Wednesday, August 10, 2011

सातवीं दिल्ली की स्थापना मुगल बादशाह शाहजहां ने की


  भोजीला पहाड़ी पर बनाई गई थी जामा मस्जिद


    सातवीं दिल्ली की स्थापना मुगल बादशाह शाहजहां ने की और इसके लिए 1638 में यमुना के पश्चिम में व सलीमगढ़ किले के दक्षिण में एक ऊंचा स्थल चुना गया। इसके पश्चिमोत्तर भाग को झोजीला पहाड़ी और मध्य भाग को भोजीला पहाड़ी कहा जाता था। भोजीला पहाड़ी पर ही प्रसिद्ध जामा मस्जिद बनवाई गई, जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।
पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक शाहजहांनाबाद को घेरने वाली प्राचीर 1650 में बनी। इसके निर्माण में चार महीने और डेढ़ लाख रुपए लगे थे। पहले यह दीवार पत्थरों से बनाई गई थी लेकिन मिट्टी की चिनाई के कारण यह पहली बारिश के बाद नष्ट हो गई। बाद में इसका पुनर्निर्माण कराया गया और चिनाई चूने से की गई। 27 फुट ऊंची और 12 फुट चौड़ी इस प्राचीर में 30 फुट ऊंची 27 बुर्जियां भी बनवाई गईं लेकिन इसमें तोप चढ़ाने की व्यवस्था नहीं थी।
शहर की योजना सन 1857 तक अपने मूल रू प में मौजूद रही। लेकिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की जीत के बाद शहर और किले का मूल रू प काफी बदल गया। जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा किया तो उन्होंने इस प्राचीर की मरम्मत की और गोलाकार बुर्जियों का आकार बढ़ा कर तोप चढ़ाने की व्यवस्था की गई।
शाहजहां ने व्यवस्थित आवागमन के लिए प्राचीर में कई छोटे बड़े दरवाजे और खिड़कियां बनवाई थीं। 1857 के विद्रोह से पहले तक यहां चौदह दरवाजे थे लेकिन आज इनमें से केवल चार दरवाजे दिल्ली दरवाजा, तुर्कमान दरवाजा, कश्मीरी दरवाजा और अजमेरी दरवाजा ही शेष हैं। इनका नामकरण शहरों की ओर जाने वाले रास्तों के नाम पर किया गया था।
इतिहासकारों के मुताबिक शाहजहां ने प्राचीर के अंदर कई मस्जिदों, बगीचों, हवेलियों और अन्य भवनों का भी निर्माण कराया था। ऊंचे पदाधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भव्य हवेलियां बनवाईं थीं। प्रमुख हवेलियों में दिल्ली दरवाजे के पास सआदुल्ला खान की हवेली, तुर्कमान दरवाजे के पास मुजफ्फर खान की हवेली, अजमेरी दरवाजे के पास खलीउल्ला खान की हवेली और मीर जुमला की हवेली शामिल थी। शाहजहां की बसाई पुरानी दिल्ली यानी शाहजहांनाबाद को मीर तकी मीर ने ‘आलम ए इंतिखाब’ कहा था। पहले दिल्ली के कई इलाके परकोटों से घिरे थे, जो हमलों से बचाने या शहर से कर एकत्र करने की सुविधा के लिए बनाए गए थे।
सन 1857 में ब्रिटिश सेना विद्रोह को दबाने के लिए सक्रिय हुई। हताशा में सैनिकों ने बहुत तोड़फोड़ की और इस परकोटे का भी बड़ा हिस्सा तोड़ दिया गया। इसके बाद शाहजहांनाबाद एक खुला शहर बन गया। इसका विस्तार पश्चिम में सदर बाजार तक और उत्तर में सिविल लाइंस तक किया गया। रेलवे की योजना बनी तो ट्रेन अंदर आ सके, इसके लिए दीवार का कुछ हिस्सा फिर तोड़ा गया। देश के विभाजन के बाद बड़ी संख्या में शाहजहांनाबाद के लोग पाकिस्तान चले गए और वहां के प्रवासियों ने यहां आ कर उनके मकानों पर कब्जा कर लिया।
आजादी के बाद शाहजहांनाबाद को तेजी से फैलती नई दिल्ली के साथ एकीकृत कर दिया गया। यहां से बिजली का सामान, कपड़ा और अन्य वस्तुएं पूरे उत्तर भारत में जाने लगीं और उन पर ‘द वाल्ड सिटी’ का लेबल लगा होता था। बदलते समय के साथ शाहजहांनाबाद में भी बदलाव हुआ। मकान दुकान में बदले, दुकानें छोटे उद्योगों में बदलीं। हवेलियां हिस्सों में बंट गईं। छोटे-छोटे मकानों और दुकानों के समूह को ‘कटरा’ कहा गया।(साभार-नई दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा)। 
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