Thursday, December 31, 2009

नष्ट हो रही है त्रिपुरा की ७०० साल पुरानी एक कलाकृति

खबरों में इतिहास ( भाग-४)

अक्सर इतिहास से संबंधित छोटी-मोटी खबरें आप तक पहुंच नहीं पाती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए इतिहास ब्लाग आपको उन खबरों को संकलित करके पेश करेगा, जो इतिहास या मिथकीय इतिहास से संबंधित होंगी। मूल रूप में देने के साथ इन खबरों का मूल लिंक भी है ताकि आपको मूल स्रोत की पहचान और प्रमाणिकता भी बनी रहे। इस अंक में पढ़िए--------।

१-नष्ट हो रही है त्रिपुरा की ७०० साल पुरानी एक कलाकृति


२-झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम




  
दक्षिण त्रिपुरा के घने जंगलों में पहाड़ पर उकेरी गई ५०० से लेकर ७०० साल पुरानी देवी प्रतिमा (कलाकृति ) उपेक्षित पड़ी हुई है। इतिहास के पन्नों में बतौर साक्ष्य जुड़ने से पहले ही नष्ट होने की कगार पर है। जहां यह पुरातात्विक महत्व की प्रतिमा अवस्थित है, वह इलाका देवतामुरा कहलाता है और पूरी तरह से निर्जन है। इसके ६० किलोमाटर के दायरे में सिर्फ घना जंगल है। गोमती नदी यहां से होकर गुजरती है। नदी के सतह से करीब २०० फीट सीधे ऊपर पहाड़ पर हिंदू देवी ( संभवतः दुर्गा ) की आकृति तराशी गई है।

दक्षिण त्रिपुरा के अमरपुर के पास रांगामांटी घाट से गोमती नदी में नाव से यहां पहुंचने में करीब तीन-चार घंटे लग जाते हैं। वही लौटनें में पांच घंटे से ज्यादा समय लग जाता है। लौटनें में ज्यादा समय इसलिए लगता है क्यों कि नाव को तब नदी की धारा के विपरीत चलना होता है। देवतामुरा चारों तरफ से हरियाली से घिरा ऐसा निर्जन इलाका है जहीं की नीरवता सिर्फ पक्षियों के यदा-कदा कोलाहल से ही टूटता है। त्रिपुरा के मशहूर कलाकार स्वपन नंदी, त्रिपुरा सरकार के सूचना, सास्कृतिक मामले व पर्यटन विभाग में निदेशक रह चुके सुभाष दास और एक आईटी प्रोफेशनल विशवजीत भट्टाचार्य व नाव खेने वाले केवट धर्म जमातिया ने इस इलाके का यात्रा की। विश्वजीत के मुताबिक यहां से गुजरना उस अमेजन नदी से गुजरने जैसा हो जिसमें अनाकोंडा का खौफ न हो। धर्म जमातीया का कहना है कि कुछ ङठी लोग ही यहां सकते हैं।

सुभाष दास की राय में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि सीधे पहाड़ पर जहां खड़े होने की भी जगह नहीं है, हिंदू देवी की आकृति प्राचीन कलाकारों ने कब तराशी होगी ? उनकी राय में यह ५०० से लेकर ७०० वर्ष तक पुरानी होगी।

कहा जाता है कि अमरपुर के राजा अमर माणिक्य ( १५७७- ८६ ई.) को मुगल शासक होतन खान आक्रमण करके हरा दिया। राजपाट छिन जाने पर राजा अमर ने गोमती नदी वाले घने जंगल में नदी के किनारे शरण ली। कहते हैं कि उनके साथ एक कलाकार ( मूर्तिकार ) भी था। शायद उसी ने इस दुर्म पहाड़ पर देवी दुर्गा जैसी आकृति पहाड़ काटकर बनाई होगी। इस स्थल को देखने गईं इस टीम को वहां लोहे के कुछ टुकड़े मिले जो इनकी राय में बंदूकों से चली गोलियां हैं। इन्हें देवी की आकृति के पास फायर की गई गोलियों से निशान भी देखने को मिले। इस बारें में स्वपन नंदी का कहना है कि यहां से नदी के रास्ते से गुजर रहे मुगल सिपाहियों ने शायद फायर किए होंगे। स्वपन नंदी इसे देवी दुर्गा की आकृति मानते हैं।नंदी के मुताबिक यहां मुगल सिपाही आए रहे होंगे और दुर्गा देवी की आकृति नष्ट करने की मंशा से फायर किए होंगे। नंदी आकृति के पास ही सुरा के ऐसे गिलास की आकृति होने की बात कहते हैं जिसे मुगल प्रयोग में लाते थे। उनका कहना है कि जब इस आकृति को मुगल सिपाही नष्ट नहीं कर पाए तो वहीं देवी की आकृति के नीचे एक सुरा की गिलास भी बना दिया। फिलहाल इस दुर्गम जगह में अवस्थित इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य का कई सालों से संरक्षण स्वपन नंदी और कुछ स्थानीय कलाकार कर रहे हैं। वे अमरपुर में ठहरकर देवतामुरा जाते हैं।


सुभाष दास की राय में इस स्थल को इतिहास के पन्नों में जोड़ने के लिए विशेषग्यों की तलाश है। कहते हैं कि देवतामुरा की आकृति कलाकारों ने कैसे तराशी होगी जबकि वहां खड़ा होना भी मुश्किल है। छिन्नी व हथौड़ियों के सहारे इस दुर्गम स्थल पर उन साधनहीन दिनों में ऐसी कलाकारी का नमूना पेश करना ताज्जुब की बात है। अगर आप उस स्थल को देखें तो आपको भी लगा होगा कि कलाकार वहां कैसे पहुंचे होंगे। यह प्राचीन युग का चमत्कार ही है। दास का कहना है कि उन्होंने दुनिया के की हैरतअंगेज स्थलों का दौरा किया है मगर देवतामुरा का यह पुरातात्विक महत्व का स्थल कम आश्चर्यजनक नहीं है। इसके बादजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और त्रिपुरा राज्य सरकार ने इसके संरक्षण में कभी रुचि नहीं दिखाई। यह आकृति संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही है। इतिहास के साक्ष्यों के प्रति ऐसी उदासीनता अक्षम्य है। या फिर कह सकते हैं इसको राजकीय संरक्षण देने के जिम्मेदार लोगों में इतिहास बोध का अभाव है। इन लोगों की राय में अगर फौरन संरक्षण नहीं मिला तो चार पांच सालों में यह कलाकृति में नष्ट हो जाएगी।

झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं बहादुरशाह जफर की पौत्रवधू


 आज के चमकते-दमकते और आर्थिक रू प से तेजी से बढ़ते भारत में इतिहास के सशक्त हस्ताक्षरों के वंशजों की दशा के बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं है। शायद इसीलिए मुगल शासन के अंतिम बादशाह बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम  आज झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं।
बहादुरशाह जफर की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम वर्तमान में कोलकाता की एक छोटी-सी झुग्गी में रहती हैं और जीवन-यापन के लिए वह एक चाय की दुकान चला रही हैं। अब मुगलकाल के अंतिम नरेश की प्रपौत्र वधू सुल्ताना बेगम की जिंदगी को झुग्गियों से निकालने के लिए आगे आए हैं पत्रकार शिवनाथ झा। इस के लिए झा ने ‘प्राइम मिनिस्टर्स आॅफ इंडिया- भारत भाग्य विधाता’ नामक एक किताब लिखी है, जिसमें 1947 से अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल का लेखा-जोखा है।

झा इस किताब के माध्यम से सुल्ताना की जिंदगी को झुग्गियों से निकालने के काम में लगे हैं। झा इसमें सुल्ताना की दुर्दशा की कहानी को बताने के साथ ही, किताब की बिक्री से अर्जित राशि को सुल्ताना के जीवनस्तर को सुधारने में लगाएंगे। झा ने बताया कि मैंने इससे पहले शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां और 1857 के सैन्य विद्रोह के महान योद्धा टात्या टोपे के वंशज विजयराव टोपे को किताबों के माध्यम से आर्थिक मदद देने का सफल प्रयास किया। 2006 से मैं हरेक साल इस तरह के किसी एक व्यक्ति के ऊपर किताब लिखता हूं, जिससे उस व्यक्ति के जीवन स्तर में कुछ सुधार किया जा सके।

शिवनाथ ने कहा कि बिस्मिल्लाह खां साहब और टोपे की हमने हरसंभव मदद करने की कोशिश की। अब बारी सुल्ताना बेगम की है। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडेÞ सभी लोगों से इस तरह के लोगों को सहायता देने की अपील करते हुए कहा कि हम सभी को इस काम के लिए अपने-अपने स्तर से प्रयास करना चाहिए। अंग्रेजी भाषा में छपी ‘प्राइममिनिस्टर्स आॅफ इंडिया- भारत भाग्य विधाता’ में कुल 444 पन्ने हैं और इसमें जाने-माने इतिहासकार विपिन चंद्रा, लेखक इंद्रजीत बधवार, पत्रकार वीर सांघवी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद आदि लेखकों ने अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की समीक्षा की है।

इस किताब में कुछ ऐसे दुर्लभ फोटो लगाए गए हैं, जो आम तौर पर उपलब्ध नहीं होते। इसकी ऊंची कीमत इसको आम आदमी के पहुंच से दूर कर देती है। इस किताब की कीमत सात हजार नौ सौ 95 रुपए रखी गई है। लेकिन झा को उम्मीद है कि इस बार भी उनका प्रयास सफल होगा।( भाषा )।
 

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