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कैमूर की पहाड़ियों में मिले मध्य पाषाण काल के कई दुर्लभ अवशेष आज भी उपेक्षित

>> Tuesday, September 20, 2011


  मानव विकास के इतिहास के साक्षी हैं ये शैल चित्र

 मध्य प्रदेश के भीमबेटका के मध्य पाषाण काल के आसपास के शैल चित्रों (रॉक पेंटिंग) पर दुनिया की नजर पड़ने के बाद यूनेस्को ने इसके ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे विश्व धरोहर का दर्जा दे दिया, लेकिन बिहार के रोहतास जिले की कैमूर पर्वतीय शृंखला में हाल ही में मिले मध्य पाषाण काल के शैल चित्रों सहित न जाने ऐसे कितने दुर्लभ अवशेष है, जो आज भी उपेक्षित हैं।
कैमूर की पहाड़ियों और तलहटियों में कुछ पुरातत्व विज्ञानियों, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जानकारों ने जिन शैल चित्रों की खोज की है अभी उससे कहीं अधिक धरोहर अनछुई हैं। एक उत्साही इतिहासकार ने हाल में खोज कर उसे दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है।
इतिहासकार डा श्याम सुंदर तिवारी ने रोहतास में नौहट्टा, तिलौथू और आसपास के क्षेत्र में कैमूर पर्वतीय इलाके में दर्जनों शैल आश्रय (रॉक शेल्टर) में शैल चित्रों की खोज की है। बीएचयू के पुरातत्त्ववेत्ता प्रो बीपी सिंह के साथ सेन्हुआर, पैसरा, खैरडही, नरहन और अगियाबीर जैसे स्थानों पर शैल चित्र के शोध कार्य में सहयोग कर चुके तिवारी मानते हैं कि उन्होंने जिन शैल चित्रों को खोजा है, वे मध्य पाषाण से लेकर नव पाषाण काल के हो सकते हैं। 
तिवारी के अनुसार ये शैल चित्र धाऊ पत्थर को पीस कर पतले ब्रश से उकेरे गए हैं। इससे उस समय के लोगों के चित्रकला कौशल की भी जानकारी मिलती है। यह बात सही भी है कि मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत शृंखला में भीमबेटका में खोजे गए शैल चित्र जिस प्रकार चर्चित हुए, देश में इस प्रकार के कई धरोहरों को वैसा सम्मान नहीं मिल पाया। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र में खोजे गए शैल चित्र भी उन्हीं श्रेणी के हैं, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
पुरातत्व विज्ञानियों ने पुरापाषाण, मध्य पाषाण और नव पाषाण काल के अवशेषों के लिए विंध्य कैमूर शृंखला और गंगा के मैदानी इलाकों की मानव सभ्यता के इतिहास के प्रमुख स्थलों के रूप में पहचान की है। कैमूर पर्वतीय क्षेत्र उनमें काफी महत्व रखता है।  तिवारी ने जिले के दक्षिणी भाग में कैमूर पहाड़ी पर 21 नए रॉक शेल्टर की खोज की है जो शैल चित्रों के विशाल खजाने साबित हो सकते हैं। कार्बन डेंटिंग पद्धति से कालावधि के बारे में निर्धारण कर इन्हें इनकी सही पहचान देना बहुत जरूरी है। इनके संरक्षण की जरूरत है, क्योंकि इनका लगातार क्षरण हो रहा है।
कैमूर की पहाड़ियों में खोजे गए शैल चित्र मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाए पाषाण चित्रों की तरह अमूल्य है और लगातार इनका क्षरण हो रहा है। ये बिखरे पड़े हैं। इस उत्साही पुरातत्व प्रेमी ने दुर्लभ शैल चित्र वाले रॉक शेल्टर को रोहतास के नौहट्टा के बजरमरवा के धानी बांध जंगल के पास खोज निकाला है।
उन्होंने तिलौथू में फुलवरिया में गड़के और कछुआर की पहाड़ियों में तीन शैल आश्रय में बने शैल चित्रों की खोज की है। इसके अलावा अघौरा प्रखंड के बेचिरागी महाकोल में पांच, बनरमोरा पहाड़ी में दो शैल आश्रयों, दारीहारा में दो, सड़की में तीन, सारोदाग के करमू चौतरा पहाड़ी में दो और तुरवाडीह जंगल में तीन शैल आश्रय मिले हैं।
तिवारी बताते हैं कि शैल आश्रयों में शैल चित्रों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि कैमूर की इन पहाड़ियों में प्राचीन काल में बस्तियां बसी थी, जो अब धरोहर और साक्ष्य के रूप में विशाल चट्टानों पर दर्ज हो चुके हैं। इन्हें गुफाओं में रहने के दौरान मानवों ने अंकित किया है। कैमूर के पर्वतीय क्षेत्रों में मिले इन शैल चित्रों में बाघ जैसे पशु को मानव द्वारा पालतू कुत्तों के जरिए घेरते हुए दिखाया गया है। शैल चित्रों में सूअर, बाघ, बैल आदि पालतू जानवरों को दिखाया गया है। सारोदाग में एक गैंडे का चित्र बना है।
धर्मशालामान में हाथी और उसके बच्चों के भागने और हिरण के शिकार को दर्शाया गया है। वहीं दारीहारा में चनैनमान में एक अज्ञात लिपि भी दिखी है। बंधा गांव के दक्षिण में चनैन मान से मिले शैलचित्र में नाच करते महिला पुरुष और पालतू पशुओं को दर्शाया गया है। इससे पहले रोहतास में सेनुवार, सकास, मलांव और कैमूर के अकोढी आदि गांवों में नवपाषाण काल के अवशेषों की खोज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास और पुरातत्व विभाग ने की थी।
प्रो बीपी सिंह के निर्देशन में हुई खुदाई के बाद रेडियो कार्बन डेटिंग पद्धति से जांच के बाद इन अवशेषों के 2200 से 1950 ईस्वी पूर्व के होने के प्रमाण मिले हैं। सारण के चिरांद में पाए गए नव पाषाण युग के अवशेषों से भी पहले के हैं।
डा तिवारी कहते हैं कि कैमूर की पहाड़ियों में फैले इन शैल चित्रों की खोज का काम 1867 में ब्रिटिश काल में हुआ था। उसके बाद बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के सदस्यों ने कुछ शैल आश्रय की खोज की। 1999-2000 में कर्नल उमेश प्रसाद की अगुआई में भी कुछ शैल आश्रयों पर नजर पड़ी थी।
नई खोजी गई रॉक पेंटिंग्स के बारे में ध्यान दिलाने पर जिलाधिकारी अनुपम कुमार ने कहा कि हजारों साल पुराने शैल चित्र और शैल आश्रय मानव विकास इतिहास के साक्षी हैं। ये धरोहर हैं। कला संस्कृति विभाग को इनके संरक्षण के बारे ध्यान दिलाया जाएगा।  (सासाराम, 19 सितंबर (भाषा)।
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Mesolithic period rock paintings kaimur hills - India

4 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) September 21, 2011 6:13 AM  

इतिहास से मुझे भी कुछ खास लगाव है।

Dr. Mandhata Singh September 21, 2011 9:06 PM  

संदीपजी जी इतिहास से आपके लगाव की बात जानकर बड़ी खुशी हुई।

Rahul Singh September 21, 2011 9:30 PM  

अज्ञात लिपि, जिसका उल्‍लेख है, का चित्र होता तो अच्‍छा होता.

ब्लॉ.ललित शर्मा September 23, 2011 6:28 PM  

रोचक जानकारी, अच्छी पोस्ट - आभार

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