्जियों का आकार बढ़ा कर तोप चढ़ाने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;शाहजहां ने व्यवस्थित आवागमन के लिए प्राचीर में कई छोटे बड़े दरवाजे और खिड़कियां बनवाई थीं। 1857 के विद्रोह से पहले तक यहां चौदह दरवाजे थे लेकिन आज इनमें से केवल चार दरवाजे दिल्ली दरवाजा, तुर्कमान दरवाजा, कश्मीरी दरवाजा और अजमेरी दरवाजा ही शेष हैं। इनका नामकरण शहरों की ओर जाने वाले रास्तों के नाम पर किया गया था।&lt;br /&gt;इतिहासकारों के मुताबिक शाहजहां ने प्राचीर के अंदर कई मस्जिदों, बगीचों, हवेलियों और अन्य भवनों का भी निर्माण कराया था। ऊंचे पदाधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भव्य हवेलियां बनवाईं थीं। प्रमुख हवेलियों में दिल्ली दरवाजे के पास सआदुल्ला खान की हवेली, तुर्कमान दरवाजे के पास मुजफ्फर खान की हवेली, अजमेरी दरवाजे के पास खलीउल्ला खान की हवेली और मीर जुमला की हवेली शामिल थी। शाहजहां की बसाई पुरानी दिल्ली यानी शाहजहांनाबाद को मीर तकी मीर ने ‘आलम ए इंतिखाब’ कहा था। पहले दिल्ली के कई इलाके परकोटों से घिरे थे, जो हमलों से बचाने या शहर से कर एकत्र करने की सुविधा के लिए बनाए गए थे।&lt;br /&gt;सन 1857 में ब्रिटिश सेना विद्रोह को दबाने के लिए सक्रिय हुई। हताशा में सैनिकों ने बहुत तोड़फोड़ की और इस परकोटे का भी बड़ा हिस्सा तोड़ दिया गया। इसके बाद शाहजहांनाबाद एक खुला शहर बन गया। इसका विस्तार पश्चिम में सदर बाजार तक और उत्तर में सिविल लाइंस तक किया गया। रेलवे की योजना बनी तो ट्रेन अंदर आ सके, इसके लिए दीवार का कुछ हिस्सा फिर तोड़ा गया। देश के विभाजन के बाद बड़ी संख्या में शाहजहांनाबाद के लोग पाकिस्तान चले गए और वहां के प्रवासियों ने यहां आ कर उनके मकानों पर कब्जा कर लिया।&lt;br /&gt;आजादी के बाद शाहजहांनाबाद को तेजी से फैलती नई दिल्ली के साथ एकीकृत कर दिया गया। यहां से बिजली का सामान, कपड़ा और अन्य वस्तुएं पूरे उत्तर भारत में जाने लगीं और उन पर ‘द वाल्ड सिटी’ का लेबल लगा होता था। बदलते समय के साथ शाहजहांनाबाद में भी बदलाव हुआ। मकान दुकान में बदले, दुकानें छोटे उद्योगों में बदलीं। हवेलियां हिस्सों में बंट गईं। छोटे-छोटे मकानों और दुकानों के समूह को ‘कटरा’ कहा गया&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;।(साभार-नई दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा)।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-1800625591405574967?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/1800625591405574967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=1800625591405574967' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1800625591405574967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1800625591405574967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/08/blog-post_10.html' title='सातवीं दिल्ली की स्थापना मुगल बादशाह शाहजहां ने की'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-4154757094157116722</id><published>2011-08-09T22:26:00.000+05:30</published><updated>2011-08-09T22:26:30.303+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिरोजशाह तुगलक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली सल्तनत'/><title type='text'>पांचवीं दिल्ली का निर्माण तुगलक शासक फिरोजशाह ने कराया</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के शासक फिरोजशाह ने पांचवीं दिल्ली का निर्माण कराया। &amp;nbsp;पूर्ववर्ती बादशाहों की बनाई इमारतों का जीर्णोद्धार कराया और कई शहरों के नए नाम रखे गए। उन्होंने राजस्व प्रणाली में सुधार भी किया। उनके शासनकाल में महामारी नहीं फैलीं और बाहरी आक्रमण नहीं हुए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक यमुना &amp;nbsp;तट पर फिरोजशाह तुगलक ने 1354 में पांचवीं दिल्ली ‘कोटला फिरोजशाह’ को स्थापित किया और फिरोजाबाद दुर्ग का निर्माण कराया। उन्होंने 38 साल के शासनकाल में दिल्ली के पास 1200 बाग बगीचे लगवाए। फिरोजशाह को वास्तुशिल्प का शौक था और उनकी तुलना रोम के सम्राट अगस्तस से की जाती है। &lt;br /&gt;फिरोजशाह के मुख्य शिल्पकारों मल्लिक गाजÞी सहना और अब्दुल हक्क द्वारा तैयार ‘कुश्क ए फिरोज’ ही उसकी राजधानी फिरोजाबाद कहलाई। यह राजभवन योजना में बहुभुजाकार था, जो लंबाई में आधा मील और चौड़ाई में एक चौथाई मील है। इसमें निर्मित इमारतों में खासमहल, जनाना महल, महल ए बार ए आम, सहन ए मियांनगी (स्तंभयुक्त बरामदा), अंगूरी महल, शाही महल, जामी मस्जिद और बाउली प्रमुख थे। भवन निर्माण के बारे में फिरोजशाह का कहना था &amp;nbsp;- अल्लाह की नियामत से मुझ जैसे एक अदना से बंदे को बहुत सारे तोहफे मिले हैं, जिसमें से एक लोकहित के लिए भवन निर्माण की इच्छा है। इस कारण मैंने कई मस्जिद, मदरसे और सराय बनवार्इं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;एतिहासिक तथ्यों के मुताबिक सम्राट अशोक के दो स्तंभों को फिरोजशाह तुगलक दिल्ली लाए। पहले स्तंभ को टोपरा (अम्बाला) से लाकर जामी मस्जिद के पास लगवाया, जिसे सुनहरी मीनार भी कहा जाता है। दूसरे स्तंभ को मेरठ के पास से लाकर ‘कुश्क ए शिकार’ पर स्थापित किया गया। इसमें अशोक के पाली, प्राकृत और ब्राही लिपि में सात अभिलेख उत्कीर्ण है। इस पर चौहान शासक बीसलदेव, भद्रमित्र और इब्राहीम लोदी के भी अभिलेख उत्कीर्ण हैं। इस स्तंभ में उत्कीर्ण अशोक की राजाज्ञाओं को सबसे पहले 1837 में जेम्स प्रिन्सेप ने पढ़ा। पहले 27 टन भार वाले स्तंभ की ढुलाई के बारे में समकालीन इतिहासकार अफीक ने लिखा है, जिसे 30 सितंबर 1367 में वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया। फिरोज ने इन्हें लाने के बारे में कहा - अल्लाह के रहम से हम इस विशाल स्तम्भ को लाकर फिरोजाबाद की जामी मस्जिद में मीनार के रूप में स्थापित करेंगे और अल्लाह की इच्छा से यह तब तक रहेगा, जब तक विश्व रहेगा।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;फिरोजशाह ने यमुना नदी की दीवार के साथ भव्य मस्जिद बनवाई। यह तीन तरफ खंभेयुक्त गलियारे और पश्चिम की तरफ पूजास्थल से युक्त हैं, जिसमे केवल किबला की दीवार के अवशेष ही बचे हैं। तैमूर इस मजिस्द से इतना प्रभावित हुआ कि उसने समरकंद में 1398 में बीबी खानम की मजिस्द बनवाई जिसके लिए भारत से गए कारीगरों को लगाया गया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इतिहास गवाह है कि फिरोजशाह तुगलक के 38 साल के शासनकाल के बाद वंशानुगत झगड़ों के कारण उसकी सल्तनत 1398 में तैमूर के हमले की शिकार हो गई, जिसके कारण दिल्ली में भारी तबाही हुई।&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt; (नई दिल्ली, 9 अगस्त -भाषा)।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-4154757094157116722?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/4154757094157116722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=4154757094157116722' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4154757094157116722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4154757094157116722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html' title='पांचवीं दिल्ली का निर्माण तुगलक शासक फिरोजशाह ने कराया'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-5514534542511153474</id><published>2011-08-07T23:31:00.000+05:30</published><updated>2011-08-07T23:31:21.145+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उड़नतश्तरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली'/><title type='text'>दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’</title><content type='html'>&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5" width="100%"&gt;&lt;th style="color:blue;background-color:yellow;" rowspan="2"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-१४ )&lt;br /&gt;अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१- दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’&lt;br /&gt;२--बोथनिया की समुद्रतल पर मिली उड़नतश्तरी ?&lt;br /&gt;३- 4 लाख साल पुराना मानव दांत मिला&lt;br /&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’ पहले दो नगरों ‘किला राय पिथौरा’ और ‘सीरी’ को जोड़ने वाला दीवारनुमा अहाता था। इसका निर्माण मंगोल आक्रमण से बचने के लिए कराया गया था। इसका निर्माण तुगलक वंश के शासक जौना शाह यानी मुहम्मद बिन तुगलक ने कराया था। दिल्ली से लगभग साढ़े 14 किलोमीटर दूर पर ये दीवारें दिल्ली-महरौली सड़क को काटती हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-दिल्ली) के उत्तर में, बेगमपुरी मस्जिद के उत्तर में, खिड़की मस्जिद के दक्षिण में, चिराग दिल्ली के उत्तर में और सतपुल के निकट इस नगर के अवशेषों को देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;इतिहासकार वाईडी शर्मा के मुताबिक, 1964-65 में थोड़े पैमाने पर की गई खुदाई के बाद ‘किला राय पिथौरा’ की पूर्वी दीवार के साथ उसके संधि स्थल पर ‘जहांपनाह’ का एक हिस्सा मिला है। खुदाई से निर्माण और विस्तार के तीन स्थानों का पता चलता है। इसकी बुनियाद खुरदरे छोटे पत्थर हैं और जमीन से ऊपरी दीवार तक का हिस्सा चिनाई का है। बीसवीं सदी में दिल्ली में बढ़ते हुए उपनगरों की जरूरतों के कारण इस शहर की पत्थर से निर्मित दीवारों को अब हटाकर दूर फैला दिया गया है। स्थापत्य के लिहाज से खिलजी शासकों ने बादामी पत्थरों के स्थान पर लाल पत्थरों को तरजीह दी थी। तुगलकों ने इसे पूरी तरह बदल दिया। उनकी इमारतों में भूरे पत्थर के सीधे-सादे और कठोरतल, बड़े बड़े कमरों के ऊपर मेहराबी छत, भीतर की ओर ढालू दीवारें, किनारों की तरफ बुर्ज, चार केंद्रीय मेहराबें और खुले भागों पर सरदल होते थे।&lt;br /&gt;शर्मा के मुताबिक, मिट्टी और र्इंटों से बनी मोटी दीवारों के लिए बाहर की तरफ ढालू बनाना जरूरी था। लेकिन वह पत्थर की दीवार के लिए जरूरी नहीं था। इस पद्धति को तुगलकों ने संभवत: सिंध, पंजाब या अफगानिस्तान से लिया था जहां गारे या र्इंटों का इस्तेमाल होता था। बर्नी के मुताबिक, मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में दिल्ली के कोषागार में सबसे अधिक कर संग्रह किया। सुल्तान ने दिल्ली में रहने के दौरान कृषि उत्पादन को बढ़ाने का प्रयास किया और अकाल के दौरान कुंओं का निर्माण करवाया। कृषि के लिए अलग विभाग ‘दीवान-ए-अमीरकोट’ की स्थापना की।&lt;br /&gt;तुगलक को भारतीय उपमहाद्वीप का एक विशाल क्षेत्र शासन करने को प्राप्त हुआ था। उसे राजधानी दक्षिण के दौलताबाद ले जाने और मुद्रा नीति के लिए जाना जाता है। महत्वाकांक्षी सुल्तान ने तुगलकाबाद के दक्षिण पूर्व में 1327 में एक छोटी पहाड़ी पर आदिलाबाद के किले का निर्माण कराया था। इस किले का नाम मुहम्मदाबाद था। लेकिन बाद में इसे आदिलाबाद नाम से जाना जाने लगा। पुरातत्वविदों के मुताबिक, इसकी प्राचीर की सुरक्षा तीन स्तरों बाह्य दुर्ग प्राचीर, गलियारा और अंतर्कोट में थी। इसका निर्माण विशुद्ध रूप से स्थानीय शैली में किया गया है। केंद्र में निर्मित तल का विन्यास आयताकार है। चारों ओर से अनगढ़ पत्थरों की प्राचीर से घिरा हुआ है।&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt; ( नई दिल्ली, 7 अगस्त -भाषा)।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;बोथनिया की समुद्रतल पर मिली उड़नतश्तरी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;लंदन। बोथनिया की खाड़ी में स्वीडन के एक व्यापारी जहाज के मलबे की खोज के दौरान अभियानकर्ताओं ने सोनार किरणों के माध्यम से एक ऐसी रहस्यमय चीज का मलबा खोजने का दावा किया है, जो अज्ञात उड़न तश्तरी (यूएफओ) हो सकती है।&lt;br /&gt;इस रहस्यमय आकार के यूएफओ की खोज स्वीडन और फिनलैंड के बीच स्थित समुद्री हिस्से में करीब 100 मीटर गहराई पर की गई। इस खोज के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दूसरे ग्रह के लोग धरती पर आते रहे हैं।&lt;br /&gt;समाचार पत्र 'डेली मेल' के अनुसार यूएफओ की खोज करने वाले खोजी दल की राय है कि कीचड़ से सने इस वस्तु ने समुद्रतल से हटने का प्रयास किया होगा क्योंकि उसके आसपास हिलने-डुलने के निशान पाए गए हैं।&lt;br /&gt;शराब और शैम्पेन से लदे स्वीडन के डूबे जहाजों की खोज में लगे स्वीडिश विशेषज्ञ पीटर लिंडबर्ग ने इस यूएफओ के मलबे की खोज की। कुछ लोगों का मत है कि इस यूएफओ का आकार स्टार वार्स श्रृंखला की फिल्मों में दिखाए जाने वाली मिलेनियम फाल्कन उड़न तश्तरी से मिलता है, जिसका आकार गोलाकार था।&lt;br /&gt;लिंडबर्ग ने कहा कि यह 60 फुट बड़ा है और इसे आसानी से देखा जा सकता है। बकौल लिंडबर्ग, " इस पेशे में हम अक्सर अजीबोगरीब चीजें देखते हैं लेकिन अपने 18 वर्ष के पेशेवर करियर के दौरान मैंने इस तरह की चीज पहले कभी नहीं देखी।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;4 लाख साल पुराना मानव दांत मिला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तेल अवीव। तेल अवीव विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर मंगलवार को लिखा कि इजराइली शहर रोश हाइन में एक गुफा में चार लाख साल पुराना मानव दांत मिला है। यह प्राचीन आधुनिक मानव का सबसे पुराना प्रमाण है।समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक वेबसाइट पर इसके साथ ही लिखा गया कि अब तक मानव के जिस समय काल से अस्तित्व में होने की बात मानी जा रही थी, यह मानव उससे दोगुना अधिक समय पहले जीवित था। यह दांत 2000 में गुफा में मिला था।&lt;br /&gt;इससे पहले आधुनिक मानव का सबसे प्राचीन अवशेष अफ्रीका में मिला था, जो दो लाख साल पुराना था। इसके कारण शोधार्थी यह मान रहे थे कि मानव कि उत्पत्ति अफ्रीका से हुई थी।सीटी स्कैन और एक्स रे से पता चलता है कि ये दांत बिल्कुल आधुनिक मानवों जैसे हैं और इजरायल के ही दो अलग जगहों पर पाए गए दांत से मेल खाते हैं। इजरायल के दो अलग जगहों पर पाए गए दांत एक लाख साल पुराने हैं।&lt;br /&gt;गुफा में काम कर रहे शोधार्थियों के मुताबिक इस खोज से वह धारणा बदल जाएगी कि मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी।गुफा की खोज करने वाले तेल अवीव विश्वविद्यालय के अवि गाफेर और रैन बरकाई ने कहा कि चीन और स्पेन में मिले मानव अवशेष और कंकाल से हालांकि मानव की अफ्रीका में उत्पत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ी थी, लेकिन यह खोज उससे भी महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-5514534542511153474?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/5514534542511153474/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=5514534542511153474' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5514534542511153474'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5514534542511153474'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='दिल्ली का चौथा नगर ‘जहांपनाह’'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-7599552874586771191</id><published>2011-07-07T18:32:00.017+05:30</published><updated>2011-07-10T19:58:02.841+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='travancore'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='padamnabhswami mandir'/><title type='text'>पद्मनाभ मंदिर में 5 लाख करोड़ का खजाना</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-bK7xSGm6YqA/ThW-l7hjdcI/AAAAAAAADas/AkNAD6SVx2Y/s1600/padmanabha_swam_1309938407.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="296" m$="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-bK7xSGm6YqA/ThW-l7hjdcI/AAAAAAAADas/AkNAD6SVx2Y/s400/padmanabha_swam_1309938407.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-vYMuBS-wWR0/ThW-kzeDkgI/AAAAAAAADao/PRcUjqIfYmg/s1600/padmanabha_swam_1309939503.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" m$="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-vYMuBS-wWR0/ThW-kzeDkgI/AAAAAAAADao/PRcUjqIfYmg/s400/padmanabha_swam_1309939503.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-O45-Zr_qz68/ThWpXkKBBbI/AAAAAAAADaA/zH7gGUpNPwU/s1600/padmanabha_swam_1309938634.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" m$="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-O45-Zr_qz68/ThWpXkKBBbI/AAAAAAAADaA/zH7gGUpNPwU/s400/padmanabha_swam_1309938634.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-REmPUrM6-5U/ThWpgrw4MjI/AAAAAAAADaM/4hmBUgAA4CY/s1600/padmanabha_swam_1309937576.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-uhm38ePjfUo/ThWpdxagupI/AAAAAAAADaI/ZPSmaTOp1rY/s1600/padmanabha_swam_1309937706.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-5-S46SSOO78/ThWpakenBiI/AAAAAAAADaE/7DsEcINmrLs/s1600/padmanabha_swam_1309938407.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-O45-Zr_qz68/ThWpXkKBBbI/AAAAAAAADaA/zH7gGUpNPwU/s1600/padmanabha_swam_1309938634.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-uSigIril7bc/ThWpT6dfa1I/AAAAAAAADZ8/UCCKmhNy1ac/s1600/padmanabha_swam_1309938857.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;img border="0" height="266" m$="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-uSigIril7bc/ThWpT6dfa1I/AAAAAAAADZ8/UCCKmhNy1ac/s400/padmanabha_swam_1309938857.jpg" width="400" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-tpQJFJC26Q4/ThWpQ18yNMI/AAAAAAAADZ4/_XArNo2-fe4/s1600/padmanabha_swam_1309939234.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-JM9iurv3ajs/ThWpNuFL-oI/AAAAAAAADZ0/my0e6Cz-Sog/s1600/padmanabha_swam_1309939503.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर से अब तक मिला खजाना कितने मूल्‍य का है, यह अभी तक सस्‍पेंस ही बना है। मीडिया में तहखाने से मिली चीजों की कीमत 1 लाख करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा बताई जा रही है। लेकिन केरल के पूर्व मुख्‍य सचिव सीपी नायर ने दावा किया है कि खजाना करीब पांच लाख करोड़ रुपये का हो सकता है। &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;ऊपर से नीचे के क्रम में चित्रों के परिचय दिए गए हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; सभी चित्र सहारा समय से साभार लिए गए हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;चित्र संख्या 1-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर से सोने का अब तक का सबसे बड़ा भंडार मिला है. मंदिर से अब तक 1 लाख करोड़ का खजाना मिलने की बात कही जा रही है. फिलहाल खजाने की लिस्ट बनाने का काम जारी है.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;चित्र संख्या 2-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; हिंदुओं के पद्मनाभस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की उपासना होती है. इसके तहखाने में छुपाए गए सोने के खजाने के मिलने के बाद श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया का सबसे अमीर धार्मिक स्थल बन गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;strong&gt;चित्र संख्या 3-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; यह मंदिर त्रावणकोर राजाओं के शासनकाल में 1772 में राजा मार्तण्‍ड वर्मा ने बनवाया था। इस शासन के नियमों के अनुसार मंदिर की संपत्ति पर केंद्र या राज्‍य सरकार का हक नहीं बनता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चित्र संख्या 4-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; खजाने का पता चलने के बाद से मंदिर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई है. पद्मनाभस्‍वामी मंदिर के कुल 6 तहखानों में से 5 तहखाने खोले जा चुके हैं. इनमें से सोना, हीरे, जेवरात, मर्तियां और सिक्‍के मिले हैं. इनकी कीमत लगभग 1 लाख करोड़ आंकी गई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चित्र संख्या 5-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; अब इस बात पर बहस हो रही है कि मंदिर से मिले खजाने को कहां रखा जाए. सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से खजाने का स्रोत और प्राचीनता का पता लगाने का आदेश दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चित्र संख्या 6-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; सरकारी अफसर मंदिर के खजाने की गिनती करने के लिए जा रहे हैं. मंदिर में मिली संपत्ति में भगवान विष्‍णु की हीरे, पन्‍ने और रूबी जड़ी 3.5 फुट ऊंची मूर्ति है. इसके अलावा 35 किलों की 18 फुट लंबी एक चेन भी बरामद हुई है. तहखाने में से 1 फुट लंबी एक और मूर्ति भी मिली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चित्र संख्या 7-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; सरकारी अफसर मंदिर के खजाने की गिनती करने के लिए जा रहे हैं. मंदिर में मिली संपत्ति में भगवान विष्‍णु की हीरे, पन्‍ने और रूबी जड़ी 3.5 फुट ऊंची मूर्ति है. इसके अलावा 35 किलों की 18 फुट लंबी एक चेन भी बरामद हुई है. तहखाने में से 1 फुट लंबी एक और मूर्ति भी मिली है. राज परिवार के सूत्रों का कहना है कि चेंबर बी के मुख्य द्वार पर सांप का बना होना यह दर्शाता है कि इसे खोलना अशुभ होगा. सूत्रों ने कहा जांच कमेटी भी इसे नहीं खोलेगी क्योंकि इसके साथ मंदिर की काफी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. एक मान्यता के अनुसार चेंबर बी के नीचे एक सुरंग है जो समुद्र तक जाती है. इस बीच मंदिर और इसके आसपास 24 घंटे का पहरा जारी है. &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-dHP9N25ZTeQ/ThW-o5CXv9I/AAAAAAAADa0/CtXCClDl3tA/s1600/padmanabha_swam_1309937576.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="295" m$="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-dHP9N25ZTeQ/ThW-o5CXv9I/AAAAAAAADa0/CtXCClDl3tA/s400/padmanabha_swam_1309937576.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-7599552874586771191?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/7599552874586771191/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=7599552874586771191' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7599552874586771191'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7599552874586771191'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/07/5.html' title='पद्मनाभ मंदिर में 5 लाख करोड़ का खजाना'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-bK7xSGm6YqA/ThW-l7hjdcI/AAAAAAAADas/AkNAD6SVx2Y/s72-c/padmanabha_swam_1309938407.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-8552216551732242318</id><published>2011-06-20T18:11:00.000+05:30</published><updated>2011-06-20T18:11:19.929+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनारगढ़ में चन्द्रकांता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिरामिड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गायकवाड़ राजपरिवार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोनालीसा'/><title type='text'>सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;th rowspan="2" style="background-color: yellow; color: blue;"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-14 )&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1-सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड&lt;br /&gt;2-बूढ़ा हो गया है चुनारगढ़ में चन्द्रकांता का किला!&lt;br /&gt;3-  500 साल बाद मिली मोनालीसा की मॉडल की खोपड़ी&lt;br /&gt;4-लक्ष्मी विलास पैलेस है बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़!&lt;/span&gt;&lt;/th&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैटेलाइट के ज़रिए किए गए एक नए सर्वेक्षण से लुप्त हो चुके 17 पिरामिडों और एक हज़ार से अधिक ऐसे मक़बरों का पता चला है जिसकी अब तक खुदाई नहीं की गई है.ये सर्वेक्षण नासा के सहयोग से एक अमरीकी प्रयोगशाला की ओर से किया गया है.इसमें उच्च स्तरीय इंफ़्रा-रेड तकनीक का उपयोग किया गया जिससे भूमिगत वस्तुओं की तस्वीरें हासिल की जा सकती हैं.मिस्र के अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक के उपयोग से प्राचीन स्मारकों को बचाने में सहायता मिलेगी क्योंकि इसके ज़रिए ये पता लगाया जा सकता है कि उनकी खुदाई करके वहाँ लूट तो नहीं हो गई है.&lt;br /&gt;अलाबामा यूनिवर्सिटी की एक टीम ने सैटेलाइट से लिए गए उन तस्वीरों का अध्ययन किया जो इंफ़्रा-रेड कैमरों की मदद से खींची गई थीं.इससे ज़मीन के भीतर मौजूद चीज़ों का पता लगाया जा सकता है.शोध कर रही टीम ने जिस सैटेलाइट का उपयोग किया वह पृथ्वी की सतह से 700 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा कर रहा है लेकिन इसके कैमरे इतने शक्तिशाली हैं कि वे पृथ्वी की सतह पर एक मीटर के व्यास में मौजूद चीज़ों की तस्वीरें ले सकते हैं.सैटेलाइट पुरातत्वविदों ने मिट्टी से बने कई इमारतों का पता लगाया है जिनमें पिरामिड के अलावा कुछ मिस्र के पुराने मकान हैं, धर्म स्थल हैं और मक़बरें हैं.उनका कहना है कि आसपास की मिट्टी से ज़्यादा घनत्व वाले ढाँचों के आधार पर इनकी पहचान की गई है.अब तक एक हज़ार से ज़्यादा मक़बरे और तीन हज़ार पुरानी इमारतों का अब तक पता लगाया जा चुका है.&lt;br /&gt;आरंभिक खुदाई से इस शोध में मिली कुछ जानकारियों की पुष्टि भी हो गई है.जिसमें सक़्क़ारा में ज़मीन में दबे गए दो पिरामिड शामिल हैं.जब शोध कर रहा दल वहाँ पहुँचा था तो कम ही लोगों को भरोसा था कि वहाँ कुछ मिलेगा लेकिन खुदाई शुरु हुई तो इन पिरामिडों का पता चला. अब संभावना व्यक्त की जा रही है कि ये मिस्र के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्मारकों में से एक साबित हो सकते हैं. डॉ सारा पारकैक बरमिंघम और अलाबामा स्थित प्रयोगशालाओं में नासा के सहयोग से इस परियोजना पर काम कर रही हैं.&lt;br /&gt;उन्होंने सैटेलाइट से मिली तस्वीरों की मदद से पुरातात्विक सर्वेक्षण के काम की शुरुआत की है. वे कहती हैं, "हम एक साल से भी अधिक समय से शोधकार्य में लगे हुए थे. मैं सैटेलाइट से मिल रही जानकारियों को देख रही थी लेकिन 'वाह' कहने वाला क्षण उस समय आया जब हमने एक क़दम पीछे हटकर सारी सामग्री को देखा. हमे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हमने मिस्र में इतनी चीज़ों का पता लगा लिया है."&lt;br /&gt;वे मानती हैं कि ये तो शुरुआत भर है. वे कहती हैं, "जिसका हमने पता लगाया है वो तो सतह के क़रीब हैं. इसके अलावा हज़ारों ऐसे स्थान हो सकते हैं जो नील नदी की गाद में दब गए होंगे." डॉ सारा पारकैक कहती हैं कि सबसे अद्भुत क्षण तानिस में आया. वे बताती हैं कि खुदाई में एक तीन हज़ार साल पुराना मकान निकला जिसका पता सैटेलाइट की तस्वीरों से मिला था और सब चकित रह गए जब मकान और तस्वीर में समानता मिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;बूढ़ा हो गया है चुनारगढ़ में चन्द्रकांता का किला!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;http://khabar.ibnlive.in.com/news/54017/9&lt;br /&gt;मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर के चुनार में रहस्य, रोमांच, विस्मय और जादू की रोमांचक दास्तानों से भरपूर किवदंतियों एवं लोककथाओं के लिए विख्यात देश का अनोखा चन्द्रकांता का चुनारगढ़ का किला बूढ़ा हो गया है। गढ़ की दीवारें, प्राचीरें और चट्टानी जीवट वाले बुर्ज शताब्दियों से समय के निर्मम थपेड़ों की चोट झेलते-झेलते अब जर्जर हो चुकी है। समय के साथ अब इसकी चोट सहने की शक्ति लगभग खत्म हो रही है।&lt;br /&gt;राजा भर्तहरी की तपोस्थली व हिन्दी के पहले उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री की तिलिस्म स्थली चुनारगढ़ अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है और इस ओर किसी का ध्यान नही है। उत्तर भारत के शासकों के जय-पराजय का हमराज किसी समय ध्वस्त हो सकता है। हिन्दुओं की पवित्र धार्मिक नगरी वाराणसी जाने के लिए गंगा के लिए मार्ग प्रशस्थ करने वाले विंध्य पर्वत पर चरण आकार वाले इस किले का प्राचीन नाम चरणाद्रिगढ़ रहा है।&lt;br /&gt;यदि विंध्याचल पर्वत नहीं होता तो गंगा वाराणसी की ओर न जाकर दक्षिण दिशा की ओर जाती। गंगा पर पुस्तक लिखने वाले विद्वानों ने अपनी पुस्तकों में इसका उल्लेख किया है। इतिहासकारों के अनुसार उत्तर भारत के प्रत्येक शासकों की दिलचस्पी चुनार के किले पर कब्जा जमाने की रही है। जिस विजेता का शासन दिल्ली से बंगाल तक हो जाता था उसके लिए चुनार का किला एक महत्वपूर्ण पड़ाव हो जाता था। इसके अतिरिक्त जलमार्ग से इस किले तक पहुंचना भी काफी आसान होता था।&lt;br /&gt;मिर्जापुर के तत्कालीन कलक्टर द्वारा 18 अप्रैल सन 1924 को दुर्ग पर लगाये एक शिलापत्र पर उत्कीर्ण विवरण के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद इस किले पर 1141 से 1191 ई. तक पृथ्वीराज चौहान, 1198 में शहाबुद्दीन गौरी, 1333 से स्वामीराज, 1445 से जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की, 1512 से सिकन्दर शाह लोदी, 1529 से बाबर, 1530 से शेरशाहसूरी और 1536 से हुमायूं आदि शासकों का अधिपत्य रहा है। शेरशाह सूरी से हुए युद्ध में हुमायूं ने इसी किले में शरण ली थी।&lt;br /&gt;जहां तक इस किले के निर्माण का सम्बंध है कुछ इतिहासकार 56 ईपू में राजा विक्रमादित्य द्वारा इसे बनाया गया मानते हैं। कुछ इतिहासकार इसके निर्माण वर्ष पर अपनी मान्यता प्रदान नहीं करते। शेरशाह सूरी ने चुनार के दुर्ग का महत्व बेहतर समझा। चुनार से बंगाल तक सूरी के शासनकाल में कोई अन्य किला नहीं था। हालांकि बाद में शेरशाह ने बिहार के सासाराम में एक किले का निर्माण खुद कराया।&lt;br /&gt;शेरशाह सूरी के पश्चात 1545 से 1552 तक इस्लामशाह, 1575 से अकबर के सिपहसालार मिर्जामुकी और 1750 से मुगलों के पंचहजारी मंसूर अली खां का शासन इस किले पर था। तत्पश्चात 1765 ई. में किला कुछ समय के लिए अवध के नवाब शुजाउदौला के कब्जे में आने के बाद शीघ्र ही ब्रिटिश आधिपत्य में चला गया। शिलापट्ट पर 1781 ई में वाटेन हेस्टिंग्स के नाम का उल्लेख अंकित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस किले पर उत्तर प्रदेश सरकार का कब्जा है।&lt;br /&gt;किले की ऐतिहासिकता का विवरण अबुलफजल के चर्चित आईने अकबरी में भी मिलता है। फजल ने इसका नाम चन्नार दिया है। लोकगाथाओं में पत्थरगढ़, नैनागढ़, चरणाद्रिगढ़ आदि नामों से जाने जानेवाला यह किला किवंदतियों के अनुसार विक्रमादित्य ने अपने भाई भतृहरि के लिए बनवाया था। विलासिता व भोग के जीवन से विरक्त भतृहरि ने यही तप साधना की थी। दुर्ग में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है। हालांकि तमाम इतिहासकार इसे मान्यता नहीं देते हैं पर मिर्जापुर गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है।&lt;br /&gt;गजेटियर में संदेश नामक राज का सम्बन्ध का भी उल्लेख है। माना जाता है कि महोबा के वीर बांकुरे आल्हा का विवाह इसी किले में सोनवा के साथ हुआ था। सोनवा मण्डप आज भी किले में मौजूद है। ऐतिहासिक एवं रहस्य रोमांच का इतिहास अपने हृदय में समेटे इस किले का इस्तेमाल फिलहाल पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र के रुप में किया जा रहा है। लिहाजा पर्यटक इस किले के दीदार से वंचित रह जाते हैं।&lt;br /&gt;पर्यटन को बढ़ावा देने का ढिढोरा पीटने वाली सरकारों का इस ओर ध्यान नही है दुर्ग जगह-जगह से दरक रहा है। यह ऐतिहासिक धरोहर किसी भी समय ध्वस्त हो सकता है। भले ही चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के लोकप्रिय धारावाहिक चन्द्रकांता के बाद इसी नाम से एक और टेलीविजन धारावाहिक का प्रदर्शन शुरू होने वाला हो पर सरकार का ध्यान इस किले को बचाने की ओर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;500 साल बाद मिली मोनालीसा की मॉडल की खोपड़ी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फ्लोरेंस। पुरातत्वविदों को इटली के फ्लोरेंस शहर में एक खोपड़ी का कंकाल मिला है। ऐसा माना जा रहा है कि यह खोपड़ी उसी महिला की है जो चित्रकार लियोनार्दो दा विंची की मोनालीसा कृति के लिए उनकी मॉडल बनी थी। यह कंकाल 500 साल पुराना है।&lt;br /&gt;समाचार एजेंसी एकेआई के मुताबिक रेशम व्यापारी फ्रासेंस्को डेल गियोकोंडो की पत्नी लीसा ज्योर्जियो का शव सेंट ऑरसोला में दफनाया गया था। उनकी जुलाई 1542 में 63 वर्ष की आयु में मौत हो गई थी। पुरातत्वविदों ने पिछले महीने ही सेंट ऑरसोला में खुदाई शुरू की थी। बोलोग्ना विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद ज्योर्जियो ग्रुपियोनी का कहना है कि एक कब्र की खुदाई की गई थी, जिसमें एक महिला की खोपड़ी व श्रोणी के हिस्से मिले।&lt;br /&gt;जब इस खोपड़ी के टूटे हुए हिस्सों को जोड़ा गया तो जो आकृति बनी वह मोनालीसा की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग से मिलती-जुलती है। अब इतिहासकार इस महिला के डीएनए की तुलना फ्लोरेंस के सैंटिसिमा एनुन्जिएंटा गिरजाघर में दफनाए गए उसके दोनों बच्चों के डीएनए से करेंगे।&lt;br /&gt;ज्यादातर आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि लियोनार्दो की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग मोनालीसा के लिए ज्योर्जिया ही मॉडल बनी थी, जो बाद में अपने पति की मौत के बाद नन बन गई थीं। वैसे कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लियोनार्दो की यह कृति कई चेहरों का सम्मिलित रूप थी।&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-iozIYnj9FCk/Tf8_oILj5VI/AAAAAAAADUY/EC3rLvC3n7o/s1600/raj_laxmi_palace_1506.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="http://1.bp.blogspot.com/-iozIYnj9FCk/Tf8_oILj5VI/AAAAAAAADUY/EC3rLvC3n7o/s320/raj_laxmi_palace_1506.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;लक्ष्मी विलास पैलेस है बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वडोदरा। वडोदरा के गायकवाड़ राजपरिवार को पूरे गुजरात में काफी सम्मान से देखा जाता है। अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद इस राजपरिवार ने वडोदरा के विकास से लेकर सामाजिक और आर्थिक सुधारों से जुड़े कई कार्यक्रम चलाए।&lt;br /&gt;वडोदरा के लक्ष्मी विलास पैलेस का निर्माण 1890 में महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के वक्त हुआ था। तब से लेकर अभी तक राजपरिवार का मुख्य ठिकाना यही है। एक जमाने में वडोदरा स्टेट पर गायकवाड़ राजपरिवार की हुकूमत चलती थी। लक्ष्मी विलास पैलेस और उसके आसपास के 700 एकड़ का इलाका राजपरिवार के नाम है। बताया जाता है कि लक्ष्मी विलास पैलेस ब्रिटिश राजघराने के महल बकिंघम पैलेस से 4 गुना बडा़ है। इस महल के दायरे में एक म्यूजियम, एक क्रिकेट ग्राउंड, इनडोर टेनिस कोर्ट और बैडमिंटन कोर्ट मौजूद है।&lt;br /&gt;महल के पास की जमीन पर एक गोल्फ कोर्स और चिड़ियाघर भी बनाया गया है। राजपरिवार के बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल से लेकर लक्ष्मी विलास पैलेस तक एक रेल लाइन बिछाई गई थी। फिलहाल इस राजपरिवार के सबसे बड़े भाई रंजीत सिंह यहां अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनको इस राजघराने में महाराजा का दर्जा हासिल है। लक्ष्मी विलास पैलेस के अलावा वडोदरा में दो और महल- मकरपुर पैलेस और प्रताप विलास पैलेस इस मराठा राजपरिवार के नाम है।&lt;br /&gt;भारत की आजादी से पहले इस राजपरिवार ने वडोदरा स्टेट में शिक्षा और टेक्सटाइल इंडस्ट्री के विकास में अहम भूमिका निभाई थी। बाल विवाह पर रोक, छूआछूत मिटाने और संस्कृत के विकास में भी वडोदरा राजपरिवार का खास योगदान माना जाता है। 1908 में बैंक ऑफ बड़ौदा की नींव भी इसी राजपरिवार के सहयोग से डाली गई थी जो आज भी देश के बड़े बैंकों की सूची में शामिल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-8552216551732242318?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/8552216551732242318/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=8552216551732242318' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8552216551732242318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8552216551732242318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/06/17.html' title='सैटेलाइट ने ढूँढे 17 और पिरामिड'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-iozIYnj9FCk/Tf8_oILj5VI/AAAAAAAADUY/EC3rLvC3n7o/s72-c/raj_laxmi_palace_1506.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-5139310246910616416</id><published>2011-04-17T17:44:00.000+05:30</published><updated>2011-04-18T18:52:26.359+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जहाँगीर का चित्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जाब चार्नक'/><title type='text'>कोलकाता की खोज करने वाले जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;th rowspan="2" style="background-color: yellow; color: blue;"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-13 )&lt;br /&gt;अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;१-चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील &lt;br /&gt;२-नेपाल ने भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की&lt;br /&gt;3-10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र &lt;/b&gt;&lt;/th&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मान्यता थी कि कोलकाता के संस्थापक जाब चार्नक थे। कोलकाता हाईकोर्ट में इतिहासकारों की दायर एक याचिका में अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर संस्थापक की मान्यता पर रोक लगा दी। &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;( पूरा विवरण इस पीडीएफ से पढ़ें -बेदखल हुए जाब चार्नाक&amp;nbsp; ) &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-dSpN3zRjo4c/Taw6l1X6TDI/AAAAAAAADJQ/jMqUojvlRtI/s1600/kolkata+history.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-dSpN3zRjo4c/Taw6l1X6TDI/AAAAAAAADJQ/jMqUojvlRtI/s320/kolkata+history.jpg" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अब भी लोग कोलकाता की खोज का श्रेय उन्हें ही देते हैं। कोलकाता की खोज करने वाले जॉब चार्नक तीन सौ साल पहले हावड़ा जिले के उलबेड़िया पहुंचे थे। तब यहां मुगल साम्राज्य कायम था। इतिहास का ज्यादातर हिस्सा भले ही नष्ट हो गया हो, लेकिन लोग आज भी कोलकाता के साथ चार्नक को जरूर याद करते हैं। हालांकि हावड़ा वालों को और खास करके उलबेड़िया के लोगों को यह याद नहीं है कि कभी इतिहास पुरुष चार्नक उनके इलाके में भी रहते थे। महीनों तक हावड़ा जिले में रहने वाले चार्नक के मकान की दशा देख कर खंडहर भी सोचेगा कि उसकी हालत कुछ बेहतर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकान के तौर पर महज ढाई टूटे हुए खंभे और कुछ ईट-पत्थर ही शेष बचे हैं। पास में रहने वाले गोपाल दास के मुताबिक किसी जमाने में साहेब बाड़ी के तौर पर प्रसिद्ध मकान को लोग नीली कोठी के नाम से जानते थे। बचपन में सुना था कि वे यहां रहते थे। इससे ज्यादा कुछ पता नहीं है। मकान के आसपास जरूर दूसरे भवन बन चुके हैं। &lt;br /&gt;उलबेड़िया के इतिहासकार असित हाजरा के मुताबिक हेमेंद्र बनर्जी के हावड़ा इतिहास और सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि 1687 में चार्नक उलबेड़िया आए थे। वे यहां औद्योगिक केंद्र की स्थापना करना चाहते थे। इस बारे में ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल काउंसिल को सिफारिश भी की थी। &lt;br /&gt;उनका कहना है कि इतिहास के पन्नों से यह जानकारी भी मिलती है कि व्यापारिक कारणों से नवाब के लठैतों ने चार्नक को जमकर पीटा भी था। इसके बाद 24 अगस्त 1690 की दोपहर उन्होंने इलाके को सदा के लिए अलविदा कह दिया और यहां से कूच कर गए। तीन साल तक अंग्रेज बहादुर इलाके में रहे और इसके लिए उन्होंने एक मकान बनवाया था,जिसे लोग साहेब बाड़ी भी कहते थे। लगभग 20 साल पहले यहां एक विशाल दीवार और दरवाजे के हिस्से दिखाई देते थे, लेकिन अब सब कुछ गायब हो गया है। उनका कहना है कि यहां से वे सूतानूटी गए। अगर यहीं बस जाते तो आज कोलकाता नहीं होता और उसकी जगह उलबेड़िया ही विश्व व्यापार का केंद्र बन चुका होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थानीय लोगों की बात तो छोड़िए उलबेड़िया नगरपालिका के चेयरमैन देवदास घोष यह सुनकर हैरत में पड़ जाते हैं कि सचमुच चार्नक उनके इलाके में आकर ठहरे थे। इसी तरह हाटकालीगंज इलाके में चार्नक के मकान से महज 50 मीटर की दूरी पर रहने वाले एक दुकानदार सवाल पूछते हैं कि सचमुच चार्नक कभी यहां रहते थे, ऐसा तो उन्होंने कभी किसी से नहीं सुना जबकि वे सालों से यहां रह रहे हैं। (साभार-जनसत्ता)।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://hamaravatan.blogspot.com/2007/12/blog-post_24.html"&gt;यह भी पढ़िए- कोलकाता को किसने बसाया &lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;भारत में बुद्ध के जन्म स्थान होने की बात खारिज की&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेपाल ने पड़ोसी भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी की अनुकृति बनाए जाने की खबरों को खारिज किया है और कहा कि जापान और युनेस्को द्वारा शुरू की गई संरक्षण परियोजनाओं के कारण नेपाल में बुद्ध के पवित्र जन्म स्थान की मान्यता बरकरार रहेगी।नेपाल के संस्कृति मंत्रालय के सचिव मोद राज दोत्तेल ने कहा कि युनेस्को ने 1997 में लुम्बिनी को बुद्ध की जन्मस्थली बताते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि भारत युनेस्को के घोषणा पत्र को मानने वाले 200 देशों में से एक है। बुद्ध भला दो स्थानों पर जन्म कैसे ले सकते हैं। नेपाल का लुम्बिनी ही वह स्थान है, जहां उनका जन्म हुआ था। पुरातत्वविदों का कहना है कि बुद्ध के दक्षिणी नेपाल के राजवंश में पैदा लेने का सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय सम्राट अशोक द्वारा 249 ईसा पूर्व में लुम्बिनी की यात्रा के दौरान यहां स्थापित किए गया शिलालेख है, जिसपर लिखा है, "ईश्वर के प्रिय राजा पियादशी (अशोक) ने अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में खुद बुद्ध साक्यमुणि के जन्मस्थान की राजकीय यात्रा की, उन्होंने यहां शिला लगवाई.. और लुम्बिनी गांव पर लगने वाला कर घटा दिया।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुम्बिनी के बुद्ध का जन्म स्थान होने का एक अन्य ऐतिहासिक प्रमाण वह पाषाण चित्र है, जो नेपाली राजा रिपु मल्ला के आदेश पर बनाया गया था। रिपु मल्ला ने 1312 ईस्वी में लुम्बिनी की तीर्थयात्रा के समय इस चित्र बनाने का आदेश दिया था। इसमें बुद्ध की माता और महारानी एक हाथ से एक पेड़ को पकड़ी हुई है, जबकि उसके बगल में एक नवजात शिशु एक कमल की पंखुड़ी पर खड़ा है। यह पाषाण शिल्प अपने निर्माण के समय से ही इस स्थान पर लगा हुआ है। यहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालु सम्राट अशोक द्वारा लगवाए गए शिलाओं और पाषाण चित्र को दूध और जल से नहलाते हैं। जापान सरकार के खर्च पर इन शिलाओं और पाषाण शिल्प के संरक्षण की एक परियोजना चलाई जा रही है। माना जाता है कि बुद्ध का जन्म 623 ईसा पूर्व में हुआ था, लेकिन 624 ईसा पूर्व से 560 ईसा पूर्व के बीच कुछ और तिथियों का भी उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुम्बिनी में अभी अनेक बौद्ध मठ चल रहे हैं और यह वर्तमान दक्षिणी नेपाली जिला रुपनदेही में स्थित है। यहां से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिलौराकोट को बुद्ध के समय के कपिल वस्तु की राजधानी माना जाता है। इधर कुछ रिपोर्टों में हालांकि उत्तर प्रदेश के पिपराहवा को तत्कालीन कपिलवस्तु की राजधानी बताया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के एक जिले का नाम सिद्धार्थ नगर होने और यहां लुम्बिनी तथा तिलौराकोट की अनुकृति बनाने की खबरों से नेपाल के नागरिकों को चिंता हो रही है कि इससे तीर्थयात्रियों में यह भ्रम फैल सकता है कि बुद्ध का जन्म भारत में हुआ था। &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( काठमांडो-एजंसियां )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;10 करोड़ में नीलाम हुआ जहाँगीर का चित्र &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगल शासक जहाँगीर का आदमकद चित्र 10 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ। यह अब तक के ज्ञात बड़े मुगल चित्रों में एक है। सत्तरहवीं सदी का यह चित्र बोन्हमास इंडियन एवं इस्लामिक नीलामी घर में मंगलवार को नीलाम हुआ। स्वर्ण एवं वाटरकलर से बने इस चित्र में जहांगीर ने स्वर्णजड़ित सिंहासन पर आसीन हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीलामीघर क प्रमुख एलीस बेली ने कहा कि यह 17 वीं सदी का दुलर्भतम एवं वांछित चित्र है और इस काल का ऐसा कोई चित्र नहीं है जो नीलाम हुआ हो। इस प्रकार की कोई दूसरी कलाकृति ज्ञात नहीं है और इसके महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता है। यह कलाकृति मध्य पूर्व के संग्रहालय द्वारा खरीदी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेली ने कहा कि इस चित्र से के असाधारण विवरण और जटिलता दर्शकों को मोह लेती है। हम इसे बेचकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि यह 1617 के आसपास की तस्वीर है और जब जहाँगीर मांडू में थे तब इसे चित्रकार अबुल हसन ने बनाया था। &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( नई दिल्ली, बुधवार, 6 अप्रैल 2011 -भाषा )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-5139310246910616416?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/5139310246910616416/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=5139310246910616416' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5139310246910616416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5139310246910616416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='कोलकाता की खोज करने वाले जाब चार्नक का मकान खंडहर में तब्दील'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-dSpN3zRjo4c/Taw6l1X6TDI/AAAAAAAADJQ/jMqUojvlRtI/s72-c/kolkata+history.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-7616198685846851062</id><published>2011-03-18T00:24:00.000+05:30</published><updated>2011-03-18T00:24:16.604+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सारनाथ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौद्ध प्रतिमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्पाइस रूट'/><title type='text'>देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा</title><content type='html'>&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5" width="100%"&gt;&lt;th style="color:blue;background-color:yellow;" rowspan="2"&gt;खबरों में इतिहास(भाग-12)&lt;br /&gt;अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१-देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा का अनावरण&lt;br /&gt;२-खुदाई में मिले अवशेषों से स्पाइस रूट की पुष्टि&lt;br /&gt;3-सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर&lt;/th&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;खुदाई में मिले अवशेषों से स्पाइस रूट की पुष्टि&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;केरल के प्राचीन बंदरगाह शहर विझिनजम में एक खुदाई स्थल पर मिले अवशेषों से सदियों पहले बाहरी दुनिया से व्यापार के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले स्पाइट रूट की पुष्टि हुई है। इसके लिहाज से इसे यूनेस्को से धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रदेश के प्रयास को बल मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार में दो हजार सालों से केरल प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। इसके कारोबारी साझेदारों में रोमन साम्राज्य, अरब खाड़ी और सुदूर पूर्व शामिल हैं। केरल के मसालों के लिए प्राचीन दुनिया के लगाव के कारण ये व्यापारी प्रदेश में आते थे। विझिनजम का जिक्र मध्यकालीन दस्तावेजों में मिलता है। यह एक समय दक्षिण केरल में आठवीं से दसवीं सदी में एवाय राजवंश की राजधानी रहा था। केरल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के अजीत कुमार ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के राबर्ट हार्डिंग के साथ विझिनजम में खुदाई का काम शुरू किया ताकि शहर के सांस्कृतिक महत्त्व को समझा जा सके।(भाषा)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा का अनावरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारनाथ स्थित थाई मंदिर में गांधार शैली में बनी देश की सबसे ऊंची (80 फुट) प्रतिमा का बुधवार को थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री जनरल सूरावेद चुल्लानाट ने अनावरण किया। इसके साथ ही भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि से गुंजित वातावरण में थाईलैंड के प्रमुख भिक्षु सुथी सहित एक दर्जन अनुयायियों ने दीप जलाकर पंचशील पाड्ग किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थाई बौद्ध विहार परिसर में बौद्ध परंपरा के मुताबिक विधिपूर्वक पूजा अर्चना की गई। उसके बाद विशाल बुद्ध प्रतिमा के सामने रखी प्रतीक छोटी प्रतिमा का पर्दा खींचकर अनावरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। जनरल चुल्लानाट ने इस मौके पर कहा कि भगवान बुद्ध की प्रतिमा भारत और थाईलैंड के बीच मैत्री का प्रतीक है। भारत गुरुभूमि है। यहीं से भिक्षु थाइलैंड गएऔर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। कई एकड़ क्षेत्र में फैले मंदिर परिसर के संस्थापक व बौद्धधर्म के प्रमुख प्रचारक भदंत शासन रश्मि का यह ड्रीम प्रोजेक्ट लगभग 14 साल में पूरा हुआ। बामियान (अफगानिस्तान) में गौतम बुद्ध की प्राचीन व विशाल प्रतिमाओं को तालिबानियों के खंडित करने से आहत होकर भदंत शासन ने इस प्रतिमा के निर्माण की परिकल्पना की थी। लगभग दो करोड़ रुाए में बनकर तैयार हुई प्रतिमा में 20 फीट ऊंची आधार स्तंभ व 60 फुट प्रतिमा की ऊंचाई है। इसके निर्माण में चार लाख 89 हजार किलोग्राम वजन के कुल 815 पत्थर लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैजनाथ धाम (बिहार) निवासी शिल्पकार मोहन राउत के तैयार माडल को चुनार निवासी मूर्तिकार जीउत कुशवाहा नेकुशल कारीगरों की सहायता से विशाल बुद्ध प्रतिमा का रूप दिया। प्रसिद्ध वास्तुकार अनुराग कुशवाहा के निर्देशन में प्रतिमा की आधारशिला व तकनीकी ढ़ांचों का निर्माण हुआ, जबकि मुंबई के वरिष्ठ इंजीनियर पीपी कल्पवृक्ष के मार्गदर्शन में प्रतिमा स्थापित की गई। इस बीच पूर्व घोषणा के विपरीत प्रतिमा अनावरण के बाद मंदिर परिसर में ही भदंत शासन रश्मि का दाह संस्कार क्षेत्रीय नागरिकों के विरोध के चलते नहीं किया जा सका। 22 दिसंबर 2010 को देहांत के बाद उनके पाथर्व शरीर को उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार प्रतिमा के अनावरण तक मंदिर में रखा गया था। थाई बौद्ध विहार समिति के सचिव डा. धर्मरश्मि गौतम ने बताया कि दंत भदंत शासन रश्मि का अंतिम संस्कार कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है। उनका शव तब तक मंदिर परिसर में ही रखा जाएगा। (भाषा)। &lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों को खुदाई में धरती पर मौजूद सबसे बड़े शाकाहारी डायनासोर का जीवाश्म मिला है। समझा जाता है कि यह धरमी पर करीब नौ करोड़ वर्ष पहले विचरण करता था। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल को इस डायनासोर का जीवाश्म अंगोला में में मिला। उनका मानना है कि इसका आकार धरती पर मौजूद आज तक के सबसे बड़े माँसाहारी डायनासोर ‘टी-रेक्स’ से भी बड़ा था। यह लंबी गर्दन वाला जीव पौधे और अन्य वनस्पति खाता था । डेली मेल के रिपोर्ट अनुसार इसे अंगोलाटाइटन एडामास्टोर नाम दिया गया है। जहाँ इसके जीवाश्म मिले हैं वह नौ करोड़ वर्ष पहले पानी के अंदर रहा होगा। समझा जाता है कि मछली और शार्क के दाँत के साथ मिले उसके अवशेष बहकर समुद्र में चले और शार्कों ने उसके टुकडे-टुकड़े कर दिए। (भाषा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-7616198685846851062?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/7616198685846851062/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=7616198685846851062' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7616198685846851062'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/7616198685846851062'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/03/blog-post_17.html' title='देश की सबसे ऊंची बौद्ध प्रतिमा'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-4000593386111810586</id><published>2011-03-16T22:28:00.000+05:30</published><updated>2011-03-16T22:28:43.419+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रलय'/><title type='text'>प्रलय की ओर बढ़ रही दुनिया !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-fX5crzTy8XA/TYDr3NQHB6I/AAAAAAAADGA/p-KBODQf48k/s1600/pralaya.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" src="https://lh4.googleusercontent.com/-fX5crzTy8XA/TYDr3NQHB6I/AAAAAAAADGA/p-KBODQf48k/s320/pralaya.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पहले इंडोनेशिया, फिर चीन, ब्राजील, श्रीलंका और अब जापान। पूरी दुनिया पर कुदरत का कहर टूट रहा है। आए दिन सुनामी, भूकंप, ज्‍वालामुखी फटने, बाढ़ और बर्फबारी जैसे धरती पर मंडराते खतरों के चलते दुनिया के खत्म होने की चर्चाएं भी जोर पकड़ने लगी हैं। हाल के वर्षों की कुछ घटनाओं ने इस शंका को प्रबल कर दिया है। प्रलय की पौराणिक मान्‍यताओं को वैज्ञानिक भी सही साबित कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;नासा की चेतावनी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी अंतरिक्षण अनुसंधान केंद्र नासा के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि 2012 में धरती पर भयानक तबाही आने वाली है। इन वैज्ञानिकों ने पिछले साल अगस्त में सूरज में कुछ अजीबोगरीब हलचल देखी। नासा के उपग्रहों से रिकॉर्ड करने के बाद वैज्ञानिकों ने इन आग के बादलों से धरती पर भयानक तबाही की चेतावनी दी। इनका दावा है कि सूरज की तरफ से उठा खतरा धरती की तरफ चल पड़ा है। वैज्ञानिक इसे सुनामी कह रहे हैं। आग की ये लपटें सूरज की सतह पर हो रहे चुंबकीय विस्फोटों की वजह से पैदा हुईं और लावे का ये तूफान धरती की तरफ रुख कर चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये तूफान सूरज से धरती के रास्ते में है और कभी भी धरती से टकरा सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर सोलर सुनामी धरती से टकराती है तो जबर्दस्त रोशनी पैदा होगी। दुनिया के बड़े हिस्से में अंधकार छा जाएगा। सेटेलाइटों को नुकसान पहुंच सकता है। संचार उपकरण ठप हो जाएंगे। मोबाइल फोन काम करना बंद कर देंगे। विमानों के उड़ान में मुश्किलें पैदा होंगी। नासा के वैज्ञानिकों ने 2013 में सौर तूफान की चेतावनी पहले ही दे दी थी। वे इस बारे में लगातार शोध कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;प्रलय से जुड़े मिथ, धार्मिक ग्रंथों में प्रलय का जिक्र&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्रलय शब्द का जिक्र लगभग हर धर्म के ग्रंथों में मिलता है। करीब 250 साल पहले महान भविष्यवक्ता नास्त्रेस्देमस ने भी प्रलय को लेकर घोषणा की है हालांकि इसमें उसके समय को लेकर कोई घोषणा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;महाभारत -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; महाभारत में कलियुग के अंत में प्रलय होने का जिक्र है, लेकिन यह किसी जल प्रलय से नहीं बल्कि धरती पर लगातार बढ़ रही गर्मी से होगा। महाभारत के वनपर्व में उल्लेख मिलता है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि सातों समुद्र और नदियां सूख जाएंगी। संवर्तक नाम की अग्रि धरती को पाताल तक भस्म कर देगी। वर्षा पूरी तरह बंद हो जाएगी। सबकुछ जल जाएगा, इसके बाद फिर बारह वर्षों तक लगातार बारिश होगी। जिससे सारी धरती जलमग्र हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;बाइबिल -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; इस ग्रंथ में भी प्रलय का उल्लेख है जब ईश्वर, नोहा से कहते हैं कि महाप्रलय आने वाला है। तुम एक बड़ी नौका तैयार करो, इसमें अपने परिवार, सभी जाति के दो-दो जीवों को लेकर बैठ जाओ, सारी धरती जलमग्र होने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;इस्लाम &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;- इस्लाम में भी कयामत के दिन का जिक्र &amp;nbsp;है। पवित्र कुरआन में लिखा है कि कयामत का दिन कौन सा होगा इसकी जानकारी केवल अल्लाह को है। इसमें भी जल प्रलय का ही उल्लेख है। नूह को अल्लाह का आदेश मिलता है कि जल प्रलय होने वाला है, एक नौका तैयार कर सभी जाती के दो-दो नर-मादाओं को लेकर बैठ जाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;पुराण -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; हिदू धर्म के लगभग सभी पुराणों में काल को चार युगों में बाँटा गया है। हिंदू मान्ताओं के अनुसार जब चार युग पूरे होते हैं तो प्रलय होती है। इस समय ब्रह्मा सो जाते हैं और जब जागते हैं तो संसार का पुन: निर्माण करते हैं और युग का आरम्भ होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;नास्त्रेस्देमस की भविष्यवाणी -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; नास्त्रेस्देमस ने प्रलय के बारे में बहुत स्पष्ट लिखा है कि मै देख रहा हूँ,कि एक आग का गला पृथ्वी कि ओर बाद रहा है,जो धरती से मानव के काल का कारण बनेगा। एक अन्य जगह नास्त्रेस्देमस लिखते हैं, कि एक आग का गोला समुन्द्र में गिरेगा और पुरानी सभ्यता के समस्त देश तबाह हो जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;प्रलय को लेकर वैज्ञानिकों के बयान -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; केवल धर्म ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि कई देशों में वैज्ञानिकों ने भी प्रलय की अवधारणा को सही माना है। कुछ महीनों पहले अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने घोषणा कि है कि 13 अप्रैल 2036 को पृथ्वी पर प्रलय हो सकता है। खगोलविदों के अनुसार अंतरिक्ष में घूमने वाला एक ग्रह एपोफिस 37014.91 किमी/ प्रति घंटा) की रफ्तार से पृथ्वी से टकरा सकता है। इस प्रलयंकारी भिडंत में हजारों लोगों की जान भी जा सकती है। हालांकि नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे लेकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;माया कैलेंडर की भविष्‍यवाणी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माया कैलेंडर भी कुछ ऐसी ही भविष्‍यवाणी कर रहा है। साउथ ईस्ट मेक्सिको के माया कैलेंडर में 21 दिसंबर 2012 के बाद की तिथि का वर्णन नहीं है। कैलेंडर उसके बाद पृथ्वी का अंत बता रहा है।&lt;br /&gt;माया कैलेंडर के मुताबिक 21 दिसंबर 2012 में एक ग्रह पृथ्वी से टकराएगा, जिससे सारी धरती खत्‍म हो जाएगी। &amp;nbsp;करीब 250 से 900 ईसा पूर्व माया नामक एक प्राचीन सभ्यता स्थापित थी। ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं को मिले हैं। ऐसी मान्यता है कि माया सभ्यता के काल में गणित और खगोल के क्षेत्र उल्लेखनीय विकास हुआ था। अपने ज्ञान के आधार पर माया लोगों ने एक कैलेंडर बनाया था। कहा जाता है कि उनके द्वारा बनाया गया कैलेंडर इतना सटीक निकला है कि आज के सुपर कम्प्यूटर भी उसकी गणनाओं में 0.06 तक का ही फर्क निकाल सके और माया कैलेंडर के अनेक आकलन, जिनकी गणना हजारों सालों पहले की गई थी, सही साबित हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;चीन के धार्मिक ग्रंथ ‘आई चिंग’ व ‘द नेशनल फिल्म बोर्ड ऑफ कनाडा’&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; ने भी इन मतों को बल दिया है। लेकिन विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता व हिंदू मान्यताओं के प्रतीक 5123 वर्ष पुराने टांकरी कलेंडर ने इस बात को पूरी तरह से नकार दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेब पर साजिशों की खोज करते रहने वालों ने दावा किया है कि वैब-बॉट्स यानी वैब रोबोट्स ने 11 सितंबर के हमलों और 2004 की सुनामी के बारे सटीक भविष्यवाणी की थी। अब उनका कहना है कि 21 दिसंबर 2012 को कोई आफत धरती को मटियामेट कर देगी। वैब-बॉट् एक तरह से ‘स्पाइडर’ जैसा सॉफ्टवेयर होता है जिसे 1990 में स्टॉक मार्केट के बारे भविष्यवाणी करने के लिए विकसित किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;प्रलय के संकेत?&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलवायु परिवर्तन का खतरा: हमारी औद्योगिक प्रगति और उपभोक्तावादी संस्कृति, तापमान में विश्वव्यापी वृद्धि, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ता स्‍तर। यानी कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन की वजह से धरती के अस्तित्‍व पर खतरा है। बढते औद्योगीकरण के चलते जलवायु परिवर्तन का खतरा कई रूपों में सामने आ रहा है। गत क्रिसमस के समय यूरोप तथा अमेरिका में बर्फीली हवाओं और जबरदस्त हिमपात के कारण तापमान में आई भारी गिरावट से सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। हिमपात और बर्फबारी की वजह से कई दिनों तक सड़क, रेल और हवाई यातायात ठप रहा था। लंदन, गेटविक और स्टैनस्टड से संचालित होने वाली सभी उड़ानें कई दिनों तक बाधित रहीं। ब्रिटिश एयरवेज ने 2000 से ज्यादा फ्लाइटें निरस्त की। वर्जीनिया, मैरीलैंड, पश्चिम वर्जीनिया और डेलावेयर प्रांतों में आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। वहीं ऑस्ट्रिया, फिनलैंड और जर्मनी में तापमान शून्य से 33 डिग्री सेल्सियस नीचे पहुंच गया। अमेरिका और यूरोपीय देशों में ऐसी बर्फबारी पहले कभी नहीं देखी गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;जर्मनी में पोट्सडाम के जलवायु शोध संस्थान&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; के वैज्ञानिक और जर्मन सरकार के जलवायु सलाहकार डॉ.स्तेफान राम्सटोर्फ के शब्‍दों में कहें तो हवा में कार्बन डाइऑक्साइड का घनत्व 1970 वाले दशक की तुलना में दोगुना हो गया है। जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति IPCC के आंकड़ों के अनुसार धरती का मौजूदा औसत तापमान पिछले एक हजार वर्षों की तुलना में सबसे अधिक है। पिछली पूरी शताब्दी में धरती का औसत तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ा था, जबकि अब वह 0.74 डिग्री की दर से बढ़ रहा है। राम्सटोर्फ का कहना है कि इस बढ़ोतरी को 2050 तक के अगले 40 वर्षों में कुल मिलाकर दो डिग्री की वृद्धि से नीचे ही रखना होगा, नहीं तो इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय औसत वैश्विक तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है। अगले चार दशकों में उस में दो डिग्री तक की भी बढ़ोतरी नहीं होनी चाहिए, नहीं तो प्रलय आ जाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि तापमान मामूली-सा बढ़ने से भी समुद्र का जलस्‍तर तेजी से बढ़ेगा और एक बार बढ़ गया तापमान सदियों, शायद हजारों वर्षों तक नीचे नहीं उतरेगा। स्‍टैनफोर्ड के कृषि वैज्ञानिक डेविड लोबेल और अंतरराष्‍ट्रीय मक्‍का और गेहूं सुधार केंद्र के अनुसंधानकर्ताओं ने आगाह किया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते अनाज के उत्‍पादन पर भी असर पड़ेगा और इससे दुनियाभर में खाद्यान्‍न की किल्‍लत हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;बढ़ते समुद्र स्‍तर से डूब जाएंगे तट:&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; हाल में कोपनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इंटरनेशनल साइंटिफिक कांग्रेस में यह बात सामने आई कि सन् 2100 तक समुद्र के जलस्‍तर में करीब एक मीटर तक बढ़ोतरी हो सकती है। संभावना है कि यह बढ़ोतरी एक मीटर से भी अधिक हो सकती है। यदि ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍सर्जन पर तत्‍काल रोक नहीं लगाई गई तो समुद्री तट के किनारे वाले इलाकों पर इसका असर साफ दिखेगा और दुनिया की आबादी का दस प्रतिशत इससे प्रभावित होगा।&lt;br /&gt;इस सिलसिले में हुए एक नए अनुसंधान में चेतावनी दी गई है कि पहले की तुलना में समुद्र का जलस्‍तर तेजी से बढ़ सकता है। यह कहा गया है कि वर्ष 2100 तक समुद्र का पानी 75 से 190 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। &lt;br /&gt;सेंटर फॉर ऑस्‍ट्रेलियन वेदर एंड क्‍लाइमेट रिसर्च के डॉ. जॉन चर्च ने इस सम्‍मेलन में कहा, ‘सैटेलाइट और जमीनी उपकरणों से ली गई ताजा तस्‍वीरों से साफ है कि 1993 के बाद से समुद्र के जलस्‍तर में हर साल तीन मिलीमीटर की बढ़ोतरी हो रही है जो पिछली शताब्‍दी के औसत से अधिक है। हिमालय, ग्रीनलैंड तथा उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर की बर्फ पिघलने से भी धरती पर का तापमान और समुद्र का जलस्‍तर बढ़ेगा, क्योंकि बर्फ जिस सूर्यप्रकाश को आकाश की तरफ परावर्तित कर देती है, वह उसके पिघल जाने से बनी सूखी जमीन सोखने लगेगी।’ &lt;a href="http://www.bhaskar.com/article/SPLDB-solar-tsunami-after-tsunami-in-japan-earth-endangered-1939618.html?HT3="&gt;साभार-दैनिक भाष्कर&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-4000593386111810586?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/4000593386111810586/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=4000593386111810586' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4000593386111810586'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4000593386111810586'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='प्रलय की ओर बढ़ रही दुनिया !'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१-&lt;b&gt;जलवायु अस्थिरता से हुआ सभ्यताओं का उत्थान-पतन&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;२- &lt;b&gt;दस हजार साल पुरानी 35 किलोमीटर लंबी रॉक पेंटिग &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;जलवायु अस्थिरता से हुआ सभ्यताओं का उत्थान-पतन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेड़ों के तने पर बने रिंग या वलयों पर हुए एक विस्तृत शोध से पता चलता है कि पुरानी सभ्यताओं के उत्थान और पतन का संबंध जलवायु में हुए अचानक होने वाले परिवर्तनों से हो सकता है। इस दल ने शोध के लिए पिछले 25 सौ सालों की क़रीब नौ हज़ार लकड़ियों की कलाकृतियों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि गर्मियों के जो मौसम गर्म के अलावा बारिश वाले रहे उन दिनों समाज में समृद्धि आई और जिन दिनों जलवायु में अस्थिरता रही उन दिनों राजनीतिक हलचलें तेज़ रहीं। शोध के नतीजे 'जनरल साइंस' की वेबसाइट पर प्रकाशित किए गए हैं। इस शोध के सहलेखक उल्फ़ बंटजेन ने इस बेबसाइट से कहा, "अगर हम पिछले 25 सौ सालों के इतिहास पर नज़र डालें तो ऐसे उदाहरण हैं जब जलवायु परिवर्तन ने मानव इतिहास को प्रभावित किया है।"बंटजेन स्विस फ़ेडरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में मौसम परिवर्तन से जुड़े वैज्ञानिक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;छाल का इतिहास&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शोध के लिए दल ने एक ऐसी प्रणाली का उपयोग किया जिससे कि खुदाई के दौरान मिली चीज़ों के समय काल का पता चल सकता है। प्रकाशित शोध पत्र में कहा गया है, "पुरातत्वविदों ने मध्य यूरोप के ओक या बलूत के पेड़ों के तनों पर बने वलयों की एक अनुक्रमणिका तैयार की जो लगभग 12 हज़ार साल के इतिहास की जानकारी देती थी. फिर इसके आधार पर उन्होंने कलाकृतियों, पुराने घरों और फ़र्नीचरों के समय काल के बारे में अध्ययन किया।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरातत्वविदों ने जो सूची तैयार की है उसके अनुसार वर्तमान में मौजूद और पुराने समय के ओक पेड़ों के वलयों के अध्ययन से यह पता चल सकता था कि गर्मियों के दौरान और सूखे के दौरान उनकी प्रवृत्ति कैसी होती है।&lt;br /&gt;शोध टीम ने अध्ययन किया कि पिछली दो सदियों में मौसम ने पेड़ों के तनों के वलयों के विकास में कैसी भूमिका निभाई। उन्होंने पाया कि जब अच्छा मौसम होता है, जिसमें पानी और पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं, पेड़ों में बनने वाले वलयों की चौड़ाई बहुत अधिक होती है। लेकिन जब मौसम अनुकूल नहीं होता तो वलय की चौड़ाई तुलनात्मक रुप से कम होती है।इसके बाद वैज्ञानिकों ने कलाकृतियों में मौजूद छालों के अध्ययन के आधार पर पुराने मौसमों के बारे में एक अनुमान लगाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जब उन्होंने 25 सौ सालों के मौसम की सूची तैयार कर ली तो फिर उन्होंने उन वर्षों में समाज में समृद्धि के बारे में अनुमान लगाना शुरु किया। टीम का कहना है कि जिस समय गर्मियों में तापमान ठीक था और बारिश हो रही थी रोमन साम्राज्य और मध्ययुगीन काल में समृद्धि थी. लेकिन 250 से 600 ईस्वी सदी का समय, जब मौसम में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा था उसी समय रोमन साम्राज्य का पतन हुआ और विस्थापन की प्रक्रिया तेज़ हुई।शोध में कहा गया है तीसरी सदी में सूखे मौसम के संकेत मिलते हैं और यही समय पश्चिमी रोमन साम्राज्य के लिए संकट का समय माना जाता है। इसी समय गॉल के कई प्रांतों में हमले हुए, राजनीतिक हलचल रही और आर्थिक अस्थिरता रही। डॉक्टर बंटजेन का कहना है कि उन्हें इन आंकड़ों की जानकारी थी लेकिन उन्होंने इसका नए तरह से अध्ययन किया और इसका संबंध जलवायु से जोड़कर देखा। &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( बीबीसी से साभार-http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2011/01/110115_trees_civilisation_vv.shtml )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;दस हजार साल पुरानी 35 किलोमीटर लंबी रॉक पेंटिग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभाजन के बाद सियालकोट से बूंदी में आकर बस गए ओमप्रकाश शर्मा कुक्की ने 35 किलोमीटर लंबी रॉक पेंटिग खोजने का दावा किया है। उन्होंने बताया कि खोज किए गए शैल चित्र करीब दस हजार साल पुराने हैं तथा मिसोलेथिक युग से संबंध रखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परचून की दुकान करने वाले और पुरा अन्वेषण खोज को शौकिया तौर पर अपनाने वाले ओम प्रकाश उर्फ कुक्की ने बूंदी जिले के गरहडा क्षेत्र के बांकी गांव से भीलवाड़ा जिले के मॉडल तक फैली करीब 35 किलोमीटर लंबी रॉक पेंटिंग खोजने का दावा किया है। उन्होंने कहा कि 35 किलोमीटर लंबी राक पेंटिग्स पर करीब बतीस रंगीन रॉक पेंटिग बनी हुई है। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में बने शैल चित्र नक्काशी कर उकेरे गये हैं, जबकि बूंदी के गरहडा क्षेत्र में पाए गए शैल चित्र रंगों से बनाए गए हैं। कुक्की बताते हैं कि यहां बने शैल चित्रों में हल्का लाल, गहरा लाल, सफेद, काला, पीला व गहरे हरे रंग का विलक्षण प्रयोग किया गया है। इन चित्रों में मानव आकृतियां, पशु जीवन, बाघ, औजार आदि की आकृतियां है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) भोपाल के परियोजना समन्वयक डा. नारायण व्यास ने कहा कि कुक्की की यह खोज बेमिसाल है। लेकिन यह विश्व की सबसे लंबी रॉक पेंटिग नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुक्की ने कहा कि बूंदी जिले में की गई पुरा महत्व की खोजों को इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्टस, नई दिल्ली व इंडियन रॉक आर्ट रिसर्च सेंटर नाशिक द्वारा संरक्षित किया गया है। उन्होंंने दावा किया कि बूंदी जिले में उनके द्वारा खोजी गए 78 पुरा अन्वेषक स्थल हैं। कुक्की ने कहा-मैं अपने परिवार का पालन पोषण परचून की दूकान से कर रहा हूं। साथ ही समय निकालकर पुरा महत्व की खोज में जुटा रहता हूं। इसके बावजूद सरकार ने आज तक मुझे कोई आर्थिक मदद देना मुनासिब नहीं समझा। सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने और न जाने कितनी मदों में लोगों की मदद कर रही है। मगर सरकार की नजर मेरी ओर नहीं जा रही है। जबकि मैंने बूंदी जिले की पुरासामग्री को खोज निकाला है जो दबी हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुक्की का कहना है कि राजस्थान सरकार विशेष रूप से पर्यटन विभाग बूंदी से भीलवाड़ा जिले तक फैली 35 किलोमीटर लंबी रॉक पेंटिग को प्रचारित करे तो पहले से ही पर्यटन मानचित्र पर उभरे बूंदी की तस्वीर बदल सकती है। उन्होंने कहा कि उन्होंने पर्यटन मंत्री बीना काक को राक पेंटिग समेत बूंदी जिले की पुरा सामग्री को संजोने और पर्यटकों को दिखाने के लिए प्रस्ताव भेजे हैं लेकिन अभी तक जवाब नहीं मिला है। इधर, जयपुर में राजस्थान पर्यटन विकास निगम सूत्रों ने कुक्की के बूंदी पर्यटन विकास को लेकर भेजे गए किसी प्रस्ताव पर अनभिज्ञता जताई है। (बूंदी, 12 जनवरी (भाषा)।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-3131230838058937104?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/3131230838058937104/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=3131230838058937104' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/3131230838058937104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/3131230838058937104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/01/blog-post_16.html' title='जलवायु अस्थिरता से हुआ सभ्यताओं का उत्थान-पतन'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-880976586217928689</id><published>2011-01-02T21:08:00.000+05:30</published><updated>2011-01-02T21:08:11.084+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आदि मानव'/><title type='text'>'आदि मानव शाकाहारी भी थे'</title><content type='html'>&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5" width="100%"&gt;&lt;th style="color:blue;background-color:yellow;" rowspan="2"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-१० )&lt;br /&gt;   अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१-चार लाख साल पुराना मानव दांत मिला&lt;br /&gt;२-'आदि मानव शाकाहारी भी थे'&lt;br /&gt;३-200 साल पुरानी एक सुरंग &lt;br /&gt;४-24 सौ साल पुराना 'सूप' मिला&lt;br /&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;चार लाख साल पुराना मानव दांत मिला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://thatshindi.oneindia.in/news/2010/12/29/20101229240847.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेल अवीव विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर मंगलवार को लिखा कि इजराइली शहर रोश हाइन में एक गुफा में चार लाख साल पुराना मानव दांत मिला है। यह प्राचीन आधुनिक मानव का सबसे पुराना प्रमाण है।समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक वेबसाइट पर इसके साथ ही लिखा गया कि अब तक मानव के जिस समय काल से अस्तित्व में होने की बात मानी जा रही थी, यह मानव उससे दोगुना अधिक समय पहले जीवित था। यह दांत 2000 में गुफा में मिला था। इससे पहले आधुनिक मानव का सबसे प्राचीन अवशेष अफ्रीका में मिला था, जो दो लाख साल पुराना था। इसके कारण शोधार्थी यह मान रहे थे कि मानव कि उत्पत्ति अफ्रीका से हुई थी।सीटी स्कैन और एक्स रे से पता चलता है कि ये दांत बिल्कुल आधुनिक मानवों जैसे हैं और इजरायल के ही दो अलग जगहों पर पाए गए दांत से मेल खाते हैं। इजरायल के दो अलग जगहों पर पाए गए दांत एक लाख साल पुराने हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुफा में काम कर रहे शोधार्थियों के मुताबिक इस खोज से वह धारणा बदल जाएगी कि मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी।गुफा की खोज करने वाले तेल अवीव विश्वविद्यालय के अवि गाफेर और रैन बरकाई ने कहा कि चीन और स्पेन में मिले मानव अवशेष और कंकाल से हालांकि मानव की अफ्रीका में उत्पत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ी थी, लेकिन यह खोज उससे भी महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;'आदि मानव शाकाहारी भी थे'&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://thatshindi.oneindia.in/news/2010/12/28/neanderthalvegskj.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निएंडरथल मानव सब्ज़ियां भी खाया करते थेआदि मानवों पर किए गए एक नए शोध के अनुसार आदिमानव (निएंडरथल) सब्ज़ियां पकाते थे और खाया करते थे.अमरीका में शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें निएंडरथल मानवों के दांतों में पके हुए पौधों के अंश मिले हैं.यह पहला शोध है जिसमें इस बात की पुष्टि होती है कि आदिमानव अपने भोजन के लिए सिर्फ़ मांस पर ही निर्भर नहीं रहते थे बल्कि उनके भोजन की आदतें कहीं बेहतर थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह शोध प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज़ में छपा है.आम तौर पर लोगों में आदि मानवों के बारे में ये धारणा रही है कि वो मांसभक्षी थे और इस बारे में कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी मिल चुके हैं. अब उनकी हड्डियों की रासायनिक जांच के बाद मालूम चलता है कि वो सब्ज़ियां कम खाते थे या बिल्कुल ही नहीं खाते थे.इसी आधार पर कुछ लोगों का ये मानना था कि मांस भक्षण के कारण ही हिमकाल के दौरान बड़े जानवरों की तरह ये मानव भी बच नहीं पाए. हालांकि अब दुनिया भर में निएंडरथल मानवों के अवशेषों की जांच रासायनिक जांच से मिले परिणामों को झुठलाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इन मानवों के दांतों की जांच के दौरान उसमें सब्ज़ियों के कुछ अंश मिले हैं जिसमें कुछ तो पके हुए हैं.निएंडरथल मानवों के अवशेष जहां कहीं भी मिले हैं वहां पौधे भी मिलते रहे हैं लेकिन इस बात का प्रमाण नहीं था कि ये मानव वाकई सब्ज़ियां खाते थे. जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलिसन ब्रुक्स ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, ‘‘ हमें निएंडरथल साइट्स पर पौधे तो मिले हैं लेकिन ये नहीं पता था कि वो वाकई सब्ज़ियां खाते थे या नहीं. हां लेकिन अब तो लग रहा है कि उनके दांतों में सब्ज़ियों के अंश मिले हैं तो कह सकते हैं कि वो शाकाहारी भी थे.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;200 साल पुरानी एक सुरंग &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://hindi.webdunia.com/samayik/deutschewelle/dwnews/1010/20/1101020084_1.htm&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की आर्थिक राजधानी में 200 साल पुरानी एक सुरंग मिली है। इतिहासकारों का कहना है कि निर्माण कार्य के दौरान अनायास इस सुरंग के मिलने से मिट्टी में दबे पड़े अतीत से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण नए तथ्यों का पता चलेगा। मुंबई में डाक विभाग की ओर से की जा रही खुदाई के दौरान मजदूरों को इस सुरंग का पता चला। यह सुरंग दक्षिण मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल इलाके में स्थित डाक घर के नीचे मिली है।डाक विभाग की निदेशक आभा सिंह ने बताया कि इस जगह पर अब तक झंडारोहण होता था और किसी को इसके ठीक नीचे मौजूद सुरंग के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। मजदूरों ने जब पामस की नाली को साफ करने के लिए मामूली सी खुदाई की तो कुछ सीढ़ियाँ दिखाई दीं। इनको साफ करने पर देखा गया कि सीढ़ियाँ सुरंग की ओर जा रही थी। इससे पहले बीते शुक्रवार को एक अखबार के रिपोर्टर ने भी सीढ़ियों की तरफ डाक विभाग का ध्यान आकर्षित किया था। उसकी सूचना पर ही मजदूरों को कूड़ा करकट से अटी पड़ी सीढ़ियों की तरफ खुदाई करने को कहा गया। मोटी दीवारों और पिलर के सहारे बनाई गई इस सुरंग में नीचे एक बड़ा सा हॉल पाया गया जिसके फर्श पर बिखरी पड़ी गंदगी के बीच कुछ अनजान पौधे मिले हैं जिनपर सुंदर फूल भी पाए गए। इसके अलावा भी तमाम पुरानी चीजें बिखरी पाई गई। मुंबई में पुरातत्व अधिकारी दिनेश अफजालपुरकर ने बताया कि इस सुरंग का दौरा कर इसके पुरातात्विक महत्व का पता लगाया जाएगा। इसके बाद ही इसके संरक्षण और उपयोग संबंधी भविष्य की रूपरेखा तय की जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;24 सौ साल पुराना 'सूप' मिला&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://thatshindi.oneindia.in/news/2010/12/14/chinasoupap.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जा रहा है कि ये चीन का पहला 'बोन सूप' है.चीन की राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक देश के भूगर्भशास्त्रियों को एक ऐसा कटोरा हाथ लगा है जिसमें मौजूद सूप 24 सौ साल पुराना हो सकता है.ये सूप कांसे के एक बर्तन में सुरक्षित रखा था और इस बर्तन का ढक्कन ऊपर से बंद था.बंद बर्तन के अंदर सूप का तरल पदार्थ और उसमें हड्डियाँ सुरक्षित पाई गई हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बर्तन एक खुदाई के दौरान चीन के प्राचीन शहर सियान में मिला.चीन के मशहूर मिट्टी के लड़ाके यानि 'टेराकोटा वारियर्स' इसी शहर के हैं.अब इस तरल पदार्थ की जाँच ये पता करने के लिए हो रही है कि ये बना किससे था और इसमें किन चीज़ों का इस्तेमाल हुआ था.इस खुदाई के दौरान बिना किसी गंध वाला एक और तरल पदार्थ मिला जिसके बारे में माना जा रहा है कि वो एक किस्म की शराब, वाइन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थानीय एयरपोर्ट तक जाने के लिए एक उपमार्ग बनाने के उद्देश्य से की जा रही खुदाई के दौरान ये बर्तन एक कब्र की खुदाई के समय मिले.चीन की मीडिया में कहा गया है कि ये चीन के इतिहास में पहले 'बोन सूप' की खोज है.चीन की मीडिया के मुताबिक ये खोज 475-221 ईसा पूर्व के मध्य देश में रह रहे लोगों के बारे में, उनकी सभ्यता और खान-पान वगैरह के बारे में पता लगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों ने कहा है कि जिस कब्र से सूप और उसका मर्त्तबान मिला है, वो या तो किसी ज़मींदार या फिर निम्न स्तर के किसी सैनिक अधिकारी का रहा होगा.सियान 11 सौ साल से ज़्यादा लंबे समय तक चीन की राजधानी रहा थाचीन के पहले बादशाह, किन शिहुआंग की कब्रगाह के स्थल पर 1974 में इसी शहर में चीन की मशहूर 'टेराकोटा आर्मी' मिली थी। 221 ईसा पूर्व में किन शिहुआंग ने चीन के एकीकरण का नेतृत्त्व किया था उन्होंने 210 ईसा पूर्व तक चीन पर शासन किया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-880976586217928689?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/880976586217928689/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=880976586217928689' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/880976586217928689'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/880976586217928689'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2011/01/blog-post_02.html' title='&apos;आदि मानव शाकाहारी भी थे&apos;'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-5527535716290264459</id><published>2010-12-29T23:11:00.000+05:30</published><updated>2011-02-10T17:46:55.449+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बालथाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='plos'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुष्ठ रोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='leprocy'/><title type='text'>भारत में चार हजार साल पुराना है कुष्ठ रोग</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRtuU_c72hI/AAAAAAAAC_U/12DPkUV5v8A/s1600/lepro.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;img border="0" height="203" src="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRtuU_c72hI/AAAAAAAAC_U/12DPkUV5v8A/s320/lepro.jpg" width="320" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;बालथाल में खुदाई में मिली खोपड़ी। तीर के चिन्ह से इसके कुष्ठ रोग प्रभावित हिस्से को दिखाया गया है। ( फोटो-साभार पीएलओएस )&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मानवजाति की महाविपत्ति समझा जाने वाला कुष्ठ रोग ( कोढ़ ) दुनिया के पुराने रोगों में से एक है। आज लाइलाज नहीं है कुष्ठ रोग मगर अभी भी कुष्ठ रोगियों को जाने-अनजाने तिरस्कार झेलना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में 2007 तक 212000 से 250000 के बीच लोग कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। यह रोग मुख्यत: हाथों और पैरों से शुरू होता है। मवाद के साथ गल रहे हाथ पैर इतने विकृत व घिनौने हो जाते हैं कि इनके आसपास भी कोई फटकना नहीं चाहता। &lt;br /&gt;चार हजार साल पुराना कुष्ठ रोग भारत या अफ्रीका से पूरी दुनिया में फैला&lt;br /&gt;अभी पिछले साल ही फरीदाबाद में अपने मित्र सुरेंद्र प्रसाद सिंह के साथ फरीदाबाद में घूम रहा था तो सुरेंद्र ने कुष्ठ रोगियों की एक बस्ती दिखाई। हम बस्ती के बगल से ही गुजर रहे थे। इस बस्ती को हरियाणा सरकार ने बसाया है। इनहें पूरे शहर में घूमकर भीख मांगने की इजाजत भी नहीं है। जनि किसी को इन्हें कुछ दान करना होता है वे खुद इस बस्ती तक आते हैं और वस्त्र, खाद्यान्न इन्हें दे जाते हैं। यानी बेहतर व्यवस्था हो तो भी इस संक्रमण वाले रोग से ग्रसित लोगों को समाज से बहिष्कृत तो होना ही पड़ता है। अगर फरीदाबाद जैसी व्वस्था में न हों तो हीन जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है। हमारे मिथकीय इतिहास में भी कोढ़ के कारण तमाम लोगों के महाविपत्ति में पड़ने की घटनाएं भरी पड़ी हैं। बचपन हमें भी ऐसी कहानियां या किस्से सुनने को मिलीं कि फलां राजा पाप के कारण कोढ़ी हो गया और राजपाट छोड़कर जंगल में चला गया। पुन: किसी दिव्य प्रताप से ठीक होकर लौटा। यानी कोढ़ को मिथकीय कहानियों में व्यक्ति का पाप बताया गया तो भला ऐसे पापी को समाज में रहने की इजाजत कैसे मिलती? बहरहाल इस पर कभी अलग से चर्चा करूंगा। &lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;फिलहाल यहां मैं कोढ़ के सामाजिक प्रभाव पर चर्चा नहीं करने जा रहा हूं बल्कि आपको यह बताने वाला हूं कि कितना पुराना और मूलत: कहां से पूरी दुनिया में फैला है यह कोढ़ रोग। यानी कुष्ठ रोग के इतिहास की जानकारी के साथ इसके नवीनतम शोध की भी जानकारी दूंगा। &lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;भारत या अफ्रीका से पूरी दुनिया में फैला कुष्ठ रोग&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिसकारों और रोगों पर शोध करने वाले चिकित्साविज्ञानियों की नई खोजों से पता चला है कि &lt;strong&gt;भारत में चार हजार साल पुराना है कुष्ठ रोग।&lt;/strong&gt; पब्लिक लाइब्रेरी साइंस में छपी रिपोर्ट में यह हवाला दिया गया है। इनका दावा है कि भारत में राजस्थान के प्राचीन स्थल बालथाल में खुदाई के दौरान मिली मानव खोपड़ी में कुष्ठ रोग के साक्ष्य मिला हैं। यह खोपड़ी 2000 ईसापूर्व की बताई गई है। यही साक्ष्य ही कुष्ठ रोग को ४००० साल पुराना साबित करता है। इसके साथ ही इस अवधारणा को भी बल मिला है कि भारत या दक्षिण अफ्रीका से एशिया या यूरोप में यह रोग तब फैला होगा जब भारत विजय अभियान के बाद सिकन्दर वापस लौटा होगा। बून के अप्पलचियन स्टेट यूनिवसिर्टी को मानवविज्ञानी ग्वेन राबिंस का मानना है कि बालथाल के साक्ष्य के आधार पर इस रोग के यहां होने का काल ३७०० से १८०० ईसापूर्व माना जा सकता है। हालांकि यह तय कर पाना मुश्किल है कि जिस खोपड़ी में कुष्ठ रोग के साक्ष्य मिले हैं, वह कितना पहले कोढ़ग्रस्त हुआ होगा। इस नवीन खोज ने अबतक की उस अवधारणा पर भी विराम लगा दिया है जिसमें मिस्र और थाइलैंड से मिले साक्ष्य में इसकी तारीख इतिहासकारों ने ३०० से ४०० ईसापूर्व निर्धारित की थी। कुल मिलाकर एशियाई साक्ष्य अब तक इसे 600 ईसापूर्व बताते थे। हालाकि लेप्रेई नामक बैकटीरिया से फैलने वाले कोढ़ रोग के सर्वप्रथम अस्तित्व में आने और पूरी दुनिया में फैलने पर शोध जारी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;प्राचीन ग्रंथों में कुष्ठ रोग के विवरण &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभ्यता के इतिहास के तानेबाने के साथ जुड़ी है कोढ़ रोग के भी इतिहास की कहानी। कभी लाइलाज समझा जाने वाला यह रोग अब असाध्य रोग नहीं रहा। और न ही कुष्ठ रोगीअछूत रहे। तमाम सामाजिक सेवा संस्थाओं ने कुष्ठ सेवा केंद्र खोलकर और उनकी सेवा में रहकर दिखाया और साबित किया कि कुष्ठ रोगियों को लोगों की मदद की जरूरत है। हालांकि इलाज के स्तर पर ही जागरूकता पैदा हुई है। अभी भी बांग्लादेश,ब्राजील, चीन, कांगो, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, मोजाम्बिक , म्यानमार, नेपाल, नाइजीरिया , फिलीपींस और नेपाल के ग्रामीण इलाकों में करीब सवा दो लाख लोग ( आंकड़ा २००७ का है) इस रोग के शिकार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तक यह भी ठीक से नहीं समझा जा सका है कि इसकी उत्पत्ति कहां और कैसे हुई और कब और कैसे यह पूरी प्राचीन दुनिया में फैला। सबसे प्राचीन लिखित संदर्भ १५५० ईसापूर्व के मिस्र के एबर्स पैपिरस में मिलता है। इसके अलावा प्रथम शताब्दी ईसापूर्व में संस्कृत में लिखे गए अथर्वेद के श्लोक और बाइबिल के नए और पुराने टेस्टामेंट में भी जिक्र है। हालांकि यह साक्ष्य कापी विवादास्पद है। भारत के छठी शताब्दी ईसापूर्व के महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रन्थ सुश्रुत संहिता और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, चौथी शताब्दी के ग्रीक लेखक नैनजियानोस के विवरण, तीसरी शताब्दी के चानी ग्रन्थ शूईहूदी क्विन जिया और प्रथम शताब्दी के सेल्सस व प्लिनी द एल्डर के रोमन विवरण में कुष्ठ रोग के विवरण हैं। इन सब साक्ष्यों के आधार पर इतिहासकारों ने यह प्रतिपादित किया कि कुष्ठ रोग चौथी शताब्दी ईसापूर्व में भारतीय उपमहाद्वीप में था और यहां से यूरोप में फैला। यह रोग तब तक सामान्य रोग था। मध्यकाल तक यूरोप में आम लोगों के लिए यह महामारी तब बना जब सातवीं शताब्दी में फ्रांस में बेहद गंदी झुग्गी-बस्तियां बढ़ने लगीं। ब्रिटेन, डेनमार्क, इटली, चेक गणराज्य और हंगरी से मध्य यूरोपीय काल के प्राप्त नरकंकालों में खोजे गए कुष्ठ रोग के साक्ष्य ही इसके खतरनाक बीमारी बन जाने की सूचना देते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेजी से शहरीकरण ने प्राचीन विश्व में इस रोग के विस्तार में और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अफ्रीका और एशिया में मिले पुरातात्विक साक्ष्य से तो यह पता चलता है कि यहां यह रोग प्राचीन काल से ही मौजूद था लेकिन मानव नरकंकाल में कुष्ठ रोग के पुख्ता साक्ष्य द्वितीय शताब्दी ईसापूर्व के रोमन काल, प्रथम शताब्दी ईसापूर्व में उजबेकिस्तान, न्यूबिया में पांचवीं शताब्दी ईसापूर्व, थाइलैंड सिरसा में ३०० ईसापूर्व में मिले हैं। सबसे हाल का साक्ष्य पश्चिम एशिया के इजरायल का प्रथम शताब्दी ईसवी का है। इसके पहले का दक्षिण एशिया से कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;प्राचीन भारत की लोककथाएं और कुष्ठ रोग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान सूर्य से जुड़ी एक लोकथा में कुष्ठ रोग और भगवान सूर्य की पूजा से इस रोग से मुक्ति की एक लोक कथा का विवरण मिलता है। इस हिंदू मिथकीय कथा में बताया गया है कि करीब ३०० साल पहले एक विद्वान हिंदू कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया। उसने इस रोग से मुक्ति के लिए भगवान सूर्य की आराधना की। भगवान सूर्य से प्रेरणा पाकर उसने संस्कृत में सात श्लोक लिखे। इस श्लोक को सूर्याष्टक के नाम से जाना गया। इस सूर्याष्टक के आखिरी श्लोक तक जाप पूरा होते ही वह पूरी तरह स्वस्थ होगया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत काल की एक कथा भी इसी संदर्भ में मिलती है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शम्ब भी कुष्ठ रोग से पीड़ित थे, जो भगवान सूर्य की आराधना से स्वस्थ हुए। शम्ब ने कृष्ण की पत्नी के स्नानागार में प्रवेश की धृष्टता की थी जिसके कारण कृष्ण ने उन्हें कोढ़ी होने का श्राप दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी भारत के करोड़ों हिंदुओं की मान्यता है कि सूर्यमंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करने से कुष्ठ, दूसरे चर्म रोगों, अंधत्व व बांझपन से मुक्ति मिल जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में सर्वाधिक प्रचलित छठपूजा भी इसी अवधारणा का प्रमाण है। मुख्यतः रोगों से मुक्ति व संतान की प्राप्ति के लिए छठ पूजा की जाती है। छठ पूजा भी सूर्यपूजा ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;तमिलनाडु का चमत्कारिक मंदिर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में तमिलनाडु ही एक ऐसा राज्य है जहां सभी नवग्रहों के लिए एक मंदिर हैं। तंजौर जिले में स्थित इस जगह को नवग्रहस्थलम कहा जाता है। वहीं पर एक स्थल है- वैथीस्वरन कोइल। यह मंगल ग्रह का मंदिर है। यह चिदम्बरम से २४ किलोमीटर दूर है। वैथास्वरन का अर्थ उस भगवान से है जो लोगों के रोग हर लेते हैं। यह श्री वैद्यनाथस्वामी देवता लोगों को सभी रोगों से छुटकारा दिलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंदिर के संदर्भ में मिथकीय बातें यह है कि मंगल को एक श्राप के कारण कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान वैद्यनाथ स्वामी ने मंगल को रोगमुक्त किया। इस मंदिर के पास एक तालाब है। कहा जाता है कि इस तालाब में डुबकी लगाने से सभी तरह के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। भगवान राम ने जटायु का अंतिम संस्कार यहीं किया था। यहीं पर भगवान मुरुगन यानी आयुर्वेदिक औषधियों के देवता का मंदिर है और यहां धन्वंतरि की भी पूजा की जाती है। सप्तऋषियों ने भी यहां पूजा की थी। यहां प्रसाद में भस्म और चंदन का लेप दिया जाता है। अवधारणा है कि इससे सभी रोगों से छुटकारा मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;भारत के प्राचीन ग्रंथों में कुष्ठ का उल्लेख&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस रोग के उदभव और प्रागैतिहासिक अवस्था में फैलने के बारे में ठीक से पता नहीं है। प्रागैतिहासिक काल को इतिहासकारों ने ब्रह्मांड की शुरुआत बताया है। कोढ़ रोग के बारें में यहां प्रागैतिहास का अर्थ मानव के कोढ़ रोग से ग्रसित होने की प्राचीनता से है। इस संदर्भ में अब तक का सबसे प्राचीन लिखित संदर्भ भारत के संस्कृत ग्रन्थ अथर्वेद में मिलता है। इसके एक श्लोक में कोढ़ रोग और उसके उपचार का विवरण है। इसमें कहा गया है कि-- &lt;br /&gt;............कोढ़ रोग, जो कि शरीर, हड्डियों और त्वचा को प्रभावित करता है, को मैंने अपने मंत्र से ठीक कर लिया है।.......... इतना ही नहीं सस्कृत में कुष्ठ शब्द और उपचार के निमित्त एक पौधे का उल्लेख है। यह पौधा कुष्ठ और राजयक्ष्मा ( टीबी ) के उपचार में प्रयुक्त होता है। अर्थात उपचार के बारें में भी सबसे प्राचीन लिखित संदर्भ भी अथर्वेद में ही मिलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अथर्ववेद संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों में से चौथे वेद अथर्ववेद की संहिता अर्थात मन्त्र भाग है । इसमें देवताओं की स्तुति के साथ जादू, चमत्कार, चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के भी मन्त्र हैं। भूगोल, खगोल, वनस्पति विद्या, असंख्य जड़ी-बूटियाँ, आयुर्वेद, गंभीर से गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा, अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धान्त, राजनीति के गुह्य तत्त्व, राष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमा, शल्यचिकित्सा, कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोगों का विवेचन, मृत्यु को दूर करने के उपाय, प्रजनन-विज्ञान अदि सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का निरूपण अथर्ववेद में है। आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व अत्यन्त सराहनीय है। अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा अभिचारिक दोनों तरह के अनुष्ठन वर्णित हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं। सामान्यतः अथर्ववेद में ६००० मन्त्र होने का मिलता है परन्तु किसी-किसी में ५९८७ या ५९७७ मन्त्र ही मिलते हैं। &lt;br /&gt;२००० ईसापूर्व के अथर्ववेद और १५०० ईसापूर्व की मनुस्मृति में विभिन्न चर्म रोगों का उल्लेख मिलता है। जिन्हें कुष्ठ रोग का नाम दिया गया है। मनुसंहिता में तो ऐसे लोगों से संपर्क भी निषिद्ध बताया गया है जो कुष्ठ रोग पीड़ित हैं। इतना ही नहीं इसमें यहां तक कहा गया है कि कि कुष्ठ रोग पूर्वजन्म का पाप होता है। यद्यपि कुष्ठ उन्मूलन अभियान के तहत आज लोगों में जागरूकता लाकर और कुष्ठ को साध्य रोग बताकर पूर्वजन्म के पाप की अवधारणा को खत्म करने की पूरी कोशिश की गई है मगर भारत के धर्मभीरु लोग अभी भी पाप की अवधारणा से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;६०० ईसापूर्व की सुश्रुत संहिता में चालमोगरा वृक्ष के तेल से कुष्ठ रोग के इलाज की बात कही गई है। इस संदर्भ में वर्णित मिथकीय कथा में कहा गया है कि एक कोढ़ग्रस्त राजा को चालमोगरा के बीज खाने की हिदायत दी गई थी। कोढ़ग्रस्त होने के बाद राजा होते हुए समाज से बहिष्कृत होने की स्थिति झेलनी पड़ती थी क्यों कि यह लगभग असाध्य होता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण भारत के शक्तिशाली चोल राजा राजराज प्रथम ( १००३ ईसवी ) के भारत के शानदार मंदिरों में से एक वृहदेश्वर शिवमंदिर बनवाने के पीछे भी कुष्ठ रोग से मुक्त होने की कहानी है। राजराज प्रथम कुष्ठ रोग से पीड़ित थे और इलाज करके परेशान हो गए थे। तभी उनके धर्मगुरू ने सलाह दी कि वे नर्मदा नदी से शिवलिंग लाएं और मंदिर का निर्माण कराएं। उन्होंने ऐसा ही किया औक रोग से मुक्ति भी मिली।&lt;br /&gt;संदर्भवश यहां यह वर्णित करना समीचीन होगा कि संगठित तौरपर प्राचीन काल के बाद कुष्ठ रोग से लड़ने के क्या प्रयास किए गए। भारत में १८७२ पहली बार इस रोग की जनगणना कराई गई जिसमें प्रति १० हजार की आबादी पर ५४ कोढ़ग्रस्त लोग पाए गए। तब कोढ़ग्रस्त लोगों ती तादाद १०८००० ( यानी एक लाख आठ हजार ) दर्ज की गई। १८७३ में इस रोग के वाहक बैक्टीरिया एम लेप्रेई ( माइक्रोबैक्ट्रीयम लेप्रेई ) की पहचान कर ली गई। १८९८ में लेप्रोसी एक्ट लाया गया और इसके बाद से भारत के आजाद होने के बाद इस रोग के नियंत्रण के अथक प्रयास किए गए हैं। १९५५ में आजाद भारत में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण प्रोग्राम चलाया गया। जब १९८३ में इसके उपचार की माकूल दवा खोज ली गई तो सरकार ने इस अभियान का नाम बदलकर राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन प्रोग्राम कर दिया। इसे १९७७ से लागू करके बड़े पैमाने चलाया गया। नतीजे में २००५ तक आते-आते प्रति १० हजार की जनसंख्या पर सिर्फ एक व्यक्ति कुष्ठ पीड़ित पाया गया। जबकि १९८१ में कुष्ठ रोगियों की तादाद ४० लाख थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;कुष्ठ रोग की प्राचीनता का नया साक्ष्य&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहासकारों को अब नया साक्ष्य मिला है। यह २००० ईसापूर्व का है। लगभग ४००० साल पुराने नरकंकाल में कोढ़ रोग के चिन्ह मिले हैं। यह नरकंकाल भारत में राजस्थान के उदयपुर शहर से ४० किलोमीटर उत्तरपूर्व बालथाल पुरातात्विक स्थल से खुदाई में मिला है। यह पत्थर की एक शिला से ढका हुआ था। और ऊपर से मिट्टी डाली गई थी। जमीन के जिस स्तर से यह नरकंकाल मिला है वह चाल्कोलिथिक काल यानी ३७०० से १८०० ईसापूर्व के बीच का है। इस युग के लोग बालथाल में पहाड़ों के कंदराओं या मिट्टी के ईटों से बने आश्रयस्थल ( घरों ) में रहा करते थे। चाकी पर मिट्टी के बर्तनों का निर्माण भी कर लेते थे। जौ व गेहूं की खेती करते थे। इस युग में तांबे के धारदार हथियार, चाकू, कुल्हाड़ी, भाले का प्रयोग करते थे। यहां १९९४ से १९९७ के बीच की गई खुदाई में दो कब्रें मिलीं हैं। इसके बाद १९९९ से २००२ तक चली खुदाई में तीन कब्रें मिली हैं। जिस नरकंकाल से इतिहासकारों ने कोढ़ रोग की भारत में प्राचीनता निर्धारित की है वह १९९७ की खुदाई में मिली कब्र से ताल्लुक रखता है। जमीन के इस १३वें स्तर की रेडियों कार्बन तिथि करीब ३६२० से ३१०० ईसापूर्व के बीच अनुमानित की गई है। नरकंकाल की रेडियो कार्बन तिथि और बाकी साक्ष्यों के आधार पर यह अवधारणा कायम की गई है कि इसे २५०० से २००० ईसापूर्व के बीच दफनाया गया होगा। बालथाल की पूरी पुरातात्विक खुदाई में जो ४५ रेडियो कार्बन तिथियां निर्धारित की गई हैं उनमें से ३० चाल्कोलिथिक काल की हैं। और इनकी रेडियो कार्बन तिथि ३७०० से १८०० ईसापूर्व के बीच की है। इनमें से खुदाई किए गए गड्ढों में से एफ-४ की तिथि २००० ईसापूर्व हासिल हुई है। इसी तरह डी-४ के स्तर-७ की तिथि २५५० ईसापूर्व हासिल हुई है। इसी आधार पर इतिहासकारों ने यह अनुमान लगाया है कि वह नरकंकाल, जिससे कोढ़ रोग का साक्ष्य मिला है, २५०० से २००० ईसापूर्व के मध्य दफनाया गया होगा। इतिहासकारों ने अपने शोधपत्र में विस्तार से बताया है कि किस अंग के कोढ़ग्रस्त होने के अवशेष मिले हैं। ( पूरा शोधपत्र पढ़ने के लिए &lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.plosone.org/article/info%3Adoi%2F10.1371%2Fjournal.pone.0005669"&gt;यहां क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; )। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अब जो भारत में कोढ़ रोग का २००० ईसापूर्व का नवीनतम पुरातात्विक साक्ष्य मिला है, उससे इस रोग के पूरी दुनिया में फैलने के प्रतिपादित मत को बल मिलता है। पूरी दुनिया में कोढ़ रोग के जीवाणु एम लेप्रेई के समानान्तर तौर पर दो प्रकार मिले हैं। एशिया में पहले से मौजूद टाइप-१ और पूर्वी अफ्रीका में टाइप-२ में से टाइप-२ के एशिया में ज्यादा नहीं फैलने व पूर्वी अफ्रीका में ज्यादा फैलने के साक्ष्य के आधार पर यह अवधारणा बनी कि टाइप-२ का कोढ़ रोग ४०,००० ईसापूर्व के पहले पूर्वी अफ्रीका में पनपा होगा। इसके बाद टाइप-१ के तौर पर एशिया और टाइप-३ के तौर पर यूरोप में फैला होगा। यही टाइप-३ ही पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका में व्याप्त हुआ। दूसरा प्रतिपादित मत यह है कि टाइप-२ का विकास टाइप-१ से एशिया में काफी बाद में हुआ और इसके बाद यह पूरे एशिया, अफ्रीका और यूरोप में फैला। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एक और अवधारणा है कि इतिहास के कालक्रमानुसार आखिरी १०००० साल के पृथ्वी के इतिहास, जिसे कि एज आफ मैन यानी मानव युग कहा जाता है, में इस रोग के फैलने की परिकल्पना कोढ़ रोग के जीवाणु के स्वाभविक इतिहास से ज्यादा मेल खाती है। इसमें तीनों किस्म का कोढ़ रोग मानव के संपर्क में आता है और इसके बाद पूर्वी अफ्रीका में शहरीकरण के विकास के साथ फैलता है। तदुपरान्त एक देश से दूसरे देश में व्यापारिक संपर्कों के कारण फैला। खासतौर से सिंधु सभ्यता और मध्य एशिया के व्यापारिक संपर्कों से फैला। ताम्रपाषाणकालीन युग में मध्य व पश्चिम एशिया के बाच राजनैतिक व आर्थिक संपर्कों के बाद कुष्ठ रोग फैला। मुख्यतः सपर्क के ये चार क्षेत्र थे। सिंधु घाटी में मेलुहा, मध्य एशिया में तूरान, मेसोपोटामिया और अरब प्रायद्वीप में मांगन। मेसोपोटामिया से प्राप्त साक्ष्यों के मुताबिक मेलुहा से व्यापारिक संपर्क २९०० - २३७३ ईसापूर्व से हम्मूराबी (१७९२-१७५० ईसापूर्व ) तक होता रहा। हम्मूराबी मेसोपोटामिया सभ्यता का महान शासक था। इस काल में विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक मेसोपोटामिया सभ्यता चरमोत्कर्ष पर थी। इसी तरह मेसोपोटामिया और मिस्र के बाच भी व्यापारिक संपर्क ३०५० से २६८६ ईसापूर्व के मद्य था। यह सब दोनों के पुरातात्विक स्थलों से मिले समान साक्ष्यों से प्रमाणित होता है। हालांकि ४०० ईसापूर्व यूरोप में मौजूद कोढ़ रोग मध्यकाल के बाद ही शहरी क्षेत्रों में तब फैला होगा जब इन शहरों के मध्य व्यापारिक संपर्क तेज हुआ होगा। अगर १०००० हजार पहले हिमयुग के लगभग आखिरी दौर में अगर अफ्रीका में कोढ़ रोग फैला तो काफी बाद यानी होलोसीन युग तक एशिया में फैलकर लोगों के गंभीर बीमारी बन चुका होगा। यानी तीसरी सहस्राब्दी में एशिया व अफ्रीका में एम लेप्रेई किस्म का कोढ़ रोग तब फैला जब दोनों के बीच वृहद व्यापारिक संपर्क बन चुका था। अब आगे उस भौगोलिक स्थान की पहचान की जानी चाहिए जहां से इसके होने का सबसे प्राचीनतम साक्ष्य उपलब्ध होता है। यानी सिंधु घाटी सभ्यता के खोजे गए स्थलों से मिले नरकंकालों की डीएनए जांच और रोगपरीक्षण की जानी चाहिए। इसमें भी २००० ईसापूर्व के सिंधु सभ्यता के शहरी केंद्रों को इस संदर्भ में खास ध्यान में रखना होगा। मालूम हो कि इस शोधपत्र में इसी सिंधु सभ्यता के एक उत्खनन स्थल बालथाल से मिले नरकंकाल में कोढ़ रोग के साक्ष्य ने इस रोग की प्राचीनता २००० ईसापूर्व तक पहुंचा दी है। इतिहासकारों की राय में यह आखिरी साक्ष्य नहीं है इसलिए इसमें आगे भी निरंतर खोज की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;u&gt;साभार&lt;/u&gt;-&lt;/span&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;&lt;u&gt;यह लेख कोढ़ रोग पर छपे एक शोधपत्र का सारसंक्षेप है। यह लेख पब्लिक लाइब्रेरी आप साइंस में छपा है। इस शोधकार्य में शामिल इतिहासकारों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया गया है। छपे लेख का लिंक भी इसी के साथ ही है।&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #274e13; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;Ancient Skeletal Evidence for Leprosy in India (2000 B.C.) &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #274e13; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;http://www.plosone.org/article/info%3Adoi%2F10.1371%2Fjournal.pone.0005669 &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;इतिहासकारों का विवरण&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;Gwen Robbins ( Department of Anthropology, Appalachian State University, Boone, North Carolina, United States of America) ,V M.ushrif Tripathy (Department of Anthropology, Deccan College, Deemed University, Pune, India), V. N. Misra (Indian Society for Prehistoric and Quaternary Studies, Deccan College, Deemed University, Pune, India ), R. K. Mohanty, V. S. Shinde (Department of Anthropology, Deccan College, Deemed University, Pune, India ), Kelsey M. Gray ( Department of Anthropology, Appalachian State University, Boone, North Carolina, United States of America) , Malcolm D. Schug (Department of Biology, University of North Carolina Greensboro, Greensboro, North Carolina, United States of America) &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;इस शोधपत्र की संदर्भ सूची निम्नवत है।-----&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;WHO (2008) Global Leprosy Situation, beginning of 2008. Weekly Epidemiological Record 83: 293–300. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Hutchinson J (1906) On Leprosy and Fish Eating: a statement of facts and an explanation. London: Constable. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Hulse EV (1972) Leprosy and Ancient Egypt. Lancet 2: 1024. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Bloomfield M (2004) Hymns of the Atharva Veda. Whitefish, MT: Kessinger Publishing. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Auferheide AC, Rodriguez-Martin C (1998) Cambridge Encyclopedia of Human Paleopathology. Cambridge: Cambridge University Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts C, Manchester K (2005) The Archaeology of Disease. Ithaca: Cornell University Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Zysk KG (1992) Religious Medicine: The History and Evolution of Indian Medicine. Edison, NJ: Transaction Publishers. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Pinhasi R, Foley R, Donoghue HD (2005) Reconsidering the Antiquity of Leprosy. Science 312: 846. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;McLeod K, Yates R (1981) Forms of Ch'in Law: An Annotated Translation of the Feng-chen shih. Harvard Journal of Asiatic Studies 41: 111–163. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Rawcliffe C (2006) Leprosy in Medieval England. Woodbridge: Boydell Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;WHOCDS/CPE/CEE, editor: (2005) Global Strategy for Further Reducing the Leprosy Burden and Sustaining Leprosy Control Activities. World Health Organization. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Monot M, Honore N, Garnier T, Araoz R, Coppee J-Y, et al. (2005) On the Origin of Leprosy. Science 308: 1040–1042. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Mariotti V, Dutour O, Belcastro MG, Facchini F, Brasili P (2005) Probable early presence of leprosy in Europe in a Celtic skeleton of the 4th-3rd century BC. International Journal of Osteoarchaeology 15: 311–325. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Likovsky J, Urbanova M, Hajek M, Cerny V, Cech P (2006) Two cases of leprosy from Zatec (Bohemia), dated to the turn of the 12th century and confirmed by DNA analysis for Mycobacterium leprae. Journal of Archaeological Science 33: 1276–1283. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Farley M, Manchester K (1989) The Cemetery of the Leper Hospital of St. Margaret, High Wycombe, Buckinghamshire. Medieval Archaeology 32: 82–89. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts CA The antiquity of leprosy in Britain: the skeletal evidence. In: Roberts CA, Lewis ME, K. M, editors. International Series 2002. pp. 213–222. British Archaeological Reports. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Taylor GM, Widdison S, Brown IN, Young D, Molleson TI (2000) A Mediaeval Case of Lepromatous Leprosy from 13–14th Century Orkney, Scotland. Journal of Archaeological Science 27: 1133–1338. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Moller-Christensen V (1961) Bone Changes in Leprosy. Copenhagen: Munksgaard. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Belcastro MG, Mariotti V, Facchini F, Dutour O (2005) Leprosy in a skeleton from the 7th century necropolis of Vicenne-Campochiaro (Molise, Italy). International Journal of Osteoarchaeology 15: 16–34. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Pálfi G (1991) The First Osteoarchaeological Evidence of Leprosy in Hungary. International Journal of Osteoarchaeology 1: 99–102. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Marcsik A, Fothi E, Hegyi A (2002) Paleopathological Changes in the Carpathian Basin in the 10th and 11th centuries. Acta Biologica Szegediansis 46: 95–99. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Dzierzykray-Rogalski T (1980) Paleopathology of the Ptolemaic inhabitants of the Dakhleh Oasis (Egypt). Journal of Human Evolution 9: 71–74. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Molto JE (2002) Leprosy in Roman Period Burials from Kellis 2: Dakhleh Oasis, Egypt. In: Roberts C, Lewis M, Manchester K, editors. The past and Present of Leprosy: Archaeological, Historical, and Clinical Approaches. Oxford: Archaeopress. pp. 186–196. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Blau SaY, Vadim (2005) Osteoarchaeological Evidence for Leprosy from Western Central Asia. American Journal of Physcial Anthropology 126: 150–158. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Elliot-Smith G, Dawson WR (1924) Egyptian Mummies. London: George Allen and Unwin Ltd. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Tayles N, Buckley HR (2004) Leprosy and tuberculosis in Iron Age Southeast Asia? American Journal of Physical Anthropology 125: 239–256. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Gibson S, Greenblatt C, Spigelman M, Gorski A, Donoghue HD, et al. (2002) The Shroud Cave - a unique case study linking a closed loculus, a shroud and ancient mycobacteria. Ancient Biomolecules 4: 134. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Donoghue HD, Marcsik A, Matheson C, Vernon K, Nuorala E, et al. (2005) Co-infection of Mycobacterium tuberculosis and Mycobacterium leprae in human archaeological samples: a possible explanation for the historical decline of leprosy. Proceedings of the Royal Society B 272: 389–394. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Zias J (2002) New Evidence for the History of Leprosy int he Ancient Near East: an overview. In: Roberts CA, Lewis ME, Manchester K, editors. pp. 259–268. The Past and Present of Leprosy: archaeological, historical, and clinical approaches: British Archaeological Reports. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Misra VN (2005) Radiocarbon chronology of Balathal, District Udaipur. Man and Environment 30: 54–61. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Shinde V (2000) The origin and Development of the Chalcolithic in Central India. Bulletin of the Indo-Pacific Prehistory Association 19: 115–124. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Robbins G, Mushrif V, Misra VN, Mohanty RK, Shinde VS (2007) Report on the Human Remains at Balathal. Man and Environment 31: 50–65. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Misra VN (1997) Balathal: A Chalcolithic Settlement in Mewar, Rajasthan, India: Results of First Three Seasons Excavations. South Asian Archaeology 13: 251–273. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Jain M, Tandon SK (2003) Quaternary alluvial stratigraphic development in a desert margin river, western India. Current Science 84: 1048–1055. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Jain M (2000) Stratigraphic development of some exposed Quaternary alluvial sequences in the Thar and its margins: Fluvial response to climate change, Western India. India: University of Delhi. [Unpublished doctoral dissertation]. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Phadtare NR (2000) 4000–3500 cal yr BP in the Central Higher Himalaya of India Based on Pollen Evidence from Alpine Peat. Quaternary Research 53: 122–129. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Kale VS, Rajaguru SN (1987) Late Quaternary alluvial history of the northwestern Deccan upland region. Nature 325: 612–614. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Buikstra JE, Ubelaker DH (1994) Standards for data collection from human skeletal remains. Fayetteville, Arkansas: Arkansas Archaeological Survey. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Ubelaker DH (1994) Human Skeletal Remains: Excavation, Analysis, and Interpretation. Washington D.C.: Smithsonian. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;McKern TW, Stewart TD (1957) Skeletal Age Changes in Young American Males: Analysed from the Standpoint of Age Identification. Natick, Mass.: Headquarters, Quartermaster Research and Development Command. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Brothwell DR (1981) Digging Up Bones: The Excavation, Treatment and Study of Human Skeletal Remains. Ithaca: Cornell University Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Steele DG, Bramblett CA (1988) The Anatomy and Biology of the Human Skeleton. College Station: Texas A &amp;amp; M University Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Manchester K (2002) Infective Bone Changes of Leprosy. In: Roberts C, Lewis M, Manchester K, editors. The Past and Present of Leprosy: archaeological, historical, and clinical approaches. Oxford: Archaeopress: BAR International Series. pp. 69–72. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts CA, Lewis ME, Manchester K (2002) The Past and present of leprosy: Archaeological, historical, and palaeopathological and clinical approaches. Oxford, UK: Hadrian Books. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Andersen JG, Manchester K (1992) The Rhinomaxillary Syndrome in Leprosy: A Clinical, Radiological and Paleopathological Study. International Journal of Osteoarchaeology 2: 121–129. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Ortner D (2002) Observations on the Pathogenesis of Skeletal Disease in Leprosy. In: Roberts C, Lewis M, Manchester K, editors. The Past and Present of Leprosy: archaeological, historical, and clinical approaches. Oxford: Archaeopress: BAR International Series. pp. 73–77. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Judd MA, Roberts CA (1998) Fracture Patterns at the Medieval Leprosy Hospital in Chichester. American Journal of Physical Anthropology 105: 43–55. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts CA (1999) Disability in the skeletal record: assumptions, problems and some examples. Archaeological Review from Cambridge 15: 79–97. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Cook D (2002) Rhinomaxillary Syndrome int he Absence of Leprosy: an exercise in differential diagnosis. In: Roberts C, Lewis M, Manchester K, editors. The Past and Present of Leprosy: archaeological, historical, and clinical approaches. Oxford: Archaeopress: BAR International Series. pp. 78–88. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Ortner DJ (2003) Identification of Pathological Conditions in Human Skeletal Remains. London: Academic Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Lukacs JR (1995) ‘Caries correction factor’: a new method of calibrating dental caries rates to compensate for antemortem loss of teeth. International Journal of Osteoarchaeology 5: 151–156. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts C (2007) A bioarcheological study of maxillary sinusitis. American Journal of Physical Anthropology 133: 792–807. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Roberts CA, Buikstra JE (2003) The Bioarchaeology of Tuberculosis. Orlando: University Press of Florida. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Bryant E (2004) The Quest for the Origins of Vedic Culture: The Indo-Aryan Migration Debate. Oxford: Oxford University Press. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Cust RN (1881) Pictures of Indian Life: Sketched with the Pen From 1852–1881. London: Trubner and Company. &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Paddayya K (2001) The problem of ashmounds of Southern Deccan in light of Budihal excavations, Karnataka. Bulletin of the Deccan College Post-Graduate Institute (Diamond Jubilee Volume) 60–61: 189–225. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Johansen PG (2004) Landscape, monumental architecture, and ritual : a reconsideration of the South Indian ashmounds. Journal of anthropological archaeology 23: 309–330. Find this article online &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;Possehl G (2002) The Indus Civilization &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-5527535716290264459?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/5527535716290264459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=5527535716290264459' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5527535716290264459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/5527535716290264459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2010/12/2007-212000-250000-2000-600.html' title='भारत में चार हजार साल पुराना है कुष्ठ रोग'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRtuU_c72hI/AAAAAAAAC_U/12DPkUV5v8A/s72-c/lepro.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-913086779479335299</id><published>2010-10-12T21:16:00.000+05:30</published><updated>2010-10-12T21:16:17.226+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रायसेन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूतनाथ मंदिर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायनासोर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोमनाथ मंदिर'/><title type='text'>हजारों साल पुराने 20 मंदिरों के मिले अवशेष</title><content type='html'>&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5" width="100%"&gt;&lt;th style="color:blue;background-color:yellow;" rowspan="2"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-९ )&lt;br /&gt;   अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१-रायसेन में हजारों साल पुराने मंदिर के मिले अवशेष&lt;br /&gt;२-आदि मानव खाते थे बच्चों का मांस&lt;br /&gt;३-उल्कापिंडों की बारिश से खत्म हुए डायनासोर&lt;br /&gt;४-अर्जेंटीना में 1,300 साल पुराने बर्तन मिले &lt;br /&gt;५-1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के &lt;br /&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;रायसेन में हजारों साल पुराने 20 मंदिरों के मिले अवशेष&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में हजारों साल पुराने विशाल मंदिर समूह का पता चला है। अब तक इस समूह के 20 मंदिरों के भग्नावशेष मिल चुके हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इन मंदिरों को फिर से उनके मूल स्वरूप में लाने का बीड़ा उठाया है। संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इन मंदिरों के भग्नावशेषों का जायजा लेने के बाद बताया कि ये ध्वस्त मंदिर भोजपुर के प्रसिद्ध शिव मंदिर के पास आशापुरी गांव में मिले हैं। शिव मंदिर गुजरात के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के काल का है। सोमनाथ मंदिर की तरह भोजपुर के ऐतिहासिक शिवमंदिर का भी जीर्णोद्धार किया गया है। इस मंदिर से पांच किलोमीटर दूर मिले 20 प्राचीन मंदिरों के टुकड़ों को बेशकीमती पुरा संपदा बताते शर्मा ने कहा कि इनके मिलने से पुरातत्व के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। इनमें से भूतनाथ मंदिर के भग्न अवशेषों को जोड़कर मंदिर को पुन: मूल स्वरूप में लाने का काम शुरू कर दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आशापुरी में मिले खंडहरों से साफ हुआ है कि भूतनाथ मंदिर का निर्माण हजारों बरस पहले विशाल जलाशय के तट पर किया गया था। प्रतिहार और परमार राजाओं ने यह जलाशय आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक बनवाया था। जलाशय पर विशाल घाट था जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। भूतनाथ मंदिर परमार कालीन स्थापत्य कला का भूमिज शैली में निर्मित उत्कृष्ट मंदिर था। इस पूर्वाभिमुख मंदिर के अवशेषों से पता चला है कि भूतनाथ मंदिर भी भोजपुर के शिव मंदिर की तरह विशाल था। आशापुरी गांव में भूतनाथ मंदिर के अलावा आशापुरी मंदिर, बिलोटा मंदिर, सतमसिया मंदिर आदि मिले हैं। इन मंदिरों में ब्रह्मा, नृवराह, नृसिंह, विष्णु, सूर्य, गणेश, उमा-महेश्वर, नटराज, सदाशिव, कृष्ण, महिषासुर मर्दिनी, नायिकाओं और अप्सराओं की प्रतिमाएं मिली हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशापुरी क्षेत्र मध्यभारत के मध्यकालीन वटेसर, खजुराहो, कदवाहा आदि की तरह अहम शिल्पकला केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। पुरातत्वविद् इसकी शैलीगत विशिष्टताओं का अध्ययन कर रहे हैं। ध्वस्त मंदिरों के पुनर्निर्माण के लिए चार हजार चार सौ शिलाखंडों को भूगर्भ से निकालकर सुरक्षित रखा गया है। शिल्पखंडों को सहेजने का काम भी किया जा रहा है। तीन महीने की मेहनत से भूतनाथ मंदिर काफी हद तक अपने प्राचीन भव्य स्वरूप में खड़ा होने लगा है। प्राचीन मंदिरों में कोई उत्तराभिमुख है तो कोई दक्षिणाभिमुख। कोई पूर्वाभिमुख है तो कोई पश्चिमाभिमुख। कई मंदिरों के आठवीं, नवीं और दसवीं शताब्दी में बनने का अनुमान लगाया गया है। कुछ मंदिर पंचांग शैली में निर्मित हैं। कई प्रतिमाएं शिल्प कला के लिहाज से बेजोड़ मानी गई हैं। ( जनसत्ता ब्यूरो )।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;आदि मानव खाते थे बच्चों का मांस&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूरोप में करीब आठ लाख वर्ष पूर्व आदि मानव अपने प्रतिदिन के भोजन के रूप में मानव मांस, खासकर बच्चों के मांस का भक्षण करते थे। स्पेन में मिले हडि्डयों के जीवाश्म के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों को ग्रान डोलिना की गुफा से बिजोन, हिरण, जंगली भेड़ और अन्य जीवों की हडि्डयों के साथ ही बच्चों और किशोरों के भी कटे हुए अवशेष मिले हैं। सूत्रों ने खबर दी है कि अनुसंधानकताओं को इन हडि्डयों पर कटने या अन्य चोट के निशान मिले हैं जो प्रस्तर के हथियारों के वार से पड़े होंगे। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि हडि्डयों के बीच की मज्जा को निकालने का प्रसास किया गया है और इस बात के भी प्रमाण है कि उनके मस्तिष्क को भी खाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि आदि मानव ने अपनी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने एवं अपने शत्रु पड़ोसियों से निबटने के लिए दूसरे लोगों की हत्या की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;उल्कापिंडों की वर्षा में खत्म हुए डायनासोर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डायनासोर दुनिया से कैसे गायब हुए, इसको लेकर पिछले तीन दशकों से बहस जारी है। अब एक नए अध्ययन में कहा गया है कि साढे़ छह करोड़ साल पहले उल्कापिंड की बारिश में डायनासोर का अंत हो गया। खगोलीय पिंडों की बारिश हजारों साल चली । वैज्ञानिकों ने इससे पहले मैक्सिको की खाड़ी में एक विशाल गड्ढा पाया था जो प्रागैतिहासिक काल में एक उल्का पिंड के टकराने से बना था। डेली टेलीग्राफ में प्रकाशित खबर के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने अब ऐसा ही एक और विशाल गड्ढा यूक्रेन में पाया है जो मैक्सिको की खाड़ी वाले गड्ढे से हजारों साल पुराना है और इससे इस बात की संभावना को बल मिला है कि उल्का पिंडो की बारिश में डायनासोरों का अंत हो गया। यूक्रेन के बोत्शि गड्डे की खोज 2002 में हुई थी। आबरदीन विश्वविद्यालय के प्रो. डेविड जोली की अगुवाई में वैज्ञानिकों के दल ने यूक्रेन के उस गड्ढे में एक और गड्ढा पाया जिसके बारे में उनका विश्वास है कि यह किसी और उल्का पिंड के टकराने से बने और उन दोनों उल्का पिंडों के बीच कई साल का अंतर था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;अर्जेंटीना में 1,300 साल पुराने बर्तन मिले &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्जेंटीना में एक घर से खुदाई के दौरान लगभग 1,300 साल पुराने बर्तन मिले हैं। समाचार एजेंसी ईएफई के मुताबिक माना जा रहा है कि ये बर्तन जूजू प्रांत के मूल निवासियों से संबंधित हैं। बर्तन फ्रांसो और गोंजालो को उस समय मिले जब वह अपने घर के निर्माण के लिए खुदाई का काम करवा रहे थे। उनके चाचा राबटरे काराजाना ने बताया, "40 सेंटीमीटर खुदाई करने के बाद बर्तन का टुकड़ा बरामद किया गया और बाद में धीरे-धीरे आगे की खुदाई की गई जिसके बाद ये बर्तन बरामद किए गए। हमने पुरातत्तवविदें से संपर्क किया।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिलकारा पुरातत्व संस्थान के वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि बर्तनों के अलावा कोई अन्य मूल्यवान वस्तु भी है अथवा नहीं। माना जाता है कि सैकड़ों वर्ष पहले ‘ओमागुआसा इंडियन्स’ समुदाय के इस इलाके में रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जर्मनी के अंकलाम शहर में 1200 साल पुराने चाँदी के सिक्के मिले हैं। इन पर अरबी भाषा में खुदाई है, जिससे साबित होता है कि प्राचीन काल में जर्मनी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में शामिल रहा है। कुछ सिक्कों पर शानदार नक्काशी है। गैर पेशेवर पुरातत्वशास्त्री पीटर डाखनर ने इन सिक्कों को बेहतरीन डिजाइन वाला बताया। उन्होंने कुछ स्वयंसेवियों और ग्रीफ्सवाल्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिल कर खुदाई का काम किया। जर्मनी के अंकलाम शहर के पास मेटल डिटेक्टर की मदद से खुदाई में 82 चाँदी के सिक्के मिले हैं। यहाँ चाँदी का बाजूबंद और चाँदी की कुछ सिल्लियाँ भी मिली हैं। ये सभी चीजें 20 से 25 मीटर के दायरे में पाई गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरातत्वशास्त्री मिषाएल शाइरेन का कहना है, 'इस जमाने के सिक्के बहुत दुर्लभ हैं। इतनी बड़ी संख्या में उनका यहाँ पाया जाना बड़ी बात है।' सबसे पुराना सिक्का सन 610 का बताया जा रहा है, जबकि यहाँ पाया गया सबसे नया सिक्का 820 एडी का हो सकता है। ग्रीफ्सवाल्ड यूनिवर्सिटी के इतिहासकार फ्रेड रुखोएफ्ट ने कहा, 'बाल्टिक सागर के किनारे अरबी भाषा के अक्षर खुदे हुए सिक्के मिलने से साबित होता है कि यह इलाका 1200 साल से अंतरराष्ट्रीय कारोबार के रूट में रहा है।' ये सिक्के मौजूदा वक्त के ईरान, इराक, अफगानिस्तान या उत्तरी अफ्रीका में ढाले गए हो सकते हैं। समझा जाता है कि काले सागर के कारोबारी रास्ते से होते हुए वे वोल्गा नदी से गुजरकर बाल्टिक सागर के तट तक पहुँचे। सिक्के स्लाविच बस्तियों के पास से मिले हैं। यूरोपीय और एशियाई नस्ल के मिले जुले लोगों की बस्ती स्लाविच बस्ती कही जाती थी। इतिहासकारों का मत है कि स्लाविच और वीकिंग लोगों के बीच कारोबार हुआ होगा। यूरोप के स्कैनडिनेवयाई इलाकों में वाइकिंग लोग रहते थे। यहाँ सिक्के और चाँदी के दूसरे सामान मिले हैं जिनका वजन करीब 200 ग्राम है। उनका मूल्य तो खत्म हो गया होगा, लेकिन चाँदी होने की वजह से उनका महत्व बना रहा होगा। इतिहासकारों का मानना है कि इतनी चाँदी से चार बैल या एक गुलाम खरीदा जा सकता था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-913086779479335299?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/913086779479335299/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=913086779479335299' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/913086779479335299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/913086779479335299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2010/10/20.html' title='हजारों साल पुराने 20 मंदिरों के मिले अवशेष'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-4925889854903329903</id><published>2010-09-28T22:35:00.000+05:30</published><updated>2010-12-29T23:25:23.301+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अयोध्या'/><title type='text'>अयोध्याः इंतजार एक सार्थक फैसले का</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1cduKNxI/AAAAAAAAC_s/1v4b4tge7-M/s1600/AyodhyaScene.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="249" width="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1cduKNxI/AAAAAAAAC_s/1v4b4tge7-M/s320/AyodhyaScene.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1mTnxW3I/AAAAAAAAC_0/0D4Jgd06FO8/s1600/Ayodhya1.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="259" width="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1mTnxW3I/AAAAAAAAC_0/0D4Jgd06FO8/s320/Ayodhya1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1roRIKHI/AAAAAAAAC_8/lHjKz0zPxKs/s1600/ayodhya2.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="214" width="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1roRIKHI/AAAAAAAAC_8/lHjKz0zPxKs/s320/ayodhya2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1wftLDsI/AAAAAAAADAE/9S4orsgwM_8/s1600/ayodhya3.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="143" width="108" src="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1wftLDsI/AAAAAAAADAE/9S4orsgwM_8/s320/ayodhya3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इतिहास गवाह है कि लगभग ढाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रांता भारत को लूटते और तोड़ते-फोड़ते रहे उनमें से बाबर भी एक था। जिसने भारत वर्ष में आतंक पैदा किया एवं उसे लूटा तथा तोडा। उक्त विवाद के समाधान हेतु देश के अनेक प्रधानमंत्रियों ने प्रयत्न भी किये लेकिन उनमें सत्य स्वीकार करने की क्षमता न होने के कारण समाधान पर न पहुँच सके। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने तो व्यवस्थित वार्ताओं के द्वारा वास्तव में समाधान का प्रयास करना चाहा परन्तु कुछ मजहबी हठधर्मियों के असहयोग के चलते नतीजे पर न पहुँच सके। 1936 के बाद से उक्त स्थल पर नमाज अता नही की गयी जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। शरियत के अनुसार भी उक्त स्थल मस्जिद नहीं है लेकिन तथाकथित सेकुलरवादियों ने हमेशा उक्त स्थल पर मंदिर होने के साक्ष्य हिन्दुओं से ही मांगे। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है आने वाली पीढ़ी को हमारा धर्मनिरपेक्ष वर्ग क्या देना चाहता है। झूठा इतिहास या भ्रम की स्थिति झूठ में प्रत्यारोपित राष्ट्र या बिखरी संस्कृति। समाधान को लटकाता एवं विकल्प की तलाश में भटकता उक्त वर्ग ही मुख्य जिम्मेदार है उस 6 दिसम्बर, 1992 की दुर्भाग्यशाली घटना का जिसने कभी भी जिम्मेदारी से निर्णायक बात कहने का साहस नही किया &amp;nbsp;या उन्हें इन्तजार है दूसरे भूचाल का जब लाशों के ढेर पर बैठ वे सत्ता का बंदरबाँट कर सकें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बहरहाल अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सारी सुनवाई पूरी करके साठ साल पुराने अयोध्या मामले पर फैसला देने की स्थिति में आ गई है। ३० अक्तूबर को आने वाला है फैसला। इस बार ज्यादातर पक्ष कोर्ट का फैसला मानने को तैयार हैं। हालांकि इसमें एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि नाखुश होने या राजनैतिक कारणों से यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में जाकर लटक सकता है ? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस राजनैतिक खींचतान में ही आया था 6 दिसम्बर, 1992 एक ऐसा दुर्भाग्यशाली दिन। इस दिन धार्मिक विद्वेष का ऐसा गुबार उठा संख्या बल के समक्ष अयोध्या के विवादित धार्मिक स्थल को समाप्त होना पड़ा। विवादित ढॉचा ध्वस्त हो गया परन्तु अभी भी यक्ष प्रश्न है ऐसी स्थिति आयी कैसे ।&amp;nbsp;सर्वे भवन्तु सुखिनः को आधार मानने वाला, सर्व धर्म समभाव की सुखद कल्पना लिए वसुधैव कुटुम्बकम् से गौरव की अनुभूति करने वाला, अंहिंसा परमो धर्मा का मूल वैचारिक सहिष्णु कहलाने वाला हिन्दू समाज अचानक आक्रामक कैसे हो गया। गंगा-जमुनी संस्कृति का निर्मल जल रक्त रंजित किन परिस्थितियों में हुआ। आपसी एकता के माध्यम से गुलामी की जंजीर तोड़ने वाले एक दूसरे से क्यों भय खाने लगे, विचारणीय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&amp;amp;task=view&amp;amp;id=12369&amp;amp;Itemid=43"&gt;विवाद सुलझाने की बहुत हुई हैं कोशिशें&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यदि हम अपने इतिहास पर गौर करे तो पायेगें कि 1847 से 1857 के बीच नवाब वाजिद अली शाह ने अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के झगड़े को समाप्त करने के लिए प्रयास किए। उन्होंने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जिसमें एक हिन्दू एक मुसलमान तथा एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सदस्य निष्पक्ष की भूमिका में था। जिस समिति ने उक्त स्थल के बारें में बताया ‘‘मीर बाकी ने किसी भवन की तोड़कर इसे बनवाया था क्योंकि इस पर साफ तौर पर लिखा है यह फरिश्तों के अवतरण का स्थल है। इसमें भवन का मलबा भी लगा है।’’ 1857 के समय अमीर अली तथा बहादुर शाह जफ़र ने फरमान जारी किया जिसके अनुसार ‘‘हिन्दुओं के खुदा रामचन्द्रजी की पैदाइश की जगह जो बाबारी मस्जिद बनी है वह हिन्दुओं को बाखुशी सौप दी जाये क्योंकि हिन्दु मुसलमान ना इन्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है’’ सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ 36 पर कर्नल मार्टिन ने लिखा है, अयोध्या की बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं को (मुसलमानों द्वारा) वापस देने की खबर से हममें (अंग्रेजो में) घबराहट फैल गयी और यह लगने लगा कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज खत्म हो जायेंगे। 1857 की क्रान्ति असफल होने के बाद अंग्रेजो ने 18 मार्च, 1858 में कुबेर टीला में इमली के पेड़ पर अमीर अली तथा बाबा राम चरण दास को हजारो हिन्दुओं तथा मुसलमानो के समाने फाँसी दे दी। इस सन्दर्भ में मार्टिन लिखते हैं, जिसके बाद फैजाबाद में बलवाइयों की कमर टूट गयी और तमाम फैजाबाद जिले में हमारा रौब गालिब हो गया। इस प्रकार राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद समाप्त होते होते रह गया। कुछ राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों ने भी सितम्बर 1992 में विवादित स्थल को 10 किमी दूर ले जाने का प्रस्ताव रखा परन्तु धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी सरकार तक इनकी आवाज नहीं पहुँची। मुस्लिम समाज के साहित्यकारों ने भी उक्त विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान माना। अबुल फलज 1598 ईं में अकबारनामा अइना-ए-अकबरी में उस स्थान को राम का निवास स्थान बताया। 1856 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक हदीका-ए-शहदा के पृष्ठ 4-7 के अनुसार मथुरा-बनारस-अवध की मस्जिदें, मंदिरों को तोड़कर बनायी गयी थी। 1878 ई.में हाजी मो. हसन ने अपनी पुस्तक जिया-ए-अख्तर के पृष्ठ 38-39 में राजा रामचन्द्र के महल सराय और सीता की रसोई को तुड़वाना वर्णित है। 1885 ई. में मौलवी अब्दुल करीम की पुस्तक गुलगस्ते हालात-ए-अयोध्या अवध के अनुसार भी जन्म स्थान और सीता रसोई भवनों को तोड़कर उस स्थान पर बाबर बादशाह ने एक मस्जिद बनवायी। 1909 के अल्लामा मो. जनमुलगानीखॉ रामपुरी की पुस्तक तारीखे-ए-अवध के अनुसार भी बाबर ने जन्म स्थान को मिस्मार करके मस्जिद बनवायी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1785 ई. में आस्ट्रेलिया के जेसुइट पादरी जोसेफ टीफेनथेलर जो 1766 से 1771 तक अवध में रहे जिनकी पुस्तक के पृष्ठ 252-254 जिसका अनुवाद श्री शेर सिंह आईएएस ने किया जिसमें भी एक किले जिसे राम कोट कहते थे गिरा तीन गुम्मदों वाली मस्जिद बनवाने का जिक्र है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया-सर्जन जनरल एडवर्ड वेलफेयर (1858) के अनुसार भी हिन्दुओं के कम से कम तीन पवित्र स्थलों पर मस्जिद बनवाने को जिक्र है जिसमें राम जन्म भूमि शामिल है। 1880 ई. की फैजाबाद समझौता रिपोर्ट में भी बाबर द्वारा 1528 में राम जन्म भूमि पर जिसे तोड़ मस्जिद का निर्माण बताया गया। 1881 की फैजाबाद के इम्पीरियल गजट में भी मुसलमानों द्वारा तीन मस्जिदें बनवाये जाने का जिक्र है। जो जन्म स्थान, त्रेता ठाकुर तथा स्वर्ग द्वार है। इसी प्रकार फाइजाबाद (फैजाबाद) गजेटियर ग्रन्थ एचआर नेविल के अनुसार (1928 ई.) भी 1525 में बाबर का 7 दिन अयोध्या में रूक कर प्रचीन मंदिरों को ध्वस्त करने एवं मस्जिद के निर्माण का जिक्र है। जो पृष्ठ 155 पर अंकित है। 1902 के बाराबंकी जिला गजेटियर में एक रिपोर्ट एच आर नेविल ने भी जन्म स्थान का जिक्र एवं विवाद की बात स्वीकार की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार मुस्लिम शायरों तथा विद्वानों ने विवादित स्थल पर राम मंदिर की बात स्वीकारी है। अबुल फजल मुगल काल के एक लेखक थे। जिन्होने आइना-ए-अकबरी में अवध (अयोध्या) को महापुरूष राम की निवास स्थान बताया। ‘‘औरंगजेब आलमगीर’’ में स्पष्ट (पृष्ठ संख्या 623-630) रूप से विस्तार को दिया गया काफिरों (हिन्दुओं) ने इस स्थान (राम जन्म भूमि) की मुक्ति के लिए 30 बार आक्रमण किये 1664 ई0 में ऐसे ही किये गये आक्रमण में दस हजार हिन्दू हताहत हुए। सहीफा-ए-नसैर बहादुर शाही (1700-1800) यह पुस्तक औरंगजेब की पौत्री तथा बहादुर शाह जफ़र की पुत्री बंगारू अमातुज्ज-जोहर ने लिखी है। जिसके अनुसार (पृष्ठ 4-7) मथुरा बनारस और अवध (अयोध्या) में काफिरों (हिन्दुओ) के इबादतगाह है जिन्हें वे गुनहगार व काफिर कन्हैया की पैदाइशखाना, सीता की रसोई व हनुमान की यादगार मानते हैं जिसके बारे में हिन्दू मानते है कि यह रामचन्द्र ने लंका पर फतह हासिल करने के बाद बनवाया था। इस्लाम की ताकत के आगे यह सब नस्तनाबूद कर दिया गया और इन सब मुकामों पर मस्जिद तामीर कर दी गयी। बादशाहों को चाहिए कि वे मजिस्दों को जुमे की नवाज से महरूम न रखे, बल्कि यह लाजमी कर दिया जाय कि वहॉ बुता की इबातद न हो शंख की आवाज मुसलमानों के कानों में न पहुँचे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबरी मस्जिद का विवरण पुस्तक के नवे अध्याय में जिसका शीर्षक ‘‘वाजिद अली और उनका अहद’’ में लिखा है। पहले वक्तो के सुल्तानों ने इस्लाम की बेहतरी के लिए और कुफ्र को दबाने के लिए काम किये। इस तरह फैजाबाद और अवध (अयोध्या) को भी कुफ्र से छुटकारा दिलाया गया। अवध में एक बहुत बड़ी इबादतगाह थी और राम के वालिद की राजधानी थी जहॉ एक बड़ा सा मन्दिर बना हुआ था। वहॉ एक मजिस्द तामीर करा दी गयी। जन्म स्थान का मंदिर राम की पैदाइशगाह थी जिसके बराबर में सीता की रसोई थी। सीता राम की बीबी का नाम था। उसी जगह पर बाबर बादशाह ने मूसा आसिकान की निगहबानी में एक सर बुलन्द मस्जिद तामीर करायी। वह मस्जिद आज भी सीता पाक (सीता की रसोई) के नाम से जानी जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यायिक व्यवस्था के अनुसार भी सन् 1885 में फैजाबाद जिले के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने एक नागरिक अपील संख्या 27 में कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद का निर्माण हिन्दुओं के एक पवित्र स्थल पर भवन तोड़कर किया गया है चूँकि यह घटना 356 वर्ष पूर्व की है इसलिए अब इसमें कुछ करना कठिन है। अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी। जिसका कि फैसला मध्य सितम्बर में आने की पूरी सम्भावना है। इस सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की विशेष पीठ ने 27 जुलाई, 2010 को दोनो पक्षों के अधिवक्ताओं को सिविल संहिता प्रक्रिया की धारा-89 के तहत बुलाकर समाधान के विषय पर बातचीत की परन्तु दुर्भाग्यवश सार्थक हल नहीं निकला था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-4925889854903329903?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/4925889854903329903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=4925889854903329903' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4925889854903329903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/4925889854903329903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2010/09/blog-post_28.html' title='अयोध्याः इंतजार एक सार्थक फैसले का'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TRt1cduKNxI/AAAAAAAAC_s/1v4b4tge7-M/s72-c/AyodhyaScene.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-1328598322286150784</id><published>2010-09-09T21:17:00.000+05:30</published><updated>2010-09-09T21:17:59.050+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रामजन्मभूमि-बाबरीमस्जिद'/><title type='text'>रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का इतिहास</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj2_n_L2nI/AAAAAAAABfY/buWlqRusnH0/s1600/Ayodhya1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="161" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj2_n_L2nI/AAAAAAAABfY/buWlqRusnH0/s200/Ayodhya1.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj6vCMv-RI/AAAAAAAABgQ/ySfuLHxip8k/s1600/babri_masjid_demolition.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: right; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="135" ox="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj6vCMv-RI/AAAAAAAABgQ/ySfuLHxip8k/s200/babri_masjid_demolition.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;अयोध्या में सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद का वर्तमान अध्याय 22-23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखने से शुरू हुआ था।&amp;nbsp;&amp;nbsp; शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में क़ायम कथित राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे। मगर 60 साल के लंबे सफ़र में अदालत को अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिंदू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी और क्या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है? वैसे तो हाईकोर्ट को दर्जनों वाद बिंदुओं पर फ़ैसला देना है, लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाक़ी ने बनवाया? इसी के साथ कुछ तकनीकी या क़ानूनी सवाल भी हैं। मसलन क्या जिन लोगों ने दावे दायर किए हैं , उन्हें इसका हक़ है? क्या उन्होंने उसके लिए ज़रुरी नोटिस वग़ैरह देने की औपचारिकताएँ पूरी की हैं और क्या ये दावे क़ानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर दाख़िल किए गए?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj3grPeP1I/AAAAAAAABgI/1Pva3FgkDUo/s1600/AyodhyaScene.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="155" ox="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj3grPeP1I/AAAAAAAABgI/1Pva3FgkDUo/s200/AyodhyaScene.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;अदालत को ये भी तय करना है कि क्या इसी मसले पर क़रीब सवा सौ साल पहले 1885 – 86 में अदालत के ज़रिए दिए गए फ़ैसले अभी लागू हैं। उस समय हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने मस्जिद से सटे राम चबूतरे पर मंदिर बनाने का दावा किया था, जिसे अदालत ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ऐसा होने से वहाँ रोज़- रोज़ सांप्रदायिक झगड़े और ख़ून- ख़राबे का कारण बन जाएगा। अदालत ने ये भी कहा था कि हिंदुओं के ज़रिए पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन अब इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मामले को हल करने के लिए सरकारों ने अनेकों बार संबंधित पक्षों की बातचीत कराई, लेकिन कोई निष्कर्ष नही निकला। लेकिन बातचीत में मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई अथवा नही।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;सुप्रीम कोर्ट ने भी 1994 में इस मामले में अपनी राय देने से इनकार कर दिया कि क्या वहाँ कोई मंदिर तोड़कर कोई मस्जिद बनाई गई थी। गेंद अब हाईकोर्ट के पाले में है। मसला तय करने के लिए अदालत ने ज़ुबानी और दस्तावेज़ी सबूतों के अलावा पुरातात्विक खुदाई करवाकर एक रिपोर्ट भी हासिल कर ली है, जिसमें मुख्य रूप से ये कहा गया है कि विवादित मस्जिद के नीचे खुदाई में मंदिर जैसी एक विशाल इमारत , खम्भे , एक शिव मंदिर और कुछ मूर्तियों के अवशेष मिले हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;लेकिन मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति करते हुए उसे सबूतों में शामिल न करने की बात कही है, जबकि हिंदू पक्ष इस रिपोर्ट के अपने दावे की पुष्टि में प्रमाण मानते हैंÜ&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अदालत में मुख्य रूप से चार मुक़दमे विचाराधीन हैं, तीन हिंदू पक्ष के और एक मुस्लिम पक्ष का. लेकिन वादी प्रतिवादी कुल मिलाकर मुक़दमे में लगभग तीस पक्षकार हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;सरकार मुकदमे में पक्षकार है, लेकिन उसकी तरफ़ से कोई अलग से पैरवी नही हो रही है. सरकार की तरफ़ से शुरुआत में सिर्फ़ ये कहा गया था कि वह स्थान 22/ 23 दिसंबर 1949 तक मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इसी दिन मस्जिद में मूर्तियाँ रखने का मुक़दमा भी पुलिस ने अपनी तरफ़ से क़ायम करवाया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क करके ताला लगा दिया गया था।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इमारत तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम की सुपुर्दगी में दे दी गई और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की ज़िम्मेदारी भी दे दी गई। आरोप हैं कि तत्कालीन ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर भीतर- भीतर उन लोगों का साथ दे रहे थे, जिन्होंने मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखीं. इसीलिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने के बावजूद मूर्तियां नहीं हटवाईं। जनवरी 16, 1950 को हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता गोपाल सिंह विशारद ने सिविल कोर्ट में ये अर्ज़ी दायर की कि मूर्तियों को वहाँ से न हटाया जाए और एक राम भक्त के रूप में उन्हें वहाँ पूजा अर्चना की अनुमति दी जाए।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;सिविल कोर्ट ने ऐसा ही आदेश पारित कर दिया. अदालत ने पूजा आदि के लिए रिसीवर की व्यवस्था भी बहाल रखी. इस मुक़दमे में सरकार को नोटिस देने की औपचारिकता पूरी नही की गई थी.। संभवतः इसीलिए कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और दावा दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र दास परमहंस ने दायर किया, जो उन्होंने बाद में 1989 में वापस ले लिया। फिर 1959 में हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने अदालत में तीसरा मुक़दमा दर्ज करके कहा कि उस स्थान पर सदा से राम जन्म स्थान मंदिर था और वह निर्मोही अखाड़ा की संपत्ति है, इसलिए रिसीवर हटाकर इमारत उसे सौंप दी जाए।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;निर्मोही अखाड़ा का तर्क है कि मंदिर को तोड़ने के प्रयास किए गए पर वह सफल नही हुए और हिंदू वहाँ हमेशा पूजा करते रहे. उनका यह भी कहना है कि 1934 के दंगों के बाद मुसलमानों ने डर के मारे वहाँ जाना छोड़ दिया था, और तब से वहाँ नमाज़ नही पढ़ी गई। इसलिए हिंदुओं का दावा पुख़ता हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;दो साल बाद सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और कुछ स्थानीय मुसलमानों ने चौथा मुक़दमा दायर करके कहा कि बादशाह बाबर ने 1528 में यह मस्जिद बनवाई थी और 22/ 23 दिसंबर, 1949 तक यह मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है। इतने लंबे समय तक उनका कब्ज़ा रहा। इसे मस्जिद घोषित कर उन्हें क़ब्जा दिलाया जाए।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि निर्मोही अखाड़ा ने 1885 के अपने मुक़दमे में केवल राम चबूतरे पर दावा किया था, न कि मस्जिद पर और वह अब उससे पलट नही सकता. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि अदालत का तत्कालीन फ़ैसला अब भी बाध्यकारी है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मुस्लिम पक्ष राम चबूतरे पर हिंदुओं के क़ब्ज़े और दावे को स्वीकार करता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मुस्लिम पक्ष तर्क में यह तो मानता है कि वर्तमान अयोध्या वही अयोध्या है जहां राम चन्द्र जी पैदा हुए, लेकिन बाबर ने जहाँ मस्जिद बनवाई, वह ख़ाली जगह थी।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;क़रीब चार दशक तक यह विवाद अयोध्या से लखनऊ तक सीमित रहा. लेकिन 1984 में राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से जन्म भूमि का ताला खोलने का ज़बरदस्त अभियान चलाकर इसे राष्ट्रीय मंच पर ला दिया. इस समिति के अध्यक्ष गोरक्ष पीठाधीश्वर हिंदू महासभा नेता महंथ अवैद्य नाथ ने और महामंत्री कांग्रेस नेता तथा उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना इसमें शामिल थे।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;एक स्थानीय वकील उमेश चंद्र पाण्डे की दरख़ास्त पर तत्कालीन ज़िला जज फ़ैज़ाबाद के एम पाण्डे ने एक फऱवरी 1986 को विवादित परिसर का ताला खोलने का एकतरफ़ा आदेश पारित कर दिया, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया मुस्लिम समुदाय में हुई।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इसी की प्रतिक्रिया में फ़रवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता अख़्तियार किया।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;ताला खोलने के आदेश के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय की अपील अभी भी कोर्ट में लंबित है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मामले में एक और मोड 1989 के आम चुनाव से पहले आया जब विश्व हिंदू परिषद के एक नेता और रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने एक जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में पांचवां दावा फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इस दावे में स्वीकार किया गया कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखी गईं. दावा किया गया कि जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं और वही इस संपत्ति के मालिक।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इस मुक़दमे में मुख्य रूप से ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि बादशाह बाबर ने एक पुराना राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई। दावे के समर्थन में अनेक इतिहासकारों, सरकारी गज़ेटियर्स और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला दिया गया है। यह भी कहा गया कि राम जन्म भूमि न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है। इस दावे में राम जन्म भूमि न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया। श्री अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इस तरह पहली बार विश्व हिंदू परिषद भी परोक्ष रूप से पक्षकार बना।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;याद रहे कि राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश फ़ैज़ाबाद में जन सभा कर राम राज्य की स्थापना के नारे के साथ किया था। चुनाव से पहले ही विवादित मस्जिद के सामने क़रीब दो सौ फुट की दूरी पर वीएचपी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, जो कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी का कारण बना।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;विश्व हिंदू परिषद ने 1989 में शिलान्यास से पूर्व इस मामले में कोर्ट आदेश के पालन की बात कही थी, पर अब वह संसद में कानून बनाकर मामले को हल करने की बात करती है, क्योंकि उसके मुताबिक़ अदालत आस्था के सवाल पर फ़ैसला नही कर सकती। निर्मोही अखाड़ा और विश्व हिंदू परिषद अदालत की लड़ाई में एक दूसरे के विरोधी हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;जगदगुरु स्वामी स्वरूपानंद की राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति भी 1989 में इस मामले में प्रतिवादी बनी। उनका दावा है कि पूरे देश के सनातन हिंदुओं का प्रतिनिधित्व यही संस्था करती है। उसके तर्क निर्मोही अखाड़ा से मिलते जुलते हैं। हिंदुओं की दो और संस्थाएं हिंदू महासभा और आर्य प्रादेशिक सभा भी प्रतिवादी के रूप में इस स्थान पर सदियों से राम मंदिर होने का दावा करती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इनके अलावा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कई अन्य हिंदुओं को उनकी निजी हैसियत से भी प्रतिवादी बनाया हैं। इनमे हनुमान गढ़ी के धर्मदास प्रमुख हैं। धर्मदास और निर्मोही अखाड़ा की पुरानी लड़ाई है और वह विश्व हिंदू परिषद के क़रीब हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;निर्मोही अखाड़ा ने कई स्थानीय मुसलमानों को प्रतिवादी बनाया है। मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड मुख्य दावेदार है। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने हाशिम अंसारी समेत कई स्थानीय मुसलमानों को अपने साथ पक्षकार बनाया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;उसके अलावा जमीयत-ए-उलेमा हिंद, शिया वक़्फ़ बोर्ड, आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस संस्थागत रूप से प्रतिवादी हैं। मुस्लिम पक्षों का सबका दावा लगभग एक जैसा है सिवा आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस के जिसने पहले यह कहा था कि अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात साबित हो जाए तो मुलिम अपना दावा छोड़ देंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;शुरू में इस मुक़दमे में कुल 23 प्लाट शामिल थे, जिनका रक़बा बहुत ज़्यादा था. लेकिन छह दिसंबर को विवादित मस्जिद ध्वस्त होने के बाद 1993 में केंद्र सरकार ने मामला हल करने और मंदिर मस्जिद दोनों बनवाने के लिए मस्जिद समेत 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;ज़मीन अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराते हुए 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अब केवल उस स्थान का मालिकाना हक़ तय करना है जहाँ पर विवादित मस्जिद थी।&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;इस तरह अब मात्र क़रीब आधा बिस्वा ज़मीन का मुकदमा बचा है। जीतने वाले पक्ष को अगल-बग़ल की अधिग्रहीत भूमि ज़रुरत के मुताबिक मिलेगी। कहने को यह आधा बिस्वा ज़मीन का मामला है लेकिन करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों की भावनाएं अब इससे जुड़ गई हैं। अदालत और समूची न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इससे जुडी है. अदालत के फ़ैसले को लागू कराना सरकार का दायित्व होगा। इसलिए सब मिलाकर यह मामला पूरे भारतीय समाज और संवैधानिक-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है। &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(साभार बीबीसी )&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-1328598322286150784?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/1328598322286150784/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=1328598322286150784' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1328598322286150784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/1328598322286150784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का इतिहास'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TIj2_n_L2nI/AAAAAAAABfY/buWlqRusnH0/s72-c/Ayodhya1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-8494260840190404633</id><published>2010-08-22T18:28:00.000+05:30</published><updated>2010-08-22T19:19:20.029+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महान सम्राट अशोक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नीतिश कुमार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नालंदा विश्वविद्यालय'/><title type='text'>नालंदा विश्वविद्यालय - बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया, अब बख्तियारपुर का नीतिश इसे जिंदा करेगा !</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/THEThaylVjI/AAAAAAAABeI/WwL16mtArSQ/s1600/Nalanda-sariputta+stup.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc; font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;img border="0" height="143" ox="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/THEThaylVjI/AAAAAAAABeI/WwL16mtArSQ/s400/Nalanda-sariputta+stup.jpg" width="480" /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc; font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt; नालंदा में सारिपुत्त स्तूप का अवशेष।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/THEU4lTTKMI/AAAAAAAABeo/fo_xrF-RsJI/s1600/Nalanda.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" ox="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/THEU4lTTKMI/AAAAAAAABeo/fo_xrF-RsJI/s640/Nalanda.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc; font-size: x-small;"&gt;&lt;strong&gt;नालंदा में प्राचीन विश्वविद्यालय के स्थल पर कुछ बौद्ध भिक्षु ( सभी फोटो विकीपीडिया से साभार ।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;u&gt;भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय &lt;span style="color: red;"&gt;तक्षशिला विश्वविद्यालय&lt;/span&gt; की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी &lt;span style="color: red;"&gt;नालंदा विश्वविद्यालय&lt;/span&gt; की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्माण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतमबुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। &lt;span style="color: red;"&gt;केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतमबुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ा केंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया।&lt;/span&gt; बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतमबुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५० ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवाया था।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। &lt;/strong&gt;गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी और पराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। &lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AF"&gt;( प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक विवरण देखने के लिए यहां क्लिक करें।)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध शिक्षाकेंद्र के तौर पर पहचान बन चुके इस विश्वविद्यालय को अंततः&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने ११९९ ईसवी में जलाकर नष्ट कर दिया। अब बख्तियारपुर के नीतिश कुमार, जो अभी बिहार के मुख्यमंत्री हैं, के प्रयासों से फिर नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया है।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; १६ देशों की मदद से इसके निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। भारत के नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की देखरेख में इसकी रूपरेखा तय की जा रही है। &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;यह तो तय है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की तरह यह सिर्फ बौद्ध शिक्षा का केंद्र नहीं रहेगा लेकिन इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवित करने के विधेयक को मंजूरी दे चुके राज्यसभा सदस्यों को उम्मीद है कि प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर दुनिया में भारत का नाम उसी तरह रोशन करेगा जैसा कि प्राचीन काल में था।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; इसी उम्मीद के साथ नालंदा विश्वविद्यालय विधेयक 2010 को राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लंबे अंतराल के बाद शनिवार को राज्यसभा में एक सार्थक और सारगर्भित चर्चा देखने को मिली। सभी दलों के सदस्यों ने इस विश्वविद्यालय के तमाम पहलुओं पर अपनी राय जाहिर की। सांसदों के सुझावों में विश्वविद्यालय की इमारत के वास्तुशिल्प से लेकर इसमें पढ़ाए जाने वाले विषय भी शामिल थे। यह विधेयक गत 12 अगस्त को राज्यसभा में पेश किया गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर स्थित बड़ा गांव में आज भी नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष मौजूद हैं। राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में बड़ा गांव के पास &lt;strong&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;।अपनी ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबिक पांचवीं सदी में दुनिया के तमाम देशों के करीब 10 हजार विद्यार्थी वहां शिक्षा ग्रहण करते थे। कहा जाता है कि तत्कालीन नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय काफी समृद्ध था। उसकी इमारत नौ मंजिल की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; विधेयक के मुताबिक नया नालंदा विश्वविद्यालय परिसर 441 एकड़ में बनेगा। विदेश राज्यमंत्री परनीति कौर के मुताबिक इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में इतिहास, व्यापार प्रबंधन, भाषा, पर्यावरण एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया जाएगा। इसकी इमारत के वास्तुशिल्प का चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के जरिए किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वरिष्ठ सदस्य डा. कर्ण सिंह ने चर्चा के दौरान कहा कि इतिहास बताता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में चीन, जापान, मंगोलिया, अफगानिस्तान, तिब्बत एवं अन्य देशों से शोधार्थी आते थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि नया नालंदा विश्वविद्यालय ऑक्सफर्ड एवं अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों से ज्यादा बेहतर होगा। सीताराम येचुरी ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दिलचस्प है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने नष्ट करवाया था। आज उसको पुन: जीवित कराने में बख्तियारपुर के ही एक व्यक्ति (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार) की महत्वपूर्ण भूमिका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजेपी के बाल आप्टे का सुझाव था कि इस विश्वविद्यालय को विदेश मंत्रालय के बजाय शिक्षा मंत्रलाय के अधीन होना चाहिए था। बीएसपी के युवा सदस्य प्रमोद कुरील का सुझाव था कि नए विश्वविद्यालय का वास्तुशिल्प पुराने विश्वविद्यालय जैसा ही होना चाहिए। ताकि यह अहसास हो कि ज्ञान का प्राचीन केंद्र पुनर्जीवित हो रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Nalanda"&gt;नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.nalanda.nitc.ac.in/about/nalandaheritage.html"&gt;नालंदा विश्वविद्यालय &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2655966365516319494-8494260840190404633?l=aajkaitihas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/feeds/8494260840190404633/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2655966365516319494&amp;postID=8494260840190404633' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8494260840190404633'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2655966365516319494/posts/default/8494260840190404633'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aajkaitihas.blogspot.com/2010/08/blog-post_22.html' title='नालंदा विश्वविद्यालय - बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया, अब बख्तियारपुर का नीतिश इसे जिंदा करेगा !'/><author><name>मान्धाता सिंह</name><uri>https://profiles.google.com/107497449089688228963</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh6.googleusercontent.com/-o_diowuOaJg/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAD7E/x-l6hPMroP8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/THEThaylVjI/AAAAAAAABeI/WwL16mtArSQ/s72-c/Nalanda-sariputta+stup.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2655966365516319494.post-1727985710142793125</id><published>2010-08-17T21:35:00.000+05:30</published><updated>2010-08-17T22:29:28.264+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बृहदेश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बृहदीश्वर'/><title type='text'>एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर</title><content type='html'>&lt;table border="1" cellpadding="5" cellspacing="5" width="100%"&gt;&lt;th style="color:blue;background-color:yellow;" rowspan="2"&gt;खबरों में इतिहास ( भाग-८)&lt;br /&gt;अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करता है, जो इतिहास, पुरातत्व या मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित होंगी। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।&lt;br /&gt;१-एक हजार साल का हुआ तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर&lt;br /&gt;२-हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव&lt;br /&gt;३-दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल &lt;br /&gt;४-डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास &lt;br /&gt;५-3500 साल पुराना कंगन मिला &lt;br /&gt;&lt;/th&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TGqxOyQYsuI/AAAAAAAABds/TBLdaoB2knU/s1600/brihadeshwar" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" ox="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_T2ndTHPWefc/TGqxOyQYsuI/AAAAAAAABds/TBLdaoB2knU/s400/brihadeshwar" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तमिलनाडु के ऐतिहासिक तंजौर कस्बे में स्थित चोल राजवंश के समय के एक विशाल मंदिर को एक हजार साल पूरे हो गये हैं और यहां महोत्सव की तैयारी चल रही है। राज्य सरकार विशालकाय बृहदीश्वर मंदिर के एक हजार साल पूरे होने पर अनेक सांस्कृतिक आयोजन करने जा रही है। यह मंदिर अब यूनेस्को के ‘ग्रेट लिविंग चोला मंदिरों’ में शामिल है। 26 सितंबर से शुरू हो रहे दो दिन के उत्सव के दौरान तंजौर सांस्कृतिक केंद्र की तरह बन जाएगा, जहां पूरे शहर भर में कलाकार प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा 100 ओडुवर :मंदिर में गायन प्रस्तुति देने वाले: पवित्र पुस्तक तिरुमुरई का पाठ पढ़ेंगे, जिसमें भगवान शिव के लिए तमिल में गीत और मंत्र लिखे हैं। इस मौके पर जानीमानी नृत्यांगना पद्मा सुब्रमण्यम के निर्देशन में एक हजार कलाकार नृत्य प्रस्तुति देंगे। ( भाषा )।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; देश के सबसे विशालकाय मंदिरों में से एक बृहदेश्वर अथवा बृहदीश्वर मन्दिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। इसे तमिल भाषा में बृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है । इसका निर्माण 1003-1010 ई. के बीच चोल शासक राजाराज चोल एक ने करवाया था । उनके नाम पर इसे राजराजेश्वर मन्दिर का नाम भी दिया जाता है । चोल शासकों ने मंदिर को राजराजेश्वरम नाम दिया था, लेकिन बाद में तंजौर पर चढ़ाई करने वाले मराठा और नायक शासकों ने इसे बृहदीश्वर मंदिर नाम दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यह मंदिर काफी बड़े परिसर में फैला है तथा तंजौर के किसी भी हिस्से से इसे देखा जा सकता है। इसके अलावा भगवान शिव की सवारी के रूप में मान्य ‘नंदी’ की भी यहां बहुत बड़ी मूर्ति है।मंदिर के गर्भगृह में दुर्लभ पेंटिंग्स हैं, जिनके बारे में कुछ दशक पहले तक जानकारी न के बराबर थी। दरअसल पेंटिंग्स की हालत बहुत खराब होने के कारण इन तक पहुंच पाना मुश्किल था। राज्य सरकार मंदिर के ढांचे में सुधार के लिए 25.19 करोड़ रुपये खर्च करने वाली है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी ली है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह अपने समय के विश्व के विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था । इसके तेरह (13) मंजिले भवन (सभी हिंदू अधिस्थापनाओं में मंजिलो की संख्या विषम होती है ।) की ऊंचाई लगभग 66 मीटर है । मंदिर भगवान शिव की आराधना को समर्पित है । यह कला की प्रत्येक शाखा - वास्तुकला, पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रांकन, नृत्य, संगीत, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का भंडार है। यह मंदिर उत्कीर्ण संस्कृत व तमिल पुरालेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पाषाण पर यह कलश स्थित है, अनुमानत: उसका भार 2200 मन ( 80 टन) है और यह एक ही पाषाण से बना है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य शिवलिंग को देखने पर उनका वृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है। मंदिर में प्रवेश करने पर गोपुरम्‌ के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर नंदी जी विराजमान हैं। नंदी जी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी तथा 3.7 मीटर ऊंची है। भारतवर्ष में एक ही पत्थर से निर्मित नंदी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है। &lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;डेढ़ अरब साल पुराना है जीवन का इतिहास&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम अफ्रीका से वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जीवाश्म खोजा है जिसने इस बात की संभावना जगाई है कि धरती पर बहुकोशिकीय जीवन का इतिहास कम से कम डेढ़ अरब साल से भी अधिक पुराना है। नए पाए गए जीव की संरचनात्मक जटिलता एक नई बहस छेड़ सकती है। गैबन की पहाड़ियों से पाया गया यह जीव साधारण आँखों से देखा जा सकता है और इसने विकास की कहानी को थोड़ा पीछे धकेल दिया है। अध्ययन को अंजाम देने वाले पोइटियर्स विश्वविद्यालय के अब्दुल रज्जाक अल अल्बानी ने बताया कि काफी समय से माना जाता रहा है कि जटिल बहुकोशिकीय जीवन की उत्पत्ति 60 करोड़ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है, लेकिन यह 2.1 अरब साल पुरानी है। इस खोज को प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक वैज्ञानिकों की यह समझ रही है कि 60 करोड़ साल से पहले दुनिया पर एककोशिकीय जीवाणु का वर्चस्व था, लेकिन बस्तियों में रहने वाले इस नए जीव की खोज से मालूम होता है कि जटिलता की ओर विकास जल्द ही शुरू हो गया था। (भाषा) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;दस करोड़ साल पहले धरती पर थे बिल्ली जैसे घड़ियाल&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस करोड़ साल पहले धरती पर डायनोसोरों के साथ बिल्ली जैसे दिखने वाले घड़ियाल रहा करते थे। इस नई खोज ने जीवन के विकास के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बिल्ली के आकार के पकासुचुस कपिलीमई के पैर अपेक्षाकृत लंबे होते थे और उनकी नाक कुत्तों जैसी होती थी। इन प्राणियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके दाँत स्तनधारी जीवों की भाँति होते थे, जिससे उन्हें चबाने की शक्ति मिलती थी। तंजानिया के तट से मिले साढ़े करोड़ साल पुराने घड़ियाल के जीवाष्म को उतने ही पुराने साढ़े करोड़ साल पुराने पत्थरों से वैज्ञानिकों ने प्राप्त किया। ओहाइयो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया कि अफ्रीका के मैदान में यह पानी से दूर रहते थे और कीट-पतंगे खाते थे। प्रो. पैट्रिक ओकोन्नोर ने इस खोज की अगुवाई की। उन्होंने बताया क पहली नजर में यह घड़ियाल स्तनधारी जैसा लगता है। उसका सर आपकी हथेली में समा जाएगा। अगर आप उसके दाँत देखेंगे तो आपको लगेगा नहीं कि वह घड़ियाल था। वह विचित्र तरह का सरीसृप था। (भाषा) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;हिम युग के समय जीवित बच सकते थे मानव&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिम युग के समय अगर मानव ने अफ्रीका के दक्षिणी तट ‘गार्डन ऑफ ईडन’ में शरण ली होती तो वे शायद जीवित बच सकते थे। वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन से लगभग 240 मील पूर्व में अलग-अलग गुफाओं से मानव-निर्मित कलाकृतियाँ मिली हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जगह धरती पर एकमात्र स्थान था जहाँ हिमयुग के दौरान भी जीवन के लिए अनुकूल स्थिति मौजूद थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि लगभग 195,000 वर्ष पहले दुनिया का तापमान जब अचानक बदला और हिम युग आया तब इस क्षेत्र में रहने वाले लोग खुद को बचाने में सफल हुए होंगे। ‘डेली मेल’ की ख
