Tuesday, April 3, 2012

मणिपुर के गुम आदिवासियों की 3000 साल बाद घर जाने की बेचैनी


खबरों में इतिहास
  अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए यह ब्लाग  इतिहास की नई खोजों व पुरातत्व, मिथकीय इतिहास वगैरह से संबंधित खबरों को संकलित करके पेश करता है। अगर आपके पास भी ऐसी कोई सामग्री है तो मुझे drmandhata@gmail पर हिंदी या अंग्रेजी में अपने परिचय व फोटो के साथ मेल करिए। इस अंक में पढ़िए--------।
१-गुम आदिवासियों की 3000 साल बाद घर जाने की बेचैनी
२-प्राचीन ग्रह प्रणाली की खोज
३- दम तोड़ रही है 19 वीं सदी में शुरू हुई कालीघाट पेंटिंग


गुम आदिवासियों की 3000 साल बाद घर जाने की बेचैनी
भारत में कुछ लोग प्रार्थना कर रहे हैं। उनकी तमन्ना है कि 3000 साल बाद वह किसी तरह अपने घर लौट जाएं। गुम आदिवासी कहे जाने वाले ये लोग मणिपुर पहुंच गए हैं, लेकिन वे हैं कहां के और हजारों साल अपने घर से दूर कैसे रहे। भारत हमारा देश नहीं है,' 72 साल के हानियल रुएबन जब यह कहते हैं तो उनकी आंखों से बेबसी और पराएपन का भाव छलक जाता है। वह छोटी सी कम्युनिटी के सबसे बुजुर्ग सदस्य हैं, जो मणिपुर के एक सिनेगॉग (यहूदी मंदिर) में अपने लोगों के साथ प्रार्थना करने पहुंचे हैं। ये जाति है यहूदियों की कुकी चिन मीजो और समझा जाता है कि इन लोगों को 720 ईसा पूर्व में इसराइल से भागना पड़ा। उस वक्त इसराइल पर मेसोपोटामिया सभ्यता के असीरियाई लोगों ने कब्जा कर लिया था। बाइबिल में जिन कुछेक गुम जातियों का जिक्र है, उनमें ये लोग भी शामिल होने का दावा करते हैं। रुएबन का कहना है, 'हमारे पूर्वज यहां आकर बस गए। लेकिन हमारा असली घर इसराइल है। हम एक दिन जरूर अपने घर, अपने लोगों को साथ जाकर रहने में सफल होंगे।'

दर दर भटके : इल समुदाय को बनाई मेनाशा कहते हैं, जो कुकी चिन मीजो नाम के आदिवासियों में गिने जाते हैं। इनकी संख्या करीब 7200 है। ये लोग म्यांमार की सीमा के पास मिजोरम और मणिपुर में रहते हैं। उनका इतिहास लिखित नहीं, मौखिक है। वे लोग बताते हैं कि किस तरह फारस, अफगानिस्तान, चीन और तिब्बत से उनके तार जुड़े। ये यहूदी धर्म की रिवायतों का पालन करते हैं। भारत आने के बाद मिशनरियों की वजह से ये लोग ईसाई बन गए। लेकिन बाइबिल पढ़ते हुए ही इन्हें अपने बारे में जानकारी मिलती रही और इनका दावा है कि वे जो आस्था रखते हैं, वह तो यहूदियों का है। रुएबन का कहना है, 'हम गुम आदिवासियों में हैं।' उनके दोमंजिला लकड़ी के मकान में एक यहूदी कैलेंडर टंगा है और मुख्यद्वार के पास पवित्र पुस्तक तोरा की कुछ पंक्तियां लगी हैं। मणिपुर की राजधानी इम्फाल में जब वह दिन में तीन बार प्रार्थना करते हैं, तो उनका चेहरा पश्चिम की तरफ होता है, जिधर यहूदियों का पवित्र शहर येरुशलम है।

कितना सच्चा दावा : हालांकि कुकी चिन मीजो के लोग उनके दावों को खारिज करते हैं। इस बारे में 1980 में पहली बार पता चला। उसके बाद से यहूदी संगठन इनके संपर्क में आने लगे। 1990 के दशक में कुछ लोगों को इसराइल ले जाया गया, उनका धर्मांतरण करके उन्हें यहूदी बनाया गया। कुछ लोग वहीं बस गए। लेकिन 2005 में बड़ी बात हुई, जब इसराइल के मुख्य रब्बी ने इस पूरे समुदाय को इसराइलियों का हिस्सा बताया और कहा कि उन्हें घर लौटने का अधिकार है। लेकिन 2007 में इसराइल में बनी सरकार ने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। बाद में 2011 में मंत्रीस्तरीय समिति ने इसके लिए हरी झंडी दे दी और बनाई मेनाशा के 7200 लोगों को इसराइल ले जाने की तैयारी हो रही है। यहूदियों के संगठन शवाई इसराइल का भारत में प्रतिनिधित्व करने वाले योशानन फालतुआल का कहना है, 'यह एक विशाल प्रोजेक्ट है। यह बहुत जटिल काम है क्योंकि इसमें कई सरकारों का योगदान चाहिए।' शवाई इसराइल के प्रमुख माइकल फ्रोएंड ने भी इस अभियान को लेकर काफी काम किया है। उनका कहना है कि भले ही यह मुश्किल काम हो, लेकिन हो जाएगा। फ्रोएंड का कहना है, 'यह एक सरकारी काम है और किसी भी सरकारी काम की तरह इसमें वक्त लगेगा। हमें उम्मीद है कि जल्द ही अच्छी खबर सुनने को मिलेगी और बनाई मेनाशा के लोग अपने घर लौट सकेंगे।'

मणिपुर में मुश्किलें : इस समुदाय को कई मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता है। ताल्या बेम 45 साल की विधवा हैं और उनके तीन बच्चे हैं। बेम का कहना है, 'मैं यहूदी हूं। भारत में पैदा हुई हूं लेकिन मेरा दिल इसराइल के साथ है। हम यहां तोरा के बताए तरीकों पर नहीं जी पाते। मैं वहां जल्द से जल्द जाना चाहती हूं।' बनाई मेनाशा समुदाय के लोग मणिपुर के रेस्तरां में खाने नहीं जाते। वे सड़क किनारे खोमचे लगाने वालों से सामान नहीं खरीदते। उनका कहना है कि यहां बिकने वाला गोश्त कोशर नहीं होता। यहूदी जिस तरह से खाने के लिए जानवरों को मारते हैं, उसे कोशर कहते हैं। उन्हें डर लगा रहता है कि कहीं खाने में पोर्क न मिल जाए। मणिपुर में बहुत गरीबी है, जबकि इसराइल एक संपन्न देश है। अगर इन लोगों को वहां जाने की इजाजत मिल गई, तो जाहिर है कि इनका रहन सहन भी बदल जाएगा। हालांकि इन लोगों का कहना है कि वे धार्मिक आस्था की वजह से इस्राएल जाना चाहते हैं, पैसों या जीवनस्तर के लिए नहीं। 3000 साल तक इंतजार करने के बाद अब ये देख रहे हैं कि यह इंतजार और कितना लंबा होता है। (साभार- एएफपी)

प्राचीन ग्रह प्रणाली की खोज
 यूरोप के खगोलशास्त्रियों ने एक प्राचीन ग्रह प्रणाली को खोज निकाला है। उनका दावा है कि यह 13 अरब वर्ष पहले सबसे पुराने ब्रह्मांड का उत्तरजीवी है। जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टिट्यूट फॉर एस्ट्रोनॉमी की नेतृत्व वाले एक दल का कहना है कि ग्रह प्रणाली में ‘एचआईपी 11952’ नामक तारा तथा दो ग्रह हैं । दोनों ग्रहों क्रमश: 290 और सात दिन में कक्षा की परिक्रमा पूरी करते हैं।
खगोलशास्त्रियों का कहना है कि इससे शुरूआती ब्रह्मांड में ग्रहों के निर्माण के बारे में जानकारी हासिल होगी। इस ग्रह प्रणाली का तारा ‘एचआईपी 11952’ पृथ्वी से 375 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। (एजेंसी)

  दम तोड़ रही है 19 वीं सदी में शुरू हुई कालीघाट पेंटिंग
कोलकाता के प्रख्यात काली मंदिर के आसपास कभी कालीघाट पेंटिंग की धूम रहती थी जो कालांतर में नदारद होती चली गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय इस शहरी लोक कला को दशकों बाद एक किताब के माध्यम से फिर से खोजने की कोशिश की गई है।
लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम (वीएंडए) और कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल हाल के दुर्लभ संग्रह की कई कृतियों के बारे में लोगों को जानकारी नहीं है। अब मैपिन प्रकाशन की ‘कालीघाट पेंटिंग्स’ में कला प्रेमियों को इस दुर्लभ खजाने की जानकारी मिल सकेगी।
बांग्ला में ‘पट’ कहलाने वाली कालीघाट पेंटिंग 19 वीं सदी में शुरू हुई और शहरी लोक कला के तौर पर लोकप्रिय हो गई। इस परंपरागत चित्रकारी से जुड़े कलाकार पटुआ कहलाते थे और कालीघाट मंदिर के समीप उनकी छोटी-छोटी गुमटियां लगती थीं।
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम के निर्देशक मार्टिन रोथ ने बताया, ‘19 वीं सदी में कोलकाता के सामाजिक परिवेश में पटुआ फैले हुए थे। धीरे-धीरे उनकी ख्याति फैलती गई और बीसवीं सदी के भारतीय और यूरोपीय कलाकार उनकी कला से प्रेरित होने लगे।’
गौरतलब है कि विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में कालीघाट पेंटिंग का दुनिया का सबसे बड़ा संग्रह है। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में कालीघाट पेंटिंग की परंपरा फीकी पड़ने लगी। नए दौर का असर कालीघाट पेंटिंग पर भी पड़ा और परंपरागत तकनीक तथा आइकॉनोग्राफी की जगह जलरंग (वाटर कलर) तथा पश्चिमी प्रभाव ने ले ली।
नई किताब ‘कालीघाट पेंटिंग’ में इस लुप्तप्राय: कला को कोलकाता के सामाजिक सांस्कृतिक और ग्रामीण बंगाल के प्ररिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की गई है। किताब में 1873 के बहुचर्चित तारकेश्वर मामले का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि कई कालीघाट पेंटिंग्स में इस मामले को दर्शाने की कोशिश की गई। तत्कालीन बांग्ला सरकार के एक कर्मचारी को जब पता चला कि उसकी पत्नी इलोकेशी का तारकेश्वर मंदिर के पुजारी के साथ संबंध है तो उसने अपनी पत्नी का सिर काट डाला और पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। ब्रिटिश अदालत ने उसे और पुजारी दोनों को दोषी ठहराया था।
किताब के एक अध्याय में बताया गया है कि कालीघाट पेंटिंग्स में उस दौर के सामाजिक धार्मिक ढांचे में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुरीतियों को भी दिखाया गया। इसके अलावा भगवान कृष्ण की लीलाएं, रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों की कहानियों पर सामाजिक विसंगतियों पर तथा सम-सामयिक विषयों पर भी कालीघाट पेंटिंग के जरिए अभिव्यक्ति दी गई।
1870 के दशक में कालीघाट के ‘पटुआ’ को मजाक में कोलकाता के ‘बाबू’ कहा जाने लगा। फिर कोलकाता में नई शहरी संस्कृति के उदय के साथ ही एक ‘बाबू संस्कृति’ भी चलन में आई। रहन-सहन और चाल ढाल में आया यह बदलाव बहुत कुछ बदलता गया। किताब के अंतिम अध्याय में 21 वीं सदी की कला और मेदिनीपुर तथा बीरभूम जिलों के समकालीन कलाकारों की कला का भी जिक्र है। ( भाषा)
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