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Wednesday, July 4, 2012

सेतु समुद्रम परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग व्यावाहारिक नहीं: रिपोर्ट

   केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पचौरी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सेतु समुद्रम परियोजना के लिए पौराणिक राम सेतु को छोड़कर वैकल्पिक मार्ग आर्थिक और पारिस्थितिकी रूप से व्यावहारिक नहीं है।
न्यायमूर्ति एचएल दत्तू और न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की खंडपीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल रोहिंटन नरीमन ने सोमवार को पर्यावरणविद आरके पचौरी की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की 37 पेज की रिपोर्ट पेश की। उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट पर अभी केंद्रीय मंत्रिमंडल को विचार कर फैसला लेना है। समिति ने इस परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं के विश्लेषण के आधार पर अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राम सेतु को सुरक्षित रखने के इरादे से इस परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग स्वीकार्य विकल्प नहीं है। यह जनहित में भी नहीं होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि धनुषकोडि के पूर्व से वैकल्पिक मार्ग निकालने का सुझाव आर्थिक और पारिस्थितिकी रूप से व्यावहारिक नहीं है।’
समिति ने गहन विश्लेषण और जोखिम प्रबंधन के महत्व का जिक्र करते हुए वैकल्पिक मार्ग की आर्थिक व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद नाजुक इलाके में किसी परियोजना की आर्थिक व्यावहारिकता का पता लगाने के लिए और अधिक विश्लेषण करना होगा। न्यायालय ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद इस परियोजना पर स्थिति साफ करने के लिए केंद्र सरकार को आठ सप्ताह का समय दिया।
सेतु समुद्रम परियोजना शुरू  होते ही पौराणिक रामसेतु के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं के कारण ही सेतु समुद्रम परियोजना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई थी। इन याचिकाओं में कहा गया था कि इस परियोजना से पौराणिक महत्व का रामसेतु क्षतिग्रस्त हो सकता है। सेतु समुद्रम परियोजना का उद्देश्य पौराणिक पुल राम सेतु के बीच से रास्ता बनाकर भारत के दक्षिणी हिस्से के इर्द-गिर्द समुद्र में छोटा नौवहन मार्ग तैयार करना है। सेतु समुद्रम परियोजना के तहत प्रस्तावित नौवहन मार्ग 30 मीटर चौड़ा, 12 मीटर गहरा और 167 किलोमीटर लंबा होगा।
इस मामले के तूल पकड़ने और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रधानमंत्री ने आरके पचौरी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। न्यायालय ने सरकार से कहा था कि वह पौराणिक राम सेतु को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए वैकल्पिक मार्ग की संभावना तलाशे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में आर्थिक और पारिस्थितिकी बिंदुओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं के आकलन के बाद वैकल्पिक मार्ग की व्यवहारिकता पर कई सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में परियोजना के आर्थिक पहलू का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि वैकल्पिक मार्ग 4-ए के अवलोकन से पता चलता है कि इससे 12 फीसद की दर से आमदनी का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि इससे इसकी व्यावहारिकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक राम सेतु के बारे में कहा जाता है कि भगवान राम की बंदर-भालुओं की सेना ने लंका के राजा रावण तक पहुंचने के लिए इस पुल को बनाया था।
केंद्र सरकार ने 19 अप्रैल को राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने पर कोई कदम उठाने से इनकार करते हुए न्यायालय से ही इस पर फैसला करने का आग्रह किया था। सरकार ने कहा था कि वह 2008 में दायर अपने पहले हलफनामे पर कायम रहेगी जिसे राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने मंजूरी दी थी। इसमें कहा गया था कि सरकार सभी धर्मों का सम्मान करती है। भगवान राम और राम सेतु के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने पर संघ परिवार की नाराजगी के बाद शीर्ष अदालत ने 14 सितंबर 2007 को केंद्र सरकार को 2,087 करोड़ रुपए की परियोजना की नए सिरे से समीक्षा करने के लिए समूची सामग्री के फिर से निरीक्षण की इजाजत दी थी। (नई दिल्ली, 2 जुलाई (भाषा)।)
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